Bihar Board Class 12 Philosophy Question Paper 2023 with Answer Key pdf is available for download here. The exam was conducted by Bihar School Examination Board (BSEB). The question paper comprised a total of 138 questions divided among 2 sections.

Bihar Board Class 12 Philosophy Question Paper 2023 with Answer Key

Bihar Board Class 12 Philosophy Question Paper 2023 PDF Bihar Board Class 12 Philosophy Answer Key 2023 PDF
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Question 1:

योग दर्शन में ‘चित्तवृत्ति निरोध’ को क्या कहते हैं?

  • (1) समाधि
  • (2) योग
  • (3) प्राणायाम
  • (4) ईश्वर
Correct Answer: (2) \(\textbf{योग}\)
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व्याख्या:

पतंजलि के योगसूत्र 1.2 में स्पष्ट है—“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात् मन की वृत्तियों के निरोध (नियंत्रण/स्थिरता) का नाम योग है।


तर्क:

समाधि योग-अंगों (अष्टाङ्ग) का एक परिणाम है; प्राणायाम एक अंग भर है; ‘ईश्वर’ योगसूत्र में विशेष पुरुष (ईश्वर-प्रणिधान) के रूप में आता है। परिभाषा सीधे ‘योग’ शब्द से जुड़ी है, इसलिए सही विकल्प योग है।
Quick Tip: योगसूत्र 1.2 को याद रखें—\(\textbf{“योग = चित्तवृत्ति-निरोध”}\); इसके आधार पर भ्रमित करने वाले विकल्प अलग हो जाते हैं।


Question 2:

भारतीय दर्शन की उत्पत्ति किससे मानी जाती है?

  • (1) पलायनवादी प्रवृत्ति
  • (2) निराशावादी दृष्टिकोण
  • (3) भौतिक सुख-प्राप्ति की कामना
  • (4) आध्यात्मिक असन्तोष
Correct Answer: (4) \(\textbf{आध्यात्मिक असन्तोष}\)
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भावार्थ:

भारतीय दर्शनों (श्रमण परम्परा, उपनिषद् आदि) की खोज का मूल प्रेरण-तत्व आध्यात्मिक असन्तोष/मुक्ति-अन्वेषण है—“क्या है परम सत्य? दुःख-निवृत्ति कैसे?”


भ्रम-निवारण:

न पलायनवादी, न निराशावादी; न ही केवल भौतिक सुख। लौकिक सफलताओं के बावजूद अंतिम शान्ति/मोक्ष का अन्वेषण ही मूल प्रेरणा है। इसलिए ‘आध्यात्मिक असन्तोष’ उपयुक्त कारण है।
Quick Tip: कुंजी शब्द: \(\textbf{मुक्ति-अन्वेषण/आध्यात्मिक असन्तोष}\)—उपनिषद् व बौद्ध- जैन परम्परा दोनों का साझा प्रेरक।


Question 3:

अद्वैत वेदान्त के अनुसार ‘जगत’ की सत्ता क्या है?

  • (1) पारमार्थिक
  • (2) व्यवहारिक
  • (3) प्रातिभासिक
  • (4) इनमें से सभी
Correct Answer: (2) \(\textbf{व्यवहारिक सत्ता}\)
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स्तर-त्रयी:

अद्वैत में पारमार्थिक (ब्रह्म—एकमेव सत्य), व्यवहारिक (जगत—मिथ्या/व्यावहारिक सत्य), और प्रातिभासिक (स्वप्न/भ्रम) तीन स्तर बताए जाते हैं।


निष्कर्ष:

जगत परमार्थ में ब्रह्म से भिन्न नहीं, पर अनुभव-व्यवहार में सत्य जैसा प्रतिष्ठित होता है—इसीलिए उसे व्यवहारिक सत्ता कहा जाता है; प्रातिभासिक पूरी तरह भ्रान्तिपूर्ण स्तर है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{ब्रह्म = पारमार्थिक}\), \(\textbf{जगत = व्यवहारिक}\), \(\textbf{स्वप्न/भ्रम = प्रातिभासिक}\)।


Question 4:

चार्वाक, बौद्ध और जैन किस दार्शनिक सम्प्रदाय में आते हैं?

  • (1) आस्तिक
  • (2) नास्तिक
  • (3) आस्तिक एवं नास्तिक दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) \(\textbf{नास्तिक}\)
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मानदण्ड:

भारतीय परम्परा में ‘आस्तिक/नास्तिक’ का मानक वेद-प्रामाण्य है—जो वेद को प्रमाण मानता वह आस्तिक, जो नहीं मानता वह नास्तिक।


तथ्य:

चार्वाक भौतिकवादी, वेद-प्रामाण्य अस्वीकार; बौद्ध व जैन भी वेद को अंतिम प्रमाण नहीं मानते। अतः ये तीनों नास्तिक वर्ग में हैं (ईश्वर-स्वीकार/अस्वीकार इससे भिन्न प्रश्न है)।
Quick Tip: ‘आस्तिक/नास्तिक’ = \(\textbf{वेद-प्रामाण्य}\) का पैमाना—ईश्वर-स्वीकार नहीं।


Question 5:

स्याद्वाद को समझाने के लिए जैन दर्शन में कितने ‘नयों/भंगियों’ का प्रतिपादन किया गया?

  • (1) चार
  • (2) पाँच
  • (3) सात
  • (4) नौ
Correct Answer: (3) \(\textbf{सात}\)
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सिद्धान्त:

जैन स्याद्वाद/सप्तभंगी कथन-प्रणाली में वस्तु का निरूपण सात संभावित प्रकारों से होता है—स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् अस्ति नास्ति, स्यात् अवक्तव्य, स्यात् अस्त्यवक्तव्य, स्यात् नास्त्यवक्तव्य, स्यात् अस्ति नास्त्यवक्तव्य।


भावार्थ:

वस्तु अनेकान्त है; संदर्भ, काल, द्रव्य, क्षेत्र के अनुसार कथन बदलता है। इसलिए ‘सात’ भंगियाँ सही उत्तर है।
Quick Tip: कुंजी: \(\textbf{जैन = अनेकान्तवाद; स्याद्वाद = सप्तभंगी (7)}\)—सूची के 3–4 रूप याद रखें।


Question 6:

भारतीय दर्शन की मूल दृष्टि है

  • (1) बौद्धिक
  • (2) विश्लेषणात्मक
  • (3) आध्यात्मिक
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) \(\textbf{आध्यात्मिक}\)
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भारतीय दर्शन का मूल प्रेरक मुक्ति/परम-कल्याण की खोज है, इसलिए इसकी दृष्टि मूलतः आध्यात्मिक मानी जाती है। उपनिषदों से लेकर बौद्ध-जैन, योग, वेदान्त—सभी का केन्द्र दुःखनिवारण, आत्म-साक्षात्कार, ब्रह्म/निर्वाण/कैवल्य जैसी परम अवस्था है। बौद्धिक तर्क, विश्लेषण, मीमांसा अवश्य प्रयुक्त होते हैं, पर वे साधन हैं; लक्ष्य आंतरिक शान्ति और परम सत्य की प्राप्ति है। अतः विकल्प (3) उपयुक्त है।
Quick Tip: कुंजी वाक्य: \(\textbf{“भारतीय दर्शन = आध्यात्मिक साध्य, तर्क केवल साधन।”}\)


Question 7:

निष्काम कर्म का मूल सिद्धान्त है।

  • (1) शारीरिक सुख
  • (2) कर्तव्य के लिए कर्तव्य
  • (3) भौतिक सुख
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) \(\textbf{कर्तव्य के लिए कर्तव्य}\)
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गीता का सिद्धान्त—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”—कर्म को फलासक्ति से रहित होकर करना है। यह न शारीरिक/भौतिक सुख की लालसा है, न अकर्म; बल्कि स्थितप्रज्ञ भाव से अपने धर्म/कर्तव्य का अनुष्ठान। ऐसे कर्म से चित्त-शुद्धि होती है, राग-द्वेष शांत होते हैं और योग्यता बढ़ती है। फल की प्राप्ति ईश्वराधीन/प्रकृति-नियमाधीन मानी जाती है; साधक का ध्यान केवल सम्यक् कर्म पर। इसलिए मूल सिद्धान्त—कर्तव्य के लिए कर्तव्य।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{निष्काम = कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं}\) — फलासक्ति त्याग।


Question 8:

निम्न में से कौन-सी वेदान्त की शाखा नहीं है?

  • (1) अद्वैत
  • (2) विशिष्टाद्वैत
  • (3) द्वैतवाद
  • (4) क्षणिकवाद
Correct Answer: (4) \(\textbf{क्षणिकवाद}\)
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वेदान्त की प्रमुख धाराएँ—अद्वैत (शंकर), विशिष्टाद्वैत (रामानुज), द्वैत (माध्व) आदि—उपनिषद्-आधारित ब्रह्म-जीव-जगत सम्बन्ध समझाती हैं। क्षणिकवाद (क्षणभंगुरवाद) बौद्ध सिद्धान्त है, जिसके अनुसार द्रव्य/धर्म क्षण-क्षण में उत्पन्न-व्यर्थ होते हैं; यह वेदान्त परम्परा का अंश नहीं। इसलिए (4) सही उत्तर है।
Quick Tip: \(\textbf{वेदान्त त्रयी}\) याद रखें—अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत; \(\textbf{क्षणिकवाद = बौद्ध}\)।


Question 9:

निम्नलिखित में से कौन-सा एक पारार्थानुमान का घटक नहीं है?

  • (1) उपनय
  • (2) उदाहरण
  • (3) हेतु
  • (4) परामर्श
Correct Answer: (4) \(\textbf{परामर्श}\)
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न्याय के पञ्चावयव पारार्थानुमान के पाँच अवयव हैं—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन। इनमें उदाहरण (व्याप्ति-दृष्टान्त) और उपनय (व्याप्ति का विषय पर लागू करना) आवश्यक चरण हैं। परामर्श पाँच अवयवों में नहीं आता; अतः वही घटक नहीं है।
Quick Tip: पाँचों अवयव रटें: \(\textbf{प्रतिज्ञा–हेतु–उदाहरण–उपनय–निगमन}\); जो इसमें न हो, वही गलत विकल्प।


Question 10:

वैशेषिक दर्शन का दूसरा नाम क्या है?

  • (1) औलूक्य
  • (2) उल्लूक
  • (3) ऐलूक
  • (4) इनमें से सभी
Correct Answer: (1) \(\textbf{औलूक्य}\)
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वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक कणाद को परम्परा में औलूक/औलूक्य भी कहा गया; इसलिए वैशेषिक को औलूक्य दर्शन भी कहते हैं। यह द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय आदि पदार्थों के विश्लेषण पर आधारित यथार्थवादी दर्शन है। ‘उल्लूक/ऐलूक’ रूप प्रचलित शुद्ध नाम नहीं; मान्य दूसरा नाम औलूक्य है।
Quick Tip: सह-स्मरण: \(\textbf{कणाद = औलूक/औलूक्य}\); वैशेषिक = \(\textbf{पदार्थ-न्याय}\)।


Question 11:

ईश्वर की सत्ता के लिए ‘नैतिक युक्ति’ (Moral Argument) का समर्थन किसने किया है?

  • (1) कान्ट
  • (2) देकार्त
  • (3) स्पिनोज़ा
  • (4) ह्यूम
Correct Answer: (1) \(\textbf{कान्ट}\)
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इमैनुएल कान्ट ने ईश्वर-प्रमाण के बौद्धिक/मीमांसीय रूपों (सत्तात्मक, कारणात्मक आदि) पर शंका की, पर व्यावहारिक बुद्धि से एक नैतिक युक्ति दी। उनके अनुसार नैतिक विधान हमें सर्वोत्तम कल्याण (Summum Bonum)—जहाँ सद्गुण के अनुपात में सुख मिले—के लिए बाध्य करता है। यह लक्ष्य संसार में पूर्णतया संभव मानने हेतु तीन व्यावहारिक उपपत्ति माननी पड़ती हैं: स्वतंत्रता, आत्मा की अमरता, और ईश्वर (नैतिक विश्व-व्यवस्था का गारंटर)। इसलिए ईश्वर का अस्तित्व सैद्धान्तिक रूप से नहीं, नैतिक अनिवार्यता के रूप में समर्थित है। देकार्त ने मुख्यतः सत्तात्मक/प्रत्यय संबद्ध तर्क दिया, स्पिनोज़ा का दृष्टिकोण सर्वेश्वरवादी है, और ह्यूम ईश्वर-तर्कों के प्रति संशयवादी थे।
Quick Tip: कान्ट = \(\textbf{व्यावहारिक बुद्धि}\) → \(\textbf{Summum Bonum}\) → \(\textbf{तीन उपपत्तियाँ}\): स्वतंत्रता, अमरता, ईश्वर।


Question 12:

कारणता सिद्धान्त है

  • (1) धार्मिक
  • (2) वैज्ञानिक
  • (3) अवैज्ञानिक
  • (4) इनमें से नहीं
Correct Answer: (2) \(\textbf{वैज्ञानिक}\)
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अर्थ:

कारणता (Causality) का तात्पर्य है—हर घटना उपयुक्त परिस्थितियों में किसी कारण-संबंध से उत्पन्न होती है।


विज्ञान में भूमिका:

यह विज्ञान का मूल सिद्धान्त/आधार-मान्यता है; इसी के कारण पूर्वानुमान और नियंत्रित प्रयोग सम्भव होते हैं—यदि कारण व शर्तें पुनरुत्पादित हों तो परिणाम भी पुनरुत्पन्न होगा।


सूक्ष्मता:

आधुनिक भौतिकी में अनिश्चय/प्रायिकता आयी है, फिर भी सांख्यिकीय कारणता (statistical laws) बनी रहती है—नियमिता नष्ट नहीं होती।


दर्शन-संदर्भ:

ह्यूम ने ‘‘आवश्यक संबंध’’ पर सवाल उठाया; भारतीय दर्शनों में भी कारण-वाद (सांख्य का सत्कार्यवाद, न्याय का असत्कार्यवाद) मिलता है। तथापि वैज्ञानिक पद्धति कारणता पर ही टिकती है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{कारणता = विज्ञान की आधार-मान्यता}\) ⇒ भविष्यवाणी, परीक्षण और पुनरावृत्ति सम्भव।


Question 13:

निम्न में से कौन पुरुषार्थ नहीं है?

  • (1) अर्थ
  • (2) धर्म
  • (3) आत्मा
  • (4) मोक्ष
Correct Answer: (3) \(\textbf{आत्मा}\)
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भारतीय आचार-दर्शन में मनुष्य-जीवन के चार प्रयोजन चतुर्वर्ग या पुरुषार्थ कहलाते हैं—धर्म (नैतिक-नीतिक आचरण/कर्तव्य), अर्थ (उपजीविका/सम्पत्ति का न्यायपूर्ण साधन), काम (इच्छाओं/रसों की मर्यादित पूर्ति) और मोक्ष (बंधन-मुक्ति/आध्यात्मिक सिद्धि)। ये चारों जीवन-समन्वय का मार्गदर्शन करते हैं—धर्म इनके लिए नियामक है, मोक्ष सर्वोच्च माना जाता है। आत्मा दार्शनिक सत्ता/तत्त्व है, प्रयोजन नहीं; अतः विकल्प (3) आत्मा पुरुषार्थ नहीं है, जबकि ‘‘काम’’ (जो विकल्पों में नहीं) चौथा पुरुषार्थ है।
Quick Tip: सूत्र याद रखें: \(\textbf{धर्म–अर्थ–काम–मोक्ष}\) = चार पुरुषार्थ; \(\textbf{आत्मा}\) = तत्त्व/सत्ता, पुरुषार्थ नहीं।


Question 14:

ज्ञान प्राप्त करने वाले को क्या कहते हैं?

  • (1) प्रमा
  • (2) अप्रमा
  • (3) प्रमाण
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (4) \(\textbf{इनमें से कोई नहीं}\)
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भारतीय ज्ञानमीमांसा में चार प्रमुख पद प्रयुक्त होते हैं—प्रमाता (ज्ञाता/knower), प्रमाण (ज्ञान का साधन/means of knowledge), प्रमेय (ज्ञेय/object), और प्रमा (यथार्थ/सत्य ज्ञान, valid cognition)। विकल्प (1) प्रमा = यथार्थ ज्ञान; (2) अप्रमा = मिथ्या/अयथार्थ ज्ञान; (3) प्रमाण = प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द आदि साधन; जबकि “ज्ञान प्राप्त करने वाला” प्रमाता कहलाता है, जो विकल्पों में नहीं है। इसलिए उचित उत्तर “इनमें से कोई नहीं” है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{प्रमाता}\) (ज्ञाता) – \(\textbf{प्रमाण}\) (साधन) – \(\textbf{प्रमेय}\) (वस्तु) – \(\textbf{प्रमा}\) (सत्य ज्ञान)। परिभाषाएँ अलग रखें।


Question 15:

‘प्रयोजनमूलक युक्ति’ (Teleological / Pragmatic Argument) सम्बन्धित है—

  • (1) आत्मा के अस्तित्व से
  • (2) कारणता सिद्धान्त से
  • (3) ईश्वर के अस्तित्व से
  • (4) जगत के अस्तित्व से
Correct Answer: (3) \(\textbf{ईश्वर के अस्तित्व से}\)
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क्या है ‘प्रयोजनमूलक’ युक्ति?

इसे उद्देश्यवाद/डिज़ाइन आर्ग्युमेंट भी कहते हैं। तर्क यह है कि प्रकृति में क्रम, सामंजस्य, उद्देश्यपूर्णता और उत्तम अनुकूलन दिखाई देता है—जैसे जटिल जैव-तंत्र, नियमबद्ध प्राकृतिक नियतियाँ, नैतिक व्यवस्था। इतना सुव्यवस्थित ‘डिज़ाइन’ बुद्धिमान नियन्ता/डिज़ाइनर की उपस्थिति का संकेत देता है; इसलिए यह युक्ति सीधे ईश्वर-सत्ता के पक्ष में प्रस्तुत की जाती है।


अन्य विकल्प क्यों नहीं?

(1) आत्मा—उसके लिए चेतनानुभव/अन्तर्दर्शन जैसी अलग युक्तियाँ दी जाती हैं।

(2) कारणता—यह Cosmological (कारण-श्रृंखला) तर्क का आधार है, प्रयोजनमूलक नहीं।

(4) जगत का अस्तित्व—सिर्फ अस्तित्व बताता है; ‘उद्देश्य’ की ओर नहीं ले जाता।


टिप्पणी:

आधुनिक आलोचनाएँ (जैसे विकासवाद) इस तर्क को चुनौती देती हैं; फिर भी अनेक दार्शनिक इसे ‘संभाव्य/प्रायिक’ आधार पर ईश्वर-विश्वास की तर्कसंगति के रूप में स्वीकारते हैं।
Quick Tip: याद रखें—\(\textbf{डिज़ाइन/उद्देश्य दिखे ⇒ बुद्धिमान नियन्ता}\)। \(\textbf{कारण-श्रृंखला = कॉस्मोलॉजिकल}\), \(\textbf{डिज़ाइन = टेलीऑलॉजिकल (प्रयोजनमूलक)}\)।


Question 16:

सर्वेश्वरवाद (Pantheism) के समर्थक कौन हैं?

  • (1) ह्यूम
  • (2) लॉक
  • (3) स्पिनोज़ा
  • (4) कान्ट
Correct Answer: (3) \(\textbf{स्पिनोज़ा}\)
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सर्वेश्वरवाद क्या है?

सिद्धान्त कि ईश्वर = प्रकृति/समस्त अस्तित्व; जगत ईश्वर से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं।


स्पिनोज़ा का तर्क:

स्पिनोज़ा ने Ethics में Substance Monism प्रतिपादित किया—केवल एक ही पदार्थ है जिसे वह “Deus sive Natura” (ईश्वर अथवा प्रकृति) कहता है। मन और शरीर उसी एक पदार्थ के गुण/रूप (attributes/modes) हैं; अतः ईश्वर संपूर्ण प्रकृति के रूप में अंतर्भूत (immanent) है, बाहर से नियंत्रक नहीं।


अन्य विकल्प क्यों नहीं?

ह्यूम—अनुभववादी/संशयवादी; ईश्वर-तर्कों की आलोचना। लॉक—ईश्वर-विश्वासी पर पैनथीस्ट नहीं। कान्ट—व्यावहारिक बुद्धि से ईश्वर-उपपत्ति देता है, सर्वेश्वरवाद नहीं। इसलिए सही उत्तर स्पिनोज़ा।
Quick Tip: स्मरण सूत्र: \(\textbf{“Deus sive Natura” = स्पिनोज़ा ⇒ ईश्वर और प्रकृति एक ही—यही \(\textbf{सर्वेश्वरवाद}\)}\)।


Question 17:

निम्न में से किस युक्ति का कहना है कि ईश्वर का अस्तित्व, ईश्वर के विचार से \(\textbf{अनिवार्यतः}\) फलित होता है?

  • (1) विश्वमूलक युक्ति
  • (2) कारणतामूलक युक्ति
  • (3) तार्किक युक्ति
  • (4) प्रयोजनमूलक युक्ति
Correct Answer: (3) \(\textbf{तार्किक युक्ति}\)
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इसे सत्तात्मक/ओन्टोलॉजिकल तर्क भी कहते हैं (एंसल्म, बाद में देकार्त)। आधार-कल्पना: “सर्वोत्तम/परम परिपूर्ण सत्ता” (that than which nothing greater can be conceived) का विचार करते ही उसका अस्तित्व मानना पड़ता है, क्योंकि अस्तित्व परिपूर्णता का आवश्यक गुण है; केवल मानसिक अस्तित्व से बढ़कर वास्तविक अस्तित्व अधिक पूर्ण होगा—अतः परम परिपूर्ण सत्ता वास्तविक रूप में अवश्य है। इसलिए ईश्वर का अस्तित्व परिकल्पना से ही तार्किक निष्कर्ष की तरह निकाला जाता है, बाह्य अनुभव/कारण या प्रयोजन की ज़रूरत नहीं।


आलोचना (संक्षेप): कान्ट ने कहा—“अस्तित्व” कोई गुण नहीं; अवधारणा से अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। फिर भी यह तर्क ईश्वर-मीमांसा में विशिष्ट तार्किक मार्ग के रूप में जाना जाता है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{Ontological = तार्किक}\) (विचार से अस्तित्व); \(\textbf{Cosmological = कारण-श्रृंखला}\); \(\textbf{Teleological = प्रयोजन/डिज़ाइन}\)।


Question 18:

महावीर को निर्वाण कहाँ प्राप्त हुआ?

  • (1) पावापुरी
  • (2) बोधगया
  • (3) कुशीनगर
  • (4) राजगीर
Correct Answer: (1) \(\textbf{पावापुरी}\)
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जैन परम्परा के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने अपना अन्तिम उपदेश देकर पावापुरी (आज का नालंदा ज़िला, बिहार; प्राचीन नाम—अपापपुरी) में निर्वाण/मोक्ष प्राप्त किया। स्मृति-चिह्न रूप में यहाँ जल-मन्दिर स्थित है।


भ्रम निवारण: बोधगया बुद्ध के सम्बोधि (ज्ञानप्राप्ति) का स्थल है; कुशीनगर बुद्ध के महापरिनिर्वाण का; राजगीर महावीर और बुद्ध दोनों की विहार-भूमि रही, पर महावीर का निर्वाण वहीं नहीं हुआ। अतः सही उत्तर पावापुरी है।
Quick Tip: याद रखें—\(\textbf{महावीर: पावापुरी (निर्वाण)}\); \(\textbf{बुद्ध: बोधगया (ज्ञान), कुशीनगर (परिनिर्वाण)}\)—तीनों को साथ में जोड़कर याद करें।


Question 19:

कितने पदार्थों को वैशेषिक स्वीकार करता है?

  • (1) तीन
  • (2) चार
  • (3) पाँच
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (4) \(\textbf{इनमें से कोई नहीं}\)
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वैशेषिक में पदार्थ (Categories) का पारंपरिक वर्गीकरण छः है—द्रव्य (Substance), गुण (Quality), कर्म (Action), सामान्य (Universal), विशेष (Particularity) और समवाय (Inherence)। बाद की न्याय–वैशेषिक परम्परा में अभाव (Non-existence) को भी जोड़ा गया, जिससे गणना सात कही जाती है। दिए गए विकल्पों (3, 4, 5) में न तो 6 और न 7 शामिल है, इसलिए उपयुक्त चयन “इनमें से कोई नहीं” है। परीक्षा में सामान्यतः “क्लासिकल वैशेषिक” पूछे जाने पर उत्तर छः पदार्थ माना जाता है—यह भेद याद रखें।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{द्रव्य–गुण–कर्म–सामान्य–विशेष–समवाय}\) = \(\textbf{6}\); बाद में \(\textbf{अभाव}\) जोड़ने पर \(\textbf{7}\)। विकल्पों में 6/7 न हो तो “\(\textbf{इनमें से कोई नहीं}\)”。


Question 20:

‘ऋण’ की अवधारणा सम्बन्धित है—

  • (1) ब्रह्मचर्याश्रम से
  • (2) गृहस्थाश्रम से
  • (3) वानप्रस्थाश्रम से
  • (4) संन्यासाश्रम से
Correct Answer: (2) \(\textbf{गृहस्थाश्रम}\)
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धर्मशास्त्रीय परम्परा में मनुष्य जन्म से त्रि–ऋण का भागी माना गया है—देव ऋण (यज्ञ/उपासना द्वारा), ऋषि ऋण (अध्ययन–अध्यापन/विद्या-संरक्षण द्वारा), और पितृ ऋण (संतानोत्पत्ति, पितृ-तर्पण तथा वंश-रक्षा द्वारा)। इन तीनों का व्यावहारिक निर्वह मुख्यतः गृहस्थाश्रम में सम्भव है, क्योंकि गृहस्थ ही अर्थोपार्जन, यज्ञ-दान-तर्पण, अतिथि-सत्कार और अन्य आश्रमों (ब्रह्मचारी/वानप्रस्थी/संन्यासी) का भरण-पोषण करता है। ब्रह्मचर्य में तैयारी, वानप्रस्थ/संन्यास में वैराग्य-उन्मुख साधना प्रधान रहती है; ऋण-परिहार का प्रमुख कर्म-क्षेत्र गृहस्थाश्रम है। अतः सही उत्तर (2) है।
Quick Tip: त्रि–ऋण याद रखें: \(\textbf{देव–ऋषि–पितृ}\) ⇒ इनका व्यावहारिक निर्वह = \(\textbf{गृहस्थाश्रम}\)।


Question 21:

‘तत्त्वचिन्तामणि’ पुस्तक के लेखक कौन हैं?

  • (1) उदयन
  • (2) गंगेश
  • (3) गौतम
  • (4) प्रशस्तपाद
Correct Answer: (2) \(\textbf{गंगेश}\)
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‘तत्त्वचिन्तामणि’ नव्यमीमांसा/नव्य-न्याय परम्परा का आद्य ग्रन्थ है जिसके रचयिता गंगेश उपाध्याय (मिथिला, 13–14वीं शताब्दी) माने जाते हैं। ग्रन्थ विशेषतः प्रमाण-विचार पर केन्द्रित है और प्रमाण-खण्ड में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द—इन चार प्रमाणों की गूढ़ विश्लेषणात्मक व्याख्या करता है। बाद में रघुनाथ शिरोमणि, गदाधर भट्टाचार्य आदि ने इस पर विस्तृत टीकाएँ लिखकर नव्य-न्याय की तकनीकी शब्दावली विकसित की। उदयन (न्यायकुसुमांजलि), गौतम (न्यायसूत्र) और प्रशस्तपाद (पदार्थधर्मसंग्रह) अलग ग्रन्थों के कर्ता हैं; अतः ‘तत्त्वचिन्तामणि’ के लेखक गंगेश ही हैं।
Quick Tip: याद रखें—\(\textbf{तत्त्वचिन्तामणि = गंगेश (नव्य-न्याय)}\); \(\textbf{न्यायसूत्र = गौतम}\), \(\textbf{न्यायकुसुमांजलि = उदयन}\), \(\textbf{पदार्थधर्मसंग्रह = प्रशस्तपाद}\)।


Question 22:

‘ऋत’ सम्बन्धित है—

  • (1) भौतिक नियम से
  • (2) धार्मिक नियम से
  • (3) नैतिक नियम से
  • (4) इनमें से सभी से
Correct Answer: (4) \(\textbf{इनमें से सभी से}\)
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ऋग्वैदिक विचार में ‘ऋत’ समस्त सृष्टि-व्यवस्था/कॉस्मिक ऑर्डर का नाम है—जो प्रकृति (ऋतु-चक्र, ग्रह-गति), धार्मिक/याज्ञिक विधि-व्यवस्था (यज्ञ का शुद्ध क्रम) और नैतिक सत्पथ/सत्य के नियम—तीनों को एक साथ नियोजित करता है। वरुण–मित्र आदि देवताओं को इसके रक्षक माना गया; सत्य (satya) इसका मानवीय रूप और आगे चलकर धर्म उसका सामाजिक-नैतिक विस्तार माना गया। इसलिए ‘ऋत’ केवल एक क्षेत्र तक सीमित न होकर भौतिक, धार्मिक और नैतिक—सभी नियमों से सम्बन्ध रखता है; अतः सही विकल्प (4) इनमें से सभी से।
Quick Tip: स्मरण सूत्र: \(\textbf{ऋत → सत्य → धर्म}\) ; और क्षेत्र: \(\textbf{प्रकृति + यज्ञ + नैतिकता} = \textbf{सभी}\)।


Question 23:

‘कर्म’ शब्द की उत्पत्ति हुई है—

  • (1) ‘कृ’ धातु से
  • (2) ‘लु’ धातु से
  • (3) ‘कर्म’ धातु से
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (1) \(\textbf{‘कृ’ धातु से}\)
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संस्कृत में ‘कर्म’ (कर्मन्) शब्द का व्युत्पत्तिस्रोत धातु √कृ (करोति—कर) है, जिसका अर्थ “करना/सृजन करना” होता है। धातु कृ पर प्रत्यय (जैसे ‘मनिन्’/कर्मनिर्देशक) लगने से ‘कर्मन्’ रूप बनता है—अर्थ किया हुआ कार्य, कृत्य या क्रिया का फल/विषय। व्याकरण में यही कर्म कारक कहलाता है (कर्म = क्रिया का object). भारतीय दर्शन/धर्मशास्त्र में ‘कर्म’ का प्रयोग नैतिक-धार्मिक अर्थ में भी होता है—किए गए सद्/दुश् कर्मों का फल जन्म-जन्मान्तर में भोगा जाता है। ‘लु’ कोई धातु नहीं है; (3) में ‘कर्म’ स्वयं व्युत्पन्न रूप है, धातु नहीं—इसलिए सही विकल्प कृ धातु है।
Quick Tip: \(\textbf{कर्म = √कृ (कर) + प्रत्यय → “कर्मन्”—व्याकरण में \(\textbf{कर्म कारक}\), दर्शन में \(\textbf{कर्म-फल}\) की धारणा।}\)


Question 24:

ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए देकार्त ने निम्न में से किस सिद्धान्त का प्रयोग किया है?

  • (1) एक पूर्ण सत्ता समग्र विश्व का कारण होनी चाहिए
  • (2) एक पूर्ण सत्ता \(\textbf{एक पूर्ण सत्ता के प्रत्यय}\) (विचार) का कारण होनी चाहिए
  • (3) एक पूर्ण सत्ता \(\textbf{असीमित सत्ताओं}\) का कारण होनी चाहिए
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) \(\textbf{एक पूर्ण सत्ता एक पूर्ण सत्ता के प्रत्यय का कारण होनी चाहिए}\)
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देकार्त का प्रमुख कारण-पर्याप्तता सिद्धान्त (Causal Adequacy Principle) कहता है—कारण में उतनी या उससे अधिक वास्तविकता होनी चाहिए जितनी प्रभाव/विचार में है। हम अपने भीतर अनन्त, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ—अर्थात सर्वोपरि पूर्ण सत्ता—का विचार पाते हैं। इस पूर्णता-युक्त विचार का पर्याप्त कारण हम स्वयं (सीमित/अपूर्ण) नहीं हो सकते; केवल पूर्ण सत्ता (ईश्वर) ही उसके लिए पर्याप्त कारण हो सकती है। अतः ईश्वर का अस्तित्व उस पूर्ण सत्ता के विचार से ही निष्कर्षित होता है। यह देकार्त का विशिष्ट आइडिया-आर्ग्युमेंट है, जो विकल्प (2) में निहित है। विकल्प (1)/(3) ब्रह्माण्ड/बहुसत्ता-कारण की सामान्य बातें हैं, देकार्त के विशिष्ट तर्क का सार नहीं।
Quick Tip: देकार्त = \(\textbf{Causal Adequacy}\): कारण की वास्तविकता ≥ प्रभाव/विचार की वास्तविकता ⇒ \(\textbf{ईश्वर}\) ही \(\textbf{पूर्ण सत्ता के विचार}\) का पर्याप्त कारण।


Question 25:

निम्न में से कौन ‘समानान्तरवाद’ (Psychophysical Parallelism) का समर्थक है?

  • (1) देकार्त
  • (2) स्पिनोज़ा
  • (3) लाइबनिज
  • (4) लॉक
Correct Answer: (2) \(\textbf{स्पिनोज़ा}\)
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समानान्तरवाद का अर्थ—मानसिक (विचार) और भौतिक (विस्तार) घटनाएँ समांतर क्रम में चलती हैं; उनके बीच प्रत्यक्ष कारण-कार्य सम्बन्ध नहीं होता।


स्पिनोज़ा ने Ethics में एक-पदार्थवाद दिया: एक ही Substance (Deus sive Natura) के दो प्रमुख गुण—Thought और Extension। अतः मन और शरीर एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं; जो कुछ शरीर-क्रम में घटता है, उसका समांतर रूप विचार-क्रम में होता है—यही Psychophysical Parallelism।


अन्य विकल्प: देकार्त — द्वैतवाद/अन्तःक्रियावाद (pineal interaction); लाइबनिज — Pre-established Harmony (मोनाडों की पूर्व-स्थापित संगति), जो समानान्तरवाद-समान दिखता है पर तत्त्वतः भिन्न सिद्धान्त है; लॉक — अनुभववादी, मन-शरीर पर अलग प्रतिपादन नहीं। अतः सही उत्तर स्पिनोज़ा।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{स्पिनोज़ा = एक पदार्थ, दो गुण (विचार–विस्तार) ⇒ समानान्तरवाद; \(\textbf{लाइबनिज = पूर्व-स्थापित सामंजस्य}\); \(\textbf{देकार्त = अन्तःक्रियावाद}\)}\).


Question 26:

पूर्व स्थापित सामंजस्य सिद्धान्त सम्बन्धित है—

  • (1) देकार्त से
  • (2) स्पिनोज़ा से
  • (3) लाइबनिज से
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) लाइबनिज
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चरण 1: सिद्धान्त की पहचान।

पूर्व स्थापित सामंजस्य (Pre-established Harmony) लाइबनिज का मन–शरीर सम्बन्ध पर समाधान है। उसके अनुसार ब्रह्मांड असंख्य मोनाडों (अविभाज्य, चेतन इकाइयों) से बना है। प्रत्येक मोनाड अपने-अपने आन्तरिक नियम से चलता है और किसी दूसरे पर कारणात्मक प्रभाव नहीं डालता।


चरण 2: “सामंजस्य” कैसे?

ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में ही सभी मोनाडों की अवस्थाओं/अनुक्रमों को इस प्रकार सेट कर दिया कि वे बिना पारस्परिक कारण-क्रिया के भी घड़ी की सूइयों की तरह समांतर चलें—यही पूर्व-स्थापित सामंजस्य है। अतः मन की अवस्थाएँ और शरीर की गतियाँ मिलती-जुलती दिखती हैं, पर एक-दूसरे को पैदा नहीं करतीं।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

देकार्त—अन्तःक्रियावाद (pineal gland के माध्यम से मन–शरीर कारण-सम्बन्ध)। स्पिनोज़ा—समानान्तरवाद: एक ही पदार्थ के दो गुण (विचार/विस्तार) समांतर चलते हैं, पर ईश्वर द्वारा पहले से “सेट” करने की बात नहीं। इसलिए सही उत्तर लाइबनिज।
Quick Tip: \(\textbf{घड़ी उपमा याद रखें—ईश्वर ने सभी ‘‘घड़ियाँ’’ (मोनाड) पहले से सेट कीं ⇒ \(\textbf{लाइबनिज = पूर्व-स्थापित सामंजस्य}\); देकार्त = \(\textbf{अन्तःक्रिया}\), स्पिनोज़ा = \(\textbf{समानान्तरवाद}\)}\).


Question 27:

अनुभववाद के समर्थक हैं

  • (1) देकार्त
  • (2) कान्ट
  • (3) ह्यूम
  • (4) स्पिनोज़ा
Correct Answer: (3) ह्यूम
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चरण 1: ‘अनुभववाद’ की पहचान।

अनुभववाद (Empiricism) वह मत है जिसके अनुसार समस्त यथार्थ ज्ञान का स्रोत मुख्यतः इन्द्रिय-अनुभव है; मन में कोई जन्मजात (innate) विचार नहीं होते।


चरण 2: ह्यूम का प्रतिपादन।

डेविड ह्यूम अनुभववादी परम्परा (लॉक, बर्कले) का सबसे सुसंगत दार्शनिक है। उसने मन की सामग्रियों को impressions (तत्काल प्रबल अनुभूति) और ideas (उनकी मन्द प्रतिलिपि) में बाँटा। कारणता, आत्म-एकता, पदार्थ—ये सब कठोर तर्क से नहीं, बल्कि आदत/निरन्तर सहसंबंध के कारण बने विश्वास हैं। अतः ज्ञान का मानदण्ड अनुभव है, न कि तर्क से निकले जन्मजात सिद्धान्त।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

देकार्त—रैशलनलिस्ट (जन्मजात विचार, “Cogito”)। कान्ट—अप्रायोगिक a priori रूपों (स्थान, काल, श्रेणियाँ) का प्रतिपादन; उसने ह्यूम की चुनौती के उत्तर में “सामंजस्यवाद” विकसित किया। स्पिनोज़ा—तर्कप्रधान रैशनलिस्ट और सर्वेश्वरवादी। अतः अनुभववाद का उपयुक्त विकल्प ह्यूम है।
Quick Tip: \(\textbf{Locke–Berkeley–Hume = Empiricists}\) ; \(\textbf{Descartes–Spinoza–Leibniz = Rationalists}\) — and \(\textbf{Kant = synthesis/critical philosophy}\).


Question 28:

अरस्तू के अनुसार कारण है—

  • (1) उपादान
  • (2) आकारीक
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) (a) तथा (b) दोनों
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चरण 1: अरस्तू का ‘चार कारण’ सिद्धान्त।

अरस्तू वस्तुओं/परिवर्तन को समझाने के लिए चार कारण मानता है—(i) उपादान कारण (Material cause: किस पदार्थ से बना), (ii) आकारीक कारण (Formal cause: उसकी रूप-रचना/विन्यास जो उसे वही वस्तु बनाती है), (iii) निमित्त कारण (Efficient cause: करने वाला/उत्पादक), और (iv) अंतिम कारण (Final cause: प्रयोजन/उद्देश्य)।


चरण 2: विकल्पों से मिलान।

यहाँ (1) उपादान और (2) आकारीक—दोनों अरस्तू की सूची के वैध कारण हैं; अतः सही उत्तर दोनों है।


चरण 3: स्मरण के लिए उदाहरण।

एक मूर्ति के संदर्भ में—पत्थर उपादान, मूर्ति की डिज़ाइन/आकार आकारीक, मूर्तिकार निमित्त, और ‘‘पूजन/सौन्दर्य प्रदर्शन’’ अंतिम कारण है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि उपादान और आकारीक दोनों कारण हैं।
Quick Tip: \(\textbf{मूर्ति-उदाहरण}\) से याद करें—पत्थर (उपादान), रूप (आकारीक), मूर्तिकार (निमित्त), प्रयोजन (अंतिम) ⇒ \(\textbf{दोनों सही}\)।


Question 29:

किस तर्क में \(\textbf{जगत के अस्तित्व}\) के आधार पर ईश्वर का अस्तित्व प्रमाणित किया जाता है?

  • (1) विश्वमूलक तर्क
  • (2) प्रयोजनमूलक तर्क
  • (3) सत्तामूलक तर्क
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (1) \(\textbf{विश्वमूलक तर्क}\)
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चरण 1: तर्क की पहचान।

विश्वमूलक (Cosmological) तर्क जगत/संसार के अस्तित्व, परिवर्तन और कारण-श्रृंखला से आरम्भ करता है और निष्कर्ष निकालता है कि इस श्रृंखला का अकारण/प्रथम कारण या निरपेक्ष आवश्यक सत्ता होना चाहिए—इसी को ईश्वर कहा जाता है।


चरण 2: प्रमुख रूप।

(i) कारण-श्रृंखला तर्क (Thomas Aquinas की “First Cause/Unmoved Mover”): अनन्त प्रतिगमन अस्वीकार्य है; अतः प्रथम कारण अनिवार्य।

(ii) आवश्यकता–संभाव्यता (Contingency) तर्क: जो कुछ संभाव्य है, उसके अस्तित्व का आधार अनिवार्य सत्ता में है; इसलिए एक Necessary Being (ईश्वर) मानना पड़ता है।

(iii) पर्याप्त कारण का सिद्धान्त (Leibniz): “क्यों कुछ है, शून्य क्यों नहीं?”—जगत के अस्तित्व का पर्याप्त स्पष्टीकरण ईश्वर है।


चरण 3: अन्य विकल्पों से भेद।

प्रयोजनमूलक (Teleological) तर्क डिज़ाइन/उद्देश्य से ईश्वर का कथन करता है; सत्तामूलक (Ontological) तर्क मात्र विचार/परिभाषा (परम परिपूर्ण सत्ता) से अस्तित्व निष्कर्षित करता है। यहाँ प्रश्न में “जगत के अस्तित्व” को आधार बनाया गया है—अतः विश्वमूलक सही है।
Quick Tip: \(\textbf{Cosmo = Cosmos (जगत)}\) ⇒ \(\textbf{प्रथम कारण/आवश्यक सत्ता}\); \(\textbf{Teleo = Design/उद्देश्य}\); \(\textbf{Onto = विचार/परिभाषा}\)—तीनों का भेद याद रखें।


Question 30:

अन्तः-क्रियावाद (Interactionism) का सिद्धान्त दिया गया है—

  • (1) कान्ट द्वारा
  • (2) देकार्त द्वारा
  • (3) स्पिनोज़ा द्वारा
  • (4) लॉक द्वारा
Correct Answer: (2) \(\textbf{देकार्त द्वारा}\)
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चरण 1: सिद्धान्त की पहचान।

अन्तः-क्रियावाद वह दृष्टि है जिसके अनुसार मन (चेतन/अविस्तारित पदार्थ) और शरीर (विस्तारित भौतिक पदार्थ) परस्पर कारण-कार्य सम्बन्ध में प्रभावित करते हैं।


चरण 2: देकार्त का प्रतिपादन।

रेने देकार्त ने द्वैतवाद (Substance Dualism) दिया—दो स्वतंत्र पदार्थ: res cogitans (सोचने वाला) और res extensa (विस्तारित)। उसने मन–शरीर की पारस्परिक क्रिया का जैव-स्थान पीनियल ग्रन्थि (pineal gland) बताया, जहाँ मानसिक संकल्पना शरीर की गतियों पर, और शारीरिक अवस्थाएँ मानसिक अनुभव पर कारणात्मक असर डालती हैं।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

स्पिनोज़ा—समानान्तरवाद (एक पदार्थ, विचार/विस्तार दो गुण; कोई क्रॉस-कारणता नहीं)। लॉक—अनुभववादी; मन–शरीर पर अलग अन्तःक्रिया-तत्वज्ञान नहीं। कान्ट—आलोचनात्मक दर्शन; मन-शरीर अन्तःक्रिया का सैद्धान्तिक प्रतिपादन नहीं करता। अतः अन्तः-क्रियावाद का सही श्रेय देकार्त को है।
Quick Tip: त्रयी को साथ याद करें—\(\textbf{देकार्त}\) = अन्तः-क्रिया, \(\textbf{स्पिनोज़ा = समानान्तरवाद}\), \(\textbf{लाइबनिज = पूर्व-स्थापित सामंजस्य}\) (घड़ी-उपमा)।


Question 31:

निम्न में से कौन \(\textbf{एकवादी}\) (Monist) है?

  • (1) देकार्त
  • (2) स्पिनोज़ा
  • (3) सांख्य
  • (4) लाइबनिज
Correct Answer: (2) \(\textbf{स्पिनोज़ा}\)
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चरण 1: ‘एकवाद’ की पहचान।

एकवाद (Monism) वह मत है जिसके अनुसार समस्त अस्तित्व का अंतिम तत्त्व एक ही है—सभी वस्तुएँ उसी एक पदार्थ की भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।


चरण 2: स्पिनोज़ा का एकवाद।

स्पिनोज़ा Ethics में Substance Monism प्रतिपादित करता है—केवल एक पदार्थ है, जिसे वह “Deus sive Natura” (ईश्वर अथवा प्रकृति) कहता है। विचार (Thought) और विस्तार (Extension) उस एक पदार्थ के गुण हैं; मन और शरीर उसी के रूप/मोड हैं। अतः वह स्पष्ट रूप से एकवादी है।


चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं?

देकार्त—द्वैतवादी: दो स्वतंत्र पदार्थ—res cogitans (मन) और res extensa (पदार्थ)।

सांख्य—द्वैत: पुरुष और प्रकृति दो अनादि तत्त्व।

लाइबनिज—अनेकवाद/बहुलवाद (Pluralism): असंख्य मोनाड अंतिम इकाइयाँ; एक पदार्थ नहीं। इसलिए सही उत्तर स्पिनोज़ा है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{स्पिनोज़ा = एकवाद (Deus sive Natura)}\), \(\textbf{देकार्त/सांख्य = द्वैत}\), \(\textbf{लाइबनिज = बहुलवाद (मोनाड)}\)।


Question 32:

‘तर्कपूर्वकम् अनुमानम्’ किसका मत है ?

  • (1) सांख्य का
  • (2) न्याय का
  • (3) बौद्ध
  • (4) जैन का
Correct Answer: (2) \(\textbf{न्याय का}\)
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चरण 1: सूत्रार्थ।

‘तर्कपूर्वकम् अनुमानम्’ का आशय है—अनुमान से पूर्व तर्क (विकल्पों के परिणामों का परीक्षण) द्वारा विरोधी सम्भावनाओं का खण्डन कर व्याप्ति/लक्षण को दृढ़ करना। यह न्याय-दर्शन की विशिष्ट पद्धति है।


चरण 2: न्याय में तर्क की भूमिका।

न्यायसूत्र-परम्परा में तर्क को संशय-निवारक सहायक साधन कहा गया—“यदि ऐसा हो तो अनिष्ट प्रतिफल” प्रकार के विचार से अनुमान के हेतु को पुष्ट किया जाता है। पाँच-अवयवी पारार्थानुमान (प्रतिज्ञा–हेतु–उदाहरण–उपनय–निगमन) के पहले तर्क अक्सर प्रयुक्त होता है ताकि प्रतिपक्ष के विकल्प निरस्त हो जाएँ।


चरण 3: अन्य मतों से भेद।

सांख्य केवल तीन प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द) मानता है—पर तर्कपूर्वक की यह विशेष रेखांकन नहीं करता। बौद्ध तर्कशास्त्र (दिङ्नाग, धर्मकीर्ति) ‘त्रिरूप-हेतु’ पर बल देता है; जैन में ‘नय/स्याद्वाद’ प्रमुख है। इसलिए यह उक्ति न्याय-दर्शन से सम्बद्ध मानी जाती है।
Quick Tip: \(\textbf{न्याय = तर्कपूर्वक अनुमान}\) (विकल्प-खण्डन से व्याप्ति दृढ़) ; \(\textbf{बौद्ध = त्रिरूप-हेतु}\) ; \(\textbf{जैन = नय/स्याद्वाद}\) ; \(\textbf{सांख्य = तीन प्रमाण}\)।


Question 33:

भरतृहरि ने प्रसिद्ध पुस्तक लिखी है—

  • (1) स्फोटवाद
  • (2) वाक्यपदीयम्
  • (3) शब्दबोध
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) \(\textbf{वाक्यपदीयम्}\)
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चरण 1: लेखक व कृति की पहचान।

5वीं शताब्दी के महान व्याकरण-दार्शनिक भरतृहरि की प्रमुख रचना ‘वाक्यपदीयम्’ है—यह भाषा-दर्शन, व्याकरण और ज्ञानमीमांसा पर आधारभूत ग्रन्थ है। ग्रन्थ तीन काण्डों में विभक्त माना जाता है: ब्रह्म-काण्ड (शब्द-ब्रह्म, दार्शनिक आधार), वाक्य-काण्ड (वाक्य/पद की सत्ता, अर्थ-संबन्ध), और प्रकीर्णक-काण्ड (विविध विषय)।


चरण 2: विचार-सामग्री का सार।

भरतृहरि स्फोटवाद को विस्तार से प्रतिपादित करते हैं—अर्थात एकात्मक वाक्य-स्फोट से अर्थ का उद्भव, जहाँ शब्द/वाक्य केवल प्रत्यभिज्ञान का माध्यम हैं; साथ ही शब्द-ब्रह्म की अवधारणा—भाषा/वाणी को सृष्टि-आधार मानने का दार्शनिक प्रतिपादन।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

(1) स्फोटवाद कोई ग्रन्थ नहीं, बल्कि भरतृहरि (और पूर्ववर्ती पतंजलि-आदि) का सिद्धान्त है; (3) शब्दबोध सामान्य विषय/समस्या है, ग्रन्थ-नाम नहीं। अतः सही उत्तर ‘वाक्यपदीयम्’।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{भरतृहरि → वाक्यपदीयम् → स्फोटवाद/शब्द-ब्रह्म}\). “स्फोटवाद” मत है, \(\textbf{ग्रन्थ-नाम नहीं}\)—इसी से विकल्प पहचानें।


Question 34:

न्याय सूत्र किसने लिखा है ?

  • (1) वाचस्पति
  • (2) वात्स्यायन
  • (3) गौतम
  • (4) उदयन भट्ट
Correct Answer: (3) \(\textbf{गौतम}\)
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चरण 1: मूल ग्रन्थ और कर्ता।

न्याय दर्शन का आधार-ग्रन्थ ‘न्यायसूत्र’ है, जिसके कर्ता आक्षिपाद (अक्षपाद) गौतम माने जाते हैं। इसमें ज्ञान के साधन (प्रमाण), तर्क-विधि, निष्कर्ष, वितण्डा, हेत्वाभास आदि का सुव्यवस्थित निरूपण है।


चरण 2: परम्परा का संदर्भ।

गौतम के बाद न्याय पर टीका-परम्परा विकसित हुई—वात्स्यायन ने ‘न्यायभाष्य’, उद्द्योतक ने ‘न्यायवार्त्तिक’, वाचस्पति मिश्र ने ‘तात्पर्यटीका’, और उदयन ने ‘न्यायकुसुमांजलि’ आदि ग्रन्थ लिखे; पर ये सभी टिप्पणी/विस्तार हैं, मूल सूत्र-ग्रन्थ नहीं।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

(1) वाचस्पति—टिकाकार; (2) वात्स्यायन—‘न्यायभाष्य’ के लेखक; (4) उदयन—‘น्यायकुसुमांजलि’ (ईश्वर-सिद्धि) के रचयिता। इसलिए न्यायसूत्र के लेखक गौतम (विकल्प 3) हैं।
Quick Tip: सूत्र–भाष्य–वार्त्तिक–टीका क्रम याद करें: \(\textbf{सूत्र: गौतम}\) → \(\textbf{भाष्य: वात्स्यायन}\) → \(\textbf{वार्त्तिक: उद्द्योतक}\) → \(\textbf{टीका: वाचस्पति}\); \(\textbf{उदयन = न्यायकुसुमांजलि}\)।


Question 35:

शंकर के अनुसार \(\textbf{निर्विशेषतः}\) चेतन सत्ता कौन है?

  • (1) ब्रह्म
  • (2) ईश्वर
  • (3) जीवात्मा
  • (4) जगत्
Correct Answer: (1) \(\textbf{ब्रह्म}\)
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चरण 1: अद्वैत की मूल प्रतिज्ञा।

आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में अंतिम सत्य ब्रह्म है—सत्–चित्–आनन्द स्वरूप, निरुपाधिक, निर्गुण/निर्विशेष और स्वत:सिद्ध। यह शुद्ध चेतना है, किसी विशेषता/उपाधि पर निर्भर नहीं।


चरण 2: अन्य पदों का स्थान।

ईश्वर = सगुण ब्रह्म (माया-उपाधि सहित, विश्व-नियन्ता)—अतः विशेष/उपाधि-युक्त।

जीव = अविद्या-उपहित चैतन्य—ब्रह्म का प्रतिबिम्ब, देह–मन से अपने को सीमित मानने से व्यक्तित्ता बनती है।

जगत् = व्यवहारिक/मिथ्या सत्ता—ब्रह्म पर नाम–रूप का आभास मात्र; परमार्थतः स्वतंत्र चेतना नहीं।


चरण 3: निष्कर्ष/उन्मूलन।

प्रश्न में “निर्विशेषतः चेतन सत्ता” (attribute-less pure consciousness) पूछा है। यह न ईश्वर (क्योंकि सगुण/माया-उपाधि), न जीव (अविद्या-उपाधि), न जगत् (मिथ्या/अचेतन-आश्रित), बल्कि केवल ब्रह्म ही है। अतः सही उत्तर (1) ब्रह्म।
Quick Tip: अद्वैत-सूत्र: \(\textbf{ब्रह्म = निरुपाधिक शुद्ध चैतन्य}\); \(\textbf{ईश्वर = सगुण ब्रह्म (माया)}\), \(\textbf{जीव = अविद्या-उपहित}\), \(\textbf{जगत् = नाम–रूप (व्यवहारिक)}\)।


Question 36:

योग दर्शन में ‘अहिंसा’ क्या है ?

  • (1) यम
  • (2) नियम
  • (3) आसन
  • (4) तपस्
Correct Answer: (1) \(\textbf{यम}\)
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चरण 1: अष्टाङ्ग-योग का संदर्भ।

पतंजलि के अनुसार साधना के आठ अंग हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। इसमें यम बाह्य/सामाजिक संयम हैं और नियम आन्तरिक अनुशासन।


चरण 2: ‘अहिंसा’ का स्थान।

यम के पाँच उपांग—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह। अहिंसा का अर्थ है किसी भी प्राणी को वाणी, मन और शरीर से चोट न पहुँचाना; यही योग के नैतिक आधार का प्रथम नियम है।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

नियम के पाँच—शौच, सन्तोष, \(\textbf{तपस्}\), स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान; अतः \(\textbf{तपस्}\) (विकल्प 4) ‘नियम’ का अंग है, ‘यम’ नहीं। आसन शारीरिक स्थिरता/स्थितप्रज्ञता हेतु देह-स्थितियाँ हैं। इसलिए ‘अहिंसा’ को यम में रखा जाता है—सही उत्तर (1)।
Quick Tip: याद रखें—\(\textbf{यम:}\) अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह; \(\textbf{नियम:}\) शौच, सन्तोष, \(\textbf{तपस्}\), स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान।


Question 37:

भगवद्गीता में कौन-से विचार पाये जाते हैं ?

  • (1) लोक-संग्रह
  • (2) निष्काम कर्म
  • (3) स्वधर्म
  • (4) इनमें से सभी
Correct Answer: (4) \(\textbf{इनमें से सभी}\)
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चरण 1: निष्काम कर्म का सिद्धान्त।

गीता का केन्द्रीय संदेश—कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन—कर्म को फलासक्ति त्यागकर करना है। साधक कर्म के परिणाम को ईश्वर/धर्म के हवाले कर समत्व-बुद्धि से कार्य करता है, जिससे चित्त-शुद्धि और योगक्षेम सिद्ध होते हैं।


चरण 2: स्वधर्म का आग्रह।

अर्जुन-संवाद में बार-बार यह प्रतिपादित है कि स्वधर्म (अपनी क्षमता/स्थिति/कर्तव्य के अनुरूप धर्म) का पालन सर्वोपरि है—‘‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः’’। दूसरे के धर्म का अनुष्ठान अस्थिरता व द्विविधा उत्पन्न करता है।


चरण 3: लोक-संग्रह की अवधारणा।

गीता कर्म को केवल निजी मोक्ष हेतु नहीं, लोक-संग्रह—समाज की स्थिरता/कल्याण—के लिए भी आवश्यक बताती है। श्रेष्ठ पुरुष जब धर्मनिष्ठ कर्म करता है तो आचरण-मानक बनता है; इससे समाज में नीति, अनुशासन और सद्भाव बना रहता है।


निष्कर्ष:

ग्रन्थ में निष्काम कर्म, स्वधर्म और लोक-संग्रह—तीनों विचार स्पष्ट व परस्पर पूरक रूप में उपस्थित हैं; इसलिए सही विकल्प ‘इनमें से सभी’।
Quick Tip: गीता-त्रयी याद रखें: \(\textbf{निष्काम कर्म}\) (फल-त्याग), \(\textbf{स्वधर्म}\) (अपना कर्तव्य), \(\textbf{लोक-संग्रह}\) (सामाजिक कल्याण) — तीनों साथ चलते हैं।


Question 38:

किसका उपदेश ज्ञान का स्रोत है ?

  • (1) आप्त पुरुष
  • (2) आम आदमी
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) आप्त स्त्री
Correct Answer: (1) \(\textbf{आप्त पुरुष}\)
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चरण 1: ‘शब्द’ प्रमाण की परिभाषा।

न्याय-दर्शन में शब्द एक स्वतंत्र प्रमाण है—आप्त (विश्वसनीय/सत्यवक्ता/सक्षम) व्यक्ति का कथन यथार्थ ज्ञान का स्रोत होता है। ग्रन्थ, गुरु, विशेषज्ञ—ये सब आप्त-वाक्य की श्रेणी में आते हैं।


चरण 2: ‘आप्त’ की लाक्षणिकता।

आप्त वह है जो (i) तत्त्व-ज्ञान रखता हो, (ii) सत्यभाषी हो, (iii) हितैषी हो—अर्थात जान-बूझकर भ्रमित न करता हो। इसलिए उसके उपदेश/वचन से प्राप्त ज्ञान प्रमाणित माना जाता है।


चरण 3: विकल्पों का परीक्षण।

(2) आम आदमी का कथन तब तक प्रमाण नहीं जब तक वह आप्त न हो।

(3) दोनों कहना अनुचित है—क्योंकि सभी ‘‘आम’’ कथन प्रमाणित नहीं होते।

(4) आप्त स्त्री भी वस्तुतः ‘आप्त’ की परिभाषा में आती है; पर न्याय परम्परा में शब्द “आप्त पुरुष” के रूप में अभिव्यक्त हुआ है (यहाँ ‘पुरुष’ सामान्य person अर्थ में प्रयुक्त है)। दिए विकल्पों में शास्त्रीय पदबंध (1) ही उपयुक्त है।
Quick Tip: सूत्र याद रखें: \(\textbf{शब्द-प्रमाण = आप्त-वाक्य (सत्य, सक्षम, हितैषी व्यक्ति का कथन)। ‘आम’ कथन स्वतः प्रमाण नहीं।}\)


Question 39:

शंकर के दर्शन के अनुसार पारमार्थिक सत्ता क्या है ?

  • (1) ब्रह्म
  • (2) जगत्
  • (3) ईश्वर
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (1) \(\textbf{ब्रह्म}\)
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चरण 1: ‘सत्ता-त्रयी’ को याद करें।

अद्वैत वेदान्त (शंकर) में तीन स्तर की सत्ताएँ मानी जाती हैं—पारमार्थिक (ब्रह्म का अखण्ड, निर्विशेष, निरुपाधिक सत्य), व्यवहारिक (जगत्/ईश्वर—उपाधि सहित, व्यवहार में मान्य), और प्रातिभासिक (स्वप्न/भ्रम आदि)।


चरण 2: पारमार्थिक सत्य क्या है?

परमार्थ में केवल ब्रह्म ही सत्यम्–ज्ञानम्–अनन्तम् रूप से सत्य है—न उसमें कोई गुण-विशेष, न परिवर्तन; वही शुद्ध चैतन्य है। ज्ञान द्वारा अविद्या-क्षय होने पर यही स्वस्वरूप प्रत्यक्ष होता है।


चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं?

जगत्—नाम–रूप-आश्रित मिथ्या (व्यवहारिक) सत्ता है; ब्रह्म से भिन्न नहीं, पर स्वतंत्र परमार्थ नहीं।

ईश्वर—माया-उपहित सगुण ब्रह्म है; विश्व-नियन्ता रूप में व्यवहारिक स्तर पर सत्य, पर परमार्थ में ब्रह्म से भिन्न नहीं।

अतः पारमार्थिक सत्ता केवल ब्रह्म है—इसलिए विकल्प (1) सही।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{ब्रह्म = पारमार्थिक}\), \(\textbf{जगत्/ईश्वर = व्यवहारिक}\), \(\textbf{स्वप्न/भ्रम = प्रातिभासिक}\)—अद्वैत की सत्ता-त्रयी।


Question 40:

निम्नलिखित में से कौन पुरुषार्थ के अन्तर्गत नहीं आता है ?

  • (1) आत्मा
  • (2) धर्म
  • (3) मोक्ष
  • (4) अर्थ
Correct Answer: (1) \(\textbf{आत्मा}\)
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चरण 1: पुरुषार्थ की परिभाषा।

भारतीय आचार-दर्शन में मनुष्य-जीवन के चार प्रयोजन पुरुषार्थ कहलाते हैं—धर्म (नीतिगत/कर्तव्य-आधारित जीवन), अर्थ (जीविका व संसाधनों की न्यायपूर्ण प्राप्ति), काम (इच्छाओं/रसों की मर्यादित, धर्मानुकूल पूर्ति) और मोक्ष (बंधन-मुक्ति/आध्यात्मिक कल्याण)।


चरण 2: विकल्पों का मिलान।

दिए विकल्पों में धर्म, अर्थ और मोक्ष—तीनों पुरुषार्थ हैं; चौथा पुरुषार्थ काम है जो यहाँ सूची में नहीं दिया गया। ‘आत्मा’ कोई प्रयोजन नहीं, बल्कि दार्शनिक तत्त्व/सत्ता (self/Ātman) है, जिसके ज्ञान/साक्षात्कार को अनेक दर्शन लक्ष्य मानते हैं। इसलिए आत्मा पुरुषार्थ की सूची में नहीं आता।


चरण 3: निष्कर्ष।

चार पुरुषार्थ = धर्म–अर्थ–काम–मोक्ष; अतः प्रश्नानुसार पुरुषार्थ में नहीं आने वाला विकल्प (1) आत्मा है।
Quick Tip: सूत्र याद रखें—\(\textbf{धर्म–अर्थ–काम–मोक्ष}\) = चार पुरुषार्थ; \(\textbf{आत्मा}\) = तत्त्व (सत्ता), \(\textbf{पुरुषार्थ नहीं}\)।


Question 41:

भारतीय दर्शन में ‘यथार्थ ज्ञान’ कहलाता है—

  • (1) प्रमा
  • (2) अप्रमा
  • (3) प्रमाण
  • (4) ख्याति
Correct Answer: (1) \(\textbf{прमा}\)
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चरण 1: परिभाषा।

भारतीय ज्ञानमीमांसा में प्रमा वह ज्ञान है जो यथार्थ/अभियोग्य हो—अर्थात् वस्तु को जैसा है वैसा ही प्रकट करे और नवीन (अनधिगत), अभाधित (अन्य से खण्डित न हो) तथा न्यायतः सिद्ध हो।


चरण 2: संबद्ध पदों का भेद।

प्रमाण = प्रमा का साधन (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द आदि)।

अप्रमा = अयथार्थ/मिथ्या ज्ञान (भ्रम, संदेह, तुच्छज्ञान); इससे व्यवहार-सिद्धि नहीं होती।

ख्याति = भ्रान्ति-व्याख्या की सिद्धान्त-परम्परा (आत्मख्याति, विषयख्याति, अनिरुद्धख्याति आदि) — यह स्वयं ज्ञान का प्रकार नहीं बल्कि भ्रम की व्याख्या का मत है।


चरण 3: निष्कर्ष।

प्रश्न ‘यथार्थ ज्ञान’ पूछता है; अतः सही पद प्रमा है, न कि प्रमाण (साधन), अप्रमा (अयथार्थ) या ख्याति (भ्रम-सिद्धान्त)।
Quick Tip: चार पद याद रखें—\(\textbf{प्रमाता}\) (ज्ञाता), \(\textbf{प्रमाण}\) (साधन), \(\textbf{प्रमेय}\) (वस्तु), \(\textbf{प्रमा}\) (यथार्थ ज्ञान)। प्रश्न में “यथार्थ” दिखे ⇒ \(\textbf{प्रमा}\) चुनें।


Question 42:

भारतीय दर्शन है

  • (1) परिकल्पनात्मक
  • (2) व्यवहारिक
  • (3) अतिव्यवहारिक
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) \(\textbf{व्यवहारिक}\)
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चरण 1: भारतीय दर्शन का लक्ष्य।

भारतीय परम्परा का मूल साध्य मोक्ष/दुःखनिवृत्ति है—अर्थात जीवन का व्यावहारिक रूपान्तरण। इसलिए ज्ञान का मूल्य केवल सैद्धान्तिक न रहकर आचरण-उन्मुख होता है।


चरण 2: सिद्धान्त–आचरण का समन्वय।

योग में यम–नियम से लेकर ध्यान–समाधि तक आचरण-क्रम है; गीता में निष्काम कर्म/स्वधर्म/लोक-संग्रह—सभी कर्म–आचरण से जुड़े; बौद्ध अष्टाङ्ग मार्ग, जैन व्रत–नियम, मीमांसा धर्मकर्म—ये सब जीवन-व्यवहार निर्देशित करते हैं। न्याय में प्रमा–प्रमाण का विश्लेषण इसलिए है कि यथार्थ ज्ञान से समुचित व्यवहार संभव हो।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

(1) परिकल्पनात्मक (सिर्फ speculative) कहना अपूर्ण है—भारतीय दर्शन चिन्तन + साधना दोनों है। (3) अतिव्यवहारिक कोई मान्य शास्त्रीय श्रेणी नहीं। अतः उपयुक्त उत्तर व्यवहारिक।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{भारतीय दर्शन = साध्य मोक्ष, साधन आचरण}\) ⇒ \(\textbf{व्यवहारिक}\)। उदाहरण: योग के \(\textbf{यम–नियम}\), गीता का \(\textbf{कर्मयोग}\), बौद्ध \(\textbf{अष्टाङ्ग मार्ग}\)।


Question 43:

अनेकान्तवाद सम्बन्धित है—

  • (1) बौद्ध दर्शन से
  • (2) जैन दर्शन से
  • (3) न्याय दर्शन से
  • (4) योग दर्शन से
Correct Answer: (2) \(\textbf{जैन दर्शन से}\)
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चरण 1: सिद्धान्त की पहचान।

अनेकान्तवाद जैन दर्शन का केंद्रीय मत है—वास्तविकता अनेकों पक्षों (many-sided) से युक्त है; किसी भी वस्तु का एकांगी, निरपेक्ष कथन अपूर्ण होता है। वस्तु द्रव्य–क्षेत्र–काल–भाव के भिन्न-भिन्न संदर्भों में भिन्न रूप से कथनीय है।


चरण 2: संबद्ध उपदर्शन।

अनेकान्तवाद से ही स्याद्वाद (सप्तभंगी नय) और नयवाद (standpoint theory) उत्पन्न होते हैं—‘‘स्यात्’’ (किसी दृष्टि से) कहकर सशर्त कथन किए जाते हैं: स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् अवक्तव्य… आदि, जिससे विरोधी प्रतीत कथन भी संदर्भ बदलने पर समन्वित हो जाते हैं।


चरण 3: अन्य विकल्पों का उन्मूलन।

बौद्ध का प्रमुख मत क्षणिकवाद/अनात्मवाद, न्याय का यथार्थवाद/प्रमाण-तर्कशास्त्र, और योग का चित्तवृत्ति-निरोध—ये सभी अनेकान्तवाद के सिद्धान्त नहीं हैं। अतः सही उत्तर जैन दर्शन है।
Quick Tip: याद रखें—\(\textbf{जैन = अनेकान्तवाद}\) ⇒ \(\textbf{स्याद्वाद (7 भंगियाँ)}\) + \(\textbf{नयवाद}\); \(\textbf{बौद्ध = क्षणिकवाद}\), \(\textbf{न्याय = प्रमाण-तर्क}\), \(\textbf{योग = चित्तवृत्ति-निरोध}\)।


Question 44:

न्याय दर्शन का समान तंत्र कौन दर्शन है ?

  • (1) योग दर्शन
  • (2) सांख्य दर्शन
  • (3) वैशेषिक दर्शन
  • (4) वेदान्त दर्शन
Correct Answer: (3) \(\textbf{वैशेषिक दर्शन}\)
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चरण 1: ‘समान तंत्र’ का अर्थ।

भारतीय दर्शन में कुछ प्रणालियाँ युग्म के रूप में विकसित हुईं—जिनकी विषयवस्तु और लक्ष्य परस्पर पूरक हों। ऐसे युग्म को ही समान तंत्र कहते हैं।


चरण 2: न्याय–वैशेषिक का युग्म।

न्याय मुख्यतः प्रमाण-तर्कशास्त्र (ज्ञान के साधन, अनुमान-विधि, वाक्य-न्याय, हेत्वाभास आदि) का सैद्धान्तिक ढाँचा देता है। वैशेषिक पदार्थ-मीमांसा (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय—और बाद में अभाव) के माध्यम से जगत की अस्तित्व-रचना समझाता है। दोनों का सम्मिलित अध्ययन न्याय–वैशेषिक के रूप में प्रसिद्ध है—एक जानने की पद्धति देता है, दूसरा जाने जाने वाले तत्त्वों का वर्गीकरण।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

योग का समान तंत्र सांख्य माना जाता है (सांख्य का तत्त्वज्ञान + योग की साधना-पद्धति)। वेदान्त स्वतंत्र उत्तरमीमांसा परम्परा है। इसलिए न्याय का समान तंत्र वैशेषिक ही है।
Quick Tip: युग्म याद रखें: \(\textbf{न्याय–वैशेषिक}\) (तर्क + पदार्थ), \(\textbf{सांख्य–योग}\) (तत्त्वज्ञान + साधना)। प्रश्न में “समान तंत्र” दिखे ⇒ न्याय के साथ \(\textbf{वैशेषिक}\) चुनें।


Question 45:

जैन और बौद्ध दर्शन किस दार्शनिक सम्प्रदाय में आते हैं ?

  • (1) आस्तिक
  • (2) नास्तिक
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) \(\textbf{नास्तिक}\)
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चरण 1: आस्तिक–नास्तिक का मानदण्ड।

भारतीय परम्परा में आस्तिक/नास्तिक का आधार वेद-प्रामाण्य है—जो वेदों को अंतिम प्रमाण मानता है वह आस्तिक, और जो नहीं मानता वह नास्तिक। यह वर्गीकरण ईश्वर-मान्यता पर नहीं, बल्कि वेद-स्वीकृति पर आधारित है।


चरण 2: जैन और बौद्ध का स्थान।

जैन और बौद्ध दार्शनिक परम्पराएँ वेदों को प्रमाण नहीं मानतीं; इनके अपने त्रिरत्न/अष्टांग मार्ग, स्याद्वाद/प्रतित्यसमुत्पाद जैसे स्वाधीन सिद्धान्त और शास्त्रीय ग्रन्थ हैं। इसलिए यह दोनों नास्तिक सम्प्रदायों में गिने जाते हैं।


चरण 3: उन्मूलन।

आस्तिक सम्प्रदायों में सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त आते हैं—ये वेद-प्रामाण्य स्वीकारते हैं। अतः जैन–बौद्ध के लिए विकल्प नास्तिक ही उपयुक्त है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{आस्तिक/नास्तिक = वेद-प्रामाण्य}\) (न कि ईश्वर-स्वीकार)। \(\textbf{जैन–बौद्ध = नास्तिक}\); \(\textbf{न्याय–वैशेषिक–सांख्य–योग–मीमांसा–वेदान्त = आस्तिक}\)।


Question 46:

निम्नलिखित में से कौन भारतीय दार्शनिक नहीं है ?

  • (1) कपिल
  • (2) गौतम
  • (3) देकार्त
  • (4) कणाद
Correct Answer: (3) \(\textbf{देकार्त}\)
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चरण 1: भारतीय परम्परा के दार्शनिक।

कपिल सांख्य दर्शन के प्रवर्तक माने जाते हैं; उन्होंने पुरुष और प्रकृति को मूल तत्त्व मानकर मुक्तिपथ समझाया। गौतम न्यायसूत्र के रचयिता हैं और प्रमाण, तर्क-विधि तथा हेत्वाभास का संघटित ढाँचा देते हैं। कणाद वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक हैं, जिन्होंने द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय जैसे पदार्थों का वर्गीकरण किया। ये तीनों भारतीय दार्शनिक परम्परा के प्रमुख स्तम्भ हैं।


चरण 2: देकार्त का परिचय।

रेने देकार्त सत्रहवीं शताब्दी के फ्रांसीसी दार्शनिक हैं, जिन्हें आधुनिक पाश्चात्य दर्शन का जनक कहा जाता है। वे रैशनलिस्ट परम्परा, मन–शरीर द्वैतवाद और अन्तः-क्रियावाद के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका कार्य भारतीय शास्त्रीय परम्परा का हिस्सा नहीं है।


चरण 3: निष्कर्ष।

अतः दिए गए विकल्पों में भारतीय दार्शनिक नहीं होने वाला विकल्प देकार्त है, जबकि कपिल, गौतम और कणाद भारतीय आस्तिक दर्शनों के प्रतिनिधि हैं।
Quick Tip: सह-स्मरण: \(\textbf{कपिल = सांख्य}\), \(\textbf{गौतम = न्याय}\), \(\textbf{कणाद = वैशेषिक}\); \(\textbf{देकार्त = फ्रांसीसी रैशनलिस्ट}\) — इसलिए वही भारतीय नहीं।


Question 47:

बुद्ध के अष्टाङ्गिक मार्ग के प्रथम दो (सम्यक दृष्टि एवं सम्यक संकल्प) को क्या कहा जाता है?

  • (1) प्रज्ञा
  • (2) शील
  • (3) समाधि
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (1) \(\textbf{प्रज्ञा}\)
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चरण 1: अष्टाङ्गिक मार्ग की त्रि-श्रेणी।

बौद्ध धर्म में अष्टाङ्गिक मार्ग को तीन प्रशिक्षणों में बाँटा जाता है—प्रज्ञा (बुद्धि/ज्ञान), शील (नैतिक आचरण) और समाधि (मानसिक अनुशासन)। यह विभाजन साधक को क्रमबद्ध साधना का ढाँचा देता है।


चरण 2: अंग–श्रेणी का मिलान।

प्रज्ञा के अंतर्गत दो अंग आते हैं—सम्यक दृष्टि (यथार्थ समझ: दुःख, समुदय, निरोध, मार्ग की सम्यक बोध) और सम्यक संकल्प (त्याग, मैत्री/अहिंसा, करुणा से युक्त संकल्प)। शील में सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका; समाधि में सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि आते हैं।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

क्योंकि प्रथम दो अंग प्रज्ञा श्रेणी में स्थित हैं, अतः न शील (जो अगले तीन अंगों का समूह है) और न समाधि (अंतिम तीन) उपयुक्त है। इसलिए सही उत्तर प्रज्ञा है।
Quick Tip: अष्टाङ्गिक मार्ग को याद करें—\(\textbf{प्रज्ञा:}\) दृष्टि–संकल्प; \(\textbf{शील:}\) वाणी–कर्म–आजीविका; \(\textbf{समाधि:}\) प्रयास–स्मृति–समाधि।


Question 48:

भारतीय दार्शनिक सम्प्रदायों को बाँटा गया है—

  • (1) आस्तिक में
  • (2) नास्तिक में
  • (3) आस्तिक एवं नास्तिक में
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) \(\textbf{आस्तिक एवं नास्तिक में}\)
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चरण 1: वर्गीकरण का मानदण्ड।

भारतीय परम्परा में दार्शनिक सम्प्रदायों का मुख्य विभाजन वेद-प्रामाण्य पर आधारित है—जो वेदों को प्रमाण मानते हैं वे आस्तिक, और जो नहीं मानते वे नास्तिक कहे जाते हैं। यह भेद ईश्वर-स्वीकार/अस्वीकार पर नहीं, केवल वेद-स्वीकृति पर टिका है।


चरण 2: आस्तिक और नास्तिक के उदाहरण।

आस्तिक में सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त सम्मिलित हैं—ये वेद-प्रामाण्य स्वीकारते हैं।

नास्तिक में बौद्ध, जैन, चार्वाक प्रमुख हैं—ये वेद को अंतिम प्रमाण नहीं मानते; अपने स्वतंत्र ग्रन्थ, पद्धतियाँ और साधना-मार्ग प्रस्तुत करते हैं।


चरण 3: निष्कर्ष/उन्मूलन।

चूँकि सम्पूर्ण परम्पराएँ इन्हीं दो वर्गों में व्यवस्थित की जाती हैं, केवल आस्तिक या केवल नास्तिक कहना अधूरा होगा। इसलिए उपयुक्त उत्तर आस्तिक एवं नास्तिक में है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{वेद-प्रामाण्य = आस्तिक}\); \(\textbf{वेद-अस्वीकृति = नास्तिक}\)। उदाहरण—\(\textbf{आस्तिक:}\) न्याय–वैशेषिक–सांख्य–योग–मीमांसा–वेदान्त; \(\textbf{नास्तिक:}\) बौद्ध–जैन–चार्वाक।


Question 49:

चतुर्थ आर्य सत्य को क्या कहा जाता है?

  • (1) मध्यम मार्ग
  • (2) अष्टाङ्गिक मार्ग
  • (3) सम्यक मार्ग
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) \(\textbf{अष्टाङ्गिक मार्ग}\)
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चरण 1: चार आर्य सत्यों की सूची।

बौद्ध सिद्धान्त के अनुसार चार आर्य सत्य हैं—(i) दुःख (जीवन-संसार दुःखमय है), (ii) समुदय (दुःख का कारण तृष्णा/अविद्या), (iii) निरोध (तृष्णा-क्षय से दुःख-निरोध संभव), (iv) मार्ग (निरोध तक पहुँचाने वाला साधन)।


चरण 2: चतुर्थ सत्य की परिभाषा।

चतुर्थ सत्य आर्य मार्ग है, जिसका रूप आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग माना गया—सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। इसे तीन प्रशिक्षणों में बाँटते हैं: प्रज्ञा (पहले दो), शील (मध्य के तीन), समाधि (अंतिम तीन)।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

मध्यम मार्ग बुद्ध का व्यापक जीवन-सिद्धान्त है (कठोर तप और भोग के चरमों से बचना), पर चतुर्थ सत्य का तकनीकी नाम अष्टाङ्गिक मार्ग ही है। सम्यक मार्ग कोई मान्य शास्त्रीय पदबंध नहीं। अतः सही उत्तर अष्टाङ्गिक मार्ग।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{दुःख–समुदय–निरोध–मार्ग}\) ⇒ \(\textbf{मार्ग = आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग}\) (प्रज्ञा–शील–समाधि के 8 अंग)।


Question 50:

बुद्ध के अनुसार दुःख का मूल कारण क्या है ?

  • (1) तृष्णा
  • (2) जाति
  • (3) अविद्या
  • (4) नामरूप
Correct Answer: (1) \(\textbf{तृष्णा}\)
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चरण 1: चार आर्य सत्यों का संदर्भ।

दूसरा आर्य सत्य समुदय बताता है कि दुःख का कारण तृष्णा है—वस्तुओं, भोगों, अस्तित्व और अनस्तित्व के लिए अतृप्त लालसा। यही प्रवृत्ति पुनर्जन्म के चक्र को चलाती है और मन में आसक्ति, द्वेष, मोह को पोषित करती है।


चरण 2: तृष्णा के रूप।

बौद्ध साहित्य तीन प्रमुख प्रकार बताता है: काम-तृष्णा (इन्द्रिय-भोग), भव-तृष्णा (अस्तित्व/सत्ता के प्रति चिपकाव), विभव-तृष्णा (अनस्तित्व/विनाश की चाह)। ये तीनों क्लेशों और कर्मों को उत्पन्न कर उपादान और आगे भव–जाति–जरामरण की श्रृंखला को जन्म देते हैं।


चरण 3: प्रतित्यसमुत्पाद से सामंजस्य।

बारह निदानों में आरम्भ अविद्या से माना गया है, पर दुःख की तात्त्विक जड़ का व्यावहारिक निदान बुद्ध ने तृष्णा-क्षय के रूप में दिया—इसीलिए समुदय सत्य का सूत्र वाक्य “तृष्णा” है। जाति और नामरूप मध्य-निदान हैं, मूल कारण नहीं। अतः सही उत्तर तृष्णा।
Quick Tip: चार सत्य याद रखें: \(\textbf{दुःख–समुदय(तृष्णा)–निरोध–मार्ग}\); \(\textbf{तृष्णा के तीन रूप}\)—काम, भव, विभव—इन्हीं का क्षय साधना का लक्ष्य है।


Question 51:

महायान धार्मिक सम्प्रदाय का सम्बन्ध किस दर्शन से है ?

  • (1) जैन दर्शन से
  • (2) बौद्ध दर्शन में
  • (3) न्याय दर्शन से
  • (4) सांख्य दर्शन से
Correct Answer: (2) बौद्ध दर्शन में
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चरण 1: पहचान।

महायान बौद्ध धर्म की प्रमुख शाखा है (दूसरी है हीनयान/थेरवाद)। इसका मूल आदर्श बोधिसत्त्व है—स्व-कल्याण के साथ सर्व-प्राणियों के कल्याण हेतु बुद्धत्त्व का व्रत।


चरण 2: मुख्य विशेषताएँ।

प्रज्ञा–करुणा का समन्वय, शून्यता (माध्यमक), चित्तमात्र/योगाचार, तथागत-गर्भ, प्रज्ञापारमिता, इत्यादि। प्रसार: चीन, जापान, तिब्बत, कोरिया, मंगोलिया।


चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।

जैन/न्याय/सांख्य से सम्बन्ध नहीं; यह बौद्ध की शाखा है।
Quick Tip: महायान = बौद्ध (बोधिसत्त्व, करुणा, शून्यता)।


Question 52:

रामानुजाचार्य ने किस दर्शन को प्रतिपादित किया है ?

  • (1) अद्वैतवाद
  • (2) विशिष्टाद्वैतवाद
  • (3) द्वैतवाद
  • (4) भेदाभेदवाद
Correct Answer: (2) विशिष्टाद्वैतवाद
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चरण 1: प्रतिपादक और मूल ग्रन्थ।

रामानुज ने वेदान्तसूत्र पर श्रीभाष्य लिखकर विशिष्टाद्वैत स्थापित किया।


चरण 2: सिद्धान्त का सार।

परम वास्तविकता सगुण ब्रह्म/नारायण है; जीव (चित्) और जगत (अचित्) उसके विशेष/अंग हैं (शरीर–शरीरी-भाव)। मोक्ष का साधन भक्ति/प्रपत्ति।


चरण 3: विकल्प-उन्मूलन।

अद्वैत—शंकर; द्वैत—माध्व; भेदाभेद—भास्कर/निंबार्क आदि। अतः सही—विशिष्टाद्वैत।
Quick Tip: शंकर–अद्वैत | रामानुज–विशिष्टाद्वैत | माध्व–द्वैत | निंबार्क/भास्कर–भेदाभेद।


Question 53:

जैन दर्शन निम्नलिखित में से किसे स्वीकार करता है ?

  • (1) स्याद्वाद
  • (2) आरंभवाद
  • (3) अनात्मवाद
  • (4) विवर्तवाद
Correct Answer: (1) स्याद्वाद
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अनेकान्तवाद से उत्पन्न स्याद्वाद—सप्तभंगी सशर्त कथन—जैन का मुख्य मत। आरम्भवाद (न्याय-वैशेषिक), अनात्मवाद (बौद्ध), विवर्तवाद (अद्वैत) जैन नहीं हैं।
Quick Tip: जैन = अनेकान्त ⇒ स्याद्वाद


Question 54:

पतंजलि के योग-प्रविधि का प्रथम पायदान क्या है ?

  • (1) यम
  • (2) नियम
  • (3) ध्यान
  • (4) धारणा
Correct Answer: (1) यम
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अष्टाङ्ग-क्रम: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। यम—पहला नैतिक पायदान: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।
Quick Tip: याद: य-नि-आ-प्र-प्र-धा-ध्या-सम ⇒ प्रथम यम


Question 55:

वैशेषिक द्वारा कितने प्रकार का कर्म माना गया है ?

  • (1) पाँच
  • (2) आठ
  • (3) सोलह
  • (4) चौबीस
Correct Answer: (1) पाँच
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कर्म के पाँच भेद—उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण, गमन (देशान्तर-गमन)।
Quick Tip: ऊपर–नीचे–सिकुड़–फैल–चल = 5।


Question 56:

सांख्य के अनुसार गुणों की संख्या है

  • (1) अनन्त
  • (2) दो
  • (3) पाँच
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (4) इनमें से कोई नहीं
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सांख्य का त्रिगुण सिद्धान्त: सत्त्व–रजस–तमस = 3; पर विकल्पों में 3 नहीं, अतः “इनमें से कोई नहीं”।
Quick Tip: त्रिगुणात्मक प्रकृति = 3।


Question 57:

‘एन इंट्रोडक्शन टू एथिक्स’ के लेखक कौन हैं ?

  • (1) अरस्तू
  • (2) मिल
  • (3) मैकेंज़ी
  • (4) विलियम लिली
Correct Answer: (4) विलियम लिली
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शीर्षक–लेखक जोड़: An Introduction to Ethics — William Lillie; A Manual of Ethics — Mackenzie; Nicomachean Ethics — Aristotle; Utilitarianism — J. S. Mill.


Question 58:

शंकर के अनुसार ब्रह्म हैं—

  • (1) सत
  • (2) चित
  • (3) आनन्द
  • (4) इनमें से सभी
Correct Answer: (4) इनमें से सभी
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अद्वैत में ब्रह्म का स्वरूप-लक्षण: सत–चित–आनन्द (उपनिषद: सत्यम्–ज्ञानम्–अनन्तम्)। यह सीमित गुण नहीं, स्वरूप का संकेत है।


Question 59:

लाइबनिज के अनुसार ज्ञान का स्रोत क्या है ?

  • (1) अनुभव
  • (2) बुद्धि
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) बुद्धि
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लाइबनिज रैशनलिस्ट—ज्ञान का उच्चतर स्रोत बुद्धि; जन्मजात प्रवृत्तियाँ/आइडियाज़, Reason के सत्य (आवश्यक/सार्वभौम) को प्राथमिकता। अनुभव सहायक, पर मूल स्रोत नहीं।


Question 60:

कान्ट के अनुसार ज्ञान का स्रोत क्या है ?

  • (1) अनुभव
  • (2) बुद्धि
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) (a) तथा (b) दोनों
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कान्ट: संवेदना सामग्री देती है, बुद्धि a priori रूप/श्रेणियाँ देकर उसे रूपायित करती है—दोनों का संयोग ही ज्ञान। विषय-वस्तु रहित विचार शून्य; विचार-रहित अनुभूति अन्धी।


Question 61:

मिल के अनुसार कारण है—

  • (1) भावात्मक उपधियों का योग
  • (2) निषेधात्मक उपधियों का योग
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) (a) तथा (b) दोनों
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J. S. Mill: किसी परिणाम के लिए आवश्यक सभी सकारात्मक (present) और नकारात्मक (absent) शर्तों का पूर्ण योग ही उसका कारण है।


Question 62:

कान्ट के अनुसार ज्ञान है—

  • (1) प्रागनुभविक निर्णय
  • (2) अनुभव सापेक्ष निर्णय
  • (3) संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय
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ज्ञान का महत्त्वपूर्ण रूप: ऐसे निर्णय जो अनुभव-पूर्व भी वैध हों और ज्ञान-वृद्धि करें (गणित/भौतिकी के सार्वभौम नियमों का रूप) — a priori रूप + अनुभव सामग्री।


Question 63:

कान्ट के ज्ञान सम्बन्धी विचार को कहते हैं—

  • (1) अनुभववाद
  • (2) बुद्धिवाद
  • (3) समीक्षावाद
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) समीक्षावाद
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Kant = Critique (आलोचना/समीक्षा); अनुभव + a priori रूप/श्रेणियों का आलोचनात्मक समन्वय ⇒ समीक्षावाद/आलोचनात्मक दर्शन।


Question 64:

समीक्षात्मक वस्तुवाद को कहते हैं—

  • (1) ज्ञानमीमांसीय एकवाद
  • (2) ज्ञानमीमांसीय द्वैतवाद
  • (3) तत्त्वमीमांसीय द्वैतवाद
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) ज्ञानमीमांसीय द्वैतवाद
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Critical Realism: वस्तु स्वतंत्र/यथार्थ, पर ज्ञान मध्यस्थित/व्याख्यापरक ⇒ ज्ञाता–ज्ञेय का एपिस्टेमिक (ज्ञानमीमांसक) द्वैत। यह तत्त्वमीमांसीय द्वैत (दो पदार्थ) नहीं।


Question 65:

किसने कहा है कि ‘ज्ञान की प्राप्ति जन्मजात प्रत्यय से होती है’ ?

  • (1) अनुभववादियों ने
  • (2) बुद्धिवादियों ने
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) बुद्धिवादियों ने
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रैशनलिस्ट (देकार्त, स्पिनोज़ा, लाइबनिज) जन्मजात प्रत्यय/प्रवृत्तियाँ मानते हैं; अनुभववादी (लॉक, ह्यूम) नहीं।


Question 66:

‘मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ’ कथन दिया गया है—

  • (1) देकार्त द्वारा
  • (2) कान्ट द्वारा
  • (3) ह्यूम द्वारा
  • (4) स्पिनोज़ा द्वारा
Correct Answer: (1) देकार्त द्वारा
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Cogito, ergo sum — विधि-सन्देह के बीच स्वयं सोचने के तथ्यमात्र से आत्म-अस्तित्व का स्वयंसिद्ध निष्कर्ष।


Question 67:

शिक्षा दर्शन एक शाखा है—

  • (1) मनोविज्ञान की
  • (2) अर्थशास्त्र की
  • (3) तर्कशास्त्र की
  • (4) इनमें से किसी की नहीं
Correct Answer: (4) इनमें से किसी की नहीं
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शिक्षा-दर्शन स्वायत्त दार्शनिक उप-शाखा है—दर्शन के सिद्धान्तों को शिक्षा के उद्देश्यों, मूल्य, पाठ्यचर्या, विधि, आकलन पर लागू करता है। यह मनोविज्ञान/अर्थशास्त्र/तर्क से सहायक अंतःविषयी सम्बन्ध रखता है, पर किसी एक की उपशाखा नहीं।


Question 68:

व्यापार व्यवसाय है—

  • (1) अनैतिक
  • (2) क्रूर
  • (3) लाभोन्मुखी
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) लाभोन्मुखी
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व्यापार का मूल उद्देश्य लाभ सहित मूल्य-निर्माण; पर यह अनैतिक/क्रूर होना नहीं—आधुनिक व्यवसाय नैतिक/कानूनी दायित्वों के भीतर चलता है।


Question 69:

प्रागनुभविक ज्ञान सम्बन्धित है—

  • (1) बुद्धि से
  • (2) अनुभव से
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (1) बुद्धि से
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a priori = अनुभव-स्वतंत्र, बुद्धि/मन के पूर्वरूपों पर आधारित (सार्वभौम-आवश्यक)। a posteriori = अनुभव-आधारित। अतः प्रागनुभविक ⇒ बुद्धि


Question 70:

प्रत्ययवाद है।

  • (1) ज्ञानमीमांसीय सिद्धान्त
  • (2) तत्त्वमीमांसीय सिद्धान्त
  • (3) (a) तथा (b) दोनों
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (1) ज्ञानमीमांसीय सिद्धान्त
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प्रत्ययवाद: हम वस्तु नहीं, उसकी मानसिक प्रति/प्रतिनिधि (representation) को तात्कालिक रूप से जानते हैं—यह “हम जानते कैसे हैं” का सिद्धान्त ⇒ Epistemology।


Question 71:

बुद्ध के किस आर्य सत्य में दुःखों का कारण वर्णित है ?

  • (1) प्रथम
  • (2) द्वितीय
  • (3) तृतीय
  • (4) चतुर्थ
Correct Answer: (2) द्वितीय
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द्वितीय आर्य सत्य = समुदय — दुःख का कारण तृष्णा (काम-भव-विभव)। प्रथम: दुःख; तृतीय: निरोध; चतुर्थ: मार्ग (अष्टाङ्गिक)।


Question 72:

निम्न में से कौन नास्तिक दर्शन है ?

  • (1) योग दर्शन
  • (2) न्याय दर्शन
  • (3) जैन दर्शन
  • (4) सांख्य दर्शन
Correct Answer: (3) जैन दर्शन
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आस्तिक/नास्तिक का मानदण्ड = वेद-प्रामाण्य। योग/न्याय/सांख्य—आस्तिक; जैन—वेद-प्रामाण्य न मानता ⇒ नास्तिक।


Question 73:

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर कौन हैं ?

  • (1) महावीर
  • (2) पार्श्वनाथ
  • (3) गौतम
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (4) इनमें से कोई नहीं
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प्रथम तीर्थंकर: ऋषभदेव/आदिनाथ। पार्श्वनाथ 23वें, महावीर 24वें; गौतम—महावीर के गणधर। अतः सूची में न होने से “इनमें से कोई नहीं”।


Question 74:

योग दर्शन के प्रवर्तक कौन हैं?

  • (1) गौतम
  • (2) कणाद
  • (3) पतंजलि
  • (4) कपिल
Correct Answer: (3) पतंजलि
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योगसूत्र-कर्त्ता पतंजलि—अष्टाङ्ग-योग की सुव्यवस्था। युग्म: सांख्य (कपिल)–योग (पतंजलि); न्याय (गौतम); वैशेषिक (कणाद)।


Question 75:

न्याय दर्शन के प्रवर्तक कौन हैं ?

  • (1) गौतम
  • (2) कपिल
  • (3) कणाद
  • (4) महावीर
Correct Answer: (1) गौतम
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आक्षेपाद/अक्षपाद गौतमन्यायसूत्र के कर्ता; चार प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) और तर्क-पद्धति का आधार।


Question 76:

सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कौन हैं ?

  • (1) पतंजलि
  • (2) कपिल
  • (3) कणाद
  • (4) गौतम
Correct Answer: (2) कपिल
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कपिल परम्परानुसार प्रवर्तक; तत्त्व-शास्त्र का सूत्रीकरण आगे ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका में। सांख्य: द्वैत—पुरुष (चेतन) और प्रकृति (अचेतन, त्रिगुण)। विवेकज्ञान से कैवल्य।
Quick Tip: जोड़ी: कपिल–सांख्य, पतंजलि–योग, कणाद–वैशेषिक, गौतम–न्याय।


Question 77:

अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक कौन हैं?

  • (1) शंकर
  • (2) रामानुज
  • (3) निम्बार्क
  • (4) मध्व
Correct Answer: (1) शंकर
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आदि शंकराचार्य—ब्रह्मसूत्र/उपनिषद/गीता भाष्य द्वारा अद्वैत प्रतिष्ठित: ब्रह्म = सत्–चित्–आनन्द, जगत/जीव—अविद्या से विवर्त; श्रवण–मनन–निदिध्यासन से मोक्ष।
Quick Tip: शंकर–अद्वैत | रामानुज–विशिष्टाद्वैत | निम्बार्क–द्वैताद्वैत | मध्व–द्वैत।


Question 78:

वैशेषिक दर्शन के अनुसार निम्नांकित में कौन द्रव्य नहीं है ?

  • (1) कर्म
  • (2) काल
  • (3) आत्मा
  • (4) पृथ्वी
Correct Answer: (1) कर्म
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वैशेषिक के नौ द्रव्य: पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा, मन। कर्म द्रव्य नहीं, अलग पदार्थ-श्रेणी (5 भेद: उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण, गमन)।


Question 79:

निम्न में से कौन आस्तिक दर्शन है ?

  • (1) बौद्ध दर्शन
  • (2) जैन दर्शन
  • (3) न्याय दर्शन
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (3) न्याय दर्शन
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आस्तिक = वेद-प्रामाण्य स्वीकार: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त। बौद्ध/जैन/चार्वाक—नास्तिक।


Question 80:

सांख्य दर्शन में आत्मा के लिए जिस पद का प्रयोग हुआ है, वह है—

  • (1) ईश्वर
  • (2) जीव
  • (3) पुरुष
  • (4) अजीव
Correct Answer: (3) पुरुष
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सांख्य में आत्मा = पुरुष (अनेक, साक्षी, अकर्ता); प्रकृति = अचेतन, त्रिगुण। ‘जीव/अजीव’ जैन-परिभाषा; योग में ईश्वर-प्रणिधान, पर सांख्य क्लासिकल रूप से ईश्वर-स्वीकार नहीं करता।


Question 81:

न्याय के द्वारा कितने प्रमाणों को स्वीकार किया गया है ?

  • (1) दो
  • (2) तीन
  • (3) चार
  • (4) छः
Correct Answer: (3) चार
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न्याय = 4 प्रमाण: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द। (मीमांसा/वेदान्त = 6; सांख्य = 3)।


Question 82:

जैन दर्शन के चौबीसवें तीर्थंकर कौन हैं ?

  • (1) गौतम
  • (2) ऋषभदेव
  • (3) कणाद
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (4) इनमें से कोई नहीं
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24वें तीर्थंकर महावीर हैं—विकल्पों में नहीं। ऋषभदेव प्रथम; गौतम—महावीर के गणधर; कणाद—वैशेषिक प्रवर्तक।


Question 83:

बुद्ध ने कितने आर्य सत्य बतलाये हैं ?

  • (1) तीन
  • (2) चार
  • (3) छः
  • (4) आठ
Correct Answer: (2) चार
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चार आर्य सत्य: दुःख, समुदय (कारण), निरोध, मार्ग (अष्टाङ्गिक)।


Question 84:

किस दर्शन में सम्यक् समाधि का वर्णन है ?

  • (1) योग दर्शन
  • (2) बौद्ध दर्शन
  • (3) जैन दर्शन
  • (4) न्याय दर्शन
Correct Answer: (2) बौद्ध दर्शन
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आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग का 8वाँ अंग: सम्यक् समाधि—झान/ध्यान द्वारा चित्त-एकाग्रता। (योग में “समाधि” है, पर “सम्यक् समाधि” तकनीकी पद बौद्ध में)।


Question 85:

गीता के अनुसार योग का क्या अर्थ है ?

  • (1) ईश्वर से मिलन
  • (2) त्याग
  • (3) समिध
  • (4) धर्म
Correct Answer: (1) ईश्वर से मिलन
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“युज्” = जोड़ना; गीता में योग = ईश्वराभिमुख संयोजन/स्थिरता—निष्काम कर्म, “समत्वं योग उच्यते” (2.48), “योगः कर्मसु कौशलम्” (2.50)।


Question 86:

निम्नलिखित में से किस एक में बुद्ध के उपदेश संहित हैं ?

  • (1) न्याय सूत्र में
  • (2) त्रिपिटक में
  • (3) ज्ञान की पुस्तक में
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (2) त्रिपिटक में
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पाली कैनन/त्रिपिटक: विनय-पिटक (संघ-नियम), सुत्त-पिटक (उपदेश), अभिधम्म-पिटक (दार्शनिक विश्लेषण)।


Question 87:

अनुमान को प्रमाण के रूप में स्वीकार किया है—

  • (1) न्याय दर्शन ने
  • (2) सांख्य दर्शन ने
  • (3) बौद्ध दर्शन ने
  • (4) इनमें से सभी ने
Correct Answer: (4) इनमें से सभी ने
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न्याय (4), सांख्य (3), बौद्ध (2) — तीनों में अनुमान प्रमाण स्वीकृत।


Question 88:

जैन दर्शन का तत्त्वमीमांसीय सिद्धान्त है—

  • (1) देहात्मवाद
  • (2) शाश्वतवाद
  • (3) अनेकान्तवाद
  • (4) स्यादवाद
Correct Answer: (3) अनेकान्तवाद
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जैन तत्त्व-सिद्धान्त: अनेकान्तवाद (वस्तु बहुपक्षीय)। स्यादवाद—उसका वक्तव्य/ज्ञानमीमांसीय रूप (सप्तभंगी)। देहात्मवाद—चार्वाक।


Question 89:

गीता में कुल कितने अध्याय हैं ?

  • (1) बारह
  • (2) पन्द्रह
  • (3) अठारह
  • (4) पच्चीस
Correct Answer: (3) अठारह
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भगवद्गीता: 700 श्लोक, 18 अध्याय, भीष्मपर्व का भाग—त्रि-षट्क (कर्म–भक्ति–ज्ञान) का विन्यास।


Question 90:

वैशेषिक के ‘अभाव’ पदार्थ दिया गया है—

  • (1) प्रशस्तपाद द्वारा
  • (2) गौतम द्वारा
  • (3) कणाद द्वारा
  • (4) भर्तृहरि द्वारा
Correct Answer: (1) प्रशस्तपाद द्वारा
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कणाद: मूल 6 पदार्थ; प्रशस्तपाद (पदार्थधर्मसंग्रह) ने अभाव पदार्थ का सुव्यवस्थित प्रतिपादन किया—प्राग, ध्वंस, अत्यन्त, अन्योन्य।


Question 91:

निम्न में से कौन कारणता के सिद्धान्त से सम्बन्धित है ?

  • (1) मिल
  • (2) अरस्तू
  • (3) ह्यूम
  • (4) इनमें से सभी
Correct Answer: (4) इनमें से सभी
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अरस्तू—चार कारण; ह्यूम—आवश्यक सम्बन्ध पर संशय; मिल—आगमन नियमों से कारण-अन्वेषण।


Question 92:

निम्न में से कौन चिंतक संदेहवाद से सम्बन्धित है ?

  • (1) कांट
  • (2) स्पिनोज़ा
  • (3) प्लेटो
  • (4) ह्यूम
Correct Answer: (4) ह्यूम
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ह्यूम—अनुभववादी संदेहवाद: कारणता का आवश्यक सम्बन्ध अनुभव से असिद्ध; आत्म/ईश्वर/बाह्य-जगत दावों पर संशय।


Question 93:

निम्नलिखित में से किस युक्ति को कारणात्मकमूलक युक्ति कहा जा सकता है ?

  • (1) सतामूलक
  • (2) विश्वमूलक
  • (3) प्रयोजनमूलक
  • (4) नैतिक
Correct Answer: (2) विश्वमूलक
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Cosmological (विश्वमूलक) तर्क कारण-फल श्रंखला से प्रथम/अकारण कारण स्थापित करता है—इसीलिए कारणात्मक। सतामूलक = परिभाषा से अस्तित्व; प्रयोजनमूलक = नियोजन/डिज़ाइन; नैतिक = नैतिक व्यवस्था।


Question 94:

किसके अनुसार यथार्थ ज्ञान सार्वभौम, अनिवार्य एवं नवीन होना चाहिए ?

  • (1) डेसकार्त
  • (2) लॉक
  • (3) ह्यूम
  • (4) कांट
Correct Answer: (4) कांट
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कांट के संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक (synthetic a priori) निर्णय: Universal + Necessary + Ampliative—गणित/विज्ञान की वैधता की कुंजी।


Question 95:

किस ज्ञान सिद्धान्त के अनुसार ‘ज्ञान की प्राप्ति आगमनात्मक विधि से होती है’ ?

  • (1) बुद्धिवाद
  • (2) अनुभववाद
  • (3) समीक्षावाद
  • (4) वस्तुवाद
Correct Answer: (2) अनुभववाद
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अनुभववाद (Bacon–Locke–Hume–Mill): ज्ञान का स्रोत अनुभव; विज्ञान की प्रगति आगमन पर—मिल के आगमन-नियम प्रसिद्ध। (रैशनलिज्म ⇒ निगमन; कांट ⇒ आलोचनात्मक संश्लेषण)।


Question 96:

निम्नलिखित में से कौन अनुप्रयुक्त नीतिशास्त्र की शाखा है ?

  • (1) व्यवसाय नीतिशास्त्र
  • (2) पर्यावरणीय नीतिशास्त्र
  • (3) जैव-चिकित्सीय नीतिशास्त्र
  • (4) इनमें से सभी
Correct Answer: (4) इनमें से सभी
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Applied Ethics = सिद्धान्तों का विशिष्ट संदर्भों में अनुप्रयोग: Business, Environmental, Bio-medical—तीनों मानक उपक्षेत्र।


Question 97:

पर्यावरणीय नीतिशास्त्र है

  • (1) जीवन केन्द्रित
  • (2) पशु केन्द्रित
  • (3) मनुष्य केन्द्रित
  • (4) इनमें से सभी
Correct Answer: (4) इनमें से सभी
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पर्यावरण-नीति में विविध दृष्टियाँ: Anthropocentric (मानव हित), Zoocentric (संवेदनशील पशु-मंगल), Bio/Ecocentric (जीवन/पारितंत्र का अंतर्निहित मूल्य)।


Question 98:

सरल प्रत्यय और जटिल प्रत्यय का विचार किस अनुभववादी दर्शन में उल्लिखित है?

  • (1) लॉक
  • (2) बर्कले
  • (3) ह्यूम
  • (4) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (1) लॉक
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Locke: मन = tabula rasa; संवेदन/प्रतिवर्तन से सरल प्रत्यय; संयोजन–तुलना–अमूर्तन से जटिल प्रत्यय


Question 99:

जड़ में गति प्रदान करने वाली शक्ति को क्या कहते हैं ?

  • (1) निमित्त कारण
  • (2) उपादान कारण
  • (3) आकारिक कारण
  • (4) अंतिम कारण
Correct Answer: (1) निमित्त कारण
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अरस्तू के चार कारण: उपादान (सामग्री), आकारिक (रूप), निमित्त (गतिदाता/क्रियाकारक), अंतिम (उद्देश्य)। जड़ में गति देने वाला = निमित्त


Question 100:

ईश्वर की सत्ता के लिए सतामूलक युक्ति का किसने समर्थन किया है ?

  • (1) लॉक
  • (2) ह्यूम
  • (3) कांट
  • (4) डेसकार्त
Correct Answer: (4) डेसकार्त
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सतामूलक (Ontological) तर्क: सर्वोत्तम सत्ता की परिभाषा में अस्तित्व निहित—समर्थक: एन्सेल्म, डेसकार्त. (कांट—आलोचक: “अस्तित्व गुण नहीं”).


Section-B

Question 101:

योग दर्शन में 'योग' का क्या अर्थ है?

Correct Answer:
योग का मूल अर्थ पतञ्जलि के अनुसार “चित्तवृत्ति निरोध” है—अर्थात् मन की वृत्तियों का निवारण कर चित्त को एकाग्र/निर्मल करना। अष्टाङ्ग—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि—से देह-मन का अनुशासन होता है और लक्ष्य कैवल्य है।
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आधार: सांख्य की पृष्ठभूमि; योगसूत्र (1.2): “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
साधन: अष्टाङ्ग से शुद्धि/एकाग्रता; फल: क्लेशक्षय, विवेकख्याति, पुरुष-स्वरूप-स्थिति।
सार: केवल व्यायाम नहीं—नैतिक, मानसिक व आध्यात्मिक समन्वित साधन।


Question 102:

गीता में योग का क्या अर्थ है?

Correct Answer:
गीता में ‘योग’ = समत्व-बुद्धि + निष्काम कर्म—“समत्त्वं योग उच्यते” (2.48), “योगः कर्मसु कौशलम्” (2.50)। स्वधर्मानुसार कर्म करते हुए फलासक्ति-त्याग और ईश्वरार्पण से चित्त-शुद्धि व मोक्ष-पथ।
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समत्व की परिभाषा, कर्मयोग का केन्द्र, ज्ञान-भक्ति-कर्म का समन्वय—व्यावहारिक रूप में यही गीता-योग।


Question 103:

प्रतीत्यसमुत्पाद से आप क्या समझते हैं?

Correct Answer:
प्रतीत्यसमुत्पाद: सभी धारणाएँ/वस्तुएँ परस्पर-निर्भर कारण-सम्बन्ध से उत्पन्न; कुछ भी स्वतन्त्र/नित्य नहीं। द्वादश निदान दुःख-चक्र समझाते हैं; इससे अनित्य, अनात्म, शून्यता का बोध और निर्वाण-पथ स्पष्ट।
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सूत्र: “इदं अस्ति तदा तत्”—सहोत्पत्ति; 12 निदान क्रम; तृष्णा/उपादान तोड़कर निरोध-साधना।


Question 104:

अरस्तू ने कारणों की स्वीकृति (विशेषतः द्वैत/सार-रूप बनाम पदार्थ) को क्यों उचित माना?

Correct Answer:
वस्तु-व्याख्या हेतु परिवर्तन, अस्तित्व, प्रयोजन—तीनों का हिसाब चाहिए। इसलिए चार कारण (उपादान, रूप, निमित्त, प्रयोजन); कई व्याख्याएँ इन्हें पदार्थ और रूप/उद्देश्य के द्वैत में समेटती हैं—“क्या से” + “किस हेतु/रूप में”।
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पदार्थ मात्र से पहचान नहीं; रूप मात्र से निर्माण नहीं—दोनों के समन्वय से व्याख्यात्मक पर्याप्तता मिलती है।


Question 105:

सांख्य दर्शन को द्वैतवादी क्यों कहते हैं?

Correct Answer:
क्योंकि यह पुरुष (चेतन साक्षी) और प्रकृति (अचेतन, त्रिगुणात्मक)—दो स्वतंत्र तत्त्व मानता है। विवेकख्याति से उनके भेद का बोध होने पर कैवल्य।
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पुरुष–प्रकृति युग्म, बन्ध-मुक्ति सिद्धान्त, गुण-संतुलन—यही सांख्य का द्वैत-आधार।


Question 106:

बर्कले का आत्मनिष्ठ प्रत्ययवाद क्या है?

Correct Answer:
बर्कले: Esse est percipi—अस्तित्व = अनुभूति में होना। भौतिक वस्तु स्वतंत्र पदार्थ नहीं, अनुभूतियों/विचारों का गुच्छ। जगत की निरन्तरता हेतु ईश्वर को सर्वपर्यवेक्षक चेतना मानते हैं।
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प्रत्यक्ष-प्रधानता, बाह्य जड़-सत्ता का निषेध, ईश्वर द्वारा अनुभव-क्रम की सुनिश्चितता।


Question 107:

पदार्थ के रूप में ‘द्रव्य’ की व्याख्या करें।

Correct Answer:
न्याय–वैशेषिक में द्रव्य = गुण-कर्म का आश्रय व समवाय-कारण। नौ द्रव्य: पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन। नित्य/अनित्य दोनों रूप; उपादान-कारण भी।
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परिभाषा, नव-विद सूची, नित्य–अनित्य भेद, दार्शनिक भूमिका का संक्षेप।


Question 108:

‘व्यक्ति’ क्या है? विवेचना करें।

Correct Answer:
‘व्यक्ति’ = निज-स्वत्व/चेतना/नैतिक दायित्व का धारक। न्याय में विशिष्ट द्रव्य-संयोग; वेदान्त में जीव; जैन में जीवात्मा द्रव्य; आधुनिक परिप्रेक्ष्य में अधिकार/स्वतंत्रता/स्व-निर्णय की इकाई।
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चेतना, स्मृति, इरादा, उत्तरदायित्व—तीन आयाम: चेतन, नैतिक, सामाजिक।


Question 109:

सांख्य के अनुसार प्रकृति के स्वरूप की व्याख्या करें।

Correct Answer:
प्रकृति = जड़, अनादि, त्रिगुणात्मक मूल-कारण (सत्त्व–रजस–तमस)। पुरुष-सन्निधि से विक्षोभ होकर विकास-क्रम: महत्त → अहंकार → तन्मात्राएँ/इन्द्रियाँ/मन → पंचभूत
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गुण-सम्य/विक्षोभ, विकास-श्रृंखला, बन्ध–मुक्ति में सत्त्व-वृद्धि/विवेकख्याति की भूमिका।


Question 110:

सत्त्व गुण क्या है?

Correct Answer:
सत्त्व = प्रकाश/प्रसाद/संतुलन; ज्ञान, शान्ति, करुणा, सत्यनिष्ठा को बढ़ाता है; ध्यान स्थिर कर विवेकख्याति में सहायक। सात्त्विक आहार–विहार से सत्त्व-वृद्धि।
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गुण-त्रयी संदर्भ, लक्षण, साधन, फल—साधना में सत्त्व का केंद्रीय महत्व।


Question 111:

स्वार्थानुमान और परार्थानुमान के बीच अन्तर स्पष्ट करें।

Correct Answer:
स्वार्थानुमान: स्वयं के लिए आन्तरिक तर्क (त्रय-केंद्रित)। परार्थानुमान: अन्य के लिए पंचावयव—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन—रूप औपचारिक प्रस्तुति। व्याप्ति/हेतु समान, पर परार्थ में संप्रेषणीयता हेतु संरचना।
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उद्देश्य/संरचना का भेद—निज-निश्चय बनाम श्रोता-निश्चय; मानक पांच-अवयव उदाहरण सहित।


Question 112:

भारतीय दर्शन में आस्तिक और नास्तिक के विभाजन का आधार क्या है?

Correct Answer:
आधार: वेद-प्रामाण्य-स्वीकार। सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त = आस्तिक; बौद्ध, जैन, चार्वाक = नास्तिक। यह वर्गीकरण ईश्वर-स्वीकार पर नहीं, प्रमाण-मीमांसा पर है।
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भ्रम-निवारण: सांख्य ईश्वर-निरपेक्ष होते हुए भी वेद-स्वीकृति के कारण आस्तिक।


Question 113:

‘स्वधर्म’ के तात्पर्य स्पष्ट करें।

Correct Answer:
स्वधर्म = स्वभाव, योग्यता, भूमिका के अनुरूप निष्काम/समत्व-बुद्धि से कर्तव्य-पालन—“श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः…”. इससे चित्त-शुद्धि व लोक-कल्याण।
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परिभाषा, निष्कामता, व्यावहारिक उदाहरण, परिणाम—स्थिरता/शान्ति/न्याय।


Question 114:

भारतीय दर्शन में ‘पुरुषार्थ’ का क्या अर्थ है?

Correct Answer:
मानव-जीवन के चार लक्ष्य: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। धर्म—मार्गदर्शक; अर्थ/काम—धर्माधीन; मोक्ष—परम लक्ष्य।
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समन्वय/पदानुक्रम, जीवन-चरणों में प्राथमिकता, संतुलित उन्नति का मॉडल।


Question 115:

ईश्वर के अस्तित्व सम्बन्धी प्रमाण कौन-कौन से हैं?

Correct Answer:
कार्य/कॉस्मोलॉजिकल, नियोजन/टेलीओलॉजिकल, नैतिक, ओण्टोलॉजिकल; भारतीय न्याय के आरम्भ/आयोजन-तर्क; तथा अनुभवात्मक (योग/भक्ति) साक्ष्य। समेकित रूप में प्रायिक/तार्किक समर्थन देते हैं।
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प्रत्येक पर आपत्तियाँ संभव; पर बहु-प्रमाणों का संयुक्त बल निर्णायकता बढ़ाता है।


Question 116:

कारण के स्वरूप की व्याख्या करें।

Correct Answer:
न्याय–वैशेषिक: कारण = जिसके बिना कार्य न हो। त्रि-भेद—समवायी, असमवायी, निमित्त। वेदान्त: प्रायः उपादाननिमित्त। कारण–कार्य का नियमबद्ध/अनिवार्य सम्बन्ध; कार्य कारण में संभाव्य रूप से पूर्वस्थित।
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आवश्यक शर्तें, उदाहरण (मृत्तिका–कुम्भ), अन्य परम्पराओं का दृष्टिकोण, नैतिक/वैज्ञानिक निहितार्थ।


Question 117:

नीतिशास्त्र की परिभाषा दें।

Correct Answer:
नीतिशास्त्र: शुभ–अशुभ/उचित–अनुचित के मानदण्डों का दर्शन; कर्तव्य, सद्गुण, उद्देश्यों का तर्कसम्मत प्रतिपादन। तीन स्तर—मानक, मेटाएथिक्स, अनुप्रयुक्त। भारतीय सन्दर्भ: धर्म, अहिंसा, सत्य, पुरुषार्थ-संतुलन।
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विषय-क्षेत्र, प्रमुख शाखाएँ, उद्देश्य—गरिमा/न्याय/दीर्घकल्याण सुनिश्चित करना।


Question 118:

क्या शंकर के अनुसार जगत असत्य है?

Correct Answer:
अद्वैत में जगत असत्य नहीं, मिथ्या है—व्यावहारिक स्तर पर सत्य, पर परमार्थतः नहीं। “ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या”—निरपेक्ष सत्य केवल ब्रह्म।
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सत्य-त्रिविध (परमार्थिक/व्यावहारिक/प्रातिभासिक), मिथ्यात्व का अर्थ, माया-नामरूप, ज्ञान से अभेद-बोध।


Question 119:

भारतीय दार्शनिक सम्प्रदायों के नाम लिखें।

Correct Answer:
आस्तिक: सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्वमीमांसा, वेदान्त। नास्तिक: बौद्ध, जैन, चार्वाक/लोकायत।
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वर्गीकरण का आधार वेद-प्रामाण्य; छः आस्तिक + तीन प्रमुख नास्तिक—सूची व संक्षिप्त पहचान।


Question 120:

परार्थानुमान क्या है?

Correct Answer:
परार्थानुमान = श्रोता हेतु पंचावयव रूप अनुमान—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण (व्याप्ति), उपनय (लागू), निगमन (निष्कर्ष)—ताकि श्रोतृ-निश्चय हो।
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मानक रूप का उदाहरण: पर्वतः अग्निमान… धूमवान… रसोई… उपनय… निगमन।


Question 121:

न्याय दर्शन के अनुसार अनुमान की परिभाषा दें।

Correct Answer:
अनुमान: लिङ्ग-दर्शनव्याप्ति-स्मृति से परोक्ष वस्तु का ज्ञान (धूम → अग्नि)। तत्व: पक्ष, साध्य, हेतु, व्याप्ति। प्रकार: पूर्ववत्, सामान्यतोदृष्ट, शेषवत्
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प्रक्रिया-क्रम, तीन प्रकार के उदाहरण, हेत्वाभासों से सावधानी।


Question 122:

आस्तिक दर्शन के नाम उनके प्रवर्तक के साथ लिखें।

Correct Answer: छः आस्तिक दर्शन और उनके प्रमुख प्रवर्तक/प्रणेताः
  • (1) न्यायगौतम/अक्षपाद
  • (2) वैशेषिककणाद
  • (3) सांख्यकपिल
  • (4) योगपतञ्जलि
  • (5) \(\textbf{पूर्वमीमांसा}—\textbf{जैमिनि} \)
  • (6) \(\textbf{उत्तरमीमांसा/वेदान्त}—\textbf{बादरायण (व्यास)}\); परवर्ती आचार्यों में शंकर, रामानुज, मध्व आदि प्रसिद्ध हैं।

ये सभी वेद-प्रामाण्य को स्वीकार करते हुए तत्त्व, ज्ञान और साधना के भिन्न-भिन्न पक्षों को प्रतिपादित करते हैं।

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साझा आधार: वेद-प्रामाण्य। शेष दो: पूर्वमीमांसा—जैमिनि, वेदान्त—बादरायण (ब्रह्मसूत्र)। स्मरण-मोनिक: “ग–क–क–प–ज–बा”.


Question 123:

बुद्धिवाद और अनुभववाद में क्या अन्तर है?

Correct Answer:
बुद्धिवाद: ज्ञान का मूल a priori/तर्क; निगमन-प्रधान (डेसकार्त, स्पिनोज़ा, लाइब्निज)। अनुभववाद: ज्ञान का मूल इन्द्रिय-अनुभव; मन = tabula rasa (लॉक, बर्कले, ह्यूम)। आधुनिक रुख: तर्क + अनुभव का समन्वय।
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ज्ञान-स्रोत, पद्धति, प्रभाव/आलोचनाएँ; कांट: “विचार बिना अंतर्वस्तु शून्य, अंतर्वस्तु बिना विचार अन्धी।”


Question 124:

भारतीय दर्शन में ‘कर्म सिद्धान्त’ के अर्थ को स्पष्ट करें।

Correct Answer:
हर कृत्य फल देता है—नियमबद्ध/अनिवार्य। कर्म-त्रय: संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण। पुण्य–पाप, पुनर्जन्म से सम्बद्ध; निष्काम कर्म/ज्ञान/भक्ति से बन्धन-क्षय व मोक्ष
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अपूर्व/अदृष्ट जैसे सेतु, उत्तरदायित्व व दीर्घकालिक दृष्टि का विकास।


Question 125:

शंकर का दर्शन अद्वैतवाद क्यों कहा जाता है?

Correct Answer:
क्योंकि ब्रह्म एकमेव अद्वितीय; जीव–जगत का भेद अविद्या-जन्य—ज्ञान से ब्रह्म–आत्मैक्य का साक्षात्कार। जगत व्यावहारिक, पर परमार्थतः मिथ्या—निरपेक्ष सत्य केवल ब्रह्म।
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त्रिपदी: “ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव”; माया-अवच्छेद, श्रवण–मनन–निदिध्यासन से अभेद-बोध।


Question 126:

व्यावसायिक नीतिशास्त्र क्या है?

Correct Answer:
व्यावसायिक नीतिशास्त्र (Business Ethics) व्यापार/संगठनों में नैतिक मानकों का अनुप्रयोग है—ईमानदारी, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, निष्पक्षता, हितधारक-कल्याण, पर्यावरण-संवेदना आदि। यह कानून-पालन से आगे जाकर सद्गुणदीर्घकालिक भलाई को साधता है—भ्रष्टाचार-विरोध, उपभोक्ता/श्रमिक अधिकार, डेटा-गोपनीयता, ईएसजी/सततता में नीति-निर्णय का मार्गदर्शन करता है।
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दायरा: बिक्री, सप्लाई-चेन, वित्तीय प्रकटन, विज्ञापन, टेक/डेटा।
सिद्धान्त: कर्तव्यवाद, उपादेयवाद, सद्गुण-नीति, हितधारक सिद्धान्त।
उपकरण: आचार-संहिता, हित-संघर्ष नियम, व्हिसलब्लोअर संरक्षण, ड्यू डिलिजेंस, ईएसजी मीट्रिक्स।
फल: विश्वास, ब्रांड-मूल्य, जोखिम-न्यूनन; “People–Planet–Profit” का संतुलन।


Question 127:

वस्तुवाद से आप क्या समझते हैं?

Correct Answer:
वस्तुवाद (Materialism): अंतिम वास्तविकता भौतिक पदार्थ/ऊर्जा है; चेतना/विचार पदार्थात्मक प्रक्रियाओं के उद्भव/रूपान्तरण हैं। भारतीय उदाहरण—चार्वाक; पाश्चात्य—भौतिक प्रकृतिवाद/नियतिवाद/न्यूरो-भौतिक दृष्टियाँ। अलौकिक सत्ता का स्वीकार नहीं।
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प्रत्यक्षवाद (चार्वाक), आधुनिक न्यूरो-प्रमाण; आलोचना—मूल्य/क्वालिया की घटनीयता पर प्रश्न; समकालीन संवाद—उद्भववाद/अकटनशीलता।


Question 128:

समनान्तरिक/समानान्तरवाद (Psychophysical Parallelism) क्या है?

Correct Answer:
समानान्तरवाद: मानसिक और दैहिक घटनाएँ समानान्तर क्रम में साथ घटित होती हैं, पर सीधा कारण-सम्बन्ध नहीं। यह किसी पूर्व-स्थापित समन्विति (लाइब्निज) या नियम-सम्बद्ध सह-घटना से समझाया जाता है।
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द्वैत की ‘इंटरऐक्शन’ समस्या से बचाव; दर्द-अनुभूति व नस-उत्तेजना साथ घटें, पर एक-दूसरे का कारण नहीं। बल/सीमा—व्याख्या सुबोध, पर परीक्षण-दुष्कर।


Question 129:

पुरुषार्थ के रूप में ‘धर्म’ की व्याख्या करें।

Correct Answer:
पुरुषार्थ-चतुष्टय में धर्म आधार—नैतिक–सामाजिक व्यवस्थाकर्तव्य जो अर्थ/काम को मर्यादित कर मोक्ष की ओर ले जाए। सत्य, अहिंसा, दया, दान, न्याय, शुचिता आदि इसके सार; स्वधर्मानुसार निष्काम पालन अपेक्षित।
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धर्म = नियामक; सामाजिक न्याय व चित्त-शुद्धि का साधन; निजी हित से ऊपर समष्टि-हित।


Question 130:

मृत्यु से आप क्या समझते हैं?

Correct Answer:
भारतीय दर्शन में मृत्यु देह-धर्म का परिवर्तन है, आत्मा का नहीं। देह–प्राण–मन का संयोग टूटने पर जीव सूक्ष्म-देह सहित कर्मानुसार पुनर्जन्म लेता है; ज्ञान/भक्ति/योग से बन्धन-क्षय कर मोक्ष (जन्म–मरण से मुक्ति) सम्भव।
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देह-आत्मा भेद; कर्म-सिद्धान्त; नैतिक दायित्व; मृत्यु-स्मरण से वैराग्य/कर्तव्य-बोध।


Section-C

Question 131:

ईश्वर के अस्तित्व के संदर्भ में प्रयोजनमूलक (टेलीओलॉजिकल) युक्ति का वर्णन करें।

Correct Answer:
डिज़ाइन/टेलीओलॉजिकल युक्ति: जगत की व्यवस्था, सामंजस्य, नियमबद्धता, उपयुक्त संरचना सर्वोत्तम रूप से बुद्धिमान नियन्ता से व्याख्यायित होती है; निष्कर्ष प्रायिक है, अन्य प्रमाणों के साथ बलवान।
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क्लासिकल ‘डिज़ाइन’ व आधुनिक ‘फाइन-ट्यूनिंग’; आपत्तियाँ—विकास/बहु-ब्रह्माण्ड; उत्तर—best explanation के रूप में औचित्य।


Question 132:

वैशेषिक के अभाव पदार्थ की व्याख्या करें।

Correct Answer:
वैशेषिक में ‘अभाव’ को विशेष पदर्थ (न-होने की स्थिति) माना—चार भेद: प्रागभाव, ध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव, अन्योन्याभाव। अभाव-ज्ञान प्रत्यक्ष/अनुमान से सम्भव; निषेध/उत्पत्ति/नाश की दार्शनिक व्याख्या इसी से व्यवस्थित।
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उदाहरण: “मेज पर घट नहीं”—स्थल-दर्शन से निषेध-ज्ञान; चारों अभाव के संक्षिप्त नमूने लिखें।


Question 133:

अनुभववाद की प्रमुख विशेषताओं की व्याख्या करें।

Correct Answer:
अनुभववाद: ज्ञान का प्रमुख स्रोत इन्द्रिय-अनुभव; मन tabula rasa; विचार अवलोकन–प्रयोग–आगमन से बनते। बल: प्रत्याक्ष्य, सत्यापन, संदेह, Occam’s razor; प्रतिनिधि—लॉक, बर्कले, ह्यूम। आधुनिक विज्ञान डेटा-आधारित पद्धति से इसी रुझान को साधता, पर a priori ढाँचे के साथ समन्वय आवश्यक।
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लॉक (सरल/जटिल विचार), बर्कले (esse est percipi), ह्यूम (कारणता = सह-घटना)। सीमा: शुद्ध अनुभव अवधारणारहित नहीं—इसलिए तर्क+अनुभव संगति।


Question 134:

शंकर के अनुसार ब्रह्म के स्वरूप की विवेचना करें।

Correct Answer:
अद्वैत में ब्रह्म सच्चिदानन्द, निराकार, निर्गुण, अखण्ड, एकमेव अद्वितीयपरमार्थ-सत्य। जगत/जीव मायाजन्य नाम-रूप (व्यावहारिक सत्य); परमार्थतः मिथ्या। आत्मा = ब्रह्म; श्रवण–मनन–निदिध्यासन से अविद्या-निवृत्ति पर ब्रह्मैक्य-साक्षात्कार।
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महावाक्य—“तत्त्वमसि”, “अहं ब्रह्मास्मि”; “नेति–नेति” द्वारा निरूपण; त्रिपदी—ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव।


Question 135:

अनेकान्तवाद की अवधारणा की व्याख्या करें।

Correct Answer:
जैन अनेकान्तवाद: वस्तु के अनेक पक्ष/अवस्थाएँ—एकांगी कथन पूर्ण सत्य नहीं। इसे स्याद्वाद (सप्तभंगी) व नयवाद से व्यक्त किया जाता है; उद्देश्य—सम्यक् ज्ञान, सहिष्णुता, अहिंसा
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सातभंगी सूची (स्यात् अस्ति… अवक्तव्य…); द्रव्य-नय/पर्याय-नय; निर्णय में संदर्भ-संवेदी दृष्टि।


Question 136:

बुद्ध के द्वितीय आर्य सत्य की विवेचना करें।

Correct Answer:
द्वितीय आर्य सत्य: समुदय—दुःख का कारण तृष्णा (कामा/भव/विभव) व उससे उपजा उपादान/अविद्या। तृष्णा-क्षय से निर्वाण संभव; यह चिकित्सकीय ढाँचे में “रोग-कारण-निर्णय” है।
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द्वादश निदान में तृष्णा/उपादान कड़ी; साधना—आष्टाङ्गिक मार्ग, स्मृति/प्रज्ञा से आसक्ति-क्षय।


Question 137:

देहवादी के अनुसार मन एवं शरीर के संबंध की व्याख्या करें।

Correct Answer:
देहवाद/भौतिकवाद: मन अलग द्रव्य नहीं; मस्तिष्क-प्रक्रियाओं का ही उद्भव/पहचान है। मानसिक अवस्थाएँ तंत्रिका-स्थितियों पर निर्भर; कारण-व्याख्या भौतिक नियमों में। रूप—पहचान-सिद्धान्त, कर्मात्मकवाद, उद्भववाद
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प्रमाण—मस्तिष्क-क्षति/दवा-प्रभाव/इमेजिंग सहसम्बन्ध; आलोचना—क्वालिया/आशयता की घटनीयता पर वाद।


Question 138:

चिकित्सकीय नीतिशास्त्र की समीक्षात्मक व्याख्या करें।

Correct Answer:
स्वास्थ्य-सेवा में चार मूल सिद्धान्त: भलाई, अनिष्ट-निवारण, स्वायत्तता, न्याय। प्रमुख मुद्दे—सूचित सहमति, गोपनीयता/डेटा-प्राइवेसी, संसाधन-वितरण, जीव-अंत निर्णय, ट्रायल/AI/टेलीहेल्थ। नियमों के साथ संदर्भ-संवेदना, सांस्कृतिक संवेदना, हित-संघर्ष प्रबंधन, पारदर्शिता आवश्यक।
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ICU-ट्राइएज, क्षमता-आकलन, जीन/IVF जोखिम, महामारी में निजता बनाम जन-हित; प्रक्रियात्मक साधन—एथिक्स कमेटी, SOPs, डेटा-गवर्नेंस; समालोचना—सिर्फ 4-प्रिंसिपल नहीं, सद्गुण/सामुदायिक न्याय/स्पष्टीकरणीय AI भी।