JAC Board is conducting the Class 12 Hindi A Board Exam 2026 on February 18, 2026. Class 12 Hindi A Question Paper with Solution PDF will be available here for download.
The official question paper of JAC Board Class 12 Hindi A Board Exam 2026 is provided below. Students can download the official paper in PDF format for reference.
JAC Board Class 12 2026 Hindi A Question Paper with Solution PDF
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उल्टा पिरामिड शैली किसे कहते हैं? इसके विभिन्न चरणों (मुखड़ा, बॉडी और समापन) को समझाइए।
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N/A Quick Tip: उल्टा पिरामिड = सबसे महत्वपूर्ण जानकारी पहले, कम महत्वपूर्ण बाद में। क्रम याद रखें: \textbf{मुखड़ा → बॉडी → समापन}
'खोजपरक पत्रकारिता' और 'एडवोकेसी पत्रकारिता' में क्या अंतर है?
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Concept:
पत्रकारिता के विभिन्न रूप समाज में अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। खोजपरक पत्रकारिता (Investigative Journalism) का उद्देश्य छिपे हुए तथ्यों को उजागर करना होता है, जबकि एडवोकेसी पत्रकारिता (Advocacy Journalism) किसी विशेष विचार, नीति या सामाजिक मुद्दे के समर्थन में की जाती है। दोनों के दृष्टिकोण, उद्देश्य और कार्यशैली में स्पष्ट अंतर होता है।
1. खोजपरक पत्रकारिता:
इसका मुख्य उद्देश्य छिपी हुई सच्चाइयों, घोटालों या भ्रष्टाचार को उजागर करना होता है।
पत्रकार स्वयं गहन अनुसंधान, दस्तावेज़ों की जाँच और साक्ष्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करता है।
इसमें निष्पक्षता और तथ्यों की प्रमाणिकता पर विशेष बल दिया जाता है।
यह अक्सर सत्ता, प्रशासन या संस्थानों की जवाबदेही तय करने का कार्य करती है।
2. एडवोकेसी पत्रकारिता:
इसका उद्देश्य किसी विशेष विचारधारा, नीति या सामाजिक मुद्दे का समर्थन करना होता है।
इसमें पत्रकार या मीडिया संस्थान किसी पक्ष का खुलकर समर्थन करते हैं।
तर्क और विश्लेषण के माध्यम से जनमत को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है।
यह सामाजिक परिवर्तन या जागरूकता लाने के लिए प्रयुक्त होती है।
मुख्य अंतर:
\begin{tabular{|p{5cm|p{5cm|
\hline
खोजपरक पत्रकारिता & एडवोकेसी पत्रकारिता
\hline
छिपे तथ्यों का खुलासा करती है & किसी विचार या नीति का समर्थन करती है
\hline
निष्पक्षता पर बल & पक्षधरता स्पष्ट होती है
\hline
साक्ष्य और अनुसंधान आधारित & तर्क और विचार आधारित
\hline
जवाबदेही सुनिश्चित करना लक्ष्य & जनमत निर्माण लक्ष्य
\hline
\end{tabular
निष्कर्ष:
खोजपरक पत्रकारिता का उद्देश्य सत्य को सामने लाना और समाज में पारदर्शिता स्थापित करना है, जबकि एडवोकेसी पत्रकारिता किसी विशेष विचार या मुद्दे के समर्थन में जनमत तैयार करने का कार्य करती है। दोनों ही लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, परंतु उनकी कार्यशैली और दृष्टिकोण अलग-अलग होते हैं। Quick Tip: याद रखें — \textbf{खोजपरक} = तथ्य खोजकर उजागर करना \textbf{एडवोकेसी} = किसी विचार/मुद्दे का समर्थन करना
भारत में छपने वाला पहला हिंदी समाचार पत्र — नाम और वर्ष
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भारत में छपने वाला पहला हिंदी समाचार पत्र उदंत मार्तंड था। इसका प्रकाशन 30 मई 1826 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) से हुआ था। इसके संस्थापक और संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल थे।
यह हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है और भारतीय भाषा पत्रकारिता के इतिहास में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। Quick Tip: पहला हिंदी समाचार पत्र = \textbf{उदंत मार्तंड} प्रकाशन वर्ष = \textbf{1826}
समाचार लेखन के 'छह ककार' (क्या, कौन, कहाँ, कब, क्यों और कैसे) कौन से हैं?
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Concept:
समाचार लेखन में ‘छह ककार’ (Six W’s and One H) अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसके माध्यम से किसी भी समाचार को पूर्ण और स्पष्ट बनाया जाता है। इन छह प्रश्नों के उत्तर देने से पाठक को घटना की पूरी जानकारी मिल जाती है। पत्रकारिता में इसे समाचार की बुनियादी संरचना माना जाता है।
छह ककार (Six Kakar):
क्या (What) — घटना क्या हुई?
कौन (Who) — इसमें कौन शामिल है?
कहाँ (Where) — घटना कहाँ हुई?
कब (When) — घटना कब हुई?
क्यों (Why) — घटना क्यों हुई?
कैसे (How) — घटना कैसे घटी?
महत्व:
समाचार को पूर्ण और संतुलित बनाते हैं।
पाठक की जिज्ञासा का समाधान करते हैं।
उल्टा पिरामिड शैली में मुखड़े (Lead) का आधार बनते हैं।
समाचार की विश्वसनीयता और स्पष्टता बढ़ाते हैं।
निष्कर्ष:
समाचार लेखन के छह ककार पत्रकारिता की आधारशिला हैं। इनके माध्यम से समाचार संपूर्ण, स्पष्ट और प्रभावी बनता है, जिससे पाठक को कम समय में पूरी जानकारी मिल जाती है। Quick Tip: छह ककार याद रखें: \textbf{क्या, कौन, कहाँ, कब, क्यों, कैसे} = पूर्ण समाचार की कुंजी
चिड़िया के पैरों में चंचलता क्यों आ जाती है?
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Concept:
चिड़िया स्वभाव से अत्यंत चंचल और सक्रिय जीव होती है। उसका जीवन निरंतर गति, सतर्कता और स्वतंत्र उड़ान से जुड़ा होता है। इसलिए उसके व्यवहार में फुर्ती और हलचल स्वाभाविक रूप से दिखाई देती है।
व्याख्या:
चिड़िया के पैरों में चंचलता कई कारणों से आ जाती है—
वह हमेशा भोजन की तलाश में इधर-उधर फुदकती रहती है।
उसे हर समय संभावित खतरे से सतर्क रहना पड़ता है, इसलिए वह एक जगह स्थिर नहीं रहती।
उड़ान भरने की तत्परता के कारण उसके शरीर में निरंतर गतिशीलता बनी रहती है।
उसकी स्वतंत्र और स्वच्छंद प्रकृति उसे चंचल बनाती है।
निष्कर्ष:
अतः चिड़िया के पैरों में चंचलता उसके स्वभाव, सतर्कता और निरंतर गतिशील जीवन के कारण आती है। यह उसकी स्वतंत्रता और जीवंतता का प्रतीक है। Quick Tip: चिड़िया = स्वभाव से चंचल कारण: भोजन की खोज + सतर्कता + उड़ान की तत्परता
राम ने लक्ष्मण के वियोग में अपनी दशा की तुलना किन-किन चीज़ों से की है?
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Concept:
राम और लक्ष्मण का संबंध गहरे प्रेम, समर्पण और भ्रातृभाव का प्रतीक है। जब राम को लक्ष्मण के वियोग या संकट का अनुभव होता है, तो वे अपनी व्यथा को व्यक्त करने के लिए विभिन्न उपमाओं (तुलनाओं) का सहारा लेते हैं। इन उपमाओं के माध्यम से उनकी करुणा और भावनात्मक गहराई प्रकट होती है।
तुलनाएँ:
राम ने लक्ष्मण के वियोग में अपनी दशा की तुलना निम्न चीज़ों से की है—
जल बिना मछली — जैसे मछली पानी के बिना तड़पती है, वैसे ही वे लक्ष्मण के बिना व्याकुल हैं।
मणि बिना सर्प — जैसे सर्प मणि के बिना निरर्थक लगता है, वैसे ही वे लक्ष्मण के बिना स्वयं को अधूरा मानते हैं।
पंख बिना पक्षी — जैसे पक्षी पंखों के बिना उड़ नहीं सकता, वैसे ही लक्ष्मण के बिना उनका जीवन असहाय प्रतीत होता है।
सूर्य बिना दिन / चंद्रमा बिना रात्रि — जैसे इन तत्वों के बिना प्रकृति अधूरी है, वैसे ही लक्ष्मण के बिना उनका अस्तित्व अधूरा है।
भावार्थ:
इन उपमाओं के माध्यम से राम यह दर्शाते हैं कि लक्ष्मण उनके जीवन का अभिन्न अंग हैं। उनके बिना वे स्वयं को असहाय, अधूरा और अत्यंत दुखी अनुभव करते हैं। यह भ्रातृ प्रेम की चरम अभिव्यक्ति है। Quick Tip: मुख्य उपमाएँ याद रखें: मछली बिना जल, सर्प बिना मणि, पक्षी बिना पंख = लक्ष्मण के बिना राम की व्यथा
बच्चों की तुलना तितलियों की दुनिया से क्यों की गई है?
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Concept:
साहित्य में बच्चों की तुलना अक्सर प्रकृति की सुंदर और कोमल वस्तुओं से की जाती है। तितलियाँ सुंदरता, चंचलता, स्वतंत्रता और रंग-बिरंगी दुनिया का प्रतीक होती हैं। इसी कारण बच्चों की दुनिया को तितलियों की दुनिया के समान बताया गया है।
व्याख्या:
बच्चों की तुलना तितलियों की दुनिया से निम्न कारणों से की गई है—
चंचलता: जैसे तितलियाँ एक फूल से दूसरे फूल पर मंडराती रहती हैं, वैसे ही बच्चे भी चंचल और फुदकने वाले होते हैं।
निर्मलता और मासूमियत: तितलियों की कोमलता बच्चों की निष्कपटता का प्रतीक है।
रंग-बिरंगी दुनिया: तितलियों की तरह बच्चों की कल्पनाएँ भी रंगों और सपनों से भरी होती हैं।
स्वतंत्रता: तितलियाँ खुले आकाश में स्वतंत्र उड़ती हैं, उसी प्रकार बच्चे भी बंधनों से मुक्त होकर जीना चाहते हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य: दोनों ही प्रकृति की सुंदरतम अभिव्यक्तियाँ मानी जाती हैं।
भावार्थ:
लेखक बच्चों की दुनिया की सुंदरता, कोमलता और स्वतंत्रता को दर्शाने के लिए तितलियों का प्रतीक प्रयोग करता है। यह तुलना बच्चों के मन की निश्छलता और जीवन की रंगीनता को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है। Quick Tip: बच्चे = तितलियाँ कारण: चंचलता + मासूमियत + रंगीन कल्पना + स्वतंत्रता
भक्तिन का वास्तविक नाम क्या था और वह इसे लोगों से क्यों छुपाती थी?
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Concept:
यह प्रश्न महादेवी वर्मा के संस्मरणात्मक लेख ‘भक्तिन’ से संबंधित है। इस रचना में लेखिका ने एक साधारण ग्रामीण स्त्री के जीवन, संघर्ष और व्यक्तित्व का मार्मिक चित्रण किया है। ‘भक्तिन’ नाम उसका वास्तविक नाम नहीं, बल्कि एक दिया गया संबोधन है।
वास्तविक नाम:
भक्तिन का वास्तविक नाम लछमिया (या लक्ष्मी) था।
नाम छुपाने का कारण:
वह अपना वास्तविक नाम लोगों से छुपाती थी, इसके पीछे कई कारण थे—
हीनभावना: उसे अपना नाम साधारण और ग्रामीण लगने के कारण संकोच होता था।
नई पहचान: वह अपने भक्तिभाव और सेवा-भाव के कारण ‘भक्तिन’ कहलाना पसंद करती थी।
सम्मान की भावना: ‘भक्तिन’ नाम उसे सामाजिक सम्मान और विशिष्ट पहचान देता था।
अतीत से दूरी: वह अपने पुराने दुखद जीवन और परिस्थितियों से अलग नई पहचान बनाना चाहती थी।
निष्कर्ष:
भक्तिन का वास्तविक नाम लछमिया था, जिसे वह अपने साधारण और संघर्षपूर्ण अतीत के कारण छुपाती थी। ‘भक्तिन’ नाम उसके व्यक्तित्व, सेवा-भाव और नई पहचान का प्रतीक बन गया था। Quick Tip: भक्तिन का असली नाम = \textbf{लछमिया छुपाने का कारण = संकोच + नई पहचान + सम्मान की चाह
लेखक ने 'बाज़ारूपन' से क्या तात्पर्य बताया है? ग्राहक को बाज़ार जाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
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Concept:
यह प्रश्न ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ से संबंधित है, जिसमें लेखक ने आधुनिक उपभोक्तावाद और बाज़ार की मानसिकता का विश्लेषण किया है। लेखक ‘बाज़ारूपन’ शब्द के माध्यम से उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिसमें मनुष्य की सोच, व्यवहार और संबंध भी बाज़ार के प्रभाव में आ जाते हैं।
बाज़ारूपन का अर्थ:
लेखक के अनुसार ‘बाज़ारूपन’ का तात्पर्य है—
हर वस्तु और संबंध को लाभ-हानि के आधार पर देखना।
आवश्यकता से अधिक उपभोग की मानसिकता विकसित होना।
दिखावे और आकर्षण के कारण अनावश्यक वस्तुएँ खरीदना।
मनुष्य का स्वयं भी वस्तु की तरह बाज़ार का हिस्सा बन जाना।
ग्राहक को बाज़ार जाते समय ध्यान रखने योग्य बातें:
आवश्यकता को प्राथमिकता दें: केवल जरूरत की वस्तुएँ ही खरीदें।
दिखावे से बचें: चमक-दमक और विज्ञापनों के प्रभाव में न आएँ।
संयम रखें: लालच और तात्कालिक आकर्षण से बचना चाहिए।
बजट का ध्यान रखें: अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही खरीदारी करें।
सजग उपभोक्ता बनें: गुणवत्ता और उपयोगिता को महत्व दें।
निष्कर्ष:
लेखक बाज़ारूपन से सावधान करते हुए बताता है कि यदि व्यक्ति सजग न रहे तो वह बाज़ार की चकाचौंध में अपनी स्वतंत्र सोच खो सकता है। इसलिए ग्राहक को विवेक, संयम और आवश्यकता के आधार पर ही बाज़ार का व्यवहार करना चाहिए। Quick Tip: बाज़ारूपन = आवश्यकता से अधिक उपभोग + दिखावा उपाय: विवेकपूर्ण खरीदारी, जरूरत को प्राथमिकता
महामारी के समय ढोलक की आवाज़ गाँव वालों के लिए संजीवनी का काम कैसे करती थी?
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Concept:
यह प्रश्न फणीश्वरनाथ रेणु के आंचलिक साहित्य से संबंधित है, जिसमें ग्रामीण जीवन की संवेदनाएँ और सामूहिक भावनाएँ जीवंत रूप में चित्रित होती हैं। महामारी जैसे संकट के समय गाँव में भय, निराशा और असहायता का वातावरण छा जाता था। ऐसे समय में ढोलक की आवाज़ आशा और जीवन का प्रतीक बन जाती थी।
व्याख्या:
महामारी के समय ढोलक की आवाज़ गाँव वालों के लिए संजीवनी का काम निम्न प्रकार से करती थी—
आशा का संचार: ढोलक की ध्वनि सुनकर लोगों को लगता था कि जीवन अभी शेष है और सामान्यता लौट सकती है।
भय का निवारण: महामारी के कारण फैले सन्नाटे और डर को यह आवाज़ तोड़ देती थी।
सामूहिकता की भावना: ढोलक की थाप लोगों को यह एहसास कराती थी कि वे अकेले नहीं हैं, पूरा गाँव साथ है।
जीवन के उत्साह का प्रतीक: संगीत जीवन और उल्लास का प्रतीक है, जो निराश मन में ऊर्जा भर देता था।
मानसिक संबल: यह ध्वनि लोगों को मानसिक शक्ति और धैर्य प्रदान करती थी।
निष्कर्ष:
इस प्रकार महामारी के भयावह वातावरण में ढोलक की आवाज़ गाँव वालों के लिए आशा, साहस और जीवन का संदेश लेकर आती थी। वह निराशा के बीच संजीवनी की तरह काम करती थी और लोगों के मन में जीने की शक्ति भर देती थी। Quick Tip: ढोलक की आवाज़ = आशा + साहस + सामूहिकता महामारी में जीवन का प्रतीक
अंबेडकर के अनुसार एक 'आदर्श समाज' की क्या विशेषताएँ होनी चाहिए?
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Concept:
यह प्रश्न डॉ. भीमराव अंबेडकर के सामाजिक विचारों से संबंधित है। अंबेडकर ने ऐसे समाज की कल्पना की थी जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित हो। उनके अनुसार आदर्श समाज वही है जिसमें मनुष्य को मनुष्य होने के नाते सम्मान मिले और किसी प्रकार का भेदभाव न हो।
आदर्श समाज की प्रमुख विशेषताएँ:
समानता (Equality): समाज में सभी व्यक्तियों को समान अधिकार और अवसर मिलें, जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव न हो।
स्वतंत्रता (Liberty): हर व्यक्ति को विचार, अभिव्यक्ति और जीवन जीने की स्वतंत्रता प्राप्त हो।
बंधुत्व (Fraternity): समाज में पारस्परिक भाईचारा और सहयोग की भावना हो, जिससे सामाजिक एकता बनी रहे।
सामाजिक गतिशीलता: व्यक्ति को अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिले, जन्म के आधार पर सीमाएँ न हों।
न्यायपूर्ण व्यवस्था: समाज में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित हो।
मानव गरिमा का सम्मान: प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान की रक्षा हो।
निष्कर्ष:
अंबेडकर के अनुसार आदर्श समाज वही है जिसमें समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का संतुलन हो। ऐसा समाज भेदभाव और अन्याय से मुक्त होकर मानवीय मूल्यों पर आधारित होता है और लोकतंत्र की सच्ची भावना को साकार करता है। Quick Tip: अंबेडकर का आदर्श समाज = \textbf{समानता + स्वतंत्रता + बंधुत्व} (Equality, Liberty, Fraternity)
यशोधर बाबू की पुरानी और नई पीढ़ी के बीच वैचारिक मतभेद (Generation Gap) के मुख्य कारण क्या थे?
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Concept:
यह प्रश्न ‘वापसी’ पाठ से संबंधित है, जिसमें यशोधर बाबू के माध्यम से पुरानी और नई पीढ़ी के बीच उत्पन्न वैचारिक दूरी को दर्शाया गया है। बदलते समय, जीवनशैली और मूल्यों के कारण दोनों पीढ़ियों के दृष्टिकोण में टकराव दिखाई देता है।
मुख्य कारण:
जीवन मूल्यों में अंतर:
यशोधर बाबू परंपरागत मूल्यों, सादगी और अनुशासन को महत्व देते थे, जबकि नई पीढ़ी आधुनिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती थी।
जीवनशैली का अंतर:
पुरानी पीढ़ी सादगीपूर्ण और संयमित जीवन जीती थी, जबकि नई पीढ़ी भौतिक सुख-सुविधाओं और आरामदायक जीवन की ओर आकर्षित थी।
संचार की कमी:
दोनों पीढ़ियों के बीच संवाद की कमी के कारण एक-दूसरे की भावनाओं और विचारों को समझने में दूरी बढ़ गई।
आधुनिकता बनाम परंपरा:
यशोधर बाबू परंपराओं से जुड़े हुए थे, जबकि नई पीढ़ी नए विचारों और बदलते सामाजिक मानकों को अपनाने के पक्ष में थी।
अपेक्षाओं का टकराव:
यशोधर बाबू परिवार से सम्मान और अपनापन चाहते थे, जबकि नई पीढ़ी अपने व्यक्तिगत जीवन और स्वतंत्र निर्णयों को अधिक महत्व देती थी।
निष्कर्ष:
यशोधर बाबू और नई पीढ़ी के बीच वैचारिक मतभेद बदलते समय, जीवन मूल्यों और सोच के अंतर के कारण उत्पन्न हुए। यह पीढ़ियों के बीच स्वाभाविक टकराव को दर्शाता है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता आमने-सामने आ जाती हैं। Quick Tip: Generation Gap के कारण: परंपरा बनाम आधुनिकता + जीवनशैली का अंतर + संवाद की कमी
लेखक की पढ़ने की इच्छा और उसके पिता के विरोध के बीच के संघर्ष का वर्णन कीजिए।
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Concept:
यह प्रश्न उस प्रसंग से संबंधित है जहाँ लेखक के भीतर शिक्षा प्राप्त करने की तीव्र इच्छा है, लेकिन उसके पिता पारंपरिक सोच और सामाजिक परिस्थितियों के कारण इसका विरोध करते हैं। इस संघर्ष में एक ओर ज्ञान की ललक है, तो दूसरी ओर पारिवारिक दबाव और रूढ़िवादी मानसिकता।
संघर्ष का वर्णन:
पढ़ने की तीव्र इच्छा:
लेखक बचपन से ही पढ़ने-लिखने के प्रति उत्सुक था। उसे शिक्षा के माध्यम से अपने जीवन को बेहतर बनाने की आशा थी।
पिता का विरोध:
लेखक के पिता पारंपरिक विचारों के थे और पढ़ाई को व्यावहारिक जीवन के लिए अनावश्यक मानते थे। वे चाहते थे कि लेखक घरेलू या पारिवारिक कार्यों में हाथ बँटाए।
आर्थिक और सामाजिक कारण:
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, इसलिए पिता पढ़ाई को समय और धन की बर्बादी समझते थे।
आंतरिक द्वंद्व:
लेखक एक ओर पिता का सम्मान करता था, तो दूसरी ओर अपनी शिक्षा की आकांक्षा को छोड़ना नहीं चाहता था। यह स्थिति उसके भीतर गहरा मानसिक संघर्ष उत्पन्न करती है।
दृढ़ निश्चय:
विरोध के बावजूद लेखक ने पढ़ने की इच्छा को जीवित रखा और अवसर मिलते ही शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया।
निष्कर्ष:
लेखक और उसके पिता के बीच यह संघर्ष परंपरा और प्रगति के टकराव का प्रतीक है। अंततः लेखक की शिक्षा के प्रति दृढ़ इच्छा यह दर्शाती है कि ज्ञान की चाह सामाजिक बाधाओं से भी बड़ी होती है। Quick Tip: संघर्ष = पढ़ने की ललक बनाम पिता का विरोध कारण: परंपरागत सोच + आर्थिक कठिनाई
'मुअनजो-दड़ो' को 'जल संस्कृति' (Water Culture) क्यों कहा जाता है?
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Concept:
मुअनजो-दड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख नगर था, जो अपनी उन्नत नगर-योजना और जल-प्रबंधन प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ जल से जुड़ी व्यवस्थाएँ इतनी विकसित थीं कि इसे ‘जल संस्कृति’ का प्रतीक माना जाता है।
कारण:
उन्नत जल-निकासी प्रणाली:
मुअनजो-दड़ो में पक्की नालियों और ढकी हुई जल-निकासी व्यवस्था थी, जो उस समय की अत्यंत विकसित तकनीक को दर्शाती है।
सार्वजनिक स्नानागार (ग्रेट बाथ):
यहाँ विशाल सार्वजनिक स्नानागार मिला है, जो जल के धार्मिक और सामाजिक महत्व को दर्शाता है।
कुएँ और जल-स्रोत:
लगभग हर घर या मोहल्ले में कुएँ थे, जिससे जल की उपलब्धता और उपयोगिता स्पष्ट होती है।
स्वच्छता पर जोर:
जल के उचित उपयोग और निकासी से यह पता चलता है कि लोग स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति सजग थे।
सांस्कृतिक महत्व:
स्नान और जल से जुड़े अनुष्ठान वहाँ की सामाजिक और धार्मिक जीवनशैली का हिस्सा थे।
निष्कर्ष:
मुअनजो-दड़ो में जल-प्रबंधन, स्वच्छता और जल के सांस्कृतिक महत्व के प्रमाण स्पष्ट रूप से मिलते हैं। इसी कारण इसे ‘जल संस्कृति’ कहा जाता है, जो उस सभ्यता की वैज्ञानिक सोच और उन्नत जीवन-पद्धति को दर्शाता है। Quick Tip: मुअनजो-दड़ो = उन्नत जल व्यवस्था (नालियाँ + कुएँ + ग्रेट बाथ) = जल संस्कृति







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