Bihar Board Class 12 Sociology Question Paper 2023 with Answer Key pdf is available for download here. The exam was conducted by Bihar School Examination Board (BSEB). The question paper comprised a total of 138 questions divided among 2 sections.
Bihar Board Class 12 Sociology Question Paper 2023 with Answer Key
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धनलक्ष्मी योजना का संबंध है
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चरण 1: योजना की प्रकृति समझें।
धनलक्ष्मी योजना (2008, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा पायलट) कंडीशनल कैश ट्रांसफ़र कार्यक्रम था—कन्या के जन्म पंजीकरण, टीकाकरण, विद्यालय में नामांकन/हाजिरी और 18 वर्ष से पहले विवाह न करने जैसी शर्तें पूरी करने पर परिवार को नकद प्रोत्साहन दिया जाता था।
चरण 2: विकल्पों का मिलान।
यह नियमित छात्रवृत्ति योजना नहीं थी, न ही कोई बीमा सुरक्षा उत्पाद। “पुरस्कार” एक-बारगी उपलब्धि-आधारित अनुदान होता है, जबकि यहाँ व्यवहार-परिवर्तन हेतु चरणबद्ध प्रोत्साहन दिया जाता था।
चरण 3: निष्कर्ष।
अतः धनलक्ष्मी योजना का संबंध प्रोत्साहन (इन्सेंटिव) से है।
Quick Tip: सामाजिक योजनाओं को याद रखने का नियम: \(\textbf{उद्देश्य}\) (क्या बदलना है) + \(\textbf{उपकरण}\) (कैसे)—धनलक्ष्मी = \(\textbf{व्यवहार परिवर्तन}\) + \(\textbf{नकद प्रोत्साहन}\)।
बालिका समृद्धि योजना किस वर्ष आरम्भ की गई ?
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चरण 1: योजना की पृष्ठभूमि समझें।
बालिका समृद्धि योजना (BSY) भारत सरकार द्वारा 1997 में शुरू की गई एक सामाजिक सुरक्षा/शिक्षा–प्रोत्साहन योजना थी। लक्ष्य था—गरीबी रेखा से नीचे (BPL) परिवारों में जन्मी बालिकाओं के जन्म को प्रोत्साहन, शिक्षा में निरंतरता और शिशु/बाल विवाह की रोकथाम।
चरण 2: इसकी प्रमुख विशेषताएँ याद रखें।
(क) जन्म के समय एक नकद अनुदान (प्रारम्भ में ₹500) दिया जाता था।
(ख) कक्षा I से X तक वार्षिक छात्रवृत्ति—कक्षा बढ़ने के साथ राशि बढ़ती।
(ग) लाभार्थी प्रायः ICDS/आंगनवाड़ी ढाँचे के माध्यम से पंजीकृत होती थीं, और 18 वर्ष से पहले विवाह न करने जैसी शर्तें भी जुड़ी रहती थीं।
इन विशेषताओं से स्पष्ट है कि यह कंडीशनल कैश सपोर्ट मॉडल था जो बालिका की शिक्षा व कल्याण पर केन्द्रित था।
चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।
2010–11 में इस नाम से नई राष्ट्रीय शुरुआत नहीं हुई; 2015–16 के आसपास अन्य कार्यक्रम (जैसे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का विस्तार, सुकन्या समृद्धि खाता 2015) सुर्खियों में आए, पर वे भिन्न योजनाएँ हैं। अतः आरम्भ वर्ष 1997 ही सही है।
Quick Tip: बालिका–सम्बन्धी योजनाएँ याद रखें: \(\textbf{BSY–1997}\) (जन्म + छात्रवृत्ति), \(\textbf{SSA–2015}\) (बचत खाता), \(\textbf{BBBP–2015}\) (अभियान)। नाम से भ्रम न करें।
हिन्दुओं में कौन विवाह की बात शुरू करता है ?
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चरण 1: परम्परागत व्यवस्था समझें।
हिन्दू समाज में व्यवस्थित विवाह (arranged marriage) में रिश्ते अक्सर परिजन/मध्यस्थों द्वारा तय किए जाते हैं। ऐतिहासिक रूप से वधूपक्ष (लड़की वाले) ही वरपक्ष से संपर्क कर विवाह-प्रस्ताव रखते हैं।
चरण 2: कारण/समाजशास्त्रीय संदर्भ।
(क) वर-प्रधानता की संस्कृति—वर का सामाजिक/आर्थिक स्थान उँचा माने जाने से वधूपक्ष पहल करता है।
(ख) कुटुम्ब-नियंत्रित विवाह—गोत्र, जाति, आंचलिकता, शिक्षा आदि मानदंड वधूपक्ष मिलान कर प्रस्ताव रखता है।
(ग) दहेज/आर्थिक अपेक्षाएँ—परम्परागत ढाँचे में दहेज/उपहार भी वधूपक्ष की ज़िम्मेदारी मानी गई, इसलिए वही वार्ता खोलते हैं।
चरण 3: समकालीन परिवर्तन।
शहरीकरण, शिक्षा और लव/स्वयं-विवाह, ऑनलाइन मैट्रिमोनियल मंचों से दोनों पक्ष पहल कर सकते हैं; फिर भी परीक्षाओं/भर्ती जैसे पारम्परिक MCQ में मानक उत्तर ``लड़की वाले'' ही माना जाता है।
Quick Tip: ऐसे सांस्कृतिक प्रश्नों में \(\textbf{“परम्परागत/रूढ़”}\) व्यवहार को चिन्हित करें—आधुनिक अपवादों से भ्रमित न हों।
हिन्दुओं में क्रय विवाह कहलाता है
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चरण 1: क्रय विवाह की परिभाषा।
क्रय विवाह का अर्थ है ऐसा विवाह जहाँ वरपक्ष वधूपक्ष को धन-संपत्ति देकर वधू को प्राप्त करे; यानी विवाह का आधार लेन–देन/खरीद जैसा आदान-प्रदान हो।
चरण 2: मनुस्मृति के आठ रूपों का सन्दर्भ।
आठ प्राचीन रूप—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, असुर, गान्धर्व, राक्षस, पैशाच। इनमें असुर विवाह में वधू के पिता/परिवार को प्रचुर धन-वस्तु देकर कन्या ग्रहण की जाती है, इसलिए इसे ही क्रय विवाह कहा गया।
चरण 3: अन्य विकल्पों से भेद स्पष्ट करें।
आर्ष में वरपक्ष द्वारा दो गाय जैसे प्रतीकात्मक दान दिया जाता है—यह लेन-देन का पूर्ण क्रय नहीं, एक धार्मिक मान्यता-जन्य उपहार है। राक्षस बलपूर्वक हरण कर विवाह करना तथा पैशाच नीचता/छल से सम्बन्ध स्थापित करने को दर्शाता है; ये क्रय की परिभाषा में नहीं आते।
निष्कर्ष: क्रय विवाह = असुर विवाह।
Quick Tip: याद रखने की तरकीब: \(\textbf{असुर = असली सौदा}\) (धन देकर वधू प्राप्त), \(\textbf{आर्ष = प्रतीकात्मक गाय}\), \(\textbf{राक्षस = बलपूर्वक}\), \(\textbf{पैशाच = नीच छल}\)।
आर्य कौन थे ?
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चरण 1: वैदिक आरम्भिक जीवनधारा पहचानें।
प्रारम्भिक वैदिक काल में आर्य मुख्यतः गोजीवी और घुमंतू प्रकृति के थे। उनका आर्थिक आधार गाय, घोड़े, भेड़-बकरी जैसे पशुधन पर टिका था; गो-धन ही प्रतिष्ठा और संपदा का माप माना जाता था।
चरण 2: साहित्यिक संकेत।
ऋग्वेदिक सूक्तों में गाय, गोचर, रथ, अश्व, गौ-रक्षा, गो-दान जैसे शब्द बार-बार आते हैं। यज्ञों में पशु, दुग्ध और घी का महत्व भी इसी पशुपालक अर्थव्यवस्था की ओर इशारा करता है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
व्यापारिक संरचनाएँ बाद के काल में विकसित हुईं; आरम्भिक अवस्था में वे व्यापारी प्रधान समाज नहीं थे। कृषि का प्रसार उत्तर वैदिक काल में अधिक हुआ—हल, सिंचाई और स्थायी ग्राम-जीवन के साथ। खाद्य संग्राहक शिकार-संग्रह अर्थव्यवस्था का द्योतक है, जो वैदिक आर्यों की मुख्य पहचान नहीं थी।
निष्कर्ष: आर्य प्रारम्भ में प्रायः पशुपालक थे; बाद में कृषि और व्यापार का विस्तार हुआ।
Quick Tip: वैदिक अर्थव्यवस्था याद रखने का मंत्र: \(\textbf{गो, घोड़ा, घी}\) — तीनों संकेत देते हैं कि प्रारम्भिक आर्य \(\textbf{गोजीवी पशुपालक}\) थे।
सामाजिक परिवर्तन जुड़ा हुआ है।
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चरण 1: अवधारणा स्पष्ट करें।
सामाजिक परिवर्तन का अर्थ है—समाज की संस्थाओं, भूमिकाओं और रिश्तों में समय के साथ होने वाला निरंतर और महत्त्वपूर्ण परिवर्तन। यह तभी स्थायी रूप लेता है जब लोगों के मूल्य बदलते हैं—यानी सही–गलत, वांछनीय–अवांछनीय के मानदंड।
चरण 2: मूल्य–व्यवस्था की केन्द्रीयता।
जब लिंग-समानता, पर्यावरण-संरक्षण, शिक्षा, विवाह–परिवार आदि के बारे में समाज के मूल्य बदलते हैं, तब क़ानून, नीतियाँ, संस्थागत प्रथाएँ और व्यवहार क्रमशः रूपांतरित होते हैं। इसलिए मूल्य-परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन का आधार बनता है; विश्वास और संस्कृति में बदलाव अक्सर मूल्यों के बदलने का परिणाम/सहचर होते हैं।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
(1) प्रतिमान/पैटर्न केवल रूपरेखा है; स्वयं कारण नहीं। (2) सांस्कृतिक व्यवस्था व्यापक है, पर सामाजिक परिवर्तन को दिशा देने वाला तत्व मूल्य है। (3) विश्वास (beliefs) मूल्य से प्रभावित होते हैं; अकेले विश्वास-परिवर्तन सामाजिक संरचनाओं को अनिवार्यतः नहीं बदलता।
निष्कर्ष: सामाजिक परिवर्तन का सबसे निकट सम्बन्ध मूल्य व्यवस्था से है।
Quick Tip: सूत्र याद रखें—\(\textbf{मूल्य बदलें ⇒ मानदंड बदलें ⇒ संस्थाएँ बदलें}\) : यही टिकाऊ सामाजिक परिवर्तन की शृंखला है।
एकल बालिका सी.बी.एस.ई. छात्रवृत्ति योजना में कितनी राशि बालिकाओं को दी जाती है ?
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चरण 1: योजना की पहचान।
यह CBSE Single Girl Child Scholarship है, जो कक्षा XI–XII के लिए एकमात्र बेटी को प्रोत्साहित करने हेतु दी जाती है। योजना का उद्देश्य लड़कियों के निरंतर स्कूली नामांकन व अध्ययन को बढ़ावा देना है।
चरण 2: प्रमुख शर्तें (सामान्य रूपरेखा)।
आवेदिका को CBSE से कक्षा X पास होना चाहिए (आमतौर पर न्यूनतम 60%/6.2 CGPA), वह कक्षा XI में CBSE-संबद्ध विद्यालय में अध्ययनरत हो, और परिवार में वह single girl child हो। विद्यालय की ट्यूशन फी सीमा और उपस्थिति जैसे मानदंड लागू होते हैं।
चरण 3: राशि और अवधि।
इस छात्रवृत्ति के तहत ₹500 प्रति माह की दर से सहायता दी जाती है, जो सामान्यतः दो अकादमिक वर्षों (कक्षा XI और XII) के लिए देय होती है और बैंक के माध्यम से भेजी जाती है। इसलिए दिए गए विकल्पों में सही राशि ₹500 मासिक है।
Quick Tip: योजनाएँ याद रखने का आसान नियम: \(\textbf{CBSE–Single Girl Child = 500 रुपये/माह, कक्षा XI–XII, दो वर्ष}\)। नाम से ही लक्ष्य और कक्षा संकेत मिल जाते हैं।
किस उद्योग से इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत हुई थी ?
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चरण 1: तथ्य पहचानें।
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इंग्लैण्ड की पहली तेज़ तकनीकी प्रगति कपास वस्त्र उद्योग में हुई—यही औद्योगिक क्रान्ति का आरम्भिक केन्द्र बना।
चरण 2: प्रमुख आविष्कार।
स्पिनिंग जेनी (हार्ग्रीव्स, 1764), वॉटर-फ़्रेम (आर्कराइट, 1769), स्पिनिंग म्यूल (क्रॉम्पटन, 1779) और पावर-लूम (कार्टराइट, 1785) ने सूत कातने और बुनाई की यंत्रिकीकरण गति कई गुना बढ़ा दी।
चरण 3: क्यों कपास, ऊन/खनन नहीं?
ऊन उद्योग तुलनात्मक रूप से गिल्ड-आधारित और धीमा था; जबकि कपास में डिमाण्ड बहुत तीव्र थी—घरेलू बाजार और उपनिवेशों में हल्के सस्ते वस्त्रों की चाह। भारतीय कपास-परम्परा और उपनिवेशों से कच्चे कपास की आपूर्ति, अटलांटिक व्यापार, और पुटिंग-आउट से फ़ैक्टरी सिस्टम की ओर तेज़ संक्रमण—इन सबने कपास उद्योग को पहला ब्रेक-थ्रू दिया। कोयला-लौह और भाप इंजन (वॉट) बाद के चरण में व्यापक औद्योगिकीकरण के प्रवर्धक बने।
निष्कर्ष: औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत इंग्लैण्ड में कपास वस्त्र उद्योग से हुई, जिसने आगे खनन, लौह-इस्पात, परिवहन आदि क्षेत्रों को गति दी।
Quick Tip: याद रखने का सूत्र: \(\textbf{Cotton → Coal/Iron → Steam → Railways}\) — क्रम यही है; क्रान्ति की पहली चिंगारी \(\textbf{कपास उद्योग}\) में।
किसने "ग्रामीण समुदाय को लघु समुदाय" कहा है ?
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चरण 1: अवधारणा समझें।
अमेरिकी मानवविज्ञानी रॉबर्ट रेडफिल्ड ने गाँव को लिटिल कम्युनिटी (लघु समुदाय) कहा—छोटा आकार, समरूपता, सापेक्ष आत्मनिर्भरता और परम्परा-आधारित जीवन इसकी विशेषताएँ हैं।
चरण 2: क्यों यही सही है?
रेडफिल्ड के लोक–शहरी निरन्तरता (folk–urban continuum) ढाँचे में गाँव उस छोर पर आता है जहाँ रिश्तेदारी, परम्परागत मानदंड और आमने–सामने की निकटता हावी होती है; इसलिए वह उसे लघु कहता है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
टॉनीज़ ने Gemeinschaft–Gesellschaft का भेद दिया; वीर्थ ने Urbanism as a way of life लिखा; बर्गल का यह प्रत्यक्ष प्रतिपादन नहीं मिलता। अतः उत्तर रेडफिल्ड।
Quick Tip: याद रखिए—\(\textbf{Redfield = Little Community}\), \(\textbf{Tönnies = Gemeinschaft/Gesellschaft}\), \(\textbf{Wirth = Urbanism}\)।
बिहार में सात निश्चय कार्यक्रम का आरम्भ किस मुख्यमंत्री ने किया ?
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चरण 1: योजना की पहचान।
सात निश्चय बिहार सरकार का प्रमुख गुड गवर्नेंस/बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंडा है, जिसकी शुरुआत नीतीश कुमार की सरकार ने 2015–16 के आसपास की—बाद में इसका सात निश्चय–II भी आया।
चरण 2: मुख्य निश्चय समझें।
हर घर नल का जल, हर गली नाली, शौचालय, बिजली, कौशल विकास/रोजगार, महिला सशक्तीकरण, युवाओं के लिए छात्र क्रेडिट कार्ड और स्टार्टअप जैसी पहलें इसमें शामिल रहीं।
चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।
अन्य मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल या प्राथमिकताओं से यह योजना सम्बद्ध नहीं है; इसलिए सही उत्तर नीतीश कुमार।
Quick Tip: कीवर्ड से याद रखें—\(\textbf{बिहार + सात निश्चय = नीतीश कुमार}\), बेसिक सुविधाएँ + युवाओं/महिलाओं का सशक्तीकरण।
इन्दिरा गांधी एकल लड़की छात्रवृत्ति योजना किस कोर्स में अध्ययनरत छात्राओं को दी जाती है?
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चरण 1: योजना की पहचान करें।
यह UGC–Post Graduate Indira Gandhi Scholarship for Single Girl Child है। नाम से ही स्पष्ट है—यह स्नातकोत्तर (पीजी) स्तर की छात्रवृत्ति है और केवल एकल बेटी को दी जाती है।
चरण 2: प्रमुख विशेषताएँ याद रखें।
(i) लाभार्थी PG प्रथम वर्ष में नियमित मोड से प्रवेशित हो। (ii) सामान्यतः आयु सीमा लगभग 30 वर्ष तक (आरक्षित वर्ग के अनुसार नियम अलग हो सकते हैं)। (iii) डिस्टेंस/ऑनलाइन पाठ्यक्रम सामान्यतः पात्र नहीं। (iv) सहायता राशि लगभग ₹36,200 प्रति वर्ष (दो वर्षों तक) विश्वविद्यालय/कॉलेज के माध्यम से दी जाती है। उद्देश्य है उच्च शिक्षा में लड़कियों की निरंतरता और लिंग–संतुलन बढ़ाना।
चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।
स्नातक या इंटर स्तर के लिए अलग योजनाएँ हैं (उदा., CBSE Single Girl Child Scholarship कक्षा XI–XII हेतु)। यह UGC की योजना विशेष रूप से PG स्तर के लिए है, इसलिए “इनमें से सभी” सही नहीं हो सकता।
निष्कर्ष: सही उत्तर स्नातकोत्तर।
Quick Tip: याद रखने का नियम: \(\textbf{UGC + Indira Gandhi + Single Girl Child = PG प्रथम वर्ष, 2 साल तक सहायता}\)—UGC दिखे तो \(\textbf{PG}\) ही सोचें।
निम्न में से किस संस्था की स्थापना ज्योतिबा फूले ने की थी ?
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चरण 1: ऐतिहासिक तथ्य।
महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फूले (1827–1890) ने 1873 में पुणे में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इसका उद्देश्य था—ब्राह्मणवादी ऊँच-नीच, जाति-भेद और अंधविश्वास का विरोध, तथा शूद्र–अतिशूद्रों और स्त्रियों में शिक्षा व आत्मसम्मान को बढ़ाना।
चरण 2: प्रमुख कार्य।
फूले दम्पति ने लड़कियों और विधवाओं के लिए स्कूल खोले; अंतरजातीय/विधवा विवाह को समर्थन दिया; सादा विवाह और सामाजिक सुधारों पर बल दिया। समाज में सत्य (तर्क, शिक्षा, समानता) की खोज ही इसका नाम और मकसद था—धर्म-आडंबर के बजाय समता।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
(2) पिछड़ा वर्ग संघ—डा. बी.आर. अम्बेडकर से सम्बद्ध संगठनों/आन्दोलनों का संदर्भ आता है, फूले द्वारा स्थापित नहीं। (3) दलित महासभा—विभिन्न समयों में बने मंच, पर फूले की स्थापना नहीं। (4) हरिजन सेवक समाज—महात्मा गांधी ने 1932 में स्थापित किया। अतः एकमात्र सही विकल्प सत्यशोधक समाज है।
Quick Tip: फूले को याद करें—\(\textbf{फूले = स्कूल + स्त्री/शूद्र शिक्षा + 1873 सत्यशोधक समाज}\); गांधी = \(\textbf{1932 हरिजन सेवक समाज}\)।
किस वर्ष अटल पेंशन योजना लागू की गई थी ?
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चरण 1: योजना की रूपरेखा।
अटल पेंशन योजना (APY) असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए परिभाषित लाभ पेंशन योजना है, जिसे भारत सरकार ने 2015 में शुरू किया। यह नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) की आर्किटेक्चर पर आधारित है और खाते बैंकों/डाकघरों में खोले जाते हैं।
चरण 2: मुख्य विशेषताएँ।
आयु 18–40 वर्ष में नामांकन संभव; अंशदान ऑटो-डेबिट से मासिक/त्रैमासिक/अर्धवार्षिक। 60 वर्ष की आयु पर आजीवन ₹1,000–₹5,000 मासिक पेंशन विकल्प मिलते हैं—राशि अंशदान और प्रवेश आयु पर निर्भर करती है। शुरुआती वर्षों में पात्र ग्राहकों के लिए सरकार ने सह-अंशदान (एक निर्धारित सीमा तक) भी दिया था। नामांकित व्यक्ति की मृत्यु पर जीवनसाथी को पेंशन/कोष-राशि का प्रावधान है।
चरण 3: वर्ष का सत्यापन तर्क।
APY को जन-धन, बीमा, पेंशन त्रयी के हिस्से के रूप में 2015 में लॉन्च किया गया था; अतः 2016, 2017 या 2018 सही नहीं हैं।
निष्कर्ष: योजना की शुरुआत 2015 में हुई।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{APY = 2015, 18–40 वर्ष में नामांकन, 60 पर ₹1k–₹5k पेंशन, बैंक/डाकघर से ऑटो-डेबिट}\)।
सुंदरलाल बहुगुणा किस आन्दोलन से सम्बन्धित है ?
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चरण 1: व्यक्तित्व और आन्दोलन की पहचान।
सुंदरलाल बहुगुणा उत्तराखण्ड के सुप्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता थे। उन्होंने हिमालयी जंगलों की अंधाधुंध कटाई के विरोध में चिपको आन्दोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाया—पेड़ों को कलेवा/आलिंगन कर उन्हें कटने से बचाना इसका प्रमुख प्रतीक था।
चरण 2: आन्दोलन के लक्ष्य और रणनीति।
उद्देश्य था—स्थानीय समुदायों (विशेषकर महिलाओं) की आजीविका, जल-स्रोत, मिट्टी-संरक्षण और आपदा-जोखिम के लिए वनों का संरक्षण। बहुगुणा ने पदयात्रा, उपवास और लगातार जनसंवाद से सरकार पर दबाव बनाया; 1980 के दशक में हिमालयी क्षेत्रों में हरित फेलाव नीति तथा वृक्ष-नीति पर प्रभाव पड़ा।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
नर्मदा बचाओ आन्दोलन मुख्यतः मेधा पाटकर आदि से जुड़ा है; नक्सलवादी आन्दोलन वामपंथी सशस्त्र आन्दोलन है; किसान आन्दोलन एक व्यापक श्रेणी है—प्रत्यक्ष रूप से बहुगुणा का प्रमुख योगदान चिपको में ही माना जाता है।
निष्कर्ष: सुंदरलाल बहुगुणा का सम्बन्ध चिपको आन्दोलन से है।
Quick Tip: याद रखने का मंत्र: \(\textbf{बहुगुणा = पेड़ों से लगाव = चिपको}\), \(\textbf{नर्मदा = मेधा पाटकर}\)—नाम और प्रतीक साथ जोड़ें।
राज्य के प्रमुख तत्व निम्नलिखित में से कौन है ?
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चरण 1: परिभाषा और तत्त्व समझें।
राजनीति–समाजशास्त्र में राज्य वह संस्थागत व्यवस्था है जो निश्चित भू-भाग में रहने वाली जनसंख्या पर वैध बल प्रयोग का एकाधिकार रखती है और कानून–प्रशासन चलाती है। इसके चार शास्त्रीय तत्त्व माने जाते हैं—(i) जनसंख्या (people), (ii) भू-भाग/राज्यक्षेत्र (territory), (iii) सरकार (government), (iv) प्रभुसत्ता/सार्वभौमिकता (sovereignty)।
चरण 2: विकल्पों का मिलान।
दिए गए विकल्पों में जनसंख्या, सरकार और प्रभुसत्ता तीनों राज्य के मूल तत्त्व हैं (भू-भाग अलग से सूचीबद्ध नहीं है)। अतः जो विकल्प इन तीनों को समेटे, वही सही होगा।
चरण 3: निष्कर्ष।
इसलिए इनमें से सभी सही है—क्योंकि राज्य का अस्तित्व इन तत्त्वों के बिना संभव नहीं।
Quick Tip: राज्य = \(\textbf{People + Territory + Government + Sovereignty}\). प्रश्न में जो-जो तत्त्व आए हों, \(\textbf{All of the above}\) चुनें।
निम्नलिखित में से कौन गैर-सरकारी संगठन नहीं है ?
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चरण 1: अवधारणा साफ़ करें।
गैर-सरकारी संगठन/नागरिक समाज संस्थाएँ वे निकाय हैं जो राज्य के औपचारिक ढाँचे का हिस्सा नहीं होते—वे स्वतंत्र रूप से संगठित होकर जन-हित, विचार, सदस्यों के हित या सूचना के अधिकार के लिए काम करते हैं। उदाहरण: राजनीतिक दल (state से बाहर, पर सत्ता पाने/नीति-प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयत्न), हित समूह या प्रेशर ग्रुप (विशिष्ट हितों की पैरवी), और प्रेस/मीडिया (स्वतंत्र सूचना/विचार-व्तैयन का मंच)।
चरण 2: राज्य अंग पहचानें।
न्यायपालिका संविधान द्वारा स्थापित राज्य की स्वतंत्र शाखा है—अदालतें वैधानिक अधिकार से न्याय-निर्णयन करती हैं; यह सिविल सोसायटी का NGO/स्वैच्छिक निकाय नहीं है।
चरण 3: निष्कर्ष।
इसलिए दिए विकल्पों में न्यायपालिका ही वह इकाई है जो गैर-सरकारी संगठन नहीं है; बाक़ी तीनों नागरिक समाज/गैर-सरकारी क्षेत्र में आते हैं, भले उनके कार्य-क्षेत्र अलग हों।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{विधायिका–कार्यपालिका–न्यायपालिका}\) = राज्य के अंग; इनके बाहर के संगठित निकाय = \(\textbf{गैर-सरकारी/सिविल सोसायटी}\)।
सर हेनरी मेन का नाम किससे सम्बन्धित है ?
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चरण 1: विद्वान की पहचान।
सर हेनरी मेन (Henry Maine), पुस्तक Ancient Law के लेखक, प्रारम्भिक समाज और क़ानून के विकास पर लिखते हैं। वे मानते हैं कि समाज की मूल इकाई पितृसत्तात्मक परिवार था, जिसके मुखिया पितृ के हाथ में अधिकार केन्द्रित था।
चरण 2: सिद्धान्त का निचोड़।
उनके अनुसार आरम्भिक सामाजिक संगठन status से contract की ओर बढ़ा—पहले व्यक्ति का स्थान जन्म/कुल से तय होता था; आगे चलकर अनुबंध/क़ानून से। इस ढाँचे में वंशानुक्रम, संपत्ति और अधिकार पितृवंश से चलते हैं, इसलिए मेन का नाम पितृसत्तात्मक सिद्धान्त से जोड़ा जाता है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
(2) मातृसत्तात्मक परिवार का संबन्ध बाखोफ़ेन/मैकलेनन जैसी परम्पराओं से जोड़ा जाता है। (3) यौन साम्यवाद मॉर्गन आदि की परिकल्पना का हिस्सा है। (4) मातृस्थानिय निवास-नियम है, सिद्धान्त नहीं; मेन इसका प्रवर्तक नहीं।
निष्कर्ष: सर हेनरी मेन मुख्यतः पितृसत्तात्मक सिद्धान्त से सम्बन्धित हैं।
Quick Tip: मेन = \(\textbf{Ancient Law}\), सूत्र: \(\textbf{Status → Contract}\) और \(\textbf{Patriarchal family}\)—इन्हें साथ याद रखें।
निम्नलिखित में से किस देश को प्रजातंत्र का घर माना जाता है ?
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चरण 1: अवधारणा स्पष्ट करें।
इतिहास में लोकतंत्र का उद्गम प्राचीन एथेंस (यूनान) से जोड़ा जाता है, पर आधुनिक प्रत्यक्ष लोकतंत्र का सबसे सशक्त और स्थायी प्रयोग स्विट्ज़रलैंड में मिलता है। इसी कारण अनेक पाठ्य-परीक्षाओं में स्विट्ज़रलैंड को प्रजातंत्र का घर कहा जाता है।
चरण 2: क्या चीज़ इसे अलग बनाती है?
स्विस व्यवस्था में नागरिकों को व्यापक रेफ़रेंडम और पीपुल्स इनिशिएटिव के माध्यम से संवैधानिक संशोधन, कानूनों के अनुमोदन/अस्वीकृति, तथा नीतिगत निर्णयों में सीधी भागीदारी का अधिकार है। स्थानीय स्तर (कम्यून/कैन्टन) से लेकर संघीय स्तर तक यह संस्कृति गहराई से पैठी हुई है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
अमेरिका, भारत और कनाडा मजबूत प्रतिनिधिक लोकतंत्र हैं, पर वहाँ स्विस जैसी निरंतर जनमत-संग्रह आधारित प्रणाली नहीं है। अतः दिए विकल्पों में “प्रजातंत्र का घर” के रूप में सबसे उपयुक्त उत्तर स्विट्ज़रलैंड है।
Quick Tip: वाक्य-याद रखिए: \(\textbf{“स्विस = सीधा लोकतंत्र”}\) ⇒ रेफ़रेंडम, इनिशिएटिव, रिकॉल जैसी प्रक्रियाएँ—यही कारण है कि इसे प्रजातंत्र का घर कहा जाता है।
किस जनजाति की जनसंख्या निरन्तर गिरती जा रही है ?
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चरण 1: समूहों का परिप्रेक्ष्य।
मीणा, गोंड और मुंडा—ये मुख्य भूमि की बड़ी जनजातियाँ हैं जिनकी जनसंख्या लाखों में है और दीर्घावधि प्रवृत्ति गिरती नहीं मानी जाती। इसके विपरीत ऑन्जी (Onge) अंडमान द्वीप समूह की अत्यन्त छोटी द्वीपीय जनजाति है जिसे भारत में PVTG (Particularly Vulnerable Tribal Group) में रखा गया है।
चरण 2: गिरावट के कारण।
वायरल/बैक्टीरियल बीमारियों के प्रति कम प्रतिरक्षा, बाहरी सम्पर्क के दुष्प्रभाव, परम्परागत आजीविका में व्यवधान, संसाधनों पर दबाव, और सीमित विवाह-विकल्प (छोटा डेमोग्राफिक पूल) जैसे कारणों से ऑन्जी समुदाय की जनसंख्या बहुत छोटी और जोखिमग्रस्त रही है। शासन द्वारा स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षित आवास और सांस्कृतिक संरक्षण हेतु योजनाएँ चलती हैं, पर दीर्घकालीन प्रवृत्ति में यह समूह लगातार संवेदनशील बना हुआ है।
निष्कर्ष: दिए विकल्पों में ऑन्जी वह जनजाति है जिसकी जनसंख्या निरन्तर घटती देखी गई है।
Quick Tip: द्वीपीय छोटी जनजातियाँ (जैसे \(\textbf{ऑन्जी, जारवा, सेंटिनली}\)) = \(\textbf{PVTG}\) और उच्च जनसांख्यिकीय जोखिम; मुख्यभूमि की बड़ी जनजातियाँ सामान्यतः गिरती प्रवृत्ति नहीं दिखातीं।
रूढ़िगत (परम्परागत) कानून मुख्यतः किस समाज में पाया जाता है ?
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चरण 1: अवधारणा समझें।
रूढ़िगत/परम्परागत कानून (Customary Law) वे नियम हैं जो समुदाय की दीर्घकालीन प्रथाओं, रीतियों और लोक-मान्यताओं से बने होते हैं—अधिकतर अलिखित, मौखिक और सामुदायिक स्वीकृति से मान्य। इनके प्रवर्तन में पंचायत/कबीलाई परिषद, बुज़ुर्ग या कबीला-प्रधान जैसे अनौपचारिक न्याय-तंत्र काम करते हैं।
चरण 2: समाज-प्रकार से सम्बन्ध।
ऐसे कानून आदिम, जनजातीय तथा कृषक (peasant) समाजों में प्रबल होते हैं, जहाँ सामाजिक सम्बन्ध निकट-सम्बन्धी, गाँव/कबीले की एकजुटता और परम्पराओं पर टिके होते हैं। यहाँ विवाद-निवारण का उद्देश्य दंड से अधिक समरसता/समाधान होता है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
औद्योगिक/आधुनिक/जटिल समाजों में राज्य-निर्मित संहिताबद्ध (statutory) कानून, अदालतें और औपचारिक पुलिस-तंत्र हावी रहते हैं; customary law का क्षेत्र सीमित हो जाता है। अतः सही उत्तर विकल्प (3) है।
Quick Tip: याद रहे—\(\textbf{Customary Law = Community norms}\) ⇒ सबसे मज़बूत \(\textbf{जनजातीय/कृषक}\) समाजों में; \(\textbf{Statutory Law}\) ⇒ \(\textbf{आधुनिक/औद्योगिक}\) समाजों में।
जाति एक उदाहरण हो सकता है
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चरण 1: अवधारणा स्पष्ट करें।
समुदाय वह सामाजिक इकाई है जहाँ सदस्य सांझी पहचान, सह-अनुभूति, सामान्य मानदंड और स्थायी सदस्यता साझा करते हैं। भारतीय संदर्भ में जाति समान जन्म-आधारित सदस्यता, गोत्र/वंश, एंडोगैमी (अंतर्विवाह-निषेध), पेशागत परंपरा और साझा रीति–रिवाजों के कारण एक सामुदायिक इकाई बनाती है।
चरण 2: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
परिवार जैव-संबंध/विवाह पर आधारित लघु समूह है; संस्था (institution) नियमों/भूमिकाओं का व्यवस्थित ढांचा है, जैसे विवाह, शिक्षा, राज्य—जाति स्वयं कोई औपचारिक संस्था नहीं बल्कि सामुदायिक समूह है। विकल्प (4) tautology है और श्रेणी नहीं बताता।
निष्कर्ष: इसलिए जाति = समुदाय का उदाहरण है।
Quick Tip: अंतर याद रखें—\(\textbf{परिवार = लघु समूह}\), \(\textbf{संस्था = नियमों का ढांचा}\), \(\textbf{समुदाय = साझा पहचान वाला समूह}\); \(\textbf{जाति}\) सीधे \(\textbf{समुदाय}\) में आती है।
‘कास्टा’ शब्द से व्युत्पन्न कास्ट शब्द का अर्थ होता है।
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चरण 1: व्युत्पत्ति समझें।
‘Caste’ शब्द पुर्तगाली casta से आया है, जिसकी जड़ लैटिन castus (अर्थ: शुद्ध/पवित्र) में है। इसलिए ‘caste’ का मूल संकेत रक्त/वंश की शुद्धता को दर्शाता है।
चरण 2: समाजशास्त्रीय अर्थ से जोड़ें।
भारतीय जाति-प्रथा में इसी शुद्ध–अशुद्ध (purity–pollution) के विचार पर भोजन-संपर्क, व्यावसायिक कर्तव्य, विवाह-नियम आदि निर्धारित होते हैं। इसीलिए कास्ट/जाति की वैचारिकी में शुद्धता बनाम प्रदूषण का द्वैत केन्द्रीय माना जाता है।
चरण 3: विकल्पों का खंडन।
अन्तर्विवाह (endogamy) जाति की प्रमुख विशेषता है, पर शब्दार्थ नहीं। संस्कृति सामान्य शब्द है। जटिल वंशानुगत गुण भी व्युत्पत्तिगत अर्थ नहीं देता। अतः सही विकल्प (1) है।
Quick Tip: कुंजी: \(\textbf{caste ← casta ← castus (pure)}\) ⇒ जाति की वैचारिकी = \(\textbf{purity–pollution}\) का सिद्धान्त।
‘वर्ण धर्म’ के संदर्भ में वर्ण का अर्थ होता है
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चरण 1: शब्द-व्युत्पत्ति।
संस्कृत में वर्ण का मूल अर्थ रंग है। वैदिक/धार्मिक साहित्य में ‘वर्ण’ शब्द का प्रयोग बाद में चार सामाजिक श्रेणियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के लिये भी होने लगा—इसी आधार पर वर्ण-धर्म (प्रत्येक वर्ण के कर्तव्य) की चर्चा मिलती है।
चरण 2: अर्थ-भ्रम दूर करें।
‘वर्ण’ का अर्थ जाति (जाती/कास्ट) नहीं है; जाति (जाती/कास्ट) स्थानीय/वंश-व्यवसाय आधारित सूक्ष्म उपसमूह हैं, जिनकी संख्या हज़ारों में है। वर्ण व्यापक वैचारिक श्रेणी है; उसका शाब्दिक अर्थ रंग ही रहता है, जिसे प्रतीकात्मक रूप से समूह-भेद बताने में लिया गया।
निष्कर्ष: ‘वर्ण-धर्म’ के सन्दर्भ में ‘वर्ण’ का मूल अर्थ रंग है; ‘जाति/कास्ट’ से इसे न मिलाएँ।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{वर्ण = रंग (शाब्दिक)}\); \(\textbf{वर्ण-व्यवस्था = 4 श्रेणियाँ}\); \(\textbf{जाति/कास्ट = स्थानीय उपसमूह}\)—शब्दों को गड़बड़ न करें।
निम्न में से कौन धर्म ईश्वर पर केन्द्रीत नहीं है ?
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चरण 1: थीइज़्म बनाम नॉन-थीइज़्म समझें।
ईश्वर-केन्द्रीत (theistic) धर्मों में एक परमेश्वर या देवताओं का अस्तित्व, उनकी उपासना और मुक्ति में उनकी भूमिका केंद्रीय मानी जाती है। ईसाइयत और इस्लाम एकेश्वरवादी हैं, जबकि हिन्दू परम्परा में भी ईश्वर/ईष्ट देव, भक्ति और अवतार का बड़ा स्थान है।
चरण 2: बौद्ध धर्म की स्थिति।
बौद्ध धर्म मूलतः अनीश्वरवादी/नॉन-थीइस्टिक है—यह सृष्टिकर्ता ईश्वर की उपासना पर नहीं, बल्कि चार आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, कर्म, अनित्य, अनात्म जैसे सिद्धान्तों पर आधारित है। देवताओं का वर्णन बौद्ध लोक में हो सकता है, पर वे मुक्ति के हेतु नहीं; साधना, प्रज्ञा और शील से निर्वाण प्राप्त करने पर बल है।
निष्कर्ष: दिए विकल्पों में जो धर्म ईश्वर-केन्द्रित नहीं है, वह बौद्ध है।
Quick Tip: थम्ब-रूल: \(\textbf{इस्लाम/ईसाई/हिन्दू}\) = ईश्वर-केन्द्रित; \(\textbf{बौद्ध/जैन}\) = \(\textbf{मार्ग-केन्द्रित}\) (आचरण, ध्यान, ज्ञान)।
बिहार विधान सभा में कितने सदस्य होते हैं ?
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चरण 1: मूल तथ्य समझें।
बिहार एक द्विसदनीय राज्य है—ऊपरी सदन विधान परिषद और निचला सदन विधान सभा। विधानसभा की कुल निर्वाचित सीटों की संख्या वर्तमान में 243 है।
चरण 2: यह संख्या कैसे तय होती है?
विधानसभा सीटें लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और सीमा-निर्धारण आयोग (Delimitation Commission) की सिफारिशों के आधार पर तय/पुनर्निर्धारित होती हैं। 2008 की सीमा-निर्धारण प्रक्रिया के बाद बिहार में विधानसभा सीटें 243 पर स्थिर हैं।
चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।
241, 240 या 245 जैसे विकल्प बिहार के किसी वैध/हालिया चरण से मेल नहीं खाते। इसलिए सही उत्तर 243 है।
Quick Tip: बिहार = \(\textbf{द्विसदनीय}\); विधानसभा \(\textbf{243}\), परिषद अलग—परीक्षा में अक्सर 243 पर ही सवाल आता है।
बिहार के किस मुख्यमंत्री ने बालिकाओं के लिए स्नातक में नि:शुल्क शिक्षा का क़ानून बनाया है ?
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चरण 1: नीतिगत पहल पहचानें।
बिहार में बालिकाओं की उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए नीतीश कुमार की सरकार ने कॉलेज स्तर पर फीस माफ़ी/नि:शुल्क शिक्षा की नीति लागू की—राजकीय/अनुदानित संस्थानों में ट्यूशन-फ़ीस, नामांकन व परीक्षा-शुल्क में छूट और साथ ही मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना के माध्यम से इंटर व स्नातक पर प्रत्यक्ष प्रोत्साहन सहायता (एकमुश्त राशि) दी जाती है।
चरण 2: उद्देश्य और प्रभाव।
उद्देश्य था—लड़कियों का नामांकन बढ़ाना, ड्रॉपआउट घटाना और आर्थिक कारणों से शिक्षा न रुकने देना। छात्र क्रेडिट कार्ड, पोशाक/साइकिल/स्कॉलरशिप जैसी अन्य पहलें भी इसी व्यापक एजेंडे का हिस्सा हैं।
निष्कर्ष: अतः बालिकाओं के लिए स्नातक स्तर पर नि:शुल्क/फीस माफी की क़ानूनी–नीतिगत पहल नीतीश कुमार के कार्यकाल में हुई।
Quick Tip: बिहार में \(\textbf{लड़कियों की उच्च शिक्षा}\) से जुड़े कीवर्ड जोड़ें: \(\textbf{नीतीश कुमार}\) + \(\textbf{नि:शुल्क/फीस माफी}\) + \(\textbf{कन्या उत्थान}\) (इंटर/ग्रेजुएशन पर प्रोत्साहन)।
किस योजना के तहत स्नातक लड़कियों को 25,000 रु. की छात्रवृत्ति दी जाती है ?
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चरण 1: योजना की पहचान।
बिहार सरकार की मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना में उच्च शिक्षा प्राप्ति को बढ़ावा देने के लिए स्नातक उत्तीर्ण अविवाहित बालिकाओं को ₹25,000 की एकमुश्त प्रोत्साहन राशि दी जाती है। यह राशि डिग्री प्राप्त करने के बाद सीधे बैंक खाते में DBT से भेजी जाती है।
चरण 2: उद्देश्य और पात्रता का सार।
योजना का उद्देश्य लड़कियों का ग्रेजुएशन तक नामांकन व निरंतरता सुनिश्चित करना और बाल विवाह/आर्थिक बाधाओं से होने वाले ड्रॉपआउट को घटाना है। सामान्य नियम—आवेदिका बिहार की निवासी हो, मान्यता प्राप्त संस्थान से स्नातक पास हो, तथा आवश्यक दस्तावेज (आधार, पासबुक, डिग्री/प्रोविजनल) जमा करे।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ एक जन-जागरूकता/कन्वर्जेन्स कार्यक्रम है—सीधी ₹25,000 स्नातक सहायता इसका हिस्सा नहीं। जननी योजना (मातृत्व सम्बन्धी) व सबला (किशोरी कौशल/पोषण) भी अलग उद्देश्यों वाली योजनाएँ हैं। अतः सही विकल्प कन्या उत्थान योजना।
Quick Tip: बिहार का नियम याद रखें: \(\textbf{इंटर पास = ₹10,000 (अक्सर अलग घटक)}\), \(\textbf{ग्रेजुएशन पास = ₹25,000}\) — दोनों \(\textbf{कन्या उत्थान}\) छत्रछाया में।
समाजशास्त्र को किस क्रान्ति का उत्पाद कहा गया है ?
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चरण 1: ऐतिहासिक सन्दर्भ।
अगस्त कॉन्त ने French Revolution (1789) के बाद अस्थिर यूरोपीय समाज में समाज-व्यवस्था को वैज्ञानिक ढंग से समझने का विचार रखा और ‘Sociology’ शब्द गढ़ा। क्रान्ति ने सामन्ती व्यवस्था, चर्च-केन्द्रित प्राधिकार और वंशगत विशेषाधिकार को चुनौती दी—नए नागरिक अधिकार, समानता, धर्मनिरपेक्ष राज्य और तर्क की प्रतिष्ठा ने सामाजिक जीवन को तेज़ी से बदला। इस भूकम्पी बदलाव को समझने हेतु एक नए विज्ञान की आवश्यकता महसूस हुई, जिसे बाद में समाजशास्त्र के रूप में विकसित किया गया।
चरण 2: पूरक बिंदु।
साथ ही औद्योगिक क्रान्ति (इंग्लैंड) ने नगरीकरण, वर्ग-विभाजन और श्रम संबंधों में बड़े परिवर्तन पैदा किए—ये भी समाजशास्त्र के विकास के महत्त्वपूर्ण कारक रहे। परन्तु दिए गए विकल्पों में सीधा उत्तर वही है, जिसे क्लासिक पुस्तकों में “समाजशास्त्र का उत्पाद” कहा गया—फ़्रांसीसी क्रान्ति।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{फ़्रांसीसी क्रान्ति = समाजशास्त्र का राजनीतिक जनक}\), \(\textbf{औद्योगिक क्रान्ति = समाजशास्त्र का आर्थिक/सामाजिक प्रेरक}\)।
‘सोशियोलॉजी’ शब्द का निर्माण किन दो शब्दों से हुआ है ?
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चरण 1: व्युत्पत्ति समझें।
‘सोशियोलॉजी’ शब्द का निर्माण दो शब्दों से हुआ—सोशियस (Latin: socius = साथी/समाज) और लोगस (Greek: logos = ज्ञान/अध्ययन)। अतः शाब्दिक अर्थ हुआ—समाज का वैज्ञानिक अध्ययन।
चरण 2: सैद्धान्तिक सन्दर्भ।
अगस्त कॉन्त ने 19वीं सदी में समाज को तर्कसंगत, वैज्ञानिक ढंग से समझने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया। यह शब्द समाज की संरचना, प्रक्रियाओं और परिवर्तन के प्रणालीबद्ध अध्ययन को दर्शाता है।
चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।
अन्य विकल्पों में दिए शब्द या तो सही मूल-शब्द नहीं हैं या विकृत रूप हैं; केवल सोशियस + लोगस सही व्युत्पत्ति देता है।
Quick Tip: याद रखने का सूत्र: \(\textbf{Socius = Society (समाज)}\), \(\textbf{Logos = Study (अध्ययन)}\) ⇒ \(\textbf{Sociology = समाज का अध्ययन}\)।
नातेदारी की वह कौन-सी रीति है जो 두 व्यक्तियों को हँसी–मज़ाक करने का अधिकार देती है ?
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चरण 1: अवधारणा समझें।
मानवशास्त्री रैडक्लिफ-ब्राउन ने नातेदारी में एक खास प्रकार की संस्थाबद्ध रीति बताई जिसे परिहास सम्बन्ध (Joking relationship) कहते हैं। इसमें दो रिश्तेदारों के बीच हँसी–मज़ाक, छेड़छाड़, हल्की चुटकी और अनौपचारिकता सामाजिक रूप से अनुमत तथा स्वीकार्य होती है।
चरण 2: उद्देश्य क्या है?
ऐसी रीति तनाव-नियंत्रण का साधन बनती है, निकटता बढ़ाती है और संयमित मज़ाक के माध्यम से वर्जनाओं को सुरक्षित दायरे में रखती है। कई समाजों में देवर–भाभी, जीजा–साली, क्रॉस-कज़िन आदि के बीच यह परम्परा दिखती है, जहाँ औपचारिक दूरी कम कर सामाजिक एकजुटता बढ़ती है।
चरण 3: भेद स्पष्ट करें।
विकल्प (1) का परिहार सम्बन्ध (Avoidance relationship) इसका उल्टा है—यहाँ मिलना-जुलना, मज़ाक या प्रत्यक्ष संवाद सीमित/निषिद्ध होता है (जैसे ससुर–बहू)। विकल्प (3) संबोधन-रीतियों से जुड़ा है; (4) सामान्य सह-निवास/परिवारजन का संकेत दे सकता है, पर मज़ाक की संस्थाबद्ध अनुमति नहीं बताता। इसलिए सही उत्तर परिहास सम्बन्ध है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{परिहास = अनुमति-प्राप्त मज़ाक}\), \(\textbf{परिहार = टालना/दूरी}\)। नातेदारी प्रश्नों में दोनों का अंतर पकड़ें।
मुस्लिम विवाह पर किस धर्म का प्रभाव है ?
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चरण 1: मुस्लिम विवाह की प्रकृति।
मुस्लिम विवाह (निकाह) नागरिक अनुबंध माना जाता है—सम्मति, मेहर, दो गवाह, इजाब–क़बूल, इद्दत आदि इसके आधार हैं। विधि का स्रोत कुरआन, हदीस, इज्मा, कियास है।
चरण 2: प्रभाव/परंपरा का सवाल समझें।
यद्यपि निकाह इस्लामी शरीयत से शासित है, इसके कई अनुष्ठानात्मक रूप (मेहर, वली/अभिभावक की भूमिका, बहुविवाह की अनुमति, तलाक़ की कुछ विधियाँ आदि) ऐतिहासिक तौर पर प्राक्-इस्लामी अरबी सामाजिक-रीतियों से भी प्रभावित रहे। इसलिए विकल्पों में प्राचीन अरबी सबसे समीचीन है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
हिन्दू, ईसाई या सिख विवाह अपने-अपने धार्मिक विधान/संस्कारों से संचालित होते हैं; मुस्लिम निकाह की बुनियाद उनकी व्यवस्था से भिन्न है।
Quick Tip: कुंजी: \(\textbf{निकाह = अनुबंध + शरीयत}\) और \(\textbf{ऐतिहासिक रूप}\) में कई तत्व \(\textbf{अरबी परंपरा}\) से आए—इसलिए ऐसे MCQ में “\(\textbf{प्राचीन अरबी}\)” चुनें।
शक्ति, युवा, निपुणता तथा तार्किकता के आधार पर आधुनिकीकरण को किसने परिभाषित किया है ?
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चरण 1: संदर्भ समझें।
भारतीय समाजशास्त्री योगेन्द्र सिंह ने अपनी पुस्तक ‘‘Modernization of Indian Tradition’’ में आधुनिकीकरण को केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि मूल्य एवं सत्ता-संरचना के रूपांतरण के रूप में समझाया। उन्होंने विशेष तौर पर शक्ति (power) की नई संरचना, युवा (युवा-समूह बतौर परिवर्तन-वाहक), निपुणता/दक्षता (competence, achievement) और तार्किकता (rationality) जैसी थीमों को आधुनिकीकरण के प्रमुख सूचक बताए।
चरण 2: अन्य विद्वानों से भेद।
लर्नर (D. Lerner) आधुनिकीकरण को संचार, साक्षरता, नगरीकरण, ‘‘empathy’’ से जोड़ते हैं। एस. सी. दूबे भारतीय ग्राम-परिवर्तन, समुदाय विकास आदि पर लिखते हैं; जबकि हेतुकर झा बिहार/लोक-संस्कृति के इतिहास-समाजशास्त्री हैं। प्रश्न में दी गई चार थीमों का समुच्चय—शक्ति, युवा, निपुणता, तार्किकता—योगेन्द्र सिंह के फ्रेम से मेल खाता है।
निष्कर्ष: अतः सही उत्तर योगेन्द्र सिंह है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{Singh = Power + Youth + Competence + Rationality}\); \(\textbf{Lerner = Urbanization + Media + Empathy}\)।
निम्न में से किसने भारतीय जनतंत्र को एक जाति तंत्र कहा है ?
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चरण 1: कथन का आशय।
“जाति तंत्र” (Casteocracy) का अर्थ है—ऐसा लोकतांत्रिक तंत्र जहाँ राजनीतिक प्रक्रियाएँ (उम्मीदवार चयन, वोट-समूहबंदी, सत्तावितरण) जाति-संबंधों से गहरे निर्देशित हों। भारत में चुनावी राजनीति का एक सशक्त पैटर्न लंबे समय तक जाति-आधारित लामबंदी से प्रभावित रहा है।
चरण 2: विद्वान की पहचान।
ब्रिटिश मानवशास्त्री जे. एच. हटन (J. H. Hutton), पुस्तक ``Caste in India: Its Nature, Function and Origins'' के लेखक, ने भारतीय समाज और राजनीति में जाति की व्यापक पैठ को रेखांकित करते हुए भारतीय जनतंत्र को “जाति तंत्र” जैसी संज्ञा दी—अर्थात लोकतांत्रिक रूप-आकृति होते हुए भी उसके संचालन में जाति संबंध निर्णायक बन जाते हैं।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
जी. एस. घुर्ये ने जाति पर शास्त्रीय कार्य अवश्य किया, पर यह विशेष उपाधि उनसे नहीं जोड़ी जाती। आर. एन. सक्सेना और नर्मदेश्वर प्रसाद के साथ भी यह प्रत्यक्ष उद्धरण मान्य नहीं है। इसलिए सही उत्तर हटन है।
Quick Tip: कुंजी-वाक्य: \(\textbf{Hutton = Caste in India ⇒ “Casteocracy”}\)। परीक्षा में “जनतंत्र = जाति तंत्र” दिखे तो \(\textbf{हटन}\) चिन्हित करें।
किन लोगों का अध्ययन कर श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण की अवधारणा विकसित किया?
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चरण 1: पृष्ठभूमि।
एम. एन. श्रीनिवास ने दक्षिण भारत के कर्नाटक स्थित कूर्ग (Coorg/Kodagu) समुदाय तथा बाद में मैसूर के गाँव ‘‘रामपुरा’’ के विस्तृत क्षेत्र-अध्ययन पर आधारित होकर संस्कृतिकरण (Sanskritization) की संकल्पना दी।
चरण 2: अवधारणा क्या कहती है?
नीची/मध्य स्थिति वाली जातियाँ उच्च (ब्राह्मण/क्षत्रिय) समूहों की जीवन-शैली—देवपूजा, व्रत, भोजन-आचार, पवित्रता के नियम, विवाह व नामकरण रीति—को अनुकरण कर सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने की कोशिश करती हैं। इस ऊर्ध्व सांस्कृतिक अनुकरण की प्रक्रिया को श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण कहा।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
नायर/लिंगायत पर उन्होंने टिप्पणियाँ अवश्य कीं, पर संस्कृतिकरण की मूल व्याख्या उनके कूर्ग और रामपुरा अध्ययन से निकली मानी जाती है। इसलिए सही उत्तर कूर्ग है।
Quick Tip: कुंजी: \(\textbf{Srinivas = Coorg (Kodagu) + Rampura → Sanskritization}\). अनुकरण द्वारा \(\textbf{प्रतिष्ठा-वृद्धि}\) = संस्कृतिकरण।
बिहार में भारतीय प्रबंधन संस्थान किस शहर में अवस्थित है ?
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चरण 1: संस्था की पहचान।
बिहार में स्थित IIM का औपचारिक नाम भारतीय प्रबंधन संस्थान बोधगया (IIM Bodh Gaya) है। यह संस्थान गया ज़िले के बोधगया में स्थित है और 2015 के आसपास IIMs के विस्तार चरण में स्थापित किया गया।
चरण 2: स्थान और प्रशासनिक स्थिति।
बोधगया अंतरराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थ-स्थल है, जो गया शहर/ज़िले के अंतर्गत आता है। IIM बोधगया का स्थायी परिसर इसी क्षेत्र में विकसित किया गया है; शैक्षणिक कार्यक्रम (MBA, PhD आदि) यहाँ से संचालित होते हैं।
चरण 3: विकल्पों का उन्मूलन।
पटना, दरभंगा और आरा में IIM नहीं है (पटना में IIM का कोई परिसर नहीं; वहाँ अन्य केंद्रीय/राज्य विश्वविद्यालय एवं IIT स्थित हैं)। इसलिए सही उत्तर गया है।
Quick Tip: बिहार का IIM याद रखें—\(\textbf{IIM Bodh Gaya = गया ज़िला (बोधगया)}\)। नाम में ‘‘बोधगया’’ दिखे तो सीधे \(\textbf{गया}\) चिह्नित करें।
भारत में ‘जलपुरुष’ के नाम से किन्हें जाना जाता है ?
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चरण 1: व्यक्तित्व की पहचान।
राजेन्द्र सिंह राजस्थान के प्रख्यात जल-संरक्षण कार्यकर्ता हैं, जिन्हें देश में ‘जलपुरुष’ कहा जाता है। वे तरुण भारत संघ के संस्थापक सदस्यों में हैं।
चरण 2: प्रमुख योगदान।
अलवर–अरावली क्षेत्र में उन्होंने समुदाय के साथ मिलकर जोहर/चेक-डैम, नालों का उपचार, वर्षाजल संचयन जैसे स्थानीय, कम लागत वाले उपायों से सूखी नदियों को पुनर्जीवित किया—अरवरी, रूपारेल आदि धाराएँ फिर बहने लगीं। इस सामुदायिक जल-प्रबंधन ने भूजल-स्तर बढ़ाया, कृषि उत्पादकता और आजीविका सुधारी तथा सूखा–बाढ़ जोखिम घटाया। इन्हीं प्रयासों के लिए उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार सहित अनेक सम्मान मिले।
चरण 3: निष्कर्ष।
अतः ‘भारत के जलपुरुष’ के रूप में सर्वाधिक प्रसिद्ध नाम राजेन्द्र सिंह का ही है; अन्य विकल्प इस उपाधि से सम्बद्ध नहीं हैं।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{जलपुरुष = राजेन्द्र सिंह (तरुण भारत संघ, अलवर, जोहर/चेक-डैम, मैग्सेसे)}\)—कीवर्ड साथ याद रखें।
‘डॉल्फ़िन मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से कौन मशहूर है ?
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चरण 1: व्यक्तित्व की पहचान।
डॉ. रविन्द्र कुमार सिन्हा (पटना विश्वविद्यालय के प्राणीशास्त्री) को ‘डॉल्फ़िन मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाता है। उन्होंने गंगेटिक डॉल्फ़िन (Platanista gangetica) के संरक्षण, अध्ययन और जागरूकता में तीन दशक से अधिक काम किया है।
चरण 2: प्रमुख योगदान।
उनकी पहल पर भागलपुर क्षेत्र में विक्रमशिला गंगेटिक डॉल्फ़िन अभयारण्य के संरक्षण को गति मिली; मछुआरों के साथ सह-प्रबन्धन, शोध, जन-अभियान और नीति-परामर्श के माध्यम से उन्होंने शिकार/उत्पीड़न रोकने में भूमिका निभाई। उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सहित कई सम्मान प्राप्त हुए।
चरण 3: निष्कर्ष।
इसलिए ‘डॉल्फ़िन मैन ऑफ इंडिया’ के रूप में सर्वमान्य नाम डॉ. रविन्द्र कुमार सिन्हा है।
Quick Tip: कीवर्ड जोड़ें: \(\textbf{गंगेटिक डॉल्फ़िन – विक्रमशिला अभयारण्य – पद्मश्री – डॉ. रविन्द्र कुमार सिन्हा}\) = \(\textbf{Dolphin Man of India}\)।
बिहार में किसान संघ की स्थापना किसने की थी?
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चरण 1: ऐतिहासिक तथ्य।
सन 1929 में स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने पटना/बिहार क्षेत्र में बिहार प्रांतीय किसान सभा (Bihar Provincial Kisan Sabha) की स्थापना की। इसका उद्देश्य जमींदारी-जुल्म, बेगार, लगान-बढ़ौती और बँटाई जैसे शोषण के विरुद्ध किसानों को संगठित करना था।
चरण 2: व्यापक प्रभाव।
यही मंच आगे चलकर अखिल भारतीय स्तर पर All India Kisan Sabha (1936) के निर्माण का आधार बना, जिसके प्रमुख नेताओं में सहजानन्द के साथ एन.जी.रंगा, EMS, इत्यादि शामिल रहे। बिहार में किसान राजनीति के संगठनात्मक ढाँचे की नींव सहजानन्द ने ही डाली।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रीय नेतृत्व/किसान मुद्दों से जुड़े थे पर संस्थापक नहीं; राजकुमार शुक्ल चंपारण सत्याग्रह से प्रसिद्ध; जयप्रकाश नारायण समाजवादी आन्दोलन के नेता। अतः सही उत्तर सहजानन्द सरस्वती है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{1929 – बिहार प्रांतीय किसान सभा – सहजानन्द सरस्वती}\); 1936 में यही धारा \(\textbf{अखिल भारतीय किसान सभा}\) बनी।
'ह्यूमन सोसाइटी' पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
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Step 1: लेखक की पहचान करें।
'ह्यूमन सोसाइटी' (Human Society) समाजशास्त्र की एक प्रसिद्ध कृति है, जिसे लुईस गिन्सबर्ग ने लिखा था। इस पुस्तक में मानव समाज की संरचना, संगठन और सामाजिक प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
Step 2: विकल्पों का मूल्यांकन करें।
- (1) गिन्सबर्ग: सही उत्तर, क्योंकि उन्होंने 'Human Society' लिखी।
- (2) ऑगबर्न: सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक पिछड़ापन (Cultural Lag) की अवधारणा से जुड़े हैं।
- (3) मैकाइवर: 'Society: Its Structure and Changes' जैसी रचनाओं से प्रसिद्ध।
- (4) किंग्सले डेविस: जनसांख्यिकी और सामाजिक संस्थाओं के अध्ययन के लिए जाने जाते हैं।
Step 3: निष्कर्ष।
इस प्रकार, 'Human Society' पुस्तक के लेखक गिन्सबर्ग हैं।
Quick Tip: गिन्सबर्ग = 'Human Society'; ऑगबर्न = सांस्कृतिक पिछड़ापन; मैकाइवर = सामाजिक संरचना; किंग्सले डेविस = जनसांख्यिकी।
‘चिपको आन्दोलन’ सम्बन्धित है
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चरण 1: आन्दोलन की प्रकृति समझें।
चिपको आन्दोलन 1970 के दशक में उत्तराखण्ड (तब उत्तर प्रदेश) के पहाड़ी क्षेत्रों में शुरू हुआ एक पर्यावरण–जन आन्दोलन था। इसका प्रतीकात्मक तरीका था—पेड़ों से चिपक जाना ताकि ठेकेदारों द्वारा कटाई रोकी जा सके।
चरण 2: लक्ष्य और नेतृत्व।
आन्दोलन का उद्देश्य वनों का संरक्षण और स्थानीय समुदायों—विशेषकर महिलाओं—की जीवन–निर्वाह, जल–मृदा संरक्षण, और आपदा-नियंत्रण से जुड़े हितों की रक्षा करना था। प्रमुख नामों में सुंदरलाल बहुगुणा और गौरा देवी (रैणी गाँव) शामिल हैं।
चरण 3: विकल्पों का मूल्यांकन।
यद्यपि वनों की रक्षा से जल–मृदा भी सुरक्षित होते हैं, पर आन्दोलन का प्रत्यक्ष और घोषित फोकस वृक्षों/वनों की कटाई रोकना था। इसलिए सही उत्तर विकल्प (1) है; जल, पशु या खनिज संरक्षण इसके प्राथमिक लक्ष्य नहीं थे।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{चिपको = पेड़ से चिपको}\) ⇒ \(\textbf{वृक्ष संरक्षण}\); प्रमुख नाम—\(\textbf{सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी}\)।
निम्न में से कौन साम्प्रदायिकता का परिणाम नहीं है ?
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चरण 1: अवधारणा समझें।
साम्प्रदायिकता वह प्रवृत्ति है जिसमें धार्मिक/सम्प्रदायिक पहचान को सर्वोपरि मानकर अन्य समुदायों के प्रति शत्रुता, पूर्वाग्रह, और ‘‘हम बनाम वे’’ की मानसिकता को बढ़ावा मिलता है।
चरण 2: इसके वास्तविक परिणाम क्या होते हैं?
ऐसी राजनीति/मानसिकता से दंगों, हिंसा, अविश्वास, और सामाजिक ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ता है। इसलिए यह राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा—दोनों के लिए बाधक बनती है; साथ ही समुदायों के बीच पारस्परिक तनाव बढ़ता है।
चरण 3: निष्कर्ष—कौन-सा परिणाम नहीं है?
पारस्पर विश्वास तो साम्प्रदायिकता के विपरीत स्थिति है; साम्प्रदायिकता अविश्वास पैदा करती है, विश्वास नहीं। अतः विकल्प (1) पारस्पर विश्वास—परिणाम नहीं है।
Quick Tip: साम्प्रदायिकता = \(\textbf{अविश्वास + तनाव + ध्रुवीकरण}\) ⇒ \(\textbf{एकता/सुरक्षा को हानि}\)। ``विश्वास'' हमेशा \(\textbf{NOT}\) वाला विकल्प होगा।
जनांकीकी विज्ञान है
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चरण 1: परिभाषा स्पष्ट करें।
जनांकीकी (Demography) वह विज्ञान है जो मानव जनसंख्या के आकार (size), संरचना (structure), वितरण (distribution) और समय के साथ उनके परिवर्तनों का अध्ययन करता है। इसमें जन्मदर, मृत्यु दर, प्रजनन, पलायन, आयु-संरचना, लैंगिक अनुपात, आश्रितता अनुपात जैसे सूचकों का विश्लेषण शामिल है।
चरण 2: दायरा और महत्व।
जनांकीकी से नीति-निर्माताओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, शहरी नियोजन व संसाधन-वितरण की योजना बनाने में मदद मिलती है। यह सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक विकास और पर्यावरणीय दबावों का पूर्वानुमान लगाने में भी सहायक है।
चरण 3: विकल्पों का मूल्यांकन।
पर्यावरण, वन या जल अध्ययन अलग-अलग विषय हैं; जनांकीकी सीधे-सीधे ‘‘जनसंख्या अध्ययन’’ का विज्ञान है—अतः सही उत्तर विकल्प (2)।
Quick Tip: Mnemonic: \(\textbf{Demo = People, Graphy = Study}\) ⇒ \(\textbf{Demography = जनसंख्या का वैज्ञानिक अध्ययन}\) (जन्म, मृत्यु, पलायन, आयु-वितरण)।
निम्नलिखित में से कौन भूराष्ट्रीयकरण (वैश्वीकरण) का बुरा प्रभाव है ?
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चरण 1: अवधारणा समझें।
वैश्वीकरण से उत्पादन, बाज़ार और वित्त का अंतरराष्ट्रीय एकीकरण तेज़ होता है। कंपनियाँ लागत-प्रतिस्पर्धा के लिए आउटसोर्सिंग, कॉन्ट्रैक्ट-हायरिंग, गिग-वर्क और लचीले श्रम का उपयोग बढ़ाती हैं।
चरण 2: नकारात्मक प्रभाव—जॉब असुरक्षा।
इस प्रतिस्पर्धा में परम्परागत स्थायी नौकरियाँ घटती हैं, छँटनी और अस्थायी अनुबंध बढ़ते हैं, वेतन-शर्तें अनिश्चित रहती हैं और कौशल-मेल न होने पर श्रमिकों में बेरोज़गारी/अध्रोज़गारी दिखती है। अतः कार्य की असुरक्षा वैश्वीकरण का प्रमुख नकारात्मक प्रभाव है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
सार्वभौमिकता (वैश्विक दृष्टि/मानवाधिकार/मानक) और एकीकरण सामान्यतः सकारात्मक/तटस्थ परिणाम माने जाते हैं। सजातीयता (सांस्कृतिक समानरूपता) कभी-कभी आलोचना का विषय है, पर प्रश्न में स्पष्ट ‘‘बुरा प्रभाव’’ के रूप में सबसे प्रत्यक्ष उत्तर जॉब असुरक्षा है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{वैश्वीकरण ⇒ प्रतिस्पर्धा ⇒ लचीला श्रम ⇒ जॉब असुरक्षा}\). सकारात्मक पक्ष: \(\textbf{एकीकरण, सार्वभौमिक मानक}\), नकारात्मक पक्ष: \(\textbf{छँटनी/अस्थिर रोजगार}\)।
निम्नलिखित में से कौन सामाजिक परिवर्तन में अहम भूमिका निभाते हैं ?
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चरण 1: माध्यम और सामाजिक परिवर्तन।
टी.वी., समाचार-पत्र और रेडियो—ये जनसंचार माध्यम सूचना, विचार और मूल्यों का तेज़ प्रसार करते हैं। इनके माध्यम से नई तकनीक, अधिकारों, नीतियों, स्वास्थ्य/शिक्षा और नागरिक दायित्वों के संदेश दूर-दराज़ तक पहुँचते हैं, जिससे मान्यताओं, व्यवहार और दृष्टिकोण में परिवर्तन आता है।
चरण 2: प्रत्येक माध्यम का योगदान।
टी.वी. दृश्य–श्रव्य प्रभाव से आदर्श/रोल मॉडल प्रस्तुत करता है; समाचार-पत्र तथ्यों का गहन विश्लेषण देकर सार्वजनिक विमर्श आकार देते हैं; रेडियो कम लागत और व्यापक पहुँच से ग्रामीण/वंचित समुदायों तक पहुँच बनाता है। तीनों मिलकर एजेंडा-सेटिंग, जागरूकता, और सामूहिक क्रिया को प्रेरित करते हैं।
निष्कर्ष: सामाजिक परिवर्तन में इन सभी माध्यमों की पूरक और निर्णायक भूमिका होती है, इसलिए सही उत्तर (4) इनमें से सभी है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{टीवी = दृश्य प्रभाव}\), \(\textbf{अख़बार = विश्लेषण}\), \(\textbf{रेडियो = व्यापक पहुँच}\) ⇒ तीनों मिलकर \(\textbf{जागरूकता + दृष्टिकोण परिवर्तन}\)।
निम्न में से कौन एक सामाजिक समस्या है ?
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चरण 1: सामाजिक समस्या की परिभाषा।
सामाजिक समस्या वह स्थिति है जो समाज के बड़े हिस्से के लिए क्षतिकारक हो, स्वीकृत मूल्यों/मानकों से विचलन दिखाए और जिसे सामूहिक हस्तक्षेप से दूर करना आवश्यक समझा जाए।
चरण 2: विकल्पों का विश्लेषण।
भिक्षावृत्ति गरीबी, बेरोज़गारी, व्यसन, मानव-तस्करी, विकलांगता और सामाजिक बहिष्करण जैसी संरचनात्मक वजहों से उत्पन्न स्थायी सामाजिक विकृति है। यह मानव-गरिमा, बच्चों के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और उत्पादक क्षमता—सबको प्रभावित करती है; इसलिए यह स्पष्ट सामाजिक समस्या है।
नगरीकरण और आधुनिकीकरण सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाएँ हैं—इनसे लाभ-हानि दोनों हो सकते हैं पर वे अपने-आपमें समस्या नहीं हैं। प्रेम विवाह एक वैवाहिक रूप है; समाजों में इसकी स्वीकार्यता भिन्न हो सकती है, पर इसे सामान्यतः समस्या नहीं माना जाता।
निष्कर्ष: दिए विकल्पों में भिक्षावृत्ति ही वह स्थिति है जिसे समाज समस्या के रूप में पहचानता और नीति/कानून/कल्याण कार्यक्रमों से निवारण चाहता है।
Quick Tip: \(\textbf{Social Problem = Harm + Norm Violation + Collective Solution Need}\).
\(\textbf{Beggary}\) ✔; \(\textbf{Urbanization/Modernization}\) = परिवर्तन प्रक्रियाएँ; \(\textbf{Love Marriage}\) = वैवाहिक रूप, समस्या नहीं।
साम्प्रदायिकता जन्म देती है।
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चरण 1: साम्प्रदायिकता का अर्थ।
साम्प्रदायिकता वह दृष्टि है जिसमें धार्मिक पहचान को सर्वोपरि रखकर अन्य समुदायों के प्रति अविश्वास, द्वेष और ‘‘हम बनाम वे’’ का भाव पैदा किया जाता है। यह ध्रुवीकरण को वैधता देता है और अफ़वाह/उत्तेजक प्रचार से भीड़-भावना भड़कती है।
चरण 2: परिणाम कैसे उत्पन्न होते हैं?
इस से समुदायों के बीच टकराव बढ़ता है जो अक्सर दंगे, लिंचिंग, और संपत्ति-नुकसान जैसी हिंसा में बदलता है। चरम अवस्था में संगठित उग्र गुट धर्म के नाम पर आतंकवादी कृत्य (बम धमाके, लक्षित हत्याएँ, धमकी) करने लगते हैं। अतः साम्प्रदायिकता हिंसा और आतंकवाद—दोनों की जनक बन सकती है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
जातिवाद (casteism) का आधार वंश/जन्म पर आधारित सामाजिक श्रेणियाँ हैं; यद्यपि दोनों भेदभाव के रूप हैं, पर साम्प्रदायिकता का प्रत्यक्ष परिणाम हिंसा और आतंकवादी प्रवृत्तियाँ अधिक स्पष्ट होती हैं। इसलिए सही उत्तर (3) है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{साम्प्रदायिकता ⇒ ध्रुवीकरण ⇒ हिंसा ⇒ चरम पर आतंकवाद}\).
जातिवाद = जन्म/वंश पर आधारित भेद; इसे साम्प्रदायिकता से अलग रखें।
भारतीय समाज पर उपनिवेशवादी शासन का क्या कारण था ?
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चरण 1: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य।
18वीं सदी में मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद भारत में राजनीतिक विखंडन बढ़ा—प्रांतीय शक्तियाँ, उत्तराधिकार युद्ध, और आपसी संघर्षों ने केंद्रीय सत्ता को कमजोर किया। इस अस्थिरता ने ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी बाहरी शक्तियों को संधि, दख़ल और सैन्य हस्तक्षेप के अवसर दिए।
चरण 2: उपनिवेशवाद की रणनीति।
कंपनी ने डिवाइड-एंड-रूल, सहायक संधि, दीवानी अधिकार, भू-राजस्व व्यवस्थाएँ (स्थायी/रैयतवाड़ी/महलवाड़ी) और आधुनिक सेना/प्रशासन का उपयोग कर शक्ति-संतुलन अपने पक्ष में किया—जो तभी संभव था जब भीतर राजनीतिक स्थिरता कमजोर हो।
चरण 3: अन्य विकल्पों का आकलन।
सांस्कृतिक विविधता अपने आप में कमजोरी नहीं; यह तो भारत की विशेषता है। जातिवाद और क्षेत्रीय तनाव मौजूद थे, पर निर्णायक प्रवेश-द्वार बना राजनीतिक अस्थिरता—इसीने उपनिवेशवादी सत्ता के विस्तार को आसान बनाया। इसलिए सही उत्तर (1) है।
Quick Tip: उपनिवेशवाद के कारणों में कुंजी शब्द: \(\textbf{राजनीतिक विखंडन, कमजोर केंद्र, कंपनी की संधियाँ/सेना}\) ⇒ बाहरी सत्ता का वर्चस्व।
भारतीय समाज में सामाजिक स्तरीकरण का बुनियादी आधार क्या है ?
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चरण 1: स्तरीकरण की धारणा।
सामाजिक स्तरीकरण समाज में दर्जाबंदी/परतों (layers) की व्यवस्था है—जहाँ संसाधन, प्रतिष्ठा और शक्ति का असमान वितरण होता है। आधुनिक समाजों में यह प्रायः वर्ग/आय पर टिका होता है, पर भारत के परंपरागत संदर्भ में इसका मुख्य आधार ‘‘जाति’’ रही है।
चरण 2: क्यों ‘‘जाति’’ आधार है?
जाति जन्म-आधारित समूह है, जिसमें व्यवसाय, विवाह, भोजन-संपर्क, पवित्रता-अपवित्रता जैसे नियम तय करते हैं कि कौन-सा समूह ऊपर/नीचे माना जाएगा। राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सामाजिक प्रतिष्ठा और संसाधनों की पहुँच पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव रहा है, इसलिए पारंपरिक भारतीय समाज में स्तरीकरण का मूल आधार जाति ही माना जाता है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
धन-संपत्ति आज प्रभावशाली अवश्य हैं, पर ऐतिहासिक दृष्टि से प्राथमिक आधार जाति रहा; परिवार और धर्म महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ हैं, पर स्तरीकरण की बुनियादी इकाई के रूप में वे जाति जितने निर्णायक नहीं। अतः सही उत्तर (2) जाति।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{भारत (परंपरागत) = जाति-आधारित स्तरीकरण}\), जबकि \(\textbf{आधुनिक/पश्चिमी}\) समाजों में प्रधानतः \(\textbf{वर्ग/आय-आधारित}\)।
निम्न में से कौन सामाजिक समस्या नहीं है ?
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चरण 1: सामाजिक समस्या की कसौटी।
सामाजिक समस्या वह स्थिति है जो व्यापक जनहित को नुकसान पहुँचाए, मान्य मूल्यों/कानूनों का उल्लंघन करे और जिसके समाधान हेतु सामूहिक/राजकीय हस्तक्षेप आवश्यक हो (जैसे अपराध, शोषण, अन्याय)।
चरण 2: विकल्पों का विश्लेषण।
बालश्रम बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है; भ्रष्टाचार सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग है; तस्करी गैरकानूनी व्यापार/अपराध है—ये तीनों स्पष्ट सामाजिक समस्याएँ हैं। आधुनिकीकरण समाज-परिवर्तन की प्रक्रिया है (तकनीक, शिक्षा, शहरीकरण, तर्कशीलता), जो सकारात्मक–नकारात्मक दोनों प्रभाव ला सकती है, पर अपने-आप में समस्या नहीं मानी जाती।
चरण 3: निष्कर्ष।
अतः दिए विकल्पों में आधुनिकीकरण सामाजिक समस्या नहीं है, जबकि शेष तीनों—बालश्रम, भ्रष्टाचार, तस्करी—समस्या की श्रेणी में आते हैं।
Quick Tip: \(\textbf{समस्या = हानि + कानून/मूल्य-उल्लंघन + सामूहिक समाधान की जरूरत}\);
\(\textbf{प्रक्रिया/परिवर्तन}\) (जैसे आधुनिकीकरण) को स्वतः समस्या न मानें।
निम्न में से कौन समाजीकरण का अभिकरण नहीं है ?
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चरण 1: समाजीकरण एवं अभिकरण का अर्थ।
समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति समाज के मूल्य, मानदंड, भूमिकाएँ, भाषा और व्यवहार-नियम सीखता है। जो संस्थाएँ/समूह यह सीखने की प्रक्रिया चलाते हैं, उन्हें समाजीकरण के अभिकरण (agents) कहते हैं—जैसे परिवार, विद्यालय, सहकर्मी/खेल समूह, मीडिया, धर्म/समुदाय इत्यादि।
चरण 2: विकल्पों का विश्लेषण।
परिवार प्राथमिक अभिकरण है जो भाषा, अनुशासन, नैतिकता देता है; विद्यालय औपचारिक शिक्षा व नागरिकता-संस्कार देता है; खेल समूह/सहकर्मी सहयोग, प्रतिस्पर्धा, नेतृत्व जैसी भूमिकाएँ सिखाते हैं। अफवाह सूचना का अविश्वसनीय/अनौपचारिक प्रसार है; इसका उद्देश्य समाजीकरण नहीं, बल्कि अक्सर भ्रम/तनाव पैदा करना होता है। इसलिए यह समाजीकरण का अभिकरण नहीं है।
निष्कर्ष: सही उत्तर (3) अफवाह है।
Quick Tip: अभिकरण = \(\textbf{परिवार, विद्यालय, सहकर्मी/खेल समूह, मीडिया, धर्म}\);
\(\textbf{अफवाह}\) = सूचना-विकृति, \(\textbf{समाजीकरण का अभिकरण नहीं}\)।
निम्न में से कौन भ्रष्टाचार का कारण नहीं है ?
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चरण 1: भ्रष्टाचार के सामान्य कारण।
भ्रष्टाचार की जड़ें सामान्यतः राजनीतिक अपराधीकरण/दबाव, कमीज़ोर पारदर्शिता-नियंत्रण, अत्यधिक भोगवादी/विलासी जीवन-लालसा, अवसरवाद, संरक्षण-तंत्र और आर्थिक प्रलोभन में मिलती हैं।
चरण 2: विकल्पों का परीक्षण।
(1) राजनीतिक अपराधीकरण सत्ता-लाभ हेतु गैरकानूनी नेटवर्क बनाता है—यह भ्रष्टाचार को उत्पन्न/संरक्षित करता है।
(2) विलासी जीवन अधिक आय/वैभव की अनुचित चाह पैदा कर रिश्वत/धांधली की ओर धकेल सकता है।
(3) काला बाज़ारी स्वयं भ्रष्ट आचरण का रूप है; यह कमी, नियंत्रण और भ्रष्ट नेटवर्क से पोषित होता है—अर्थात कारण-श्रृंखला का भाग है।
(4) आलसीपन व्यक्तिगत कार्य-शैली है; यह रिश्वत/धांधली की प्राथमिक वजह नहीं माना जाता। इसलिए यह दिए गए विकल्पों में भ्रष्टाचार का कारण नहीं है।
Quick Tip: कारणों को पहचानें: \(\textbf{सत्ता–धन–लालसा–कमज़ोर नियंत्रण}\) ⇒ भ्रष्टाचार। \(\textbf{आलसीपन}\) दक्षता को प्रभावित करता है, पर सीधे \(\textbf{भ्रष्टाचार का कारण}\) नहीं।
निम्न में से कौन सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप नहीं है ?
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चरण 1: सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप समझें।
समाजशास्त्र में परिवर्तन के प्रमुख स्वरूप/रूपरेखाएँ मानी जाती हैं—उत्क्रान्ति (धीरे-धीरे क्रमिक बदलाव), विकास (संरचनात्मक-विस्तार व भौतिक/संस्थागत उन्नति), प्रगति (मूल्य-मानकों के अनुसार ‘‘बेहतर’’ दिशा में बदलाव), तथा क्रांति/सुधार आदि। ये परिवर्तन की प्रक्रियाएँ या प्रकार हैं, जो समाज की संरचना और कार्य-प्रणाली को रूपांतरित करते हैं।
चरण 2: विकल्पों का मूल्यांकन।
(1) विकास, (2) प्रगति और (3) उत्क्रान्ति—तीनों सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप हैं।
(4) बेरोज़गारी स्वयं में परिवर्तन का स्वरूप नहीं बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक समस्या/प्रभाव है, जो कुछ परिवर्तनों (जैसे स्वचालन, संरचनात्मक मंदी, कौशल-असंगति) के कारण उभर सकती है। इसलिए यह श्रेणीगत रूप से अलग है।
निष्कर्ष: दिए विकल्पों में बेरोज़गारी सामाजिक परिवर्तन का स्वरूप नहीं है; शेष तीन परिवर्तन के प्रकार हैं।
Quick Tip: \(\textbf{स्वरूप = प्रक्रिया/प्रकार}\) (उत्क्रान्ति, विकास, प्रगति, क्रांति)।
\(\textbf{समस्या/परिणाम}\) (जैसे बेरोज़गारी) = \(\textbf{स्वरूप नहीं}\)—इन्हें अलग पहचानें।
नगरीकरण को मापने का प्रमुख पैमाना क्या है ?
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चरण 1: मापदण्ड समझें।
किसी क्षेत्र के शहरी होने का मूल संकेतक लोगों का घनत्व है—कम क्षेत्र में अधिक जनसमूह का केन्द्रित होना। भारत की जनगणना के शहरी मानदण्डों में न्यूनतम जनसंख्या (5000), न्यूनतम जनसंख्या घनत्व (400 व्यक्ति/किमी\(^2\)) और ग़ैर-कृषि में उच्च कार्य-सग्रह (≥75% पुरुष कार्यकर्ता) तीनों शामिल हैं, पर घनत्व प्रत्यक्ष रूप से शहरी स्वरूप और नगरीकरण की तीव्रता को दर्शाता है।
चरण 2: विकल्पों का मूल्यांकन।
(1) केवल जनसंख्या संख्या से शहरीपन नहीं आँका जा सकता—बड़ा लेकिन फैला हुआ क्षेत्र ग्रामीण भी हो सकता है।
(3) उद्योग नगरीकरण को बढ़ावा देते हैं, पर यह कारक है, माप का मुख्य पैमाना नहीं।
(2) जनसंख्या घनत्व सीधे-सीधे एकाग्रता/कन्सन्ट्रेशन बताता है—इसलिए इसे प्रमुख पैमाने के रूप में स्वीकार किया जाता है।
निष्कर्ष: नगरीकरण की तीव्रता आँकने के लिए सबसे प्रमुख पैमाना जनसंख्या घनत्व है।
Quick Tip: शहरी = \(\textbf{उच्च घनत्व + गैर-कृषि कार्य + पर्याप्त जनसंख्या}\); मापन में \(\textbf{घनत्व}\) को प्राथमिक संकेतक मानें।
आधुनीकीकरण का क्या परिणाम है ?
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चरण 1: अवधारणा समझें।
आधुनीकीकरण में औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, शिक्षा-विस्तार, नौकरशाही, बाज़ार-विस्तार, तकनीकीकरण और तर्कशीलता का प्रसार शामिल है। इन प्रक्रियाओं से पेशों का विभेदीकरण और श्रम का विशेषीकरण बढ़ता है।
चरण 2: वर्ग-संरचना पर प्रभाव।
खेती पर निर्भर परंपरागत ढाँचा रूपांतरित होकर औद्योगिक श्रमिक वर्ग, नयी मध्यवर्गीय/पेशेवर श्रेणियाँ, सेवा क्षेत्र आदि उभरते हैं। यानी आधुनिक अर्थव्यवस्था में नये सामाजिक–आर्थिक वर्ग निर्मित होते हैं और पुरानी जाति-आधारित प्रतिष्ठा की जगह शिक्षा–पेशा–आय पर आधारित वर्ग-भेद महत्त्व पकड़ते हैं।
चरण 3: अन्य विकल्पों का मूल्यांकन।
निरक्षरता सामान्यतः घटती है (विद्यालयीकरण बढ़ता है)। बेरोज़गारी कुछ चरणों/क्षेत्रों में बढ़ सकती है पर यह सार्विक और अनिवार्य परिणाम नहीं। जाति संघर्ष राजनीतिक/सांस्कृतिक कारणों से हो सकता है, पर आधुनीकीकरण का प्रत्यक्ष अनिवार्य नतीजा नहीं है। इसलिए सबसे उपयुक्त उत्तर नये वर्गों का उदय है।
Quick Tip: आधुनिकीकरण ⇒ \(\textbf{पेशा-विविधता + शहरीकरण + शिक्षा}\) ⇒ \(\textbf{नया मध्यवर्ग/श्रमिक/पेशेवर वर्ग}\)। निरक्षरता घटती है; बेरोज़गारी/जाति तनाव अनिवार्य नहीं।
निम्न में से कौन एक भारतीय सांस्कृतिक संरचना में परिवर्तन लाने वाली प्रक्रिया नहीं है ?
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चरण 1: अवधारणाएँ पहचानें।
संस्कृतिकरण (M.N. Srinivas) और पश्चिमीकरण भारतीय समाज में सांस्कृतिक मान्यताओं/आचरण के प्रत्यक्ष परिवर्तन की प्रक्रियाएँ हैं। लौकिकीकरण (secularization) भी धार्मिक नियंत्रण के क्षरण और धर्मनिरपेक्ष-सांस्कृतिक मूल्यों के प्रसार से जुड़ा सांस्कृतिक रूपांतरण है।
चरण 2: औद्योगीकरण का स्वरूप।
औद्योगीकरण मुख्यतः आर्थिक/उत्पादन-संरचना का परिवर्तन है—कारखाने, श्रम-विभाजन, बाज़ार, तकनीक आदि। इसके परिणामस्वरूप संस्कृति प्रभावित होती है, पर स्वयं यह प्रत्यक्ष ‘‘सांस्कृतिक’’ प्रक्रिया नहीं माना जाता, जबकि शेष तीन सीधे सांस्कृतिक तत्त्वों (मूल्य, जीवन-शैली, रीति) में बदलाव लाते हैं।
निष्कर्ष: इसलिए भारतीय सांस्कृतिक संरचना को बदलने वाली प्रत्यक्ष प्रक्रियाएँ—संस्कृतिकरण, पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण—हैं; औद्योगीकरण प्रमुखतः आर्थिक- संरचनात्मक प्रक्रिया है, अतः विकल्प (2) सही है।
Quick Tip: \(\textbf{सीधी सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ:}\) संस्कृतिकरण, पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण।
\(\textbf{संरचनात्मक/आर्थिक प्रक्रिया:}\) औद्योगीकरण — संस्कृति को प्रभावित करता है, पर \(\textbf{प्रत्यक्ष सांस्कृतिक प्रक्रिया}\) नहीं।
अस्पृश्यता अपराध अधिनियम किस वर्ष पारित हुआ ?
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चरण 1: संवैधानिक पृष्ठभूमि।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और इसके किसी भी रूप को दंडनीय बनाता है। इसे प्रभावी बनाने के लिए केंद्र ने एक विशेष क़ानून बनाया।
चरण 2: अधिनियम की तिथि व स्वरूप।
यह क़ानून Untouchability (Offences) Act, 1955 के नाम से 1955 में पारित हुआ। बाद में 1976 में व्यापक संशोधन कर इसका नाम Protection of Civil Rights Act, 1955 किया गया—अर्थात मूल अधिनियम 1955 का ही रहा, पर अधिकार-रक्षा का दायरा बढ़ाया गया।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
1976 संशोधन/नाम-परिवर्तन का वर्ष है, पारित होने का नहीं; 1988 व 1995 का इस अधिनियम से संबंध नहीं। इसलिए सही उत्तर 1955 है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{A17 ⇒ Untouchability (Offences) Act, 1955}\) → 1976 में नाम बदला: \(\textbf{Protection of Civil Rights Act, 1955}\)।
अनुसूचित जातियों में आरक्षण दिया जाता है उनकी किसके संदर्भ में ?
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चरण 1: संवैधानिक अभिप्राय।
आरक्षण का उद्देश्य अनुसूचित जाति/जनजाति के ऐतिहासिक सामाजिक बहिष्करण को दूर करना और उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना है (अनु. 15(4), 16(4), 330–332)।
चरण 2: ‘‘मात्रा’’ कैसे तय होती है?
आरक्षण की कुल मात्रा सामान्यतः संबंधित समुदाय की जनसंख्या-प्रतिशत के अनुरूप निर्धारित की जाती है—ताकि प्रतिनिधित्व वास्तविक जनसंख्या-साझे के करीब पहुँचे (जैसे केंद्र/राज्यों में SC का आरक्षण प्रायः उनकी जनसंख्या के आसपास रखा जाता है)।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
आरक्षण गरीबी/आर्थिक आवश्यकता पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और पर्याप्त प्रतिनिधित्व पर आधारित है; ‘‘आनुवंशिक स्थिति’’ जैसी कोई कसौटी भारतीय व्यवस्था में नहीं है। इसलिए सही उत्तर जनसंख्या के संदर्भ में है।
Quick Tip: SC/ST आरक्षण = \(\textbf{सामाजिक न्याय + पर्याप्त प्रतिनिधित्व}\);
\(\textbf{क्वोटा का निर्धारण}\) अक्सर \(\textbf{जनसंख्या-प्रतिशत}\) के अनुरूप किया जाता है—गरीबी नहीं।
निम्न में से किन्हें किसी एक जाति को अनुसूचित जाति घोषित करने का अधिकार है?
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चरण 1: संवैधानिक प्रावधान।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341(1) के अनुसार राष्ट्रपति किसी राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के संदर्भ में उन जातियों को अधिसूचना द्वारा अनुसूचित जाति घोषित कर सकते हैं (राज्यपाल से परामर्श के बाद)।
चरण 2: संशोधन का प्रावधान।
एक बार सूची अधिसूचित होने के बाद उसमें जोड़/कटौती केवल संसद के विधेयक द्वारा (अनुच्छेद 341(2)) की जा सकती है; कार्यपालिका अकेले परिवर्तन नहीं कर सकती।
चरण 3: विकल्पों का मूल्यांकन।
अनुसूचित जाति आयोग (अब राष्ट्रीय आयोग) सुझाव/सिफारिश देता है, पर घोषित नहीं करता। राज्यपाल से परामर्श लिया जाता है पर उन्हें यह अधिकार नहीं। केंद्रीय मंत्रिमंडल नीति निर्धारण/मसौदा तैयार कर सकता है, पर अंतिम अधिसूचना राष्ट्रपति द्वारा होती है। अतः सही उत्तर (1) राष्ट्रपति।
Quick Tip: SC/ ST सूची: \(\textbf{अधिसूचना = राष्ट्रपति (Art. 341/342)}\), \(\textbf{परिवर्तन = केवल संसद का कानून}\); आयोग/राज्यपाल \(\textbf{सलाहकार}\) भूमिका निभाते हैं।
किसने संस्कृतिकरण को प्रत्याशित समाजीकरण की प्रक्रिया कहा ?
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चरण 1: संस्कृतिकरण का सार।
एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई अपेक्षाकृत निम्न स्थिति वाली जाति उच्च वर्ण/उच्च प्रतिष्ठित समूहों के रीति–रिवाज, भोजन, पूजा, शुद्धता के नियम, जीवन-शैली अपनाकर सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने की कोशिश करती है।
चरण 2: प्रत्याशित समाजीकरण का अर्थ।
प्रत्याशित समाजीकरण (anticipatory socialization) का अर्थ है—व्यक्ति/समूह उस संदर्भ समूह के मानदंड–मूल्य पहले से सीख लेता है, जिसमें वह भविष्य में शामिल होना चाहता है; यह अवधारणा रॉबर्ट के. मर्टन ने दी।
चरण 3: दोनों का सेतु—योगेन्द्र सिंह।
योगेन्द्र सिंह (Modernization of Indian Tradition) ने स्पष्ट किया कि संस्कृतिकरण वस्तुतः प्रत्याशित समाजीकरण जैसा ही है—निम्न जाति ऊर्ध्व-समूह (आमतौर पर द्विज) को reference group मानकर उसके नियम पहले ही अपना लेती है ताकि प्रतिष्ठा और स्थिति में उन्नति संभव हो। यही कारण है कि उन्होंने संस्कृतिकरण को प्रत्याशित समाजीकरण की प्रक्रिया कहा। अन्य विकल्पों—एस. सी. दूबे, के. डेविस, सी. एच. कूले—ने ऐसा प्रतिपादन नहीं किया।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{Sanskritization = Upward imitation of higher castes}\) ⇒ \(\textbf{Anticipatory socialization}\). लेखक याद रखें—\(\textbf{योगेन्द्र सिंह}\)।
किस वर्ष संसद के दोनों सदनों से ‘तीन तलाक’ कानून पारित हुआ ?
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चरण 1: विधेयक की पहचान।
‘तीन तलाक’ कानून का औपचारिक नाम मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 है। इसका लक्ष्य ‘तलाक-ए-बिदअत’ (एक बार में तीन तलाक बोलकर विवाह तोड़ना) को अवैध और दंडनीय घोषित करना था।
चरण 2: संसदीय प्रक्रिया।
पहले 2017 और 2018 में विधेयक लाया गया पर राज्यसभा में लंबित रहा। अंततः लोकसभा ने 25 जुलाई 2019 को और राज्यसभा ने 30 जुलाई 2019 को विधेयक पारित किया। राष्ट्रपति की मंजूरी 1 अगस्त 2019 को मिली और वही वर्ष इस कानून के अधिनियमित होने का वर्ष बना।
निष्कर्ष: दोनों सदनों द्वारा पारित होने का सही वर्ष 2019 है—इसलिए उत्तर (3)।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{तीन तलाक कानून = 2019}\). 2017/2018 में बिल अटका; LS: 25 Jul 2019, RS: 30 Jul 2019, Assent: 1 Aug 2019}.
भारत में किसने सर्वप्रथम सती प्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी ?
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चरण 1: ऐतिहासिक संदर्भ।
उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में बंगाल में सती प्रथा (पति की चिता पर पत्नी को जला देना) व्यापक थी। राजा राममोहन राय (1772–1833) ने इसे अनैतिक, अमानवीय और वैदिक परम्परा के विपरीत बताते हुए समाज और शासकों को सक्रिय रूप से जागरूक किया।
चरण 2: सुधार प्रयास।
राय ने लेख, याचिकाएँ और जनमत संगठित कर गवर्नर-जनरल लार्ड बेंटिक पर क़दम उठाने का दबाव बनाया। इसके परिणामस्वरूप 1829 में सती निषेध विनियमन (Regulation XVII) जारी हुआ, जिसने सती को दंडनीय अपराध घोषित किया।
चरण 3: अन्य व्यक्तित्व क्यों नहीं।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने मुख्यतः विधवा विवाह के लिए संघर्ष किया; गाँधी और एनी बेसेन्ट का समय बाद का है। सती प्रथा के विरुद्ध सबसे पहले और निर्णायक आवाज़ राजा राममोहन राय की मानी जाती है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{सती-निषेध (1829)}\) ← जनअभियान: \(\textbf{राजा राममोहन राय}\); प्रशासन: \(\textbf{लॉर्ड बेंटिक}\).
पंचायती राज संस्था में निम्न में से कौन न्यूनतम इकाई है ?
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चरण 1: पंचायती राज की परतें।
73वाँ संवैधानिक संशोधन (1992) के अनुसार ग्रामीण स्थानीय शासन तीन-स्तरीय है—ग्राम स्तर: ग्राम पंचायत, मध्य/खंड स्तर: पंचायत समिति (ब्लॉक/तहसील), और जिला स्तर: जिला परिषद।
चरण 2: ‘‘न्यूनतम इकाई’’ की पहचान।
ग्राम पंचायत सीधे ग्राम/वार्ड के मतदाताओं से बनी संस्था है; यह स्थानीय योजना, बुनियादी सेवाएँ, कर/शुल्क वसूलना, ग्राम विकास जैसे कार्य करती है। इसलिए यही सबसे निचली/न्यूनतम इकाई है।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
जिला परिषद सर्वोच्च जिला-स्तरीय निकाय है; पंचायत समिति मध्य-स्तर की इकाई है; पंचायत सेवक संस्था नहीं, बल्कि ग्राम पंचायत का एक कार्मिक/कर्मचारी होता है। अतः सही उत्तर ग्राम पंचायत।
Quick Tip: याद रखें: पंचायती राज का क्रम—\(\textbf{ग्राम पंचायत}\) (सबसे नीचे) → \(\textbf{पंचायत समिति}\) → \(\textbf{जिला परिषद}\) (सबसे ऊपर)।
किस समाज में हठ विवाह का प्रचलन है ?
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चरण 1: हठ विवाह का अर्थ।
हठ विवाह (जिसे पकड़/अपहरण विवाह या marriage by capture भी कहा जाता है) वह रूप है जिसमें वर पक्ष लड़की को बलपूर्वक या प्रतीकात्मक रूप से ‘‘कब्ज़ा’’ कर विवाह की रस्में पूरी करता है। यह सहमति-आधारित आधुनिक विवाह से भिन्न, पारंपरिक सामुदायिक रीति है।
चरण 2: समाजशास्त्रीय संदर्भ।
भारत के कई जनजातीय समुदायों—जैसे गोंड, हो, मुंडा, संथाल, कोरकू आदि—में कुछ क्षेत्रों/उपसंस्कृतियों में हठ/पकड़ विवाह के रूप मिलते हैं। इनमें अक्सर बाद में कुटुम्बों के बीच समन्वय, दहेज़/दण्ड (ब्राइड-प्राइस) और सामुदायिक स्वीकृति की प्रक्रियाएँ जुड़ी होती हैं।
चरण 3: अन्य विकल्प क्यों नहीं।
हिन्दू, मुस्लिम और सिख समाज के विधि-सम्मत विवाह-रूप सहमति, साक्षी और धार्मिक-सांस्कृतिक संस्कारों पर आधारित हैं; हठ/पकड़ जैसी प्रथा उनकी मुख्यधारा में मान्य नहीं। अतः सही उत्तर जनजातीय समाज है।
Quick Tip: ‘‘\(\textbf{हठ/पकड़ विवाह}\)’’ = \(\textbf{tribal marriage by capture}\); प्रतीकात्मक/बलपूर्वक ले जाना + बाद में सामुदायिक सहमति/ब्राइड-प्राइस।
एक समाजशास्त्री अध्ययन करता है—
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चरण 1: विषय की परिभाषा।
समाजशास्त्र वह विधा है जो समाज, सामाजिक संबंधों, समूहों, संस्थाओं, संस्कृति, सामाजिक प्रक्रियाओं और परिवर्तन का वैज्ञानिक अध्ययन करती है। इसका केन्द्र सामाजिक जीवन है—यानी मनुष्य जब अन्य मनुष्यों के साथ अंतःक्रिया करता है तो व्यवहार, नियम और संरचनाएँ कैसे बनती/बदलती हैं।
चरण 2: विकल्पों का विश्लेषण।
(1) ‘‘मानव जीवन के सभी पहलू’’ में जैविक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि सब कुछ आता है—यह बहुत व्यापक है; समाजशास्त्र का क्षेत्र इनमें से सामाजिक पक्ष तक सीमित रहता है।
(3) ‘‘प्रकार्यात्मक (functional) पहलू’’ केवल एक दृष्टिकोण है, पूरा विषय-वस्तु नहीं।
(4) ‘‘उत्क्रान्तीय पहलू’’ मानवशास्त्र/जीवविज्ञान का क्षेत्र है। इसलिए सबसे उपयुक्त उत्तर (2) है—सामाजिक जीवन के सभी पहलू।
Quick Tip: याद रखें: Sociology = \(\textbf{systematic study of social life}\).
कुंजी शब्द: \(\textbf{समूह, संस्थाएँ, संस्कृति, अंतःक्रिया, सामाजिक परिवर्तन}\)।
‘सोशल स्ट्रक्चर ऐण्ड एनोमी’ नामक प्रसिद्ध निबंध किसने लिखा ?
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चरण 1: रचना की पहचान।
आर. के. मर्टन का निबंध “Social Structure and Anomie” 1938 में American Journal of Sociology में प्रकाशित हुआ। यह अपराध व विचलन के समाजशास्त्रीय अध्ययन की आधारभूत रचनाओं में गिना जाता है।
चरण 2: मूल तर्क समझें।
मर्टन ने दुर्कीम की एनोमी (मानदण्ड-विघटन) धारणাকে अमेरिकी संदर्भ में रूपान्तरित किया। समाज सांस्कृतिक लक्ष्य (जैसे आर्थिक सफलता) तो सबके सामने रखता है, पर वैध साधन (शिक्षा, अवसर, नौकरी) सभी को समान रूप से उपलब्ध नहीं करवाता। लक्ष्यों–साधनों के असंतुलन से तनाव/स्ट्रेन पैदा होता है और लोग पाँच प्रकार की अनुकूलनों की ओर बढ़ते हैं—
(1) Conformity (लक्ष्य+ साधन+),
(2) Innovation (लक्ष्य+ साधन−; उदा. अवैध कमाई),
(3) Ritualism (लक्ष्य− साधन+),
(4) Retreatism (लक्ष्य− साधन−),
(5) Rebellion (नये लक्ष्य/साधन प्रस्तावित)।
चरण 3: निष्कर्ष।
अतः ‘सोशल स्ट्रक्चर ऐण्ड एनोमी’ के लेखक आर. के. मर्टन हैं; उन्होंने दिखाया कि संरचनात्मक विषमता कैसे विचलन को जन्म देती है।
Quick Tip: कुंजी: \(\textbf{मर्टन = एनोमी का स्ट्रेन मॉडल}\) → \(\textbf{लक्ष्य–साधन असंतुलन}\) → पाँच अनुकूलन: Conformity, Innovation, Ritualism, Retreatism, Rebellion.
‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ की अवधारणा किसने दी है ?
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चरण 1: मूल अवधारणा।
चार्ल्स डार्विन ने अपनी कृति On the Origin of Species (1859) में Struggle for Existence (अस्तित्व के लिए संघर्ष) का विचार प्रस्तुत किया—प्रकृति में संसाधन सीमित होने से जीव प्रतिस्पर्धा करते हैं; जो बेहतर ढलते हैं वे प्राकृतिक चयन के जरिए बचते और प्रजनन करते हैं।
चरण 2: संबंधित पदों का भेद।
‘Survival of the Fittest’ (सबसे योग्य का अस्तित्व) शब्दावली हरबर्ट स्पेंसर ने गढ़ी; बाद में डार्विन ने इसे अपनाया, किन्तु ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ का प्रतिपादन डार्विन का ही है। दुर्कीम और सोरोकिन क्रमशः सामाजिक एकात्मता/एनोमी और सांस्कृतिक-परिवर्तन के सिद्धांतकार हैं।
निष्कर्ष: दिए गए विकल्पों में इस अवधारणा के प्रवर्तक चार्ल्स डार्विन हैं।
Quick Tip: \(\textbf{डार्विन}\) → Struggle for Existence + Natural Selection; \(\textbf{स्पेंसर}\) → Survival of the Fittest (शब्द गढ़ा)।
भारतीय संयुक्त परिवार का निम्नलिखित लक्षणों में से सबसे महत्वपूर्ण लक्षण क्या है?
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चरण 1: संयुक्त परिवार की संकल्पना।
भारतीय समाजशास्त्र में संयुक्त परिवार वह इकाई है जिसमें सामूहिक जीवन (एक निवास, एक रसोई) के साथ आर्थिक संयुक्तता विद्यमान रहती है—उत्पन्न आय, भूमि/संपत्ति और व्यय का प्रबंधन साझा होता है और परिवार-प्रमुख की अधिष्ठाता में चलता है।
चरण 2: कौन-सा लक्षण निर्णायक है?
पीढ़ियाँ तीन से अधिक होना सामान्य रूप है, पर केवल बहु-पीढ़ीय होना पर्याप्त नहीं—अलग कमाई/अलग खर्च होने पर वह संयुक्त नहीं माना जाता। पुरुष-प्रधानता या अनुशासन जैसी बातें कभी-कभी मिलती हैं, पर वे परिभाषात्मक नहीं। इसके विपरीत संपत्ति/आय का संयुक्त स्वामित्व और साझा उपभोग संयुक्त परिवार की केन्द्रीय/न्यूनाधिक शर्त है; यही उसे एक आर्थिक सहकारी इकाई बनाती है और संयुक्तता को बनाए रखती है।
निष्कर्ष: इसीलिए भूमि/संपत्ति की संयुक्त मिल्कियत संयुक्त परिवार का सबसे महत्वपूर्ण और परिभाषात्मक लक्षण है।
Quick Tip: संयुक्त परिवार पहचानने का सूत्र: \(\textbf{एक घर + एक रसोई + एक कोष/संयुक्त संपत्ति}\)। बहु-पीढ़ी होना पर्याप्त नहीं।
निम्न में से कौन भारतीय संस्कृति की विशेषता है ?
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चरण 1: प्राचीनता।
भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन निरंतर संस्कृतियों में है—सिंधु-सरस्वती सभ्यता, वैदिक परंपरा, शास्त्रीय भाषाएँ व ज्ञान-संहिताएँ इसकी दीर्घकालिकता दिखाती हैं।
चरण 2: जाति व्यवस्था।
ऐतिहासिक भारत में जाति/वर्ण व्यवस्था एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संरचना रही है; इससे जीवन-मार्ग, व्यवसाय और सामाजिक संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
चरण 3: अनेकता में एकता।
भाषा, धर्म, आहार, पोशाक, कला और जलवायु की अत्यधिक विविधता के बावजूद भारतीय समाज में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक एकता—त्योहारों, मूल्यों (अहिंसा, सहिष्णुता), और संविधानिक आदर्शों के माध्यम से—एक विशिष्ट पहचान है।
अतः दिए गए तीनों गुण भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ हैं; इसलिए विकल्प (4) इनमें से सभी सही है।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{Ancient continuity + Caste structure + Unity-in-diversity}\) = भारतीय संस्कृति की पहचान।
जनसंख्या संक्रामण (Demographic Transition) सिद्धान्त के प्रस्तुतकर्ता कौन हैं ?
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चरण 1: सिद्धान्त का उद्गम।
जनसंख्या संक्रामण सिद्धान्त को वॉरेन थॉम्पसन ने 1929 में रूपरेखित किया और फ्रैंक डब्ल्यू. नॉटस्टीन ने 1940–50 के दशक में इसे व्यवस्थित कर लोकप्रिय बनाया।
चरण 2: मूल विचार।
आर्थिक–सामाजिक आधुनिकीकरण के साथ समाज जन्म–मृत्यु दर के पैटर्न में चरणबद्ध परिवर्तन से गुजरता है—
1) उच्च स्थिर चरण: जन्म व मृत्यु, दोनों ऊँची ⇒ वृद्धि धीमी।
2) आरम्भिक संक्रमण चरण: मृत्यु घटती, जन्म ऊँचा ⇒ तेज़ वृद्धि।
3) द्वितीय संक्रमण चरण: जन्म भी घटता ⇒ वृद्धि मंद।
4) निम्न स्थिर चरण: जन्म–मृत्यु दोनों निम्न ⇒ स्थिर/कम वृद्धि (कई लेखक पाँचवाँ—नकारात्मक वृद्धि—भी जोड़ते हैं)।
चरण 3: निष्कर्ष।
इसलिए सिद्धान्त के प्रमुख प्रतिपादक थॉम्पसन और नॉटस्टीन हैं; माल्थस–मार्क्स अलग दृष्टिकोण देते हैं (जनसंख्या विस्फोट/आर्थिक संघर्ष), न कि डेमोग्राफिक ट्रांज़िशन।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{Thompson → 1929}\) (बीज), \(\textbf{Notestein → 1945}\) (विकास);
कुंजी: \(\textbf{जन्म–मृत्यु दर में चरणबद्ध गिरावट}\) ⇒ विकास के साथ जनसंख्या का संक्रमण।
भारत में निम्नलिखित में से कौन उच्च जन्म दर का जिम्मेदार है ?
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चरण 1: सामाजिक–शैक्षिक कारण।
शिक्षा का अभाव (खासकर महिला शिक्षा) परिवार-नियोजन, गर्भनिरोधक प्रयोग और करिअर/स्वास्थ्य जागरूकता को घटाता है। इससे विवाह जल्दी और जन्म-अन्तराल छोटा होता है, फलतः जन्म दर ऊँची रहती है।
चरण 2: सांस्कृतिक–वैवाहिक कारण।
बाल विवाह/आयु से पहले विवाह प्रजनन-अवधि को बढ़ा देता है। साथ में पुत्र-प्राथमिकता, अधिक संतान को सुरक्षा मानना तथा परम्परागत परिवार-मानदण्ड भी अधिक जन्म को प्रोत्साहित करते हैं।
चरण 3: पर्यावरणीय–आर्थिक संदर्भ।
परम्परागत जनसांख्यिकी के अनुसार गर्म/उष्ण कटिबंधीय जलवायु में जीवित रहने हेतु अधिक जन्म और उच्च शिशु-मृत्यु के प्रति ‘‘बीमा-प्रतिक्रिया’’ देखी जाती है। कृषि-आधारित, कम औद्योगीकृत क्षेत्रों में बाल-श्रम/आर्थिक सहारे की उम्मीद भी बड़ी संतान-संख्या को बढ़ाती है।
निष्कर्ष: भारत में उच्च जन्म दर बहु-कारणी है—अशिक्षा, शीघ्र विवाह/दीर्घ प्रजनन-अवधि, और पर्यावरण–आर्थिक स्थितियाँ—इसलिए ‘इनमें से सभी’ सही विकल्प है।
Quick Tip: उच्च जन्म दर के प्रमुख सूत्र: \(\textbf{कम शिक्षा + जल्दी विवाह + सीमित परिवार-नियोजन + आर्थिक/परम्परागत दबाव}\) ⇒ अधिक संतान।
संयुक्त परिवार में मनाही है—
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चरण 1: संयुक्त परिवार का तर्क।
भारतीय संयुक्त परिवार का आधार साझा निवास, साझा रसोई और संयुक्त संपत्ति है। आर्थिक–सामाजिक एकता बनाए रखने के लिए परिवार व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं पर कुछ नियंत्रण रखता है।
चरण 2: विकल्पों का विश्लेषण।
(1) श्रमिक गतिशीलता (काम/पेशे के लिए अकेले बाहर जाना) संयुक्तता को ढीला करती है, इसलिए सामान्यतः हतोत्साहित रहती है।
(2) व्यक्तिवाद—अपनी इच्छाओं/निर्णयों को सामूहिक हित से ऊपर रखना—संयुक्त जीवन की सामंजस्य-आधारित संस्कृति से असंगत है, अतः इसे रोका जाता है।
(3) भूमि/संपत्ति का बाँटवारा संयुक्त मिल्कियत की मूल धारणा के विरुद्ध है; बँटवारे से संयुक्त परिवार विखंडित हो जाता है।
निष्कर्ष: इन तीनों बातों पर संयुक्त परिवार में सामान्यतः मनाही/नियंत्रण है; अतः सही विकल्प (4) इनमें से सभी।
Quick Tip: संयुक्त परिवार की कुंजी = \(\textbf{साझा संपत्ति + साझा उपभोग + सामूहिक निर्णय}\) ⇒ व्यक्तिवाद, श्रमिक पलायन और बँटवारा हतोत्साहित।
‘द इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पॉपुलेशन स्टडीज़’ कहाँ स्थित है ?
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चरण 1: संस्थान की पहचान।
International Institute for Population Sciences (IIPS) भारत का प्रमुख जनसंख्या अध्ययन/डेमोग्राफी संस्थान है। इसकी स्थापना 1956 में भारत सरकार तथा संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी एजेंसियों की सहायता से हुई।
चरण 2: स्थान व भूमिका।
संस्थान मुंबई (देवनार, गोवंडी) में स्थित है और एक Deemed University के रूप में एम.ए./एम.एससी., एम.फिल., पीएच.डी. तक पाठ्यक्रम चलाता है। IIPS राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) सहित कई राष्ट्रीय सर्वेक्षणों का नोडल केंद्र भी है।
निष्कर्ष: उक्त संस्थान का स्थान मुंबई है; अतः सही विकल्प (4)।
Quick Tip: IIPS = भारत का शीर्ष डेमोग्राफी संस्थान; स्थान \(\textbf{मुंबई}\), और NFHS का नोडल केंद्र।
‘प्रतिस्पर्धा’ निम्न में से किससे जुड़ा है ?
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चरण 1: संकल्पना स्पष्ट करें।
समाजशास्त्र में प्रतिस्पर्धा (Competition) वह प्रक्रिया है जिसमें दो या अधिक व्यक्ति/समूह एक ही सीमित लक्ष्य—जैसे पद, प्रतिष्ठा, संसाधन, बाजार—को पाने के लिए एक-दूसरे के विरोध में प्रयास करते हैं। यह आम तौर पर अव्यक्तिगत और नियम-निबंधित होती है।
चरण 2: सामाजिक प्रक्रियाओं से भेद।
सहयोग में लक्ष्य साझा और कार्य सामूहिक होता है; अनुकूलन (Accommodation) संघर्ष के बाद सहजीवी तालमेल बनाना है; समझौता विशिष्ट वार्ता-आधारित समाधान है। प्रतिस्पर्धा इनसे अलग विरोधी प्रवृत्ति है और संघर्ष (Conflict) की नरम/नियमित अभिव्यक्ति मानी जाती है।
निष्कर्ष: अतः प्रतिस्पर्धा का निकटतम सम्बन्ध संघर्ष प्रक्रिया से है, न कि सहयोग, अनुकूलन या समझौते से।
Quick Tip: सूत्र: \(\textbf{Competition = नियमित/अव्यक्तिगत संघर्ष}\) (opposition for scarce goals);
\(\textbf{Cooperation}\) = साथ मिलकर; \(\textbf{Accommodation/Compromise}\) = संघर्ष का समाधान।
विषाखा अधिनियम किस मुद्दे से संबंधित है ?
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चरण 1: पृष्ठभूमि समझें।
1997 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Vishaka & Others v. State of Rajasthan फैसले में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम हेतु दिशानिर्देश (विषाखा गाइडलाइन्स) जारी किए। इन दिशानिर्देशों ने प्रत्येक नियोक्ता पर रोकथाम, निषेध और निवारण की जिम्मेदारी डाली।
चरण 2: वैधानिक रूप।
इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर 2013 में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं निवारण) अधिनियम लागू हुआ, जिसमें आंतरिक शिकायत समिति (ICC)/ स्थानीय समिति की व्यवस्था और शिकायत निवारण की समय-सीमा तय की गई।
निष्कर्ष: विषय यौन उत्पीड़न से संबद्ध है, इसलिए सही विकल्प (1)।
Quick Tip: कुंजी: \(\textbf{विषाखा = 1997 SC दिशानिर्देश}\) → कार्यस्थल पर \(\textbf{Sexual Harassment}\) की रोकथाम; 2013 का कानून इन्हीं पर आधारित।
पॉक्सो अधिनियम, 2012 कब लागू हुआ?
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चरण 1: अधिनियम का परिचय।
POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) Act, 2012 बच्चों को यौन अपराधों—जैसे छेड़छाड़, शोषण, अश्लील प्रदर्शन, दुष्कर्म—से सुरक्षा देने के लिए एक विशेष, व्यापक और लिंग-तटस्थ आपराधिक क़ानून है।
चरण 2: प्रवर्तन तिथि।
भारत सरकार ने इसे अधिसूचित करने के बाद 14 नवम्बर 2012 (बाल दिवस) से देशभर में प्रभावी किया। इसी तिथि से विशेष अदालतों, बाल-मित्र जांच-पद्धति, अनिवार्य रिपोर्टिंग और गुप्तता संरक्षण जैसे प्रावधान लागू हुए।
चरण 3: क्यों याद रखें?
बाल अधिकारों के प्रतीक दिवस पर लागू होने से इसकी तिथि स्मरणीय है और परीक्षा-प्रश्नों में बार-बार पूछा जाता है। इसलिए सही उत्तर 14 नवम्बर है।
Quick Tip: POCSO = बच्चों की यौन-हिंसा से सुरक्षा; \(\textbf{लागू: 14 नवम्बर 2012}\) (बाल दिवस)। कुंजी शब्द: \(\textbf{अनिवार्य रिपोर्टिंग, विशेष अदालत, बाल-मित्र प्रक्रिया}\)।
पॉक्सो अधिनियम, 2012 की कौन-सी धारा प्रवेशण (Penetrative) यौन हमले के लिए सजा से संबंधित है ?
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चरण 1: धाराओं का अर्थ समझें।
POCSO में धारा 3 ‘‘प्रवेशन यौन हमला’’ की परिभाषा देती है—जननांग/किसी वस्तु/शरीर के अंग द्वारा यौन प्रवेशन आदि।
चरण 2: सजा की धारा।
धारा 4 उसी प्रवेशण यौन हमले के लिए दंड निर्धारित करती है (न्यूनतम कारावास और जुर्माना; संशोधनों के अनुसार न्यूनतम अवधि बढ़ाई गई है)।
चरण 3: नज़दीकी धाराएँ।
धारा 5 ‘‘गंभीर (Aggravated) प्रवेशन यौन हमला’’ के विशेष हालात बताती है (जैसे पुलिस/अभिभावक द्वारा, 12 वर्ष से कम—आदि) और इसकी सजा धारा 6 में है। धारा 2 सामान्य परिभाषाएँ देती है।
निष्कर्ष: अतः सजा से संबद्ध धारा 4 है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{3 = Definition}\), \(\textbf{4 = Punishment (Penetrative SA)}\), \(\textbf{5 = Aggravated}\), \(\textbf{6 = Punishment for Aggravated}\).
ग़ारो की पहाड़ियों में हुए हाजोंग आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
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चरण 1: पृष्ठभूमि।
पूर्वोत्तर भारत के ग़ारो हिल्स क्षेत्र में रहने वाली हाजोंग जनजाति ब्रिटिश काल और बाद के वर्षों में जमींदारों/ठेकेदारों द्वारा लिए जाने वाले ऊँचे लगान, बेगार और अवैध उपकरों से त्रस्त थी। खेती वर्षा-आधारित होने और नक़दी की कमी के कारण किसान कर्ज़ के चक्र में फँसते थे।
चरण 2: आंदोलन का स्वरूप।
किसानों ने सामूहिक रूप से लगान में कमी, बेगार की समाप्ति, मनमाने वसूली पर रोक तथा न्यायपूर्ण पट्टों की माँग उठाई। यह आंदोलन अहिंसक, संगठित और आर्थिक अधिकारों पर केंद्रित था—मंदिर-व्यवस्था, सामान्य हिंसा या नेताओं की गिरफ्तारी इसका लक्ष्य नहीं था।
निष्कर्ष।
हाजोंग किसानों का केंद्रीय उद्देश्य अत्यधिक लगान घटवाना और शोषक प्रथाओं को रोकना था; इसलिए सही विकल्प (1) है।
Quick Tip: पूर्वोत्तर के अधिकांश \(\textbf{जनजातीय किसान आंदोलनों}\) का फ़ोकस—\(\textbf{लगान/बेगार विरोध, पट्टा सुधार, वन-अधिकार}\)—धार्मिक या राजनीतिक गिरफ्तारी नहीं।
मध्याह्न भोजन योजना सबसे पहले किस राज्य में शुरू की गई थी ?
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चरण 1: ऐतिहासिक आरम्भ।
भारत में स्कूलों में मुफ़्त पका हुआ भोजन देने की पहल का अग्रदूत तमिलनाडु रहा। 1950–60 के दशकों में कुछ नगरपालिकाओं द्वारा शुरू प्रयासों को 1962 में मुख्यमंत्री के. कामराज ने प्राथमिक विद्यालयों में विस्तार दिया; 1982 में एम.जी. रामचन्द्रन सरकार ने इसे राज्यभर में सार्वभौमिक किया। लक्ष्य—नामांकन बढ़ाना, उपस्थिति सुधारना और बाल अपोषण घटाना।
चरण 2: राष्ट्रीय रूपांतरण।
तमिलनाडु के अनुभव ने केंद्र सरकार को प्रेरित किया; 1995 में राष्ट्रीय कार्यक्रम (Mid-Day Meal Scheme) प्रारंभ हुआ और 2001 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश से कई राज्यों में पका हुआ भोजन अनिवार्य किया गया।
निष्कर्ष: इस योजना का प्रारंभिक व व्यापक मॉडल तमिलनाडु में विकसित हुआ—अतः सही विकल्प (4)।
Quick Tip: याद रखने का तरीका: \(\textbf{कामराज → MGR → तमिलनाडु}\) ⇒ देशव्यापी \(\textbf{मिड-डे मील}\) की प्रेरणा।
किस आयु समूह के लोग अटल पेंशन योजना का लाभ उठा सकते हैं ?
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चरण 1: योजना का उद्देश्य।
अटल पेंशन योजना (APY) असंगठित क्षेत्र के कामगारों को 60 वर्ष की आयु के बाद निश्चित मासिक पेंशन (₹1000 से ₹5000 तक, चुने गए अंशदान के अनुसार) उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई है।
चरण 2: पात्रता और आयु सीमा।
योजना में नामांकन केवल 18 से 40 वर्ष की आयु के बीच संभव है। कारण यह है कि 60 वर्ष तक न्यूनतम 20 वर्षों का अंशदान बन पाए—तभी चुनी गई पेंशन राशि सुनिश्चित की जा सके। इसलिए 40+ आयु वालों को नए नामांकन की अनुमति नहीं है, और 18 से कम के पास बैंक/आधार-लिंक्ड KYC व नियमित आय की शर्तें प्रायः पूरी नहीं होतीं।
निष्कर्ष: सही आयु समूह 18--40 वर्ष है; अतः विकल्प (1)।
Quick Tip: APY याद रखने की कुंजी: \(\textbf{Join 18–40 → Contribute till 60 → Assured pension ₹1k–₹5k/month}\). न्यूनतम \(\textbf{20 वर्ष}\) का अंशदान अनिवार्य।
ग्राम सभा की बैठक बुलाने के लिए कौन जिम्मेदार है ?
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चरण 1: ग्राम सभा की व्यवस्था।
ग्राम सभा गाँव के सभी पंजीकृत मतदाताओं की सभा है। पंचायत राज व्यवस्था में इसके बैठकों का आयोजन तय समय पर (आम तौर पर वर्ष में 2–4 बार) अनिवार्य है।
चरण 2: बैठक किसके द्वारा बुलाई जाती है?
अधिकांश राज्य पंचायती राज कानूनों के अनुसार ग्राम प्रमुख/सरपंच (प्रधान) ग्राम सभा का अध्यक्ष होता है और वही बैठक बुलाने तथा उसकी अध्यक्षता करने के लिए उत्तरदायी है। सचिव/ग्राम विकास अधिकारी सूचना जारी करने, कार्यवृत्त लिखने और प्रशासनिक सहायता देते हैं, पर कानूनी जिम्मेदारी बैठक बुलाने की प्रमुख/सरपंच पर रहती है।
निष्कर्ष: ग्राम सभा की बैठक बुलाने का उत्तरदायित्व ग्राम प्रमुख (सरपंच) का होता है—अतः सही विकल्प (4)।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{प्रमुख/सरपंच}\) बुलाता और अध्यक्षता करता है; \(\textbf{सचिव}\) सिर्फ़ नोटिस/रिकॉर्ड की प्रशासनिक सहायता देता है।
खातों में वार्षिक विवरण और पंचायत की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट की समीक्षा करना ..... का मुख्य कार्य है।
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चरण 1: ग्राम सभा की परिभाषा।
ग्राम सभा किसी ग्राम/वार्ड के सभी पंजीकृत मतदाताओं की सामूहिक संस्था है और पंचायती राज में जन-निगरानी का मूल आधार मानी जाती है।
चरण 2: विधिक दायित्व (सोशल ऑडिट)।
अधिकांश राज्य पंचायती राज अधिनियमों के अनुसार ग्राम सभा का मुख्य कार्य है—वार्षिक खातों का विवरण, लेखा/ऑडिट रिपोर्ट, तथा ग्राम पंचायत की वार्षिक कार्य-प्रगति रिपोर्ट पर विचार करना, प्रश्न करना और अनुमोदन/टिप्पणी देना। इसे ही सामाजिक लेखा परीक्षा (Social Audit) कहा जाता है।
चरण 3: अन्य संस्थाओं की भूमिका।
ग्राम पंचायत योजनाएँ बनाती और क्रियान्वित करती है; जिला पंचायत समन्वय/अनुदान देखती है; कलेक्टर प्रशासनिक पर्यवेक्षण करता है, पर जन-समीक्षा का अधिकार ग्राम सभा के पास है।
निष्कर्ष: इसलिए वार्षिक खातों व प्रगति रिपोर्ट की समीक्षा करने का मुख्य कार्य ग्राम सभा का है—विकल्प (2)।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{ग्राम सभा = Social Audit}\) (खाते, ऑडिट, प्रगति रिपोर्ट की \(\textbf{समीक्षा}\)); \(\textbf{ग्राम पंचायत = कार्यान्वयन}\), \(\textbf{जिला पंचायत = समन्वय}\)।
पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य निम्नलिखित में से किसे सुनिश्चित करना है ?
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चरण 1: अवधारणा।
पंचायती राज भारतीय संविधान के 73वें संशोधन (भाग-IX) के तहत स्वशासन की त्रि-स्तरीय व्यवस्था है—ग्राम, मध्य (पंचायत समिति/ब्लॉक) और जिला स्तर। इसके मूल में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का सिद्धांत है, अर्थात निर्णय लेने की शक्ति और संसाधनों को जनता के सबसे निकट के स्तर तक पहुँचाना।
चरण 2: प्रभाव/लक्ष्य।
विकेन्द्रीकरण के माध्यम से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएँ बनती हैं, भागीदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है, आरक्षण से दलितों, आदिवासियों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है तथा ग्राम सभा द्वारा सामाजिक लेखा परीक्षा होती है। ये सभी परिणाम हैं, पर मूल उद्देश्य—लोकतांत्रिक सत्ता और संसाधनों का विकेन्द्रीकरण—ही केंद्र में है।
निष्कर्ष: अतः सही उत्तर लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण (विकल्प (3)) है; अन्य विकल्प इस उद्देश्य के परिणाम या तत्व हैं, मूल नहीं।
Quick Tip: पंचायती राज = \(\textbf{Power to the People}\): 73वां संशोधन \(\Rightarrow\) \(\textbf{विकेन्द्रीकरण}\) + ग्राम सभा + आरक्षण + सामाजिक लेखा परीक्षा।
पंचायती राज दिवस कब मनाया जाता है ?
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चरण 1: पृष्ठभूमि समझें।
भारत में पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा 73वें संशोधन द्वारा मिला, जो 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ। इसी दिन से ग्रामीण स्थानीय स्वशासन को औपचारिक संवैधानिक आधार प्राप्त हुआ।
चरण 2: दिवस की घोषणा।
केंद्र सरकार ने इस ऐतिहासिक तिथि के महत्व को रेखांकित करने हेतु 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस घोषित किया, जब देशभर में ग्राम से जिला स्तर की पंचायतों के योगदान का सम्मान किया जाता है और उत्तम पंचायतों को पुरस्कृत किया जाता है।
निष्कर्ष: इसलिए पंचायती राज दिवस प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को मनाया जाता है—सही विकल्प (3)।
Quick Tip: \(\textbf{24 अप्रैल = 73वां संशोधन प्रभावी}\) \(\Rightarrow\) इसी दिन \(\textbf{राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस}\)। याद रखने का ट्रिक: \(\textbf{24/4}\) → पंचायत के \(\textbf{3}\) (ग्राम–ब्लॉक–जिला) स्तर + \(\textbf{4}\) अक्षर "पंच" का संकेत।
यदि कोई पंचायत भंग हो जाती है, तो चुनाव ........ के भीतर होने चाहिए।
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चरण 1: संवैधानिक प्रावधान।
भारतीय संविधान के भाग–IX में अनुच्छेद 243E पंचायतों का कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित करता है। यदि कार्यकाल पूरा होने से पहले पंचायत भंग हो जाए, तो नए सदस्यों का चुनाव छह महीने के भीतर कराया जाना अनिवार्य है।
चरण 2: उद्देश्य समझें।
यह प्रावधान स्थानीय स्वशासन की निरंतरता सुनिश्चित करता है ताकि प्रशासनिक रिक्तता न बने और विकास कार्य रुकें नहीं। साथ ही, जनता के प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की श्रृंखला बनी रहती है।
निष्कर्ष: अतः यदि कोई पंचायत भंग होती है, तो चुनाव विघटन की तारीख से छह महीने के भीतर होना चाहिए — विकल्प (1)।
Quick Tip: याद रखने का सूत्र: \(\textbf{243E}\) = \(\textbf{E for Election}\) और \(\textbf{6 Months Rule}\) (भंग होने पर अधिकतम 6 माह में चुनाव)।
निम्नलिखित में से कौन ग्राम पंचायत का कार्य नहीं है ?
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चरण 1: पंचायत के दायित्व।
73वें संशोधन के बाद ग्यारहवीं अनुसूची में ग्राम पंचायतों के लिए अनेक विषय दिए गए हैं—जैसे बाज़ार एवं मेले, स्वास्थ्य और स्वच्छता (संक्रामक रोग नियंत्रण), ग्रामीण सड़कें, नाली, स्ट्रीट-लाइट, पेयजल, ठोस कचरा प्रबंधन आदि। ये सीधे स्थानीय स्तर पर प्रबंधन/रख-रखाव वाले कार्य हैं।
चरण 2: जो कार्य पंचायत का नहीं।
परिवहन सुविधाएँ (उदाहरण: बस/माल परिवहन का संचालन, राज्य/राष्ट्रीय परिवहन नीति) प्रायः राज्य परिवहन विभाग अथवा नगरीय/क्षेत्रीय प्राधिकरण के अधिकारक्षेत्र में आती हैं; ग्राम पंचायत इन्हें चलाती नहीं, अधिक से अधिक स्थानीय सड़कों/स्टॉपेज की देखरेख कर सकती है।
निष्कर्ष: इसलिए दिए गए विकल्पों में पंचायत का कार्य नहीं है—परिवहन सुविधाएँ (विकल्प (2))।
Quick Tip: ग्राम पंचायत = \(\textbf{स्थानीय सेवा}\) (बाज़ार, सफ़ाई, स्ट्रीट-लाइट, छोटी सड़कें); \(\textbf{परिवहन संचालन}\) = प्रायः \(\textbf{राज्य}\) का काम।
जिला परिषद को कौन भंग कर सकता है ?
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चरण 1: संवैधानिक ढाँचा समझें।
पंचायती राज राज्य सूची का विषय है। संविधान का भाग IX (अनुच्छेद 243) राज्यों को अधिकार देता है कि वे अपने पंचायती राज कानूनों के तहत जिला परिषद (ज़िला पंचायत) जैसी संस्थाओं का गठन, अधिकार और भंग/निलंबन का प्रावधान करें।
चरण 2: व्यावहारिक प्रावधान।
लगभग सभी राज्य पंचायती राज अधिनियमों में यह व्यवस्था है कि यदि जिला परिषद कर्तव्यों में विफल हो, कानूनी उल्लंघन करे या जनहित में आवश्यक हो, तो राज्य सरकार (अथवा राज्यपाल की ओर से) उसे निरस्त/विलुप्त/भंग कर सकती है; साथ ही 243E के अनुसार चुनाव छह माह के भीतर कराने होते हैं।
निष्कर्ष: जिला परिषद को भंग करने की शक्ति राज्य सरकार के पास होती है — विकल्प (2)।
Quick Tip: पंचायती राज = \(\textbf{State Subject}\). गठन, सत्ता-वितरण और \(\textbf{भंग}\) — सब \(\textbf{राज्य सरकार}\) के कानून से संचालित होते हैं।
‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की शुरुआत कब हुई ?
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चरण 1: पहल का उद्देश्य समझें।
‘मेक इन इंडिया’ भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए शुरू की गई औद्योगिक नीति पहल है, जिसमें निवेश प्रोत्साहन, ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस सुधार, और रोजगार-सृजन प्रमुख लक्ष्य हैं।
चरण 2: तिथि की पहचान।
इस कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ 25 सितम्बर 2014 को नई दिल्ली में किया गया था। इसी दिन शेर-लोगो जारी हुआ और 25 प्रमुख क्षेत्रों (ऑटो, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा निर्माण आदि) के लिए रोडमैप प्रस्तुत किया गया।
निष्कर्ष: सही विकल्प सितम्बर, 2014 है।
Quick Tip: मंत्र: \(\textbf{Make in India = 25 सितम्बर 2014, शेर-लोगो, विनिर्माण और निवेश}\)—तिथि और तीन कीवर्ड याद रखें।
निम्नलिखित में से कौन भारत में पंचायती राज व्यवस्था वाला पहला राज्य है ?
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चरण 1: ऐतिहासिक तथ्य याद करें।
स्वतंत्रता के बाद पंचायती राज के प्रयोग की शुरुआत राजस्थान में हुई। बलवंत राय मेहता समिति (1957) की सिफारिशों के आधार पर राज्य सरकारों ने त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू करने की पहल की।
चरण 2: सटीक घटना व तिथि।
भारत में पंचायती राज का प्रथम औपचारिक शुभारंभ 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले से हुआ। इसके तुरंत बाद आंध्र प्रदेश में भी इसे अपनाया गया, पर देश में पहला राज्य राजस्थान ही माना जाता है।
निष्कर्ष: अतः सही विकल्प राजस्थान है।
Quick Tip: कुंजी-सूत्र: \(\textbf{राजस्थान—नागौर—2 अक्टूबर 1959}\) (गांधी जयंती). यह त्रयी याद रखें।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना .......... से सम्बन्धित है।
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चरण 1: योजना का उद्देश्य समझें।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का मुख्य लक्ष्य गरीब परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना है ताकि ठोस ईंधन (लकड़ी, गोबर, कोयला) से होने वाले धुएँ और स्वास्थ्य-हानि को घटाया जा सके।
चरण 2: योजना की प्रमुख बातें।
यह योजना पात्र निम्न-आय (SECC/बीपीएल) परिवारों की महिलाओं के नाम पर जमानत-मुक्त एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराती है। इसके साथ प्रारम्भिक रिफिल व चूल्हे के लिए सहायता भी दी जाती है; बाद में उज्ज्वला 2.0 के तहत दस्तावेजी प्रक्रिया सरल की गई और प्रवासी/गरीब परिवारों तक विस्तार हुआ।
निष्कर्ष:
चूँकि योजना का केंद्र बिंदु एलपीजी कनेक्शन प्रदान करना है, इसलिए सही विकल्प (3) है।
Quick Tip: याद रखें: \(\textbf{उज्ज्वला = महिलाओं के नाम पर निःशुल्क/जमानत-मुक्त एलपीजी कनेक्शन}\) ⇒ धुआँ कम, स्वास्थ्य व पर्यावरण लाभ।
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय .......... में शुरू किया गया था।
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चरण 1: योजना की पहचान।
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) भारत सरकार की एक आवासीय विद्यालय योजना है, जिसका लक्ष्य शिक्षा से वंचित/ड्रॉपआउट बालिकाओं (विशेषकर अनुसूचित जाति/जनजाति, ओबीसी, अल्पसंख्यक और गरीबी रेखा से नीचे के परिवार) को कक्षा 6–8 में स्कूल से जोड़ना था।
चरण 2: शुरुआत का वर्ष।
यह योजना 2004 में शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े प्रखण्डों में आरम्भ हुई। बाद में इसे RMSA और फिर समग्र शिक्षा के तहत समेकित कर कक्षा 6–12 तक विस्तार दिया गया, ताकि बालिकाओं की निरंतरता और माध्यमिक शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित हो।
निष्कर्ष:
उक्त जानकारी से स्पष्ट है कि KGBV की शुरुआत 2004 में हुई थी, इसलिए विकल्प (2) सही है।
Quick Tip: KGBV \(\Rightarrow\) \(\textbf{आवासीय विद्यालय}\) + \(\textbf{बालिका-केन्द्रित}\) + \(\textbf{शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों}\) में \(\textbf{2004}\) से; अब \(\textbf{समग्र शिक्षा}\) के अंतर्गत।
सुकन्या समृद्धि योजना में खाता खोलने के लिए पात्र लड़की की अधिकतम आयु क्या है ?
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चरण 1: योजना का उद्देश्य समझें।
सुकन्या समृद्धि योजना बालिकाओं की उच्च शिक्षा और विवाह हेतु बचत को प्रोत्साहित करने वाली छोटी बचत योजना है, जिसे भारत सरकार ने बेटियों के नाम से शुरू किया। खाता माता-पिता/अभिभावक लड़की के नाम पर खोलते हैं।
चरण 2: आयु-सीमा का नियम।
खाता जन्म से लेकर 10 वर्ष की आयु पूर्ण होने तक खोला जा सकता है। 10 वर्ष से अधिक आयु होने पर नया खाता नहीं खुलता (कुछ विशेष परिस्थितियों में केवल अनुग्रह अवधि—आमतौर पर 1 वर्ष—दी जाती है, पर सामान्य नियम 10 वर्ष ही है)।
चरण 3: संबंधित प्रमुख बातें।
एक परिवार में अधिकतम दो बालिकाओं के लिए खाते खोले जा सकते हैं; जमा अवधि 15 वर्ष होती है और खाता परिपक्वता पर सामान्यतः 21 वर्ष में बंद होता है या बालिका के 18 वर्ष के बाद विवाह पर खाते से निकासी नियमों के अनुसार संभव है।
निष्कर्ष:
अतः पात्र बालिका की अधिकतम आयु 10 वर्ष है। इसलिए विकल्प (4) सही है।
Quick Tip: SSY: \(\textbf{जन्म–10 वर्ष}\) में खाता खोलें, \(\textbf{15 वर्ष}\) तक जमा करें, \(\textbf{21 वर्ष}\) पर परिपक्वता—यह तीन संख्या याद रखें: 10–15–21।
निम्नलिखित में से कौन-सी योजना देश में बालिकाओं के विकास के उद्देश्य से है ?
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चरण 1: विकल्पों की प्रकृति पहचाने।
विद्या लक्ष्मी योजना उच्च शिक्षा ऋण का राष्ट्रीय पोर्टल है; यह सभी छात्रों के लिए है, केवल बालिकाओं के लिए नहीं।
“प्रधानमंत्री शिशु विकास योजना” नामक कोई स्वीकृत राष्ट्रीय योजना मुख्यतः प्रचलित नहीं है।
“प्रधानमंत्री बालिका सुरक्षा योजना” कुछ राज्यों/स्थानीय पहलों से जुड़ा पद है, पर केंद्र-स्तरीय व्यापक वित्तीय ढांचा नहीं।
चरण 2: बालिकाओं के विकास से सीधे संबद्ध योजना।
प्रधानमंत्री सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) विशेष रूप से बालिकाओं के लिए छोटी बचत योजना है—जन्म से 10 वर्ष तक खाता, आकर्षक ब्याज, कर-छूट, 18 वर्ष के बाद आंशिक निकासी और 21 वर्ष पर परिपक्वता। इसका उद्देश्य बालिकाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और विवाह संबंधी भविष्यगत आवश्यकताओं के लिए सुनियोजित आर्थिक सुरक्षा बनाना है। इसलिए यह बालिका विकास की दिशा में प्रत्यक्ष निवेश है।
चरण 3: निष्कर्ष।
उपरोक्त तुलना से स्पष्ट है कि बालिका-विशेष विकास हेतु सबसे सुसंगत राष्ट्रीय योजना SSY ही है, अतः विकल्प (3) सही है।
Quick Tip: बालिका-विशेष राष्ट्रीय योजनाएँ याद रखें: \(\textbf{बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ}\) (जागरूकता/कार्यान्वयन), \(\textbf{सुकन्या समृद्धि}\) (बचत/वित्तीय सुरक्षा)। बचत वाली—\(\textbf{SSY}\)।
अग्निपथ भर्ती योजना का संबंध किस नौकरी से है ?
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चरण 1: योजना की पहचान।
अग्निपथ केंद्र सरकार की सशस्त्र बलों (आर्मी, नेवी, एयर फ़ोर्स) के लिए भर्ती योजना है, जिसके तहत चुने गए युवाओं को अग्निवीर कहा जाता है।
चरण 2: मुख्य विशेषताएँ समझें।
आयु सामान्यतः लगभग 17{.}5–21 वर्ष, सेवा अवधि 4 वर्ष होती है। सेवा के दौरान वेतन, भत्ते और सेवा निधि (Seva Nidhi) का प्रावधान है; लगभग 25% योग्य अग्निवीर आगे नियमित कैडर में चयनित हो सकते हैं।
चरण 3: विकल्पों का मिलान।
यह योजना पुलिस, होमगार्ड या अबकारी विभाग से नहीं, बल्कि सैनिक सेवा से संबद्ध है। इसलिए सही उत्तर सैनिक है।
Quick Tip: \(\textbf{अग्निपथ = सशस्त्र बल भर्ती}\) (अग्निवीर, 4 वर्ष सेवा, Seva Nidhi)। पुलिस/होमगार्ड/अबकारी से इसका संबंध नहीं।
जेरोन्टोलॉजी किसका विज्ञान है ?
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चरण 1: शब्द का अर्थ समझें।
Gerontology (जेरोन्टोलॉजी) शब्द ग्रीक geron (वृद्ध) और logos (अध्ययन/विज्ञान) से बना है। इसका तात्पर्य वृद्धावस्था, वृद्धावस्था की प्रक्रियाओं तथा वृद्ध व्यक्तियों के जीवन का बहुविषयी अध्ययन है।
चरण 2: जेरोन्टोलॉजी बनाम जेरियाट्रिक्स।
जेरोन्टोलॉजी सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, जैविक, आर्थिक और नीतिगत पहलुओं को सम्मिलित करती है; जबकि Geriatrics (जेरियाट्रिक्स) चिकित्सा-विज्ञान की वह शाखा है जो वृद्धों की बीमारियों के उपचार पर केंद्रित रहती है।
चरण 3: विकल्प जाँचें।
बच्चों (बाल्यावस्था), युवाओं या महिलाओं से यह शब्द विशेष रूप से सम्बद्ध नहीं है। यह सीधे-सीधे वृद्धों के विज्ञान/अध्ययन को निरूपित करता है। अतः सही उत्तर विकल्प (2) वृद्धों है।
Quick Tip: \(\textbf{Gerontology = वृद्धावस्था का समग्र अध्ययन (social+psychological+biological)।}\)
\(\textbf{Geriatrics = वृद्धों का चिकित्सा-उपचार}\).
भारत के राष्ट्रपति कौन है ?
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चरण 1: पद व चयन की मूल जानकारी। भारत का राष्ट्रपति राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। इसका चुनाव इलेक्टोरल कॉलेज द्वारा होता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों (विधानसभा वाले) के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
चरण 2: वर्तमान पदाधिकारी की पहचान। वर्ष 2022 के चुनाव में द्रोपदी मुर्मू विजयी रहीं और 25 जुलाई 2022 को पद की शपथ ली। वे भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं।
चरण 3: विकल्पों का मिलान। प्रतिभा पाटिल (2007–2012), प्रणव मुखर्जी (2012–2017) और रामनाथ कोविन्द (2017–2022) पूर्व राष्ट्रपति रहे हैं; वर्तमान में पद पर द्रोपदी मुर्मू हैं। अतः सही विकल्प (3) है।
Quick Tip: राष्ट्रपति का चुनाव \(\textbf{इलेक्टोरल कॉलेज}\) करता है, कार्यकाल \(\textbf{5 वर्ष}\)। 2022 से वर्तमान राष्ट्रपति: \(\textbf{द्रोपदी मुर्मू}\) (पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति)।
एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट, 2022 के कप्तान कौन है ?
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पृष्ठभूमि: एशिया कप 2022 का प्रारूप T20I था और प्रतियोगिता अगस्त–सितंबर 2022 में यूएई में हुई।
टीम इंडिया की नेतृत्व स्थिति: 2021 के बाद से सीमित ओवरों में भारत की कप्तानी रोहित शर्मा के पास है। एशिया कप 2022 में भी भारतीय टीम का नेतृत्व रोहित ने ही किया।
विकल्पों का सत्यापन: विराट कोहली पूर्व कप्तान रहे पर 2022 में कप्तान नहीं थे; के. एल. राहुल उपकप्तान थे; ऋषभ पंत विकेटकीपर-बल्लेबाज थे। अतः सही उत्तर रोहित शर्मा है।
Quick Tip: एशिया कप 2022 (T20 प्रारूप, यूएई): भारत के \(\textbf{कप्तान—रोहित शर्मा}\), उपकप्तान—\(\textbf{के. एल. राहुल}\)।
निम्न में किसने संथाली ओलचिकी लिपि का आविष्कार किया ?
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कदम 1: तथ्य याद करें। संथाली भाषा के लिए स्वतंत्र रूप से विकसित लिपि ओलचिकी (Ol Chiki/Ol Cemet’) है।
कदम 2: आविष्कारक की पहचान। इसका निर्माण पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1920 के दशक के अंत से 1940 के बीच किया, ताकि संथाली को देवनागरी/रोमन पर निर्भर न रहना पड़े और अपनी ध्वन्यात्मक विशेषताएँ ठीक से लिखी जा सकें।
कदम 3: विकल्प जाँच। जयपाल सिंह एक प्रमुख आदिवासी नेता और खिलाड़ी थे; विश्वनाथ मुर्मू व लाखो बोदरा ओलचिकी के आविष्कारक नहीं माने जाते। इसलिए सही उत्तर रघुनाथ मुर्मू है।
Quick Tip: याद रखने का तरीका: \(\textbf{ओलचिकी = रघुनाथ मुर्मू}\); संथाली भाषा की अपनी अलग लिपि, ध्वनि-आधारित वर्णमाला।
निम्न संथाल नेताओं में से कौन आपस में भाई थे ?
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कदम 1: ऐतिहासिक संदर्भ। 1855–56 के संथाल विद्रोह का नेतृत्व संथाली समुदाय के चार प्रमुख नेताओं—सिद्धू मुर्मू, कानू मुर्मू, चाँद मुर्मू और भैरव (भैराब) मुर्मू—ने किया।
कदम 2: रिश्ते की पहचान। ये चारों सगे भाई थे और भागनाडीह (झारखंड) क्षेत्र से उठे आंदोलन के मुखिया बने।
कदम 3: विकल्प जाँच। विकल्प (1) सिद्धू–कानू, (2) कानू–चाँद, और (3) चाँद–भैरव—तीनों ही जोड़े वास्तविक भाई-भाई हैं; इसलिए सही उत्तर “इनमें से सभी” है।
Quick Tip: संथाल विद्रोह याद रखने का नियम: \(\textbf{मुर्मू भाइयों की चौकड़ी}\)—सिद्धू, कानू, चाँद, भैरव—सभी भाई और सभी नेता।
जलने पर किस लोक औषधि का प्रयोग आदिवासी द्वारा किया जाता है ?
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कदम 1: लोक-उपचार का सिद्धांत। जलन पर ऐसी सामग्री उपयोगी होती है जो त्वचा पर ठंडी, चिपचिपी परत बनाकर दर्द को घटाए, संक्रमण से बचाए और नमी बनाए रखे।
कदम 2: इमली बीज की लई का गुण। भिगोए बीज पीसने पर म्यूसिलेज जैसा गाढ़ा जेल बनता है, जो संरक्षक परत बनाकर फफोलों और जलन की तीव्रता कम करता है।
कदम 3: विकल्प जाँच। महुआ तेल/अमलतास/पलाश अन्य रोगों में उपयोगी हैं, पर आदिवासी परंपरा में जलन के प्राथमिक घरेलू उपचार के लिए इमली बीज की लई को प्रमुख माना गया है। इसलिए विकल्प (2) सही है।
Quick Tip: जलन पर पहले \(\textbf{ठंडे पानी}\) से 10–15 मिनट धोएँ, फिर \(\textbf{इमली बीज की लई}\) जैसी \(\textbf{सौम्य}\) परत लगाएँ; गहरी जलन/चेहरे पर जलन हो तो तुरंत चिकित्सक से मिलें।
निम्न में से दहिया किससे जुड़ा हुआ है ?
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कदम 1: लोक-शब्द की पहचान। ग्रामीण/आदिवासी क्षेत्रों में “दहिया” शब्द का प्रयोग प्रायः अनाज भंडारण के लिए बने बाँस, फूस या मिट्टी से बने बड़े स्टोरेज-बिन/कोठार के अर्थ में होता है।
कदम 2: प्रयोजन समझें। इसका उपयोग धान–मकई–गेहूँ जैसे अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने, नमी और कीट से बचाने के लिए किया जाता है।
कदम 3: विकल्प जाँच। यह न तो स्थानांतरण खेती, न पशुपालन और न हस्तकला का विशिष्ट उपकरण है; इसलिए सही मेल खाद्य/अनाज संग्रह है।
Quick Tip: ग्रामीण भंडारण शब्द: \(\textbf{दहिया/कोठार/कुंडा}\) = अनाज रखने के पारंपरिक भंडार; उद्देश्य—नमी, कीट और चूहे से सुरक्षा।
सरपंच के दो कार्यों की विवेचना करें।
सरपंच ग्राम पंचायत/ग्राम सभा की बैठकों की अध्यक्षता कर विकास योजनाओं का अनुमोदन व क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है। वह राजस्व/कर वसूल, अभिलेख रख-रखाव, शिकायत निवारण, छोटे विवादों का निस्तारण तथा ब्लॉक/जिला अधिकारियों से समन्वय कर निधि और अनुपालन सुनिश्चित करता है।
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शासन व पारदर्शिता:
सरपंच एजेंडा प्रस्तुत कर ग्राम सभा में योजनाएँ, बजट और सामाजिक लेखा-जोखा अनुमोदित कराता है, कार्यवृत्त/सूचनाएँ सार्वजनिक कर जवाबदेही बनाता है।
विकास क्रियान्वयन:
ग्राम आवश्यकता सर्वे, वार्षिक ग्राम विकास योजना, जल/स्वच्छता/सड़क जैसी परियोजनाएँ, गुणवत्ता निगरानी तथा पूर्णता-प्रमाणन उसकी जिम्मेदारी है।
समन्वय:
ब्लॉक अभियंता, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि इत्यादि विभागों से तालमेल; आपदा/टीकाकरण जैसे अभियानों में नेतृत्व देता है।
कानूनी/प्रशासनिक दायित्व:
टैक्स/फीस संग्रह, रिकॉर्ड/एमआईएस, प्रमाण-पत्र जारी करना और शिकायतों/छोटे विवादों का प्राथमिक निस्तारण भी महत्त्वपूर्ण हैं। ये कार्य विकेंद्रीकरण को प्रभावी बनाते हैं। Quick Tip: तीन की-वर्ड लिखें: \(\textbf{बैठक/ग्रामसभा}\), \(\textbf{विकास क्रियान्वयन}\), \(\textbf{समन्वय/अभिलेख}\)—हर एक के साथ एक उदाहरण जोड़ दें।
औद्योगिकीकरण के दो परिणामों की चर्चा करें।
औद्योगिकीकरण उत्पादनक्षमता, आय और शहरीकरण बढ़ाकर आर्थिक विकास को तेज़ करता है; साथ ही पर्यावरण प्रदूषण, संसाधन-क्षरण, असमानता व असंगठित/अस्थिर रोज़गार जैसी सामाजिक-पर्यावरणीय चुनौतियाँ पैदा करता है, जिन्हें नियमन, हरित तकनीक और श्रम-सुरक्षा से संतुलित करना होता है।
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आर्थिक पक्ष:
कारखानों में मशीनों/विभाजन-श्रम से उत्पादकता बढ़ती, लागत घटती और निर्यात/निवेश बढ़ता है; सहायक उद्योग, सेवा क्षेत्र व आधारभूत ढाँचा (परिवहन/ऊर्जा) विकसित होते हैं।
सामाजिक पक्ष:
ग्रामीण-शहरी पलायन से परिवार/समाज की संरचना बदलती; नए अवसर और साथ ही कौशल-अंतर, अस्थिर रोजगार व झुग्गियाँ उभर सकती हैं।
पर्यावरणीय पक्ष:
उत्सर्जन, अपशिष्ट, जल/वायु प्रदूषण और संसाधन-उपभोग बढ़ता है।
संतुलन:
स्वच्छ ऊर्जा, प्रदूषण मानक, श्रम-कानून, कौशल प्रशिक्षण, नगरीय नियोजन व सामाजिक सुरक्षा से लाभ अधिकतम और लागत न्यूनतम की जा सकती है। Quick Tip: उत्तर को \(\textbf{आर्थिक–सामाजिक–पर्यावरण}\) शीर्षकों में बाँटें; हर शीर्षक में \(\textbf{1 लाभ + 1 जोखिम}\) लिखें।
ग्राम सेवक के दो कार्यों का वर्णन करें।
ग्राम सेवक ग्राम विकास योजनाओं का निर्माण/कार्यान्वयन, लाभार्थी सर्वे, अभिलेख/एमआईएस रख-रखाव, सामाजिक समूहों/एसएचजी का गठन-प्रशिक्षण तथा विभागों से समन्वय करता है। वह ग्राम सभा को नियम, बजट और प्रगति की जानकारी देकर सहभागिता बढ़ाता है।
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योजना व क्रियान्वयन:
गाँव की आवश्यकताओं का आकलन कर सूक्ष्म-योजना बनाना, जल/स्वच्छता/आवास/रोज़गार योजनाओं की साइट पर निगरानी, मस्टर-रोल/मापन/उन्नयन दर्ज करना।
समुदाय-संगठन:
स्वयं-सहायता समूह, उपयोगकर्ता समितियाँ, युवा/महिला मंडल बनाकर स्थानीय भागीदारी व स्वामित्व बढ़ाना।
सूचना/अभिलेख:
पोर्टल पर एंट्री, भुगतान की ट्रैकिंग, पारदर्शिता-पट्ट, शिकायत-निवारण।
समन्वय:
स्वास्थ्य/शिक्षा/कृषि/पंचायत विभाग से तालमेल और ग्राम सभा में योजनाओं/मानकों की सरल व्याख्या। इससे योजनाएँ समय पर और गुणवत्तापूर्वक पूरी होती हैं। Quick Tip: चार शब्द याद रखें: \(\textbf{योजना–क्रियान्वयन–रिकॉर्ड–समुदाय}\); इन्हीं पर उदाहरण दें।
बालिका तस्करी से आप क्या समझते हैं?
बालिका तस्करी नाबालिग लड़कियों की भर्ती, परिवहन या आश्रय को छल/दबाव/दुरुपयोग से कर \(\textbf{शोषण}\) (यौन शोषण, बंधुआ/घरेलू श्रम, जबरन विवाह, अंग-व्यापार) हेतु करना है। नाबालिगों में सहमति अप्रासंगिक मानी जाती है; रोकथाम–सुरक्षा–दंड तीनों अनिवार्य हैं।
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घटक:
तस्करी के तीन तत्व—क्रिया (ले जाना/रखना), साधन (धोखा/बल/दुरुपयोग) और उद्देश्य (शोषण)। नाबालिग में साधन/सहमति प्रश्न नहीं।
कारक:
गरीबी, लैंगिक भेद, शिक्षा की कमी, आपदा/संघर्ष, झूठे नौकरी/विवाह प्रस्ताव।
प्रभाव:
शारीरिक/मानसिक हिंसा, रोग, शिक्षा का नुकसान, सामाजिक कलंक।
प्रतिक्रिया:
जागरूकता, सामाजिक सुरक्षा, स्कूल बनाए रखना, पुलिस–सीडब्ल्यूसी–एनजीओ समन्वय, सुरक्षित पुनर्वास, कठोर दंड और सीमा/परिवहन निगरानी आवश्यक हैं। Quick Tip: परिभाषा में लिखें: \(\textbf{क्रिया + साधन + उद्देश्य = शोषण}\); नाबालिग में \(\textbf{सहमति मान्य नहीं}\)।
लिंग असमानता क्या है?
लिंग असमानता वह स्थिति है जिसमें लिंग के आधार पर अधिकार, अवसर, संसाधन और निर्णय-शक्ति असमान हों। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार/वेतन, संपत्ति-अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व व सुरक्षा में अंतर इसके रूप हैं; समाधान हेतु कानून, बजटिंग व सामाजिक-मानस परिवर्तन आवश्यक हैं।
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धारणा:
लिंग सामाजिक निर्माण है—भूमिकाएँ/अपेक्षाएँ शक्ति-संतुलन तय करती हैं। असमानता संस्थागत/सांस्कृतिक नियमों से पैदा होती है।
प्रमुख रूप:
स्कूल-त्याग/एसटीईएम में कमी, वेतन-अंतर, असुरक्षित/अनौपचारिक काम, संपत्ति/उत्तराधिकार में बाधा, राजनीतिक भागीदारी सीमित, हिंसा/उत्पीड़न।
अंतर-अंतराल:
जाति, वर्ग, विकलांगता आदि से भेद कई गुना हो सकता है।
उपाय:
समान वेतन/विरासत कानून, लैंगिक बजट, देखभाल-अवसंरचना, सुरक्षित कार्यस्थल, शिक्षा/स्किलिंग, मीडिया/पाठ्यचर्या से मान्यताओं में बदलाव। Quick Tip: डोमेन चुनें: \(\textbf{शिक्षा, अर्थ, अधिकार, सुरक्षा}\)—हर एक में \(\textbf{एक उदाहरण + एक समाधान}\) लिखें।
जनसंचार के दो महत्त्व का वर्णन करें।
जनसंचार बड़ी आबादी तक त्वरित सूचना/शिक्षा पहुँचाकर जागरूकता, चुनावी भागीदारी व आपदा-सावधानियों को बढ़ाता है। यह सामाजिक व्यवहार-परिवर्तन (टीकाकरण, स्वच्छता), बाज़ार-सूचना/उपभोक्ता-अधिकार और सांस्कृतिक संवाद भी संभव करता है; परन्तु गलत सूचना से बचाव हेतु मीडिया साक्षरता जरूरी है।
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सूचना/शिक्षा:
टीवी/रेडियो/डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म जनहित संदेश, स्वास्थ्य अभियान और आपात अलर्ट व्यापक रूप से पहुँचाते हैं।
व्यवहार-परिवर्तन:
एडुटेनमेंट/आईईसी से स्वच्छता, सड़क-सुरक्षा, परिवार-नियोजन जैसे व्यवहार सुधरते हैं; दो-चरण प्रवाह में राय-नेता संदेश फैलाते हैं।
आर्थिक/नागरिक पक्ष:
विज्ञापन/बाज़ार सूचना उत्पादक–उपभोक्ता जोड़ती है; उपभोक्ता अधिकार/शिकायत मार्ग जगजाहिर होते हैं; चुनावी शिक्षा व नीति-विमर्श प्रबल होता है।
जोखिम व समाधान:
फेक-न्यूज़/इको-चैम्बर से निपटने को तथ्य-जाँच, विनियमन और मीडिया साक्षरता आवश्यक है। Quick Tip: दो बिंदु चुनें: \(\textbf{जनहित सूचना}\) और \(\textbf{व्यवहार-परिवर्तन}\); प्रत्येक के साथ एक \(\textbf{ठोस उदाहरण}\) दें।
बाल कल्याण से आप क्या समझते हैं?
बाल कल्याण 0–18 वर्ष के बच्चों के \(\textbf{जीवन, विकास, सुरक्षा और सहभागिता}\) हेतु नीतियों/सेवाओं का समुच्चय है—स्वास्थ्य/पोषण, शिक्षा, सुरक्षा-सेवाएँ, परिवार-समर्थन, वैकल्पिक देखभाल, परामर्श व पुनर्वास—जो ‘‘बाल-हित सर्वोपरि’’ सिद्धांत पर आधारित है।
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आधार:
अधिकार-आधारित दृष्टि (CRC) चार स्तंभ—Survival, Protection, Development, Participation।
सेवा-पैकेज:
आईसीडीएस/टीकाकरण/एएनसी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, परामर्श, ट्रैकिंग व जोखिम-प्रबंधन; शोषण/तस्करी/बाल-विवाह से सुरक्षा; ज़रूरत पड़ने पर फोस्टर/दत्तक/बाल-गृह।
केस-मैनेजमेंट:
समुदाय/स्कूल/स्वास्थ्यकर्मी मिलकर पहचान–रेफरल–अनुवर्ती करते हैं; हेल्पलाइन/सीडब्ल्यूसी/एसजेजे बोर्ड संस्थागत तंत्र हैं।
समावेशन:
विकलांगता, अल्पसंख्यक, सड़क-बच्चे आदि के लिए लक्षित हस्तक्षेप व सामाजिक सुरक्षा आवश्यक है। Quick Tip: चार शब्द याद रखें: \(\textbf{जीवन–विकास–सुरक्षा–सहभागिता}\); उत्तर इन्हीं के इर्द-गिर्द लिखें।
जनजातियों को किन्हीं दो समस्याओं का वर्णन करें।
मुख्य समस्याएँ—विस्थापन/वन-अधिकार से वंचित होकर आजीविका का नुकसान; तथा शिक्षा/स्वास्थ्य/बुनियादी सेवाओं तक सीमित पहुँच से मानव-विकास में पिछड़ना। बाज़ार-शोषण, सांस्कृतिक क्षरण और प्रशासनिक निष्पादन की कमजोरी इन चुनौतियों को बढ़ाती हैं।
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विस्थापन/संसाधन-ह्रास:
खनन/बाँध/संरक्षित क्षेत्र से पुनर्वास अपर्याप्त; वन-उत्पाद पर कम दाम; पहचान/भूमि-अधिकार कमजोर।
मानव विकास:
दूरी/भाषाई बाधा/भेदभाव से स्कूल/स्वास्थ्य सेवाएँ कम; कुपोषण, टीबी/मलेरिया, मातृ/शिशु मृत्यु दर अधिक।
अधिकार/कानून:
FRA, PESA का कमजोर क्रियान्वयन; पंचायत/वन समितियों को वास्तविक अधिकार/क्षमता चाहिए।
उपाय:
सामुदायिक वन-अधिकार, एमएसपी/वैल्यू-चेन, बहुभाषी शिक्षा, मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयाँ, संस्कृति-संरक्षण व भागीदारी-आधारित शासन। Quick Tip: समस्या लिखते ही उसके \(\textbf{समाधान}\) जोड़ें—\(\textbf{FRA/PESA, शिक्षा-स्वास्थ्य, बाज़ार}\)—अंक पक्के।
अनुसूचित जाति से क्या अभिप्राय है?
अनुसूचित जातियाँ वे ऐतिहासिक रूप से वंचित समूह हैं जिन्हें संविधान की अनुसूची में सूचीबद्ध कर शिक्षा/रोज़गार/राजनीतिक प्रतिनिधित्व में \(\textbf{आरक्षण}\), छात्रवृत्ति, संरक्षण-प्रावधान और अत्याचार-निवारण कानून द्वारा विशेष सुरक्षा दी जाती है, ताकि समता व सामाजिक-न्याय सुनिश्चित हो।
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संवैधानिक आधार:
राष्ट्रपति अधिसूचना द्वारा राज्यवार सूची; उद्देश्य—ऐतिहासिक भेदभाव का निवारण और समान अवसर।
सुरक्षा/कल्याण:
आरक्षण, छात्रवृत्ति/होस्टल, कौशल/उद्यमिता योजनाएँ; अत्याचार-निवारण अधिनियम, विशेष न्यायालय।
कार्यान्वयन:
प्रमाण-पत्र पारदर्शिता, निगरानी/आडिट, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा/रोज़गार-तैयारी और सामाजिक-सुधार आवश्यक।
चुनौतियाँ:
स्थायी भेदभाव, रोजगार-गुणवत्ता, आवास/स्वास्थ्य; समाधान—समग्र नीति व समुदाय सशक्तिकरण। Quick Tip: \(\textbf{परिभाषा + उद्देश्य + प्रमुख उपाय (आरक्षण/कानून)}\)—यह तिकड़ी हमेशा लिखें।
उपभोक्तावाद क्या है?
उपभोक्तावाद ऐसी सांस्कृतिक-आर्थिक प्रवृत्ति है जिसमें आवश्यकता से अधिक उपभोग/खरीद को वरीयता मिलती है; पहचान/प्रतिष्ठा उपभोग से जुड़ती है। इससे नवाचार/विकल्प बढ़ते हैं, पर ऋण-भार, अपशिष्ट, पर्यावरण-हानि व अस्थिर जीवनशैली जैसी समस्याएँ भी पैदा होती हैं।
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स्वरूप:
विज्ञापन, क्रेडिट, फास्ट-फैशन व नियोजित अप्रचलन उपभोग चक्र बढ़ाते हैं; ‘‘मैं क्या खरीदता हूँ’’ से पहचान बनती है।
सकारात्मक पक्ष:
प्रतिस्पर्धा/गुणवत्ता, उत्पाद विविधता, रोज़गार/नवाचार में योगदान।
नकारात्मक पक्ष:
कचरा/कार्बन उत्सर्जन, संसाधन-क्षय, मानसिक दबाव/ऋण जाल, असमानता का प्रदर्शन।
संतुलन:
उपभोक्ता-अधिकार, सूचना पारदर्शिता, टिकाऊ उत्पाद, परिपत्र अर्थव्यवस्था, न्यूनतमवाद व वित्तीय-शिक्षा से स्वस्थ उपभोग संभव है। Quick Tip: \(\textbf{परिभाषा → लाभ/हानि → टिकाऊ समाधान}\)—तीन पंक्तियों में उत्तर फ्रेम करें।
हरण विवाह से आप क्या समझते हैं?
हरण विवाह वह प्रथा है जिसमें दुल्हन को अपहरण/बलपूर्वक या प्रतीकात्मक रूप से ‘‘हर’’ कर विवाह किया जाता था। आधुनिक क़ानून के अनुसार यह अस्वीकार्य/दंडनीय है; वैध विवाह के लिए \(\textbf{वयस्कों की स्वैच्छिक, सूचित सहमति}\) अनिवार्य मानी जाती है।
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ऐतिहासिक/लोक-रूप:
कहीं-कहीं लोककथाओं/रिवाज़ में अपहरण-आधारित विवाह वर्णित मिलता है, जो सामंती/पितृसत्तात्मक नियंत्रण को दर्शाता है।
कानूनी दृष्टि:
सहमति-रहित, अल्पवय, या दबावयुक्त विवाह अपराध है; अपहरण, उत्पीड़न व महिलाओं की गरिमा का उल्लंघन।
समाजशास्त्रीय पक्ष:
रूढ़ियाँ/जाति-सीमाएँ, दहेज/सम्मान-हिंसा जैसी संरचनाएँ इसे जन्म देती थीं।
समाधान:
कानूनी जागरूकता, महिला शिक्षा/सशक्तिकरण, समुदाय-परामर्श और शिकायत-निवारण तंत्र आवश्यक हैं। Quick Tip: दो स्पष्ट वाक्य: \(\textbf{ये क्या है}\) और \(\textbf{कानूनन क्यों अस्वीकार्य}\)—फिर \(\textbf{सहमति}\) शब्द ज़रूर लिखें।
बहुपति विवाह का उदाहरण सहित परीक्षण करें।
बहुपति विवाह वह रूप है जिसमें एक स्त्री के एक साथ एकाधिक पति हों। ‘‘भ्रातृ-बहुपति’’ रूप हिमालयी क्षेत्रों (तिब्बत, लद्दाख आदि) में भूमि विभाजन रोकने/श्रम-साझेदारी हेतु पाया गया; आधुनिक क़ानून प्रायः एकविवाह को मान्यता देता है।
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रूप:
भ्रातृ-बहुपति (भाई एक पत्नी साझा) तथा अभ्रातृ-बहुपति।
कारण:
कठोर भौगोलिक/आर्थिक परिस्थितियाँ, सीमित संसाधन, विरासत का समेकन, श्रम-वितरण और संतान संख्या पर नियंत्रण।
परिणाम:
संपत्ति एकजुट रहती पर महिलाओं की स्वायत्तता/भावनात्मक दबाव, उत्तराधिकार/वंश पहचान जैसी जटिलताएँ; बच्चों की पितृत्व-संबंधी संहिताएँ अलग-अलग समाजों में भिन्न।
वर्तमान:
शिक्षा, बाज़ार, क़ानूनी एकविवाह और प्रवासन से यह प्रथा सिकुड़ रही है। Quick Tip: \(\textbf{परिभाषा + हिमालयी उदाहरण + कारण (भूमि/श्रम)}\)—तीनों लिखें, फिर \(\textbf{कानूनी स्थिति}\) जोड़ दें।
मृत विवाह का उदाहरण सहित विश्लेषण करें।
मृत विवाह वह है जिसमें विवाह समय पर कोई पक्ष मृत हो; अनुष्ठान/वंश-निरंतरता या सामाजिक दायित्व हेतु प्रतीकात्मक रूप से विवाह किया जाता है। उदाहरण—न्यूर (अफ्रीका) का ‘‘घोस्ट मैरिज’’ या कुछ एशियाई समुदायों में उत्तराधिकार-सुरक्षा हेतु परंपराएँ।
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अर्थ/उद्देश्य:
समाज वंश/अनुष्ठान पूरा करने, संपत्ति/कुल परंपरा निभाने के लिए मृत व्यक्ति के नाम से विवाह कर देता है; संतान का वंश मृतक को माना जा सकता है।
उदाहरण:
न्यूर समाज में मृतक पुरुष के नाम पर विवाह; पूर्वी एशिया में भी विरल रूप से प्रतीकात्मक विवाह दर्ज।
कानूनी/नैतिक पहलू:
आधुनिक कानूनों में वैधता सीमित/अनुपस्थित; महिलाओं/बच्चों के अधिकार, उत्तराधिकार व सहमति का संरक्षण सर्वोपरि होना चाहिए। Quick Tip: पहले \(\textbf{परिभाषा}\), फिर \(\textbf{एक पक्का नृविज्ञानिक उदाहरण}\), अंत में \(\textbf{कानूनी/अधिकार}\) टिप्पणी दें।
सरोगेट से आप क्या समझते हैं?
सरोगेसी वह प्रक्रिया है जिसमें एक महिला (सरोगेट) चिकित्सा तकनीक से गर्भ धारण कर इच्छित दम्पती/व्यक्ति के लिए शिशु को जन्म देती है। इसमें \(\textbf{गेस्टेशनल}\) सरोगेसी प्रचलित है; वैधानिक अनुमति, अनुबंध, चिकित्सा/नैतिक सुरक्षा व बच्चे के अधिकार केंद्र में हैं।
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प्रकार:
गेस्टेशनल—भ्रूण आईवीएफ से (सरोगेट का आनुवंशिक संबंध नहीं); पारंपरिक—सरोगेट के अंडाणु से (अब विरल/विवादित)।
क्यों आवश्यक:
बांझपन, चिकित्सीय जोखिम, एकल/विशेष परिस्थितियाँ।
नीतिगत पहलू:
पंजीकृत क्लिनिक, सूचित सहमति, स्वास्थ्य बीमा, भुगतान/शर्तें, गोपनीयता, शिशु का नागरिक/पालन-पोषण अधिकार; शोषण रोकने हेतु नियमन व नैतिक पर्यवेक्षण जरूरी।
सामाजिक-नैतिक विमर्श:
महिला शरीर के व्यावसायीकरण, गरिमा व एजेंसी पर बहस; अतः सख्त सुरक्षा उपाय व पारदर्शी प्रक्रियाएँ चाहिए। Quick Tip: तीन शब्द लिखें: \(\textbf{प्रकार, आवश्यकता, नियमन}\); इन्हीं पर संक्षिप्त बिंदु बना दें।
तृतीयक नातेदारी क्या है?
तृतीयक नातेदारी ऐसी दूर की संबंध-श्रेणी है जो प्राथमिक/माध्यमिक रिश्तों से आगे की कड़ियों से बनती है—जैसे चचेरे भाई/बहन का जीवनसाथी, ससुराल के मामा, या कज़िन-इन-लॉ। इनका सामाजिक महत्व होता है पर दायित्व अपेक्षाकृत हल्के होते हैं।
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स्तर:
प्राथमिक—माता-पिता/भाई-बहन/पति-पत्नी/संतान; माध्यमिक—दादा-दादी/मामा-मौसी/ससुराल आदि। तृतीयक—इन्हीं से आगे की विस्तृत कड़ियाँ (‘‘इन-लॉ ऑफ इन-लॉ’’ प्रकार)।
महत्त्व:
शादी-ब्याह, सामाजिक सहयोग, सूचना/रोज़गार नेटवर्क और अनुष्ठानों में इनका सहयोग मिलता है; ग्रामीण समाज में प्रभाव अधिक, शहरी में अवसर-आधारित।
विशेषता:
निकट रिश्तों जितनी कानूनी/आर्थिक बाध्यता नहीं पर सामाजिक पूँजी हेतु उपयोगी नेटवर्क बनाते हैं। Quick Tip: \(\textbf{प्राथमिक → माध्यमिक → तृतीयक}\) क्रम लिखकर \(\textbf{एक ठोस उदाहरण}\) ज़रूर दें—उत्तर स्पष्ट हो जाएगा।
उज्ज्वला योजना क्या है?
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना गरीब परिवारों की वयस्क महिलाओं को निःशुल्क एलपीजी कनेक्शन देती है ताकि ठोस ईंधन के धुएँ से होने वाली बीमारियाँ घटें, समय बचे और स्वच्छ ऊर्जा अपनाने को प्रोत्साहन मिले। रिफिल-सब्सिडी व अवसंरचना इसके सहायक घटक हैं।
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उद्देश्य:
स्वच्छ ईंधन की पहुँच बढ़ाकर घरेलू वायु-प्रदूषण से होने वाली श्वसन/नेत्र रोग, जलने के खतरे और महिलाओं के श्रम-भार को कम करना।
मुख्य प्रावधान:
लक्ष्यित लाभार्थी (SECC/बीपीएल श्रेणी) महिला के नाम जमा-रहित कनेक्शन, स्टोव सहायता, प्रथम सिलेंडर/रीफिल सब्सिडी, डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर।
प्रभाव:
ईंधन संग्रह में लगने वाला समय घटता, स्कूल/आमदनी/स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर; ग्रामीण डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क मज़बूत।
चुनौतियाँ:
रीफिल वहन-क्षमता, आपूर्ति विश्वसनीयता, व्यवहार परिवर्तन। इन्हें माइक्रो-क्रेडिट, अंतिम-मील डिलीवरी, और संवेदीकरण से सुधारा जाता है। Quick Tip: उत्तर को \(\textbf{लक्ष्य–प्रावधान–प्रभाव–चुनौती}\) शीर्षकों में बाँटकर 2–2 बिंदु लिखें।
पोक्सो कानून क्या है?
POCSO Act, 2012 बच्चों (18 वर्ष से कम) के विरुद्ध यौन अपराधों को परिभाषित कर कठोर दंड, अनिवार्य रिपोर्टिंग, विशेष न्यायालय, गोपनीय/बाल-हितैषी जाँच-ट्रायल की व्यवस्था करता है। नाबालिग में सहमति मान्य नहीं; पीड़ित संरक्षण और पुनर्वास अनिवार्य हैं।
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परिसीमा:
भेदन/अभेदनात्मक आक्रमण, यौन उत्पीड़न, पोर्नोग्राफी, ऑनलाइन शोषण—सब शामिल। 18 से कम आयु को ‘‘बालक’’ मानकर आयु-आधारित सुरक्षा।
प्रक्रिया:
इन-कैमरा कार्यवाही, बयान के समय सहायक, पहचान-गोपनीयता, टाइमबाउंड सुनवाई हेतु विशेष न्यायालय, मेडिकल प्रोटोकॉल व क्षतिपूर्ति।
कर्तव्य:
शिक्षक/चिकित्सक/नागरिक द्वारा अनिवार्य रिपोर्टिंग; न करने पर दंड। पुलिस/सीडब्ल्यूसी के समन्वय से बाल-हित सर्वोपरि।
महत्त्व:
देशभर में एकरूप मानक बनकर भय-रहित रिपोर्टिंग, दोषियों पर त्वरित कार्रवाई और पुनर्वास-उन्मुख न्याय सुनिश्चित करता है। Quick Tip: तीन बातें हमेशा लिखें—\(\textbf{कौन बच्चा}\), \(\textbf{कौन-से अपराध}\), \(\textbf{बाल-हितैषी प्रक्रिया}\)।
बेरोज़गारी को परिभाषित करें।
जब कार्य करने की \(\textbf{इच्छा और क्षमता}\) होते हुए भी व्यक्ति प्रचलित वेतन पर नौकरी न पाए तो वह बेरोज़गार कहलाता है। इसके रूप—खुली, मौसमी, आच्छन्न/वेश्यालयिक (disguised), संक्रमणकालीन/संरचनात्मक—हैं। दर, श्रम-बल भागीदारी व WPR प्रमुख मानक हैं।
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अवधारणा:
रोज़गार-खोज और उपलब्धता जरूरी; छात्र/गृहिणी आदि ‘‘नॉन-लेबर फोर्स’’ अलग श्रेणी।
प्रकार:
खुली बेरोज़गारी—पूर्णतः बिना काम; मौसमी—कृषि/पर्यटन ऑफ-सीज़न; आच्छन्न—अधिक श्रमिक, सीमित उत्पादकता; घर्षण/संरचनात्मक—कौशल-मिसमैच, तकनीकी बदलाव।
मापन:
बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार/श्रम-बल; सहायक सूचक—LFPR, WPR, अधरोज़गारी।
नीतियाँ:
कौशल-विकास, एमएसएमई को प्रोत्साहन, सार्वजनिक कार्य, औद्योगिक क्लस्टर, श्रम-नियम सरलीकरण, उद्यमिता/स्टार्टअप समर्थन। Quick Tip: \(\textbf{परिभाषा}\) साफ़ लिखें और \(\textbf{दो प्रकार + एक नीति}\) अवश्य जोड़ें।
सामाजिक परिवर्तन के दो कारणों का उल्लेख करें।
तकनीकी नवाचार (डिजिटलीकरण, परिवहन) और आर्थिक-जनसांख्यिकीय बदलाव (औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, प्रजनन संक्रमण) सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख कारण हैं। इनके साथ शिक्षा, कानून, सामाजिक आंदोलनों व मीडिया/प्रवास से विचारों का प्रसार भी परिवर्तन को तेज़ करता है।
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तकनीक:
नई तकनीक उत्पादन, संचार, परिवार व राजनीति के पैटर्न बदलती है—उदा. इंटरनेट से श्रम-बाज़ार व पहचान-राजनीति पर असर।
आर्थिक/जनसांख्यिकीय:
उद्योग/सेवा-विस्तार, ग्रामीण-शहरी पलायन, छोटी परिवार-मानसिकता और वृद्धावस्था बढ़ना—भूमिकाएँ/मूल्य बदलते हैं।
कानून/शिक्षा/आंदोलन:
अधिकार-आधारित कानून, सार्वभौमिक शिक्षा और जेंडर/पर्यावरण आंदोलन वैचारिक वैधता बदलते हैं।
पर्यावरण/आपदा:
महामारी/जलवायु झटके से कार्य-प्रणाली, स्वास्थ्य आचरण, और नीतियाँ तेजी से अनुकूलित होती हैं। Quick Tip: दो कारण चुनें और \(\textbf{हर कारण = तंत्र + छोटा उदाहरण}\) लिखें।
स्वर्ण जयंती रोजगार योजना क्या है?
यह 1990 के दशक के अंत में शुरू दो योजनाओं—\(\textbf{एसजीएसवाई}\) (ग्रामीण) व \(\textbf{एसजेएसआरवाई}\) (शहरी)—का सामूहिक संदर्भ है, जिनका उद्देश्य गरीबों के लिए आत्मरोज़गार/वेतन-अवसर, एसएचजी गठन, प्रशिक्षण, सूक्ष्म-ऋण व बुनियादी आजीविका अवसंरचना उपलब्ध कराना था। बाद में ये DAY–NRLM/NULM में रूपांतरित हुईं।
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एसजीएसवाई (ग्रामीण):
गरीब परिवारों को एसएचजी में संगठित कर बैंक-लिंक्ड क्रेडिट, सब्सिडी व क्षमता-विकास; क्लस्टर/की-एक्टिविटी के माध्यम से बाजार-जोड़।
एसजेएसआरवाई (शहरी):
कौशल प्रशिक्षण, सूक्ष्म-उद्यम सहायता, शहरी रोज़गार कार्य और आश्रय/सेवाएँ।
रणनीति:
समूह-आधारित वित्त, प्रशिक्षण, हैंडहोल्डिंग और बाजार/संस्थागत जुड़ाव।
विकास:
2011 के बाद समेकित रूप से DAY–NRLM/NULM ने संस्थागत ढाँचा, सामुदायिक संघ और उद्यमिता समर्थन और मजबूत किए। Quick Tip: उत्तर में दोनों नाम \(\textbf{SGSY–SJSRY}\) और \(\textbf{रूपांतरण NRLM/NULM}\) अवश्य लिखें।
ग्राम पंचायत के संगठन की विवेचना करें।
ग्राम पंचायत गाँव-स्तरीय निर्वाचित निकाय है, जिसका प्रमुख सरपंच/प्रधान और वार्ड सदस्य होते हैं। ग्राम सभा सर्वोच्च पर्यवेक्षक होती है। विषयक स्थायी समितियाँ, पंचायत सचिव/ग्राम सेवक प्रशासन-सहायक हैं; नियमित बैठकें, बजट, सामाजिक लेखा-जोखा व अभिलेख अनिवार्य हैं।
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संरचना:
वार्डों से चुने सदस्य; आरक्षण प्रावधान; सरपंच अध्यक्षता करता है।
ग्राम सभा:
सभी वयस्क नागरिक—योजनाओं/बजट की स्वीकृति, सामाजिक अंकेक्षण व अनुश्रवण।
समितियाँ:
जल/स्वास्थ्य/शिक्षा/कार्यों की समितियाँ—विशेषज्ञता व निगरानी।
प्रशासन:
पंचायत सचिव/ग्राम सेवक—रिकॉर्ड, लेखा, एमआईएस, पत्राचार, भुगतान।
प्रक्रिया:
कार्यवृत्त, पारदर्शिता-पट्ट, निविदा/गुणवत्ता नियंत्रण, उच्चतर स्तर से समन्वय। यह ढांचा स्थानीय स्वशासन को प्रभावी बनाता है। Quick Tip: चार स्तम्भ लिखें: \(\textbf{सदस्य/सरपंच, ग्राम सभा, समितियाँ, सचिव/रिकॉर्ड}\)।
ग्राम कचहरी क्या है?
ग्राम कचहरी/न्याय पंचायत गाँव-स्तर की अर्द्ध-न्यायिक संस्था है जो छोटे नागरिक/दण्डनीय विवादों का त्वरित निपटारा, मध्यस्थता व सुलह को बढ़ावा देती है। सीमित अधिकार-क्षेत्र, कम लागत, स्थानीय भाषा-प्रक्रिया इसकी विशेषताएँ हैं; गंभीर मामलों को नियमित न्यायालय भेजा जाता है।
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उद्देश्य:
सुलभ न्याय—सीमा विवाद, छोटी देनदारी, हल्की चोट/उत्पात, सार्वजनिक उपद्रव जैसे मामलों का शीघ्र समाधान।
संरचना:
निर्वाचित/नामित पंच; कार्यपालिका पंचायत से अलग। समझौते को प्राथमिकता, आवश्यक होने पर जुर्माना/दिशा-निर्देश।
लाभ:
निकटता, भाषा/रूढ़ि की समझ, समय/धन की बचत, सामुदायिक सद्भाव।
सीमाएँ:
क्षमता/पूर्वाग्रह जोखिम, प्रशिक्षण व पर्यवेक्षण की आवश्यकता। Quick Tip: परिभाषा दें, \(\textbf{उदाहरण-क्षेत्र}\) लिखें, और \(\textbf{लाभ बनाम सीमा}\) एक-एक पंक्ति।
ग्राम पंचायत की असफलता के तीन कारणों का विश्लेषण करें।
मुख्य कारण—\(\textbf{वित्तीय}\) स्वायत्तता/समय पर अनुदान का अभाव, \(\textbf{क्षमता}\) व तकनीकी-सहायता की कमी, तथा \(\textbf{जवाबदेही}\) का कमजोर होना (ग्राम सभा/पारदर्शिता/सामाजिक अंकेक्षण का अनुपालन कमजोर, स्थानीय अभिजन वर्चस्व)। इससे योजना-निर्माण, निष्पादन व रख-रखाव प्रभावित होते हैं।
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फंड्स:
देरी/ईयरमार्किंग, स्वयं-राजस्व संग्रह कमजोर—रखरखाव/ओपेक्स बाधित।
फंक्शनरी/क्षमता:
सचिव/इंजीनियर/लेखा-समर्थन कम; ई-गवर्नेंस/פרोक्योरमेंट कौशल सीमित।
फंक्शंस/जवाबदेही:
कार्य-हस्तांतरण अस्पष्ट; ग्राम सभा अनियमित; सूचना-प्रकटीकरण व ऑडिट ढीले; अभिजन कब्ज़ा।
समाधान:
‘‘3F’’ का वास्तविक विकेंद्रीकरण, प्रशिक्षण, पारदर्शी पोर्टल, सामाजिक अंकेक्षण, स्वतंत्र ऑडिट और नागरिक भागीदारी। Quick Tip: \(\textbf{Funds–Functions–Functionaries}\) के ढाँचे में कारण/उपाय लिखें।
जाति एवं वर्ग में अंतर स्पष्ट करें।
\(\textbf{जाति}\) जन्म-आधारित, अंतोगामी व अनुष्ठानिक-स्थिति व्यवस्था है जिसमें गतिशीलता सीमित रहती है; \(\textbf{वर्ग}\) आर्थिक स्थिति (आय/सम्पत्ति/व्यवसाय) पर आधारित अपेक्षाकृत खुली पायदान है। जाति जीवन-नियम/विवाह को निर्देशित करती, वर्ग उपभोग/शक्ति संबंधों को प्रभावित करता है।
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आधार:
जाति—धार्मिक/परंपरागत वैधता; वर्ग—बाज़ार/उत्पादन संबंध।
गतिशीलता:
जाति में वंश/पेशा विरासत; वर्ग में शिक्षा/रोज़गार से ऊपर-नीचे जाना संभव।
नियमन:
जाति भोजन/विवाह/स्पर्श नियम तय करती; वर्ग आवास, शिक्षा, राजनीति/खपत को आकार देता।
अंतरक्रिया:
भारतीय समाज में दोनों ओवरलैप; आर्थिक उन्नति के बावजूद जाति-कलंक रह सकता है—नीतियाँ द्विस्तरीय होनी चाहिए। Quick Tip: चार पंक्तियाँ: \(\textbf{आधार, गतिशीलता, जीवन-नियमन, अंत:क्रिया}\)—प्रत्येक में 1–1 वाक्य।
जाति व्यवस्था के दोषों की विवेचना करें।
दोष—असमानता/अस्पृश्यता, मानव-गरिमा व अवसरों का निषेध; पेशे की वंशपरंपरा से प्रतिभा का दमन; सामाजिक एकता व लोकतंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव; श्रम-बाज़ार जड़ता से आर्थिक अक्षमता। समाधान: संवैधानिक अधिकार, आरक्षण, भेदभाव-निवारण और समावेशी शिक्षा/अवसर।
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मानवाधिकार:
भेदभाव/हिंसा, सार्वजनिक संसाधनों से बहिष्कार, आत्मसम्मान पर चोट।
आर्थिक:
पेशा-निर्धारण से कौशल/उद्यमिता सीमित; गतिशीलता बाधित—उत्पादकता घटती।
लोकतांत्रिक:
नेटवर्क-आधारित कब्ज़ा, समान नागरिकता कमजोर।
नीतिगत उत्तर:
आरक्षण, छात्रवृत्ति, उद्यमिता/भूमि/क्रेडिट, कड़े अत्याचार-निवारण, सामाजिक सुधार अभियान और गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ—दीर्घकालिक समाधान। Quick Tip: \(\textbf{अधिकार–अर्थव्यवस्था–लोकतंत्र}\)—तीन आयामों में दोष लिखें, अंत में \(\textbf{नीतियाँ}\) जोड़ें।
हिन्दू विवाह की प्रकृति की व्याख्या करें।
हिन्दू विवाह परंपरागत रूप से \(\textbf{संस्कार/पवित्र बंधन}\) माना गया, पर आधुनिक कानून इसे \(\textbf{नागरिक अनुबंध}\) के रूप में भी मान्यता देता है। वैधता हेतु आयु, वैवाहिक-एकत्व, निषिद्ध-संबंध, सहमति, विधि/पंजीकरण शर्तें; साथ ही सापेक्ष अधिकार/कर्तव्य और तलाक/भरण-पोषण प्रावधान हैं।
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धार्मिक पक्ष:
सप्तपदी आदि संस्कार ‘‘धर्म–अर्थ–काम’’ के संतुलन हेतु; परिवार/वंश निरंतरता।
कानूनी पक्ष:
हिन्दू विवाह अधिनियम—आयु, एकपत्नी प्रथा, निषिद्ध डिग्री, मानसिक क्षमता; तलाक/विभिन्न राहतें, उत्तराधिकार/पालन-भरण।
समन्वय:
आज विवाह ‘‘द्वैध प्रकृति’’—आध्यात्मिक-नैतिक मूल्य और विधिक अधिकार/जवाबदेही का संगम—जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता व सामाजिक संस्थान दोनों सुरक्षित रहते हैं। Quick Tip: मुख्य वाक्य: \(\textbf{“संस्कार + अनुबंध”}\)—एक-एक उदाहरण दें।
जनजातियों में बहुपत्नी विवाह के तीन कारणों का वर्णन करें।
कारण—(i) आर्थिक: कृषि/पशुपालन में श्रम बढ़ाने और घर-उत्पादन सुधारने हेतु; (ii) जनसांख्यिकीय/प्रजनन: पहली पत्नी की बांझपन/उच्च शिशु-मृत्यु; (iii) सामाजिक-राजनीतिक: कुटुम्ब/गठबंधन विस्तार, प्रतिष्ठा व सुरक्षा की दृष्टि। आधुनिक शिक्षा/कानून से यह प्रवृत्ति घट रही है।
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आर्थिक तर्क:
स्थानांतर कृषि/वनजीविका में अधिक श्रम से उत्पादन/संग्रह बढ़ता; बच्चों/बुज़ुर्गों की देखभाल साझा।
जनसांख्यिकीय:
वंश-निरंतरता महत्त्वपूर्ण; बाँझपन/कम प्रजनन पर समुदाय दूसरी शादी वैध मान सकता है।
सामाजिक-राजनीतिक:
कुल/ग्राम के साथ रिश्ते, दहेज/कन्या-मूल्य व्यवस्थाएँ, मुखिया की प्रतिष्ठा।
परिवर्तन:
कानूनी एकविवाह, शिक्षा, वैकल्पिक आजीविका व महिलाओं की agency बढ़ने से बहुपत्नी विवाह सिमट रहा है। Quick Tip: उत्तर को \(\textbf{आर्थिक–जनसांख्यिकीय–सामाजिक}\) तीन शीर्षकों में लिखें।
पलायन विवाह से आप क्या समझते हैं?
जब वयस्क युगल सामाजिक/परिवारिक विरोध, जाति/दहेज बाधा आदि से बचकर \(\textbf{स्वेच्छा से}\) भागकर विवाह करते हैं तो उसे पलायन विवाह कहते हैं। बाद में रीति/पंजीकरण से वैधीकरण होता है। \(\textbf{सहमति}\) व वयस्कता इसकी वैध शर्तें हैं; अपहरण/अल्पवय अपराध है।
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प्रसंग:
समानता/पसंद आधारित विवाह हेतु युवा कठोर सामाजिक प्रतिबंधों को दरकिनार करते हैं।
कानूनी पहलू:
दोनों वयस्क हों, स्वतंत्र सहमति, धमकी/बल प्रयोग न हो; विवाह पंजीकरण से अधिकार/सुरक्षा सुनिश्चित।
सामाजिक आयाम:
अंतर-जाति/धर्म/आर्थिक असमानता के कारण तनाव; हिंसा-जोखिम में हेल्पलाइन/सुरक्षा-घर/कानूनी सहायता जरूरी।
परिवर्तन-संकेतक:
एजेंसी/शिक्षा/शहरी प्रभाव से साझेदारी के आधुनिक मूल्य उभरते हैं। Quick Tip: तीन की-वर्ड लिखें: \(\textbf{वयस्कता, स्वैच्छिक सहमति, पंजीकरण}\)—और इन्हें अपहरण से अलग बताएं।
मातुल्य नातेदारी रीति क्या है?
‘‘मातुल्य’’ रीति में \(\textbf{मातुल}\) (माँ का भाई) का विशेष स्थान माना जाता है—मार्गदर्शन, अनुष्ठानिक भूमिकाएँ, कभी-कभी उत्तराधिकार/निवास-प्राथमिकता। यह \(\textbf{अवंकुलेट}\) परंपरा मातृपक्षीय संबंधों को मज़बूत कर बच्चों के संरक्षण व आदान-प्रदान को सुदृढ़ करती है।
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भावार्थ:
कई समुदायों में मातुल नामकरण/विवाह-वार्ता/दीक्षा में प्रमुख; भांजे-भांजी के साथ विशेष स्नेह/जिम्मेदारी।
सामाजिक कार्य:
मातृपक्ष का समर्थन-नेटवर्क, सामरिक संतुलन, संपत्ति/पालन-पोषण पर निगरानी; आपसी भेंट/उपहार से संबंध स्थिर।
भिन्नताएँ:
कहीं प्रतीकात्मक, कहीं निवास/उत्तराधिकार तक प्रभाव; आधुनिक शिक्षा/शहरीकरण से रूपांतरित पर अनुष्ठानों में मौजूद। Quick Tip: परिभाषा में \(\textbf{मातुल (मामा)}\) और \(\textbf{अवंकुलेट}\) शब्द अवश्य लिखें।
हैग्/हैग्न (Hage) समानता क्या है?
यह सिद्धांत \(\textbf{द्विपक्षीय/बाइलैटरल}\) नातेदारी का संकेत है, जिसमें मातृ और पितृ दोनों पक्ष के रिश्तों को लगभग समान मान्यता, दायित्व और उत्तरदायित्व दिए जाते हैं। वंश/निवास/उत्तराधिकार में किसी एक पक्ष का प्रबल पक्षपात नहीं रहता, जैसा एकरेखीय प्रणालियों में होता है।
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अर्थ:
कग्नैटिक/बाइलैटरल समाजों में ‘‘इगो’’ दोनों पक्षों से सापेक्ष समान दूरी/मूल्य देता है—आमंत्रण, सहायता, उपाधि आदि में संतुलन।
परिणाम:
विवाह-चयन, निवास (प्रायः नेओ-लोकल), उत्तराधिकार में लचीलापन; दायित्व फैले होने से बहु-स्रोत सहायता।
तुलना:
पितृरेखीय/मातृरेखीय प्रणालियों में एक पक्ष प्रमुख; यहाँ संतुलित मान्यता। तथापि स्थानीय संस्कृति हल्का झुकाव रख सकती है। Quick Tip: एक पंक्ति में लिखें—\(\textbf{मातृ + पितृ = बराबर मान}\)—और \(\textbf{यूनिलिनियल}\) से छोटा अंतर बताएं।
एड्स (AIDS) की समस्याओं पर संक्षेप में लिखिए।
एड्स एचआईवी संक्रमण का उन्नत चरण है, जो प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करके अवसरवादी संक्रमणों और कुछ कैंसरों का जोखिम बढ़ा देता है। प्रमुख समस्याएँ हैं—कलंक और भेदभाव, देर से जाँच, दवाओं की निरंतर उपलब्धता व अनुपालन, परामर्श/मानसिक स्वास्थ्य की कमी, यौन व रक्त-सुरक्षा के मानकों की ढिलाई, माता-से-शिशु संचरण, तथा सामाजिक-आर्थिक असर जैसे बेरोज़गारी और गरीबी। समाधान के लिए जागरूकता, नियमित टेस्टिंग, एआरटी की समय पर शुरुआत, सुरक्षित व्यवहार, गोपनीय और गैर-भेदभावपूर्ण सेवाएँ, तथा बहु-क्षेत्रीय सहयोग आवश्यक है।
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रोग-स्वभाव:
एचआईवी सीडी4 कोशिकाएँ नष्ट करता है, जिससे टीबी, पीसीपी, कैंडिडा जैसे संक्रमण आसानी से सक्रिय होते हैं। बिना उपचार के, प्रगतिशील प्रतिरक्षी-विघटन जीवन-घातक जटिलताओं को जन्म देता है।
सामाजिक समस्याएँ:
अज्ञान और मिथक कलंक पैदा करते हैं—रोज़गार, विवाह, शिक्षा और स्वास्थ्य-सेवा तक पहुँच बाधित होती है। गोपनीयता उल्लंघन व जेंडर-आधारित हिंसा विशेषकर महिलाओं/एलजीबीटीक्यू+ समुदाय को प्रभावित करती है।
स्वास्थ्य-तंत्र चुनौतियाँ:
समय पर जाँच (पीआईटीसी, सामुदायिक स्क्रीनिंग), एआरटी की सतत आपूर्ति, वायरल-लोड मॉनिटरिंग, सह-रोगों का प्रबंधन, तथा किशोर/गर्भवती के अनुकूल सेवाएँ आवश्यक हैं।
निवारण व नीति:
कन्डोम/सुई-विनिमय, एचआईवी परीक्षण-परामर्श, पीईपी/PrEP, पीएमटीसीटी, और समावेशी कानून/कार्यस्थल नीतियाँ संक्रमण घटाती हैं। समुदाय-आधारित संगठनों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का एकीकरण उपचार-पालन व गरिमा बढ़ाता है। Quick Tip: उत्तर को तीन खंडों में बाँटें—\(\textbf{चिकित्सीय}\), \(\textbf{सामाजिक}\), \(\textbf{प्रणालीगत}\)—और हर खंड में 1–2 ठोस उपाय अवश्य लिखें।
वैश्वीकरण के प्रेरकों की विवेचना कीजिए।
वैश्वीकरण को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख प्रेरक हैं—तकनीकी प्रगति (डिजिटल संचार, इंटरनेट, कंटेनरीकरण), व्यापार व निवेश उदारीकरण, परिवहन की घटती लागत, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वैश्विक मूल्य-श्रृंखला नेटवर्क, वित्तीय बाज़ारों का एकीकरण, तथा ज्ञान/संस्कृति-प्रसार। नीतिगत समझौते (डब्ल्यूटीओ, क्षेत्रीय एफटीए) और मानकीकरण (आईएसओ, आईपीआर) ने लेन-देन को सरल किया। मानव-गतिशीलता, प्रवासन और प्रवासी-रकम (रेमिटेन्स) ने बाज़ारों को जोड़ा। इन कारकों के संयोजन ने उत्पादन, सेवाएँ, मीडिया और उपभोक्ता-रुचियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परस्पर निर्भर बनाया।
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प्रौद्योगिकी:
फाइबर-ऑप्टिक, मोबाइल-ब्रॉडबैंड, क्लाउड और एआई ने दूरियाँ मिटाईं; कंटेनर शिपिंग व रीयल-टाइम ट्रैकिंग ने लॉजिस्टिक्स तेज़ व सस्ता किया।
उदारीकरण व संस्थान:
टैरिफ/कोटा में कटौती, विदेशी निवेश नियमों में ढील और द्विपक्षीय/क्षेत्रीय समझौते नियमों का सामंजस्य बनाते हैं। आईपीआर व मानकीकरण गुणवत्ता और अंतःसंचालन बढ़ाते हैं।
कंपनी-रणनीति:
एमएनसीज़ लागत, कौशल और बाज़ार के आधार पर उत्पादन को कई देशों में बाँटती हैं; “ग्लोबल वैल्यू चेन्स” से मध्यवर्ती वस्तुओं का विशाल प्रवाह बनता है।
वित्त व संस्कृति:
पूँजी का तीव्र आवागमन, फिनटेक, और मीडिया/स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म सांस्कृतिक रूप से भी निकटता लाते हैं।
सीमाएँ:
भू-राजनीतिक जोखिम, डेटा-नियम, आपूर्ति-श्रंखला व्यवधान व असमानताएँ पुन:स्थानीकरण/“डी-रिस्किंग” की बहस को जन्म देती हैं। Quick Tip: चार शीर्षक याद रखें—\(\textbf{टेक्नोलॉजी, नीतियाँ, कंपनियाँ, वित्त/संस्कृति}\)—और हर शीर्षक के नीचे 1–2 उदाहरण दें।
सामाजिक क्षेत्र में लैंगिक विषमताओं की विवेचना कीजिए।
लैंगिक विषमताएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, श्रम-बाज़ार भागीदारी, वेतन, संपत्ति-अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सुरक्षा में दिखती हैं। बालिका-भेदभाव, देखभाल का असमान बोझ, मातृ-स्वास्थ्य जोखिम, एसटीईएम में कम भागीदारी, वेतन-अंतर, तथा निर्णय-निर्माण में सीमित आवाज़ इसके प्रमुख रूप हैं; नीतियाँ व सामाजिक मान्यताओं का सुधार आवश्यक है।
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शिक्षा/स्वास्थ्य:
विद्यालय-त्याग, डिजिटल विभाजन, तथा किशोरियों का एनीमिया/मातृ-मृत्यु दर लैंगिक अंतर दर्शाते हैं।
आर्थिक भागीदारी:
महिला श्रम-बल भागीदारी कम; समान कार्य पर असमान वेतन, अनौपचारिक/असुरक्षित नौकरियों का उच्च अनुपात, तथा देखभाल-कार्य का अदृश्य बोझ बाधा बनते हैं।
संपत्ति/प्रतिनिधित्व:
भूमि/सम्पत्ति में नाम जोड़ना सीमित; पंचायतों में आरक्षण से सहभागीता बढ़ी पर प्रभावशीलता हेतु प्रशिक्षण/संसाधन चाहिए।
हिंसा/सुरक्षा:
घरेलू व सार्वजनिक हिंसा, साइबर-उत्पीड़न, और गतिशीलता-प्रतिबंध सामाजिक पूँजी घटाते हैं।
उपाय:
लैंगिक बजटिंग, सुरक्षित परिवहन/कार्यस्थल, देखभाल-अवसंरचना, कौशल/एसटीईएम प्रोत्साहन, समान वेतन कानून का प्रवर्तन, तथा व्यवहार-परिवर्तन संचार अनिवार्य हैं। Quick Tip: उत्तर को \(\textbf{क्षेत्रवार}\) लिखें—शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, अधिकार/प्रतिनिधित्व, सुरक्षा—और हर क्षेत्र में \(\textbf{समस्या + उपाय}\) जोड़ें।
संयुक्त परिवार की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
संयुक्त परिवार में कई पीढ़ियाँ, सामान्यतः एक साझा रसोई/आय-व्यय, संपत्ति का सामूहिक स्वामित्व/उपयोग, पितृसत्तात्मक नेतृत्व, श्रम-विभाजन तथा परस्पर सहायता होती है। सामाजिक अनुशासन, बुज़ुर्गों की देखभाल, बच्चों का सामूहिक पालन-पोषण और अनुष्ठानों/उत्तराधिकार में सामूहिकता इसकी पहचान है; किन्तु निजी स्वतंत्रता व गतिशीलता सीमित हो सकती है।
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संरचना:
भाई-बंधु व उनकी पत्नियाँ/संतानें एक छत तले रहती हैं; मुखिया आर्थिक/सांस्कृतिक निर्णयों का नेतृत्व करता है।
कार्य-प्रणाली:
आय का समेकन, खर्च का साझा नियोजन, सम्पत्ति/उपकरण/भूमि का संयुक्त उपयोग—जो जोखिम बाँटता और पैमाने की अर्थव्यवस्था बनाता है।
सामाजिक कार्य:
बच्चों/वृद्धों की देखभाल, बेरोज़गारी/बीमारी में सहारा, ज्ञान/कौशल का अंतरण, तथा सांस्कृतिक-सामाजिक पूँजी का संरक्षण।
सीमाएँ:
व्यक्तिगत आकांक्षाओं, महिलाओं की गतिशीलता और निजी/आर्थिक निर्णयों पर नियंत्रण तनाव ला सकता है; शहरीकरण/नौकरी-गतिशीलता से संयुक्त परिवार में विविध रूप उभरे—अर्ध-संयुक्त/नेओ-लोकल। Quick Tip: तीन शीषर्क रखें—\(\textbf{संरचना, कार्य, सीमाएँ}\)—और उदाहरण सहित संक्षेप लिखें।
भूमण्डलीकरण (Globalization) के सकारात्मक परिणामों की विवेचना कीजिए।
सकारात्मक परिणामों में व्यापार/निवेश में वृद्धि, प्रौद्योगिकी/ज्ञान का प्रसार, प्रतिस्पर्धा से बेहतर गुणवत्ता व कम कीमतें, नए रोज़गार/सेवाक्षेत्र का विस्तार, उपभोक्ता-चयन की विविधता, वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाओं से उद्यमिता के अवसर, तथा सांस्कृतिक/शैक्षणिक आदान-प्रदान शामिल हैं। यदि समावेशी नीतियाँ हों तो गरीबी-घटाव, कौशल-विकास और आधारभूत ढाँचे में तेज़ी भी संभव होती है।
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आर्थिक लाभ:
उदारीकरण से बाज़ार बड़े हुए; एफडीआई/एफपीआई ने पूँजी व तकनीक लाई, उत्पादनशीलता बढ़ी। प्रतिस्पर्धा नवाचार व कुशलता प्रोत्साहित करती है—ई-कॉमर्स, आईटी सेवाएँ, पर्यटन जैसे क्षेत्रों में उछाल दिखा।
उपभोक्ता/कौशल प्रभाव:
ग्लोबल ब्रांड व मानक गुणवत्ता बढ़ाते हैं; अंतरराष्ट्रीय सहयोग से कौशल-मानक, प्रमाणन और रोज़गार-योग्यता सुधरती है।
ज्ञान/संस्कृति:
शैक्षणिक साझेदारियाँ, छात्र-विनिमय, ओपन साइंस व डिजिटल मंच विचारों का तीव्र प्रसार करते हैं।
समावेशन की शर्त:
लाभों के न्यायसंगत वितरण हेतु सामाजिक सुरक्षा, पुन:कौशल, एमएसएमई सहायता, क्षेत्रीय संतुलन और पर्यावरणीय सुरक्षा आवश्यक हैं—तभी सकारात्मक असर व्यापक बनता है। Quick Tip: लाभों को \(\textbf{आर्थिक, उपभोक्ता/कौशल, ज्ञान/संस्कृति}\) श्रेणियों में बाँटें; अंत में \(\textbf{समावेशी शर्तें}\) अवश्य लिखें।
विभिन्न कार्यक्रमों/कार्यक्षालाओं में बालिकाओं के साथ होने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार का वर्णन कीजिए।
बालिकाओं से जुड़ा भेदभाव भागीदारी-सीमाएँ, रूढ़ धारणाएँ, असुरक्षित परिवेश, संसाधनों/स्कॉलरशिप का असमान आवंटन, बोलने के मौक़ों की कमी, पुरुष-प्रभुत्वशील नेतृत्व, लैंगिक टिप्पणियाँ, और शौचालय/स्वास्थ्य-सुविधा की अनुपलब्धता में दिखता है। परिणामस्वरूप उपस्थिति घटती, आत्मविश्वास प्रभावित होता, कौशल/नेतृत्व अवसर छिनते हैं; लैंगिक-संवेदनशील ढाँचा व शून्य-सहिष्णुता नीति आवश्यक है।
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रूप-रेखाएँ:
चयन/नामांकन में पूर्वाग्रह, गैर-समावेशी समय-सारिणी, सुरक्षा/यातायात बाधाएँ, तथा मेंटरिंग में लड़कों को प्राथमिकता। मंच-समिति में महिलाओं का अल्प प्रतिनिधित्व व निर्णय-निर्माण से बहिष्करण भी आम है।
परिणाम:
कौशल-विकास, नेटवर्किंग और करियर-ट्रैक पर नकारात्मक प्रभाव; आत्म-प्रभावकारिता घटती है और “स्टिरियोटाइप थ्रेट” प्रदर्शन कम करता है।
उपाय:
जेंडर-ऑडिट, पंजीयन में समान अवसर, सुरक्षित परिवहन/शौचालय/एमएचएम किट, प्रशिक्षित पोषक-परामर्शदाता, शून्य-सहिष्णुता के साथ शिकायत-निवारण तंत्र; कोटा/टारगेट के जरिए पैनल/नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी; पेरेंट-समुदाय की संवेदनशीलता। Quick Tip: हर उत्तर में \(\textbf{रूप}\)–\(\textbf{परिणाम}\)–\(\textbf{उपाय}\) त्रय रखें; इससे विश्लेषण पूर्ण और स्कोर-उन्मुख बनता है।
एक पितृसत्तात्मक परिवार में प्रजनन-संबंधी लिंग-भेद की चर्चा कीजिए।
पितृसत्ता में पुत्र-प्राथमिकता, परिवार-आकार के फैसलों में पुरुष व ससुराल पक्ष का प्रभुत्व, गर्भनिरोध व गर्भावस्था-देखभाल पर महिलाओं की सीमित स्वायत्तता, प्रसवोत्तर पोषण/विश्राम की उपेक्षा, तथा बेटियों के जन्म पर भेदभाव दिखता है। यह महिलाओं के स्वास्थ्य-अधिकार, शिक्षा और आर्थिक सहभागिता को दीर्घकालिक रूप से नुकसान पहुँचाता है।
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निर्णय-प्रक्रिया:
परिवार नियोजन, जन्म-अंतराल, संस्थागत प्रसव जैसे फैसले प्रायः पुरुष/बुज़ुर्ग लेते हैं; महिलाओं की सहमति औपचारिक रह जाती है।
पुत्र-प्राथमिकता:
वंश, उत्तराधिकार व वृद्धावस्था-सुरक्षा की धारणाएँ बेटियों के प्रति निवेश घटाती हैं; चयनात्मक गर्भपात/देखभाल-भेद जोखिम बढ़ाते हैं।
स्वास्थ्य/पोषण:
गर्भावस्था जाँच, आयरन-फोलिक एसिड, टीकाकरण, विश्राम—सांस्कृतिक नियम व काम-भार के कारण अधूरे रहते हैं; प्रसवोत्तर देखभाल व मानसिक स्वास्थ्य पर कम ध्यान।
परिवर्तन-रणनीति:
महिलाओं की शिक्षा/रोज़गार, पुरुष-भागीदारी वाले कार्यक्रम, सामुदायिक संवाद, कानूनी प्रवर्तन (पीसीपीएनडीटी), और स्वास्थ्य-तंत्र की महिलाओं-केंद्रित सेवाएँ—ये मिलकर पितृसत्तात्मक भेद को घटाते हैं। Quick Tip: \(\textbf{निर्णय-प्रक्रिया, पुत्र-प्राथमिकता, स्वास्थ्य-सेवा, समाधान}\)—इन चार उपशीर्षकों में बिंदुवार लिखें।
राष्ट्रीय एकीकरण की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
राष्ट्रीय एकीकरण विविध भाषाओं, धर्मों, जातियों व क्षेत्रों के बीच साझा नागरिकता, संवैधानिक मूल्यों, समान अवसर और क़ानून के समक्ष समानता पर आधारित सामूहिकता है। इसकी विशेषताएँ—एकता में विविधता, लोकतांत्रिक सहभागिता, सामाजिक-न्याय, समावेशी विकास, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, क्षेत्रीय संतुलन, तथा राष्ट्र-हित में संकटकालीन एकजुटता—हैं; शिक्षा/मीडिया/संस्थाएँ इसे मजबूत करती हैं।
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वैचारिक आधार:
संविधान, राष्ट्रीय प्रतीक, अधिकारों/कर्तव्यों और संघीय ढाँचे के प्रति निष्ठा नागरिकों को साझा पहचान देता है।
सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष:
भाषायी/धार्मिक विविधता का सम्मान, अंत:सांस्कृतिक संवाद, और समान सार्वजनिक स्थान/उत्सव एकता बढ़ाते हैं।
आर्थिक-राजनीतिक तत्त्व:
समावेशी विकास, क्षेत्रीय संतुलन, गतिशीलता/रोज़गार के अवसर, और प्रो-पुअर नीतियाँ疎-विभाजनों को घटाती हैं; सहभागितापूर्ण लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका व मुक्त मीडिया विश्वास पैदा करते हैं।
चुनौतियाँ व उपाय:
सांप्रदायिकता, अलगाववाद, फेक-न्यूज़, असमानता से दरारें पड़ती हैं; नागरिक-शिक्षा, भावनात्मक एकता कार्यक्रम, अंतर-राज्यीय सहयोग, और सामाजिक-न्याय परियोजनाएँ टिकाऊ एकीकरण सुनिश्चित करती हैं। Quick Tip: उत्तर को \(\textbf{वैचारिक, सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक-राजनीतिक, चुनौतियाँ/उपाय}\) ढाँचे में व्यवस्थित करें—उदाहरण जोड़ें।







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