UP Board Class 10 Hindi Question Paper 2024 PDF (Code 801 HD) is available for download here. The Hindi exam was conducted on February 22, 2024 in the Morning Shift from 8:30 AM to 11:45 AM. The total marks for the theory paper are 70. Students reported the paper to be easy to moderate.
UP Board Class 10 Hindi Question Paper 2024 (Code 801 HD) with Solutions
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हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ निबन्धकार, आलोचक एवं इतिहासकार के रूप में जाने जाते हैं
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में पूछा गया है कि हिन्दी साहित्य में कौन व्यक्ति श्रेष्ठ निबंधकार, आलोचक और इतिहासकार, इन तीनों रूपों में प्रसिद्ध है।
Step 2: Detailed Explanation
आचार्य रामचंद्र शुक्ल को हिन्दी साहित्य में एक युग-प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है।
निबन्धकार: उनके निबंध संग्रह 'चिंतामणि' को हिन्दी निबंध की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि माना जाता है।
आलोचक: उन्होंने हिन्दी आलोचना को एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। 'रस मीमांसा' उनका प्रसिद्ध आलोचना ग्रंथ है।
इतिहासकार: उनका ग्रंथ 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' आज भी सबसे प्रामाणिक और मानक इतिहास ग्रंथ माना जाता है।
इन तीनों क्षेत्रों में उनके अतुलनीय योगदान के कारण, उन्हें ही सर्वश्रेष्ठ निबंधकार, आलोचक और इतिहासकार माना जाता है।
Step 3: Final Answer
अतः, सही उत्तर (C) रामचन्द्र शुक्ल है।
Quick Tip: हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखकों और उनके योगदान के क्षेत्रों को याद रखना महत्वपूर्ण है। आचार्य शुक्ल का नाम आलोचना, निबंध और साहित्य-इतिहास के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
'महादेवी वर्मा' द्वारा रचित रेखाचित्र है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में महादेवी वर्मा द्वारा रचित रेखाचित्र का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation
महादेवी वर्मा को हिन्दी साहित्य में छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है। वे एक उत्कृष्ट कवयित्री होने के साथ-साथ एक सिद्ध गद्य-लेखिका भी थीं। 'अतीत के चलचित्र' और 'स्मृति की रेखाएँ' उनके सबसे प्रसिद्ध रेखाचित्र-संग्रह हैं, जिनमें उन्होंने अपने जीवन में आए साधारण और उपेक्षित पात्रों का अत्यंत मार्मिक और सजीव चित्रण किया है।
अन्य विकल्प:
'जिन्दगी मुस्कुराई' और 'बाजे पायलिया के घुँघरू' कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' की रचनाएँ हैं।
Step 3: Final Answer
अतः, महादेवी वर्मा द्वारा रचित रेखाचित्र 'अतीत के चलचित्र' है। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: प्रमुख लेखकों की महत्वपूर्ण रचनाओं और उनकी विधाओं (कविता, कहानी, उपन्यास, रेखाचित्र आदि) की एक सूची बनाकर याद करें। महादेवी वर्मा के रेखाचित्र 'अतीत के चलचित्र' और 'स्मृति की रेखाएँ' बहुत प्रसिद्ध हैं।
'कोणार्क' के रचनाकार हैं
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में 'कोणार्क' नामक रचना के लेखक का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation
'कोणार्क' एक प्रसिद्ध नाटक है जिसके रचनाकार जगदीश चन्द्र माथुर हैं। यह नाटक 1951 में प्रकाशित हुआ था। यह कोणार्क के सूर्य मंदिर के निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है और इसमें सर्जक और शासक के बीच के संघर्ष को दर्शाया गया है। जगदीश चन्द्र माथुर एक प्रसिद्ध नाटककार और साहित्यकार थे। 'पहला राजा' और 'शारदीया' उनके अन्य प्रसिद्ध नाटक हैं।
Step 3: Final Answer
अतः, 'कोणार्क' के रचनाकार जगदीश माथुर हैं। सही उत्तर (A) है।
Quick Tip: हिन्दी के प्रमुख नाटकों और उनके नाटककारों के नाम याद रखें। 'कोणार्क' (जगदीश चन्द्र माथुर), 'आषाढ़ का एक दिन' (मोहन राकेश), और 'ध्रुवस्वामिनी' (जयशंकर प्रसाद) कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण नाटक हैं।
'चलो चाँद पर चलें' के रचनाकार हैं
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में 'चलो चाँद पर चलें' नामक रचना के लेखक का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation
'चलो चाँद पर चलें' एक प्रसिद्ध बाल-साहित्य और विज्ञान-लेखन की कृति है। इसके रचनाकार जयप्रकाश भारती हैं। जयप्रकाश भारती जी ने बच्चों के लिए सरल भाषा में विज्ञान से संबंधित अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'अनंत आकाश : अथाह सागर', 'हिमालय की पुकार' आदि प्रमुख हैं। 'चलो चाँद पर चलें' उनकी सबसे लोकप्रिय कृतियों में से एक है।
Step 3: Final Answer
अतः, 'चलो चाँद पर चलें' के रचनाकार जयप्रकाश 'भारती' हैं। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: लेखक के उपनाम पर ध्यान दें। 'भारती' उपनाम धर्मवीर भारती और जयप्रकाश भारती दोनों के साथ है, जिससे भ्रम हो सकता है। रचना के साथ लेखक का पूरा नाम याद रखना महत्वपूर्ण है।
'तूफानों के बीच' रचना की विधा है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में 'तूफानों के बीच' रचना की साहित्यिक विधा पूछी गई है।
Step 2: Detailed Explanation
'तूफानों के बीच' प्रसिद्ध साहित्यकार रांगेय राघव द्वारा रचित एक 'रिपोर्ताज' है। रिपोर्ताज गद्य की एक आधुनिक विधा है जिसमें किसी घटना का आँखों-देखा और कलात्मक वर्णन किया जाता है। यह रचना 1942 के बंगाल के अकाल की विभीषिका पर आधारित है। इसे हिन्दी का प्रथम रिपोर्ताज भी माना जाता है।
Step 3: Final Answer
अतः, 'तूफानों के बीच' की विधा रिपोर्ताज है। सही उत्तर (D) है।
Quick Tip: हिन्दी गद्य की विभिन्न विधाओं (जैसे- कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, रिपोर्ताज, संस्मरण, रेखाचित्र) और उनकी प्रमुख रचनाओं से परिचित होना आवश्यक है।
'केशवदास' किस काल के कवि हैं ?
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में कवि केशवदास का काव्य-काल पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation
केशवदास हिन्दी साहित्य के रीतिकाल के प्रवर्तक और एक प्रमुख कवि माने जाते हैं। यद्यपि कालक्रम की दृष्टि से वे भक्तिकाल और रीतिकाल की संधि-रेखा पर आते हैं, तथापि उनकी रचनाओं की प्रवृत्ति (लक्षण-ग्रंथों का निर्माण, अलंकार-प्रियता, पांडित्य-प्रदर्शन) पूर्णतः रीतिकालीन है। उन्हें 'कठिन काव्य का प्रेत' भी कहा जाता है। 'रामचंद्रिका', 'कविप्रिया', और 'रसिकप्रिया' उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
Step 3: Final Answer
अतः, केशवदास रीतिकाल के कवि हैं। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: हिन्दी साहित्य के कालों (आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल) और उनके प्रमुख कवियों की सूची बनाकर याद करें। केशवदास, बिहारी और भूषण रीतिकाल के प्रमुख कवि हैं।
'भारत-भारती' के रचनाकार हैं
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में 'भारत-भारती' नामक काव्य-कृति के रचनाकार का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation
'भारत-भारती' के रचनाकार राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। यह रचना 1912 ई. में प्रकाशित हुई थी। इस कृति में गुप्त जी ने भारत के गौरवशाली अतीत, दुखद वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस रचना ने भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी रचना की लोकप्रियता के कारण महात्मा गाँधी ने मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी थी।
Step 3: Final Answer
अतः, 'भारत-भारती' के रचनाकार मैथिलीशरण गुप्त हैं। सही उत्तर (A) है।
Quick Tip: कुछ रचनाएँ अपने रचनाकारों को उपाधियाँ दिलाने के लिए प्रसिद्ध हैं। 'भारत-भारती' और मैथिलीशरण गुप्त का 'राष्ट्रकवि' बनना इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
'भारतेन्दु युग' की समयावधि है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में हिन्दी साहित्य के 'भारतेन्दु युग' की सही समयावधि पूछी गई है।
Step 2: Detailed Explanation
आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रथम चरण 'भारतेन्दु युग' के नाम से जाना जाता है। इसकी समयावधि को लेकर विद्वानों में थोड़ा मतभेद है, लेकिन सर्वमान्य रूप से सन् 1868 ई. (जब भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'कविवचनसुधा' पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया) से लेकर सन् 1900 ई. (जब 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ और द्विवेदी युग की शुरुआत हुई) तक की अवधि को भारतेन्दु युग माना जाता है। इस युग में गद्य का विकास हुआ और राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ।
Step 3: Final Answer
अतः, दिए गए विकल्पों में सबसे उपयुक्त समयावधि (B) सन् 1868 से 1900 ई० तक है।
Quick Tip: हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के विभिन्न युगों (भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद आदि) की समयावधि और उनकी प्रमुख प्रवृत्तियों को याद रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
'सुमित्रानन्दन पन्त' की रचना नहीं है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में पूछा गया है कि दिए गए विकल्पों में से कौन सी रचना सुमित्रानन्दन पन्त की नहीं है।
Step 2: Detailed Explanation
ग्राम्या, स्वर्णधूलि, और युगान्त ये तीनों सुमित्रानन्दन पन्त की प्रसिद्ध काव्य-कृतियाँ हैं। पन्त जी छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं और उन्हें 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है।
कामायनी छायावाद के दूसरे प्रमुख स्तंभ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक महाकाव्य है। इसे छायावाद की सर्वश्रेष्ठ कृति और आधुनिक हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है।
Step 3: Final Answer
अतः, 'कामायनी' सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: छायावाद के चार स्तंभ - प्रसाद, पन्त, निराला, और महादेवी वर्मा की प्रमुख रचनाओं को अच्छी तरह याद कर लें। 'कामायनी' (प्रसाद) और 'चिदंबरा' (पन्त) अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।
'रीतिमुक्त' काव्यधारा के कवि हैं
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में रीतिकाल की 'रीतिमुक्त' काव्यधारा के कवि का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation
रीतिकाल को तीन प्रमुख धाराओं में बाँटा गया है:
रीतिबद्ध: वे कवि जिन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र के नियमों (रीति) में बँधकर लक्षण-ग्रंथों की रचना की। जैसे - केशवदास, पद्माकर।
रीतिसिद्ध: वे कवि जिन्होंने रीति-ग्रंथ नहीं लिखे, किन्तु काव्य-रचना करते समय रीति के नियमों का पूरा ध्यान रखा। जैसे - बिहारीलाल।
रीतिमुक्त: वे कवि जिन्होंने रीति के बंधनों को पूरी तरह त्यागकर स्वच्छंद प्रेम की कविताएँ लिखीं। घनानन्द इस धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। आलम, बोधा और ठाकुर अन्य रीतिमुक्त कवि हैं।
Step 3: Final Answer
अतः, घनानन्द 'रीतिमुक्त' काव्यधारा के कवि हैं। सही उत्तर (D) है।
Quick Tip: रीतिकाल की तीनों धाराओं (रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त) के कम से कम एक-एक प्रमुख कवि का नाम और उनकी विशेषता याद रखें। यह वर्गीकरण बहुत महत्वपूर्ण है।
हा ! रघुनन्दन प्रेम परीते ।
तुम बिन जियत बहुत दिन बीते ।।
उपर्युक्त पंक्तियों में प्रयुक्त रस है
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Step 1: Understanding the Question
दी गई काव्य पंक्तियों में निहित रस को पहचानना है।
Step 2: Key Concept
करुण रस का स्थायी भाव 'शोक' होता है। जब किसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु के विनाश, अनिष्ट या उससे स्थायी वियोग के कारण हृदय में शोक का भाव उत्पन्न होता है, तो वहाँ करुण रस की निष्पत्ति होती है।
Step 3: Detailed Explanation
इन पंक्तियों में, वक्ता अपने प्रिय 'रघुनंदन' (श्री राम) के वियोग में अत्यधिक दुःख और पीड़ा व्यक्त कर रहा है। "हा!", "तुम बिन जियत" जैसे शब्द सीधे-सीधे शोक और वेदना के भाव को प्रकट करते हैं। यहाँ प्रिय के वियोग से उत्पन्न स्थायी दुःख का वर्णन है, जो करुण रस का स्थायी भाव 'शोक' को जाग्रत करता है।
Step 4: Final Answer
अतः, इन पंक्तियों में करुण रस है। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: रस को पहचानने के लिए उसके स्थायी भाव पर ध्यान दें। वियोग श्रृंगार और करुण रस में भ्रम हो सकता है। यदि प्रिय से पुनः मिलने की आशा हो तो वियोग श्रृंगार होता है, परन्तु यदि वियोग स्थायी हो या किसी अनिष्ट की आशंका हो, तो करुण रस होता है। यहाँ स्थिति शोकपूर्ण है, इसलिए करुण रस है।
"ज्यौं आँखिनु सब देखियै, आँख न देखी जाँहि ।"
उपर्युक्त पंक्ति में कौन-सा अलंकार है ?
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Step 1: Understanding the Question
दी गई पंक्ति में प्रयुक्त अलंकार को पहचानना है।
Step 2: Detailed Explanation
इस पंक्ति का अर्थ है: "जिस प्रकार आँखों से सब कुछ देखा जाता है, किन्तु उन्हीं आँखों को स्वयं नहीं देखा जा सकता।"
यहाँ एक सामान्य कथन को स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण दिया गया है। जब किसी बात को कहकर उसे स्पष्ट करने के लिए कोई मिलता-जुलता उदाहरण दिया जाता है, तो वहाँ 'उदाहरण अलंकार' होता है। 'ज्यौं' (जैसे) वाचक शब्द का प्रयोग उदाहरण देने के लिए किया गया है।
दिए गए विकल्पों में 'उदाहरण अलंकार' नहीं है। यह प्रश्न के विकल्पों की एक त्रुटि है, क्योंकि यह दोहा 'उदाहरण अलंकार' का एक प्रसिद्ध उदाहरण है।
उपमा: में दो भिन्न वस्तुओं में समानता दिखाई जाती है (जैसे- चाँद सा मुखड़ा)। यहाँ ऐसा नहीं है।
रूपक: में उपमेय पर उपमान का आरोप होता है (जैसे- चरण-कमल)। यहाँ ऐसा नहीं है।
उत्प्रेक्षा: में उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाती है (मानो, जानो आदि)। यहाँ संभावना नहीं, बल्कि एक तथ्यपूर्ण उदाहरण है।
चूंकि दिए गए विकल्पों में से कोई भी सटीक नहीं है, यह प्रश्न त्रुटिपूर्ण है। इसका सबसे सही उत्तर 'उदाहरण अलंकार' है, जो विकल्प में मौजूद नहीं है।
Quick Tip: कभी-कभी प्रश्न-पत्रों में गलत विकल्प दिए जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में, सही अवधारणा को समझें और यदि संभव हो तो प्रश्न को छोड़ दें या सबसे निकटतम विकल्प चुनें। 'ज्यौं', 'जैसे' आदि वाचक शब्द उपमा और उदाहरण दोनों में आ सकते हैं, लेकिन उनके प्रयोग के संदर्भ को समझना महत्वपूर्ण है।
'सोरठा' छन्द के पहले एवं तीसरे चरण में मात्राएँ होती हैं
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में 'सोरठा' छंद के पहले और तीसरे चरण में मात्राओं की संख्या पूछी गई है।
Step 2: Key Concept
सोरठा एक अर्धसम मात्रिक छंद है। यह दोहा छंद का ठीक उल्टा होता है। इसमें चार चरण होते हैं।
विषम चरण (पहले और तीसरे): इनमें 11-11 मात्राएँ होती हैं।
सम चरण (दूसरे और चौथे): इनमें 13-13 मात्राएँ होती हैं।
Step 3: Detailed Explanation
प्रश्न के अनुसार, सोरठा के पहले और तीसरे चरण में मात्राओं की संख्या बतानी है। परिभाषा के अनुसार, इसके पहले चरण में 11 मात्राएँ और तीसरे चरण में भी 11 मात्राएँ होती हैं।
Step 4: Final Answer
अतः, सोरठा के पहले एवं तीसरे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: दोहा और सोरठा एक दूसरे के उल्टे होते हैं, इसे याद रखें। \textbf{दोहा:} 13-11, 13-11
\textbf{सोरठा:} 11-13, 11-13
यह याद रखने से आप कभी भ्रमित नहीं होंगे।
'सुगम' शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में 'सुगम' शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग को पहचानने के लिए कहा गया है।
Step 2: Key Concept
उपसर्ग वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द के आरम्भ में जुड़कर उसके अर्थ में विशेषता या परिवर्तन ला देते हैं।
Step 3: Detailed Explanation
'सुगम' शब्द दो भागों से मिलकर बना है:
\[ सुगम = सु + गम \]
यहाँ 'गम' एक मूल शब्द है जिसका अर्थ 'जाना' या 'पहुँच' होता है। इसके आगे 'सु' उपसर्ग लगा है, जिसका अर्थ 'अच्छा' या 'सरल' होता है। इस प्रकार 'सुगम' का अर्थ है 'जहाँ सरलता से पहुँचा जा सके'।
Step 4: Final Answer
अतः, 'सुगम' शब्द में 'सु' उपसर्ग है। सही उत्तर (A) है।
Quick Tip: किसी शब्द में उपसर्ग पहचानने के लिए, शब्द में से मूल शब्द को अलग करने का प्रयास करें। जो सार्थक शब्दांश आगे बचता है, वही उपसर्ग होता है।
'नवरत्न' में समास है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में 'नवरत्न' शब्द में निहित समास का प्रकार पूछा गया है।
Step 2: Key Concept
द्विगु समास वह समास होता है जिसका पहला पद (पूर्वपद) संख्यावाचक विशेषण होता है और समस्त पद किसी समूह का बोध कराता है।
Step 3: Detailed Explanation
'नवरत्न' शब्द का समास-विग्रह करने पर होता है - 'नौ रत्नों का समूह'।
यहाँ पहला पद 'नव' (अर्थात् नौ) एक संख्या है, और पूरा शब्द 'नवरत्न' नौ रत्नों के समूह को दर्शा रहा है। चूँकि पहला पद संख्यावाचक है, इसलिए यहाँ द्विगु समास है।
Step 4: Final Answer
अतः, 'नवरत्न' में द्विगु समास है। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: समास पहचानने के लिए शब्द का विग्रह करना सबसे अच्छा तरीका है। यदि विग्रह करने पर पहला पद संख्या निकले और पूरा शब्द समूह का बोध कराए, तो वह द्विगु समास होगा। जैसे - चौराहा (चार राहों का समूह), त्रिभुज (तीन भुजाओं का समूह)।
'पृथ्वी' का पर्यायवाची शब्द नहीं है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में पूछा गया है कि दिए गए विकल्पों में से कौन सा शब्द 'पृथ्वी' का पर्यायवाची नहीं है।
Step 2: Detailed Explanation
भू, धरा, वसुधा: ये तीनों शब्द पृथ्वी के प्रसिद्ध पर्यायवाची हैं। पृथ्वी के अन्य पर्यायवाची शब्द हैं - भूमि, अचला, मही, धरणी, वसुन्धरा आदि।
प्रसून: यह शब्द 'फूल' का पर्यायवाची है। फूल के अन्य पर्यायवाची शब्द हैं - पुष्प, सुमन, कुसुम, गुल आदि।
Step 3: Final Answer
अतः, 'प्रसून' शब्द पृथ्वी का पर्यायवाची नहीं है। सही उत्तर (D) है।
Quick Tip: महत्वपूर्ण शब्दों जैसे पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि, कमल, सूर्य, चन्द्रमा आदि के पर्यायवाची शब्दों को याद करना परीक्षा के लिए बहुत उपयोगी होता है।
'त्वाम्' शब्द में विभक्ति एवं वचन है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में संस्कृत शब्द 'त्वाम्' की विभक्ति और वचन पूछा गया है।
Step 2: Key Concept
'त्वाम्' शब्द 'युष्मद्' (तुम) सर्वनाम का रूप है। हमें युष्मद् के शब्द-रूप का ज्ञान होना चाहिए।
Step 3: Detailed Explanation
युष्मद् (तुम) सर्वनाम के एकवचन के रूप इस प्रकार हैं:
प्रथमा: त्वम् (तुमने)
द्वितीया: त्वाम् (तुमको)
तृतीया: त्वया (तुमसे/तुम्हारे द्वारा)
चतुर्थी: तुभ्यम् (तुम्हारे लिए)
पंचमी: त्वत् (तुमसे)
षष्ठी: तव (तुम्हारा)
सप्तमी: त्वयि (तुममें/तुम पर)
इस तालिका से स्पष्ट है कि 'त्वाम्' युष्मद् शब्द का द्वितीया विभक्ति, एकवचन का रूप है।
Step 4: Final Answer
अतः, 'त्वाम्' में द्वितीया विभक्ति, एकवचन है। सही उत्तर (A) है।
Quick Tip: संस्कृत व्याकरण में 'युष्मद्' (तुम) और 'अस्मद्' (मैं) के शब्द-रूप अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। इन्हें अच्छी तरह याद कर लें।
अर्थ के आधार पर वाक्य के भेद हैं
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में अर्थ के आधार पर वाक्य के भेदों की संख्या पूछी गई है।
Step 2: Detailed Explanation
अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद होते हैं। वे इस प्रकार हैं:
विधानवाचक वाक्य: जिससे किसी कार्य के होने की सामान्य सूचना मिलती है। (जैसे - सूर्य पूर्व में उगता है।)
निषेधवाचक वाक्य: जिससे किसी कार्य के न होने का बोध होता है। (जैसे - वह नहीं पढ़ता है।)
प्रश्नवाचक वाक्य: जिसमें कोई प्रश्न पूछा जाता है। (जैसे - तुम क्या कर रहे हो?)
आज्ञावाचक वाक्य: जिसमें आज्ञा, उपदेश या अनुरोध किया जाता है। (जैसे - कृपया शांत रहें।)
इच्छावाचक वाक्य: जिसमें इच्छा, शुभकामना या आशीर्वाद व्यक्त किया जाता है। (जैसे - आपकी यात्रा मंगलमय हो।)
संदेहवाचक वाक्य: जिसमें किसी कार्य के होने में संदेह व्यक्त किया जाता है। (जैसे - शायद आज वर्षा हो।)
विस्मयादिबोधक वाक्य: जिसमें हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य आदि भाव व्यक्त होते हैं। (जैसे - वाह! कितना सुंदर दृश्य है।)
संकेतवाचक वाक्य: जिसमें एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर करता है। (जैसे - यदि तुम परिश्रम करते, तो सफल हो जाते।)
Step 3: Final Answer
अतः, अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद हैं। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: वाक्य के भेद दो आधारों पर किए जाते हैं: (1) अर्थ के आधार पर (8 भेद) और (2) रचना के आधार पर (3 भेद - सरल, संयुक्त, मिश्र)। प्रश्न को ध्यान से पढ़ें कि किस आधार पर भेद पूछे गए हैं।
'कर्तृवाच्य' में प्रधानता होती है
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में पूछा गया है कि कर्तृवाच्य (Active Voice) में किसकी प्रधानता होती है।
Step 2: Key Concept
वाच्य क्रिया का वह रूप है जिससे यह पता चलता है कि वाक्य में क्रिया का मुख्य विषय कर्ता, कर्म या भाव में से कौन है। वाच्य के तीन भेद हैं:
कर्तृवाच्य: जिसमें कर्ता की प्रधानता होती है और क्रिया का लिंग-वचन कर्ता के अनुसार होता है।
कर्मवाच्य: जिसमें कर्म की प्रधानता होती है और क्रिया का लिंग-वचन कर्म के अनुसार होता है।
भाववाच्य: जिसमें भाव की प्रधानता होती है और क्रिया सदैव पुल्लिंग, एकवचन में रहती है।
Step 3: Detailed Explanation
'कर्तृवाच्य' के नाम से ही स्पष्ट है 'कर्तृ' अर्थात् 'कर्ता'। इस वाच्य में वाक्य का केंद्रबिंदु कर्ता होता है। क्रिया का रूप कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार ही परिवर्तित होता है।
उदाहरण: राम पुस्तक पढ़ता है। (कर्ता 'राम' पुल्लिंग, एकवचन है, इसलिए क्रिया 'पढ़ता है' भी पुल्लिंग, एकवचन है।)
सीता पुस्तक पढ़ती है। (कर्ता 'सीता' स्त्रीलिंग, एकवचन होने पर क्रिया 'पढ़ती है' हो गई।)
Step 4: Final Answer
अतः, 'कर्तृवाच्य' में कर्ता की प्रधानता होती है। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: वाच्य को पहचानने के लिए, क्रिया का लिंग और वचन बदलकर देखें। यदि क्रिया कर्ता के अनुसार बदलती है, तो कर्तृवाच्य है। यदि कर्म के अनुसार बदलती है, तो कर्मवाच्य है।
जिनके अलग-अलग रूप वाक्यों में मिलते हैं, वे पद कहलाते हैं
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Step 1: Understanding the Question
प्रश्न में उन पदों के बारे में पूछा गया है जिनके रूप वाक्यों में प्रयोग के अनुसार बदल जाते हैं।
Step 2: Detailed Explanation
प्रयोग के आधार पर शब्द दो प्रकार के होते हैं:
विकारी पद: वे पद जिनमें लिंग, वचन, कारक आदि के कारण 'विकार' अर्थात् परिवर्तन आ जाता है। इनके रूप वाक्यों में बदल जाते हैं। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया विकारी पद हैं।
उदाहरण: लड़का जाता है। \(\rightarrow\) लड़के जाते हैं। \(\rightarrow\) लड़की जाती है। (यहाँ 'लड़का' शब्द बदल रहा है)।
अविकारी पद (या अव्यय): वे पद जिनमें लिंग, वचन, कारक आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता। इनके रूप हमेशा एक जैसे रहते हैं। क्रिया-विशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक अविकारी पद हैं।
उदाहरण: राम धीरे चलता है। सीता धीरे चलती है। वे धीरे चलते हैं। (यहाँ 'धीरे' शब्द नहीं बदला)।
प्रश्न के अनुसार, वे पद जिनके अलग-अलग रूप वाक्यों में मिलते हैं, 'विकारी पद' कहलाते हैं।
Step 3: Final Answer
अतः, सही उत्तर (A) विकारी पद है।
Quick Tip: 'विकार' का अर्थ है 'परिवर्तन'। तो 'विकारी' का अर्थ हुआ 'परिवर्तनशील'। इस तरह आप आसानी से याद रख सकते हैं कि जिन पदों में परिवर्तन होता है, वे विकारी कहलाते हैं।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
जो वृद्ध हो गये हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आये हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है । वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं । तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत । वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है । तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं । तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक । इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है ।
(i) उपर्युक्त अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
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प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित ‘क्या लिखूँ?’ नामक पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हैं।
Quick Tip: संदर्भ लिखते समय पाठ और लेखक का नाम स्पष्ट रूप से लिखना चाहिए। इसे रेखांकित करने से अच्छे अंक प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
जो वृद्ध हो गये हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आये हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है । वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं । तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत । वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है । तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं । तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक । इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
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लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी कहते हैं कि युवा और वृद्ध दोनों ही अपने-अपने दृष्टिकोण के कारण वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। युवा पीढ़ी भविष्य के सुनहरे सपनों में खोई रहती है और वह चाहती है कि भविष्य की कल्पनाएँ और योजनाएँ शीघ्र-से-शीघ्र वर्तमान में साकार हो जाएँ। वे भविष्य को लेकर इतने अधीर होते हैं कि उसे तत्काल यथार्थ में देखना चाहते हैं। इसके विपरीत, वृद्ध लोग अपने अतीत के गौरवशाली क्षणों और उपलब्धियों में जीते हैं। वे अपने पुराने समय को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और चाहते हैं कि वही पुराना समय, वही मूल्य और वही परम्पराएँ वर्तमान में भी लौट आएँ।
इस प्रकार, युवा पीढ़ी परिवर्तन और क्रांति की समर्थक होती है, जबकि वृद्ध पीढ़ी अपनी पुरानी परम्पराओं और अतीत के गौरव की रक्षा करना चाहती है। इन दोनों पीढ़ियों के दृष्टिकोणों में यही मौलिक अंतर है।
Quick Tip: रेखांकित अंश की व्याख्या करते समय, उसे सरल भाषा में अपने शब्दों में स्पष्ट करें। लेखक के मूल भाव को पकड़ना महत्वपूर्ण है, जो यहाँ युवा और वृद्ध पीढ़ी के बीच वैचारिक द्वंद्व को दर्शाना है।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
जो वृद्ध हो गये हैं ... इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है ।
(iii) लेखक ने वर्तमान काल को सुधारों का काल क्यों कहा है ?
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लेखक ने वर्तमान काल को सुधारों का काल इसलिए कहा है क्योंकि वर्तमान में हमेशा दो पीढ़ियों - युवा और वृद्ध - के बीच वैचारिक द्वंद्व और संघर्ष चलता रहता है।
युवा पीढ़ी भविष्य को देखकर वर्तमान में क्रांतिकारी परिवर्तन और सुधार लाना चाहती है।
वृद्ध पीढ़ी अतीत के गौरव को आधार मानकर वर्तमान को उसी के अनुरूप ढालना चाहती है और उसकी कमियों को दूर करने का प्रयास करती है।
इन दोनों पीढ़ियों के खींचतान और असंतोष के कारण, वर्तमान काल कभी भी स्थिर नहीं रहता। इसमें निरंतर परिवर्तन और सुधार की प्रक्रिया चलती रहती है। इसी कारण लेखक ने वर्तमान को 'सुधारों का काल' कहा है।
Quick Tip: गद्यांश पर आधारित प्रश्नों का उत्तर देते समय, उत्तर गद्यांश के मूल भाव पर ही आधारित होना चाहिए। इस प्रश्न का उत्तर गद्यांश की अंतिम पंक्तियों में निहित है।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वंद्विता से होता है, क्योंकि भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता । यह एक ऐसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है, क्योंकि प्रतिद्वंद्विता से भी मनुष्य का विकास होता है । किन्तु, अगर आप संसार व्यापी सुयश चाहते हैं तो आप रसेल के मतानुसार, शायद नेपोलियन से स्पर्द्धा करेंगे । मगर, याद रखिए कि नेपोलियन भी सीजर से स्पर्द्धा करता था और सीजर सिकन्दर से तथा सिकन्दर हरकूलस से, जिस हरकूलस के बारे में इतिहासकारों का यह मत है कि वह कभी पैदा ही नहीं हुआ ।
(i) उपर्युक्त अवतरण के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
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प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा लिखित 'ईर्ष्या : तू न गई मेरे मन से' नामक निबंध से उद्धृत है।
Quick Tip: संदर्भ लिखते समय पाठ का नाम और लेखक का नाम सही-सही लिखना बहुत महत्वपूर्ण है। इसे काले पेन से या रेखांकित करके प्रस्तुत करने से अच्छे अंक मिलते हैं।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वंद्विता से होता है, क्योंकि भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता । यह एक ऐसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है, क्योंकि प्रतिद्वंद्विता से भी मनुष्य का विकास होता है । किन्तु, अगर आप संसार व्यापी सुयश चाहते हैं तो आप रसेल के मतानुसार, शायद नेपोलियन से स्पर्द्धा करेंगे । मगर, याद रखिए कि नेपोलियन भी सीजर से स्पर्द्धा करता था और सीजर सिकन्दर से तथा सिकन्दर हरकूलस से, जिस हरकूलस के बारे में इतिहासकारों का यह मत है कि वह कभी पैदा ही नहीं हुआ ।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
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लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' जी कहते हैं कि यद्यपि ईर्ष्या एक नकारात्मक मनोभाव है, परन्तु इसका एक सकारात्मक पहलू भी हो सकता है। ईर्ष्या की भावना प्रतिद्वंद्विता को जन्म देती है, और जब व्यक्ति किसी से प्रतिद्वंद्विता या प्रतिस्पर्धा करता है तो वह उससे आगे निकलने का प्रयास करता है। इस प्रयास में वह और अधिक परिश्रम करता है, अपनी क्षमताओं को निखारता है और नई ऊँचाइयों को प्राप्त करने की कोशिश करता है। इस प्रकार, प्रतिद्वंद्विता की भावना व्यक्ति को उन्नति और विकास के मार्ग पर अग्रसर कर सकती है। अतः, लेखक का मानना है कि प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित होकर मनुष्य अपना विकास कर सकता है, जो एक प्रकार से ईर्ष्या के पक्ष में जाने वाली बात है।
Quick Tip: व्याख्या करते समय, लेखक के दृष्टिकोण को समझना आवश्यक है। यहाँ लेखक ईर्ष्या के एक अप्रत्यक्ष लाभ, यानी प्रतिद्वंद्विता से होने वाले विकास, पर प्रकाश डाल रहे हैं।
निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वंद्विता से होता है ... वह कभी पैदा ही नहीं हुआ ।
(iii) लेखक के अनुसार प्रतिद्वंद्विता का सकारात्मक पक्ष क्या है ?
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लेखक के अनुसार प्रतिद्वंद्विता का सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे मनुष्य का विकास होता है।
जब कोई व्यक्ति किसी से प्रतिद्वंद्विता करता है, तो वह अपने प्रतिद्वंद्वी से बेहतर बनने और उससे आगे निकलने का प्रयास करता है। इस होड़ में वह अपनी कमियों को दूर करता है, अपने गुणों को विकसित करता है, और अधिक परिश्रम करने के लिए प्रेरित होता है। यह प्रेरणा और प्रयास अंततः उसे प्रगति और विकास के पथ पर ले जाते हैं। इस प्रकार, प्रतिद्वंद्विता मनुष्य को और अधिक सक्षम और सफल बनने में सहायता करती है, जो इसका सकारात्मक पक्ष है।
Quick Tip: इस प्रश्न का उत्तर सीधे-सीधे रेखांकित अंश में ही दिया गया है। गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ने से ऐसे प्रश्नों के उत्तर आसानी से मिल जाते हैं।
निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
मैया हौं न चरैहौं गाइ ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौं, मेरे पाइ पिराइ ।
जौ न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौंह दिवाइ ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालिन, गारी देति रिसाइ ।
मैं पठवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ ।
सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
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प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित भक्तिकाल की कृष्ण-भक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि सूरदास द्वारा रचित 'पद' शीर्षक से उद्धृत है। यह पद उनके प्रसिद्ध ग्रंथ 'सूरसागर' से लिया गया है। इस पद में कवि ने बालकृष्ण की गाय न चराने की हठ और माता यशोदा के वात्सल्यपूर्ण क्रोध का मनोहारी चित्रण किया है।
Quick Tip: संदर्भ लिखते समय कवि का नाम, कविता का शीर्षक और काव्य-ग्रंथ (यदि ज्ञात हो) का उल्लेख अवश्य करें। प्रसंग में पद का केंद्रीय भाव लिखने से उत्तर और भी प्रभावशाली हो जाता है।
... (उपरोक्त पद्यांश) ...
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
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व्याख्या: बालकृष्ण के मुख से यह शिकायत सुनकर कि सभी ग्वाल-बाल उनसे ही अपनी गायों को घिरवाते हैं, जिससे उनके पैरों में दर्द होने लगता है, माता यशोदा क्रोधित हो जाती हैं। वे ग्वालिनों को क्रोध में आकर गाली (उलाहना) देने लगती हैं। वे कहती हैं कि मैं तो अपने बालक (कृष्ण) को इसलिए वन में भेजती हूँ कि उसका मन बहल जाए, वह थोड़ा खेल-कूद आए। पर ये ग्वाल-बाल तो मेरे इतने छोटे से बालक को दौड़ा-दौड़ा कर मार डालते हैं (परेशान कर देते हैं)। सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा का यह क्रोध भी उनके कृष्ण के प्रति गहरे वात्सल्य (पुत्र-प्रेम) का ही एक रूप है।
Quick Tip: व्याख्या करते समय, प्रत्येक पंक्ति के भाव को स्पष्ट करें। माता यशोदा के क्रोध के पीछे छिपे वात्सल्य भाव को उजागर करना व्याख्या को और भी सुंदर बना देगा।
... (उपरोक्त पद्यांश) ...
(iii) बालकृष्ण गाय चराने क्यों नहीं जाना चाहते हैं ?
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बालकृष्ण गाय चराने इसलिए नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि दूसरे ग्वाल-बाल अपनी गायों को हाँकने और घेरने का काम भी उन्हीं से करवाते हैं।
इधर से उधर लगातार दौड़ने के कारण उनके नन्हे पैरों में दर्द होने लगता है ('मेरे पाइ पिराइ')। इसी शारीरिक कष्ट और ग्वालों के व्यवहार से परेशान होकर वे अपनी माता यशोदा से शिकायत करते हैं और अगले दिन गाय चराने न जाने का हठ करते हैं।
Quick Tip: पद्यांश पर आधारित प्रश्नों का उत्तर हमेशा पद्यांश में दी गई जानकारी के आधार पर ही दें। इस प्रश्न का उत्तर पद्यांश की दूसरी पंक्ति में स्पष्ट रूप से दिया गया है।
निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ में देना तुम फेंक ।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
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प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित राष्ट्रकवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित 'पुष्प की अभिलाषा' नामक कविता से उद्धृत है। यह कविता उनके काव्य-संग्रह 'युग-चरण' से ली गई है। इस कविता में कवि ने एक पुष्प के माध्यम से देश के प्रति त्याग और बलिदान की उत्कृष्ट भावना को व्यक्त किया है।
Quick Tip: संदर्भ में कवि का नाम, कविता का शीर्षक और कविता का मूल भाव लिखना एक पूर्ण उत्तर माना जाता है। माखनलाल चतुर्वेदी को 'एक भारतीय आत्मा' के उपनाम से भी जाना जाता है, इसका उल्लेख भी कर सकते हैं।
... (उपरोक्त पद्यांश) ...
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
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व्याख्या: कवि माखनलाल चतुर्वेदी पुष्प की अभिलाषा को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि हे वनमाली! मेरी इच्छा किसी देवकन्या के गहनों में गूँथे जाने की या किसी प्रेमी की माला में सजने की नहीं है। मेरी इच्छा यह भी नहीं है कि मैं सम्राटों के शव पर चढ़ाया जाऊँ या देवताओं के सिर पर चढ़कर अपने भाग्य पर अभिमान करूँ। मेरी तो बस एक ही इच्छा है कि तुम मुझे टहनी से तोड़ लेना और उस रास्ते पर फेंक देना, जिस रास्ते से होकर अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने के लिए अनेक वीर सैनिक जाते हैं। मैं उन वीरों के पैरों के नीचे आकर ही स्वयं को धन्य समझूँगा।
Quick Tip: व्याख्या करते समय, कविता के प्रतीकात्मक अर्थ को स्पष्ट करें। यहाँ पुष्प स्वयं कवि या देश के किसी भी नागरिक का प्रतीक है जो देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देना चाहता है।
... (उपरोक्त पद्यांश) ...
(iii) उपर्युक्त अवतरण में पुष्प किसका प्रतीक है ? पुष्प को किन चीजों की चाह नहीं है, और क्यों ?
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उपर्युक्त अवतरण में पुष्प एक देशभक्त नागरिक या स्वयं कवि का प्रतीक है, जो देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने को तत्पर है।
पुष्प को निम्नलिखित चीजों की चाह नहीं है:
देवबाला के गहनों में गूँथा जाना।
प्रेमी की माला में पिरोया जाना।
सम्राटों के शव पर डाला जाना।
देवताओं के सिर पर चढ़कर अपने भाग्य पर गर्व करना।
पुष्प को इन चीजों की चाह इसलिए नहीं है क्योंकि ये सभी व्यक्तिगत श्रृंगार, प्रेम, सम्मान और सौभाग्य के प्रतीक हैं। पुष्प के लिए ये सभी भोग-विलास और व्यक्तिगत सम्मान तुच्छ हैं। उसकी दृष्टि में सबसे बड़ा सम्मान और सबसे बड़ा धर्म मातृभूमि के लिए बलिदान होना है। वह व्यक्तिगत सुख और सम्मान के स्थान पर देश के लिए त्याग और समर्पण को अधिक महत्व देता है।
Quick Tip: इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर दो भागों में दें। पहले भाग में प्रतीक का अर्थ बताएँ और दूसरे भाग में बिंदुवार (bullet points) तरीके से क्या चाह नहीं है और उसका कारण स्पष्ट करें। इससे उत्तर व्यवस्थित और स्पष्ट हो जाता है।
निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
'विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एव' इति भारतीयसंस्कृतेः मूलम् । विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभिः एकम् एव ईश्वरं भजन्ते । अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, करीमः, रामः, रहीमः, जिनः, बुद्धः, ख्रिस्तः, अल्लाहः इत्यादीनि नामानि एकस्य एव परमात्मनः सन्ति । तम् एव ईश्वरं जनाः गुरुः इत्यपि मन्यते । अतः सर्वेषां मतानां समभावः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृतेः सन्देशः ।
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सन्दर्भ:
प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के 'संस्कृत खण्ड' में संकलित 'भारतीय संस्कृतिः' नामक पाठ से उद्धृत है। इस गद्यांश में भारतीय संस्कृति की ईश्वर-संबंधी मूल अवधारणा और सर्वधर्म समभाव की भावना पर प्रकाश डाला गया है।
हिन्दी में अनुवाद:
'संसार का रचयिता ईश्वर एक ही है' यह भारतीय संस्कृति का मूल (सिद्धांत) है। विभिन्न मतों को मानने वाले अनेक नामों से एक ही ईश्वर को भजते हैं। अग्नि, इन्द्र, कृष्ण, करीम, राम, रहीम, जिन, बुद्ध, ईसा मसीह, अल्लाह इत्यादि नाम एक ही परमात्मा के हैं। उसी ईश्वर को लोग 'गुरु' के रूप में भी मानते हैं। इसलिए, सभी मतों के प्रति समान भाव और सम्मान हमारी संस्कृति का सन्देश है।
Quick Tip: संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद करते समय, शब्दों के संधि-विच्छेद और विभक्ति पर ध्यान दें। जैसे 'एक एव' का अर्थ 'एक ही' है। वाक्य का भावार्थ समझकर सरल और स्पष्ट हिन्दी में अनुवाद करें।
निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
ताडितः चन्द्रशेखरः पुनः पुनः 'भारतं जयतु' इति वदति । (एवं स पञ्चदशकशाघातैः ताडितः) यदा चन्द्रशेखरः कारागारात् मुक्तः बहिः आगच्छति, तदैव सर्वे जनाः तं परितः वेष्टयन्ति, बहवः बालकाः तस्य पादयोः पतन्ति, तं मालाभिः अभिनन्दयन्ति च ।
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सन्दर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के 'संस्कृत खण्ड' में संकलित 'देशभक्तः चन्द्रशेखरः' नामक पाठ से लिया गया है। इसमें देशभक्त चन्द्रशेखर आज़ाद के न्यायालय में दिए गए साहसिक उत्तरों और उन पर हुए अत्याचार का वर्णन है।
हिन्दी में अनुवाद:
कोड़ों से पीटे जाते हुए चन्द्रशेखर बार-बार 'भारत माता की जय हो' ऐसा बोलते हैं। (इस प्रकार उन्हें पन्द्रह कोड़ों से पीटा गया)। जब चन्द्रशेखर कारागार से मुक्त होकर बाहर आते हैं, तभी सब लोग उन्हें चारों ओर से घेर लेते हैं, बहुत से बालक उनके पैरों पर गिरते हैं और मालाओं से उनका अभिनन्दन (स्वागत) करते हैं।
Quick Tip: अनुवाद करते समय कोष्ठक में दी गई जानकारी को भी अनुवाद में शामिल करना चाहिए। क्रिया के काल (भूतकाल, वर्तमानकाल) का विशेष ध्यान रखें ताकि अर्थ सही बना रहे।
दिए गए संस्कृत पद्यांश का सन्दर्भ सहित, हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
नितरां नीचोऽस्मीति त्वं खेदं कूप ! कदापि मा कृथाः ।
अत्यन्तसरस हृदयो यतः परेषां गुणग्रहीताऽसि ।।
View Solution
सन्दर्भ:
प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के 'संस्कृत खण्ड' के 'अन्योक्तिविलासः' नामक पाठ से उद्धृत है। इस श्लोक में कुएँ के माध्यम से किसी गुणी और सज्जन व्यक्ति को यह संदेश दिया गया है कि उसे अपनी विनम्र स्थिति पर दुखी नहीं होना चाहिए।
हिन्दी में अनुवाद:
हे कुएँ! 'मैं अत्यन्त नीचा (गहरा) हूँ' ऐसा सोचकर तुम कभी भी दुःख मत करो, क्योंकि तुम अत्यन्त सरस (जल से युक्त) हृदय वाले हो और दूसरों के गुणों (रस्सी) को ग्रहण करने वाले हो।
भावार्थ: हे गुणी व्यक्ति! तुम अपनी छोटी स्थिति को देखकर दुखी मत हो, क्योंकि तुम्हारा हृदय प्रेम से परिपूर्ण है और तुम दूसरों के गुणों को ग्रहण करने वाले हो।
Quick Tip: 'अन्योक्ति' का अर्थ है 'अन्य के प्रति उक्ति'। ऐसे श्लोकों का अनुवाद करते समय शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ उसका प्रतीकात्मक भावार्थ भी अवश्य लिखना चाहिए। यहाँ 'कूप' सज्जन व्यक्ति का, 'नीच' विनम्र स्थिति का, 'सरस हृदय' प्रेमपूर्ण हृदय का और 'गुण' रस्सी एवं सद्गुणों का प्रतीक है।
दिए गए संस्कृत पद्यांश का सन्दर्भ सहित, हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य भिषक् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ।।
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सन्दर्भ:
प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के 'संस्कृत खण्ड' में संकलित 'जीवन सूत्रानि' (जीवन के सूत्र) नामक पाठ से लिया गया है। यह श्लोक महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद का एक अंश है, जिसमें यक्ष के प्रश्न का युधिष्ठिर उत्तर दे रहे हैं।
हिन्दी में अनुवाद:
(युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि) प्रवास (यात्रा) में रहने वाले का मित्र धन (या ज्ञान) है, घर पर रहने वाले व्यक्ति की मित्र पत्नी है, रोगी का मित्र वैद्य (चिकित्सक) है और मरने वाले व्यक्ति का मित्र दान है।
Quick Tip: इस प्रकार के सूक्तिपरक श्लोकों का अनुवाद करते समय प्रत्येक शब्द के सही अर्थ को समझना आवश्यक है। 'सार्थः' का अर्थ यहाँ धन या ज्ञान दोनों हो सकता है, 'आतुरस्य' का अर्थ रोगी है, और 'भिषक्' का अर्थ वैद्य है।
'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के 'पंचम सर्ग' की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के पंचम सर्ग में कवि ने भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति और उसके बाद की घटनाओं का वर्णन किया है। इसकी कथावस्तु इस प्रकार है:
गाँधीजी के अथक प्रयासों और सत्याग्रह आंदोलनों के फलस्वरूप अंततः अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
चारों ओर स्वतंत्रता का उत्सव मनाया जा रहा था, किन्तु गाँधीजी इस उत्सव में सम्मिलित नहीं हुए। वे देश-विभाजन के कारण हुए साम्प्रदायिक दंगों से अत्यंत दुखी थे।
वे बंगाल के नोआखली क्षेत्र में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच शांति और सद्भाव स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे।
30 जनवरी, 1948 को जब वे दिल्ली में एक प्रार्थना सभा में जा रहे थे, तब नाथूराम गोडसे नामक एक व्यक्ति ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
गाँधीजी 'हे राम' कहकर पृथ्वी पर गिर पड़े और उनका नश्वर शरीर शांत हो गया। कवि कहता है कि यद्यपि गाँधीजी का भौतिक शरीर नष्ट हो गया, किन्तु उनके सत्य, अहिंसा और प्रेम के विचार आज भी अमर हैं और सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
Quick Tip: किसी सर्ग का कथानक लिखते समय, प्रमुख घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से लिखें। स्वतंत्रता, विभाजन का दुःख, नोआखली यात्रा और अंत में बलिदान - इन मुख्य बिंदुओं को अपने उत्तर में अवश्य शामिल करें।
'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के आधार पर 'महात्मा गाँधी' के चरित्र की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
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'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के नायक महात्मा गाँधी के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
अलौकिक महापुरुष: कवि ने गाँधीजी को एक साधारण मनुष्य न मानकर ईश्वर का दूत या अवतार माना है, जो भारत को मुक्ति दिलाने के लिए अवतरित हुए थे।
सत्य और अहिंसा के पुजारी: सत्य और अहिंसा उनके दो प्रमुख शस्त्र थे। उन्होंने बिना किसी हथियार के, इन्हीं सिद्धांतों के बल पर शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को पराजित किया।
हरिजनोद्धारक और समाज-सुधारक: गाँधीजी समाज में व्याप्त छुआछूत और ऊँच-नीच के भेदभाव के घोर विरोधी थे। उन्होंने अछूतों को 'हरिजन' (ईश्वर के लोग) नाम दिया और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
दृढ़-संकल्प और साहसी: वे अपने निश्चय के पक्के थे। एक बार जो ठान लेते थे, उसे पूरा करके ही दम लेते थे। दांडी यात्रा और भारत छोड़ो आंदोलन उनके दृढ़ संकल्प के प्रमाण हैं।
मानवता के अग्रदूत: वे केवल भारत के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के पथ-प्रदर्शक थे। उनके विचार आज भी विश्व को शांति और सद्भाव का मार्ग दिखाते हैं।
Quick Tip: गाँधीजी का चरित्र-चित्रण करते समय उनके प्रमुख सिद्धांतों (सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह) और सामाजिक कार्यों (हरिजनोद्धार) का उल्लेख करना अनिवार्य है। यह उनके चरित्र को समग्रता प्रदान करता है।
'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य के आधार पर जवाहरलाल नेहरू का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य के नायक पं. जवाहरलाल नेहरू हैं। कवि ने उनके विराट और बहुआयामी व्यक्तित्व का चित्रण किया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
दिव्य और अलौकिक पुरुष: कवि ने नेहरू जी को एक साधारण मानव न मानकर एक दिव्य पुरुष के रूप में चित्रित किया है, जिसके निर्माण में सम्पूर्ण भारत का योगदान है। वे हिमालय से ऊँचे और गंगा से पवित्र हैं।
महान राष्ट्र-प्रेमी: नेहरू जी एक महान देशभक्त थे। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए राजसी सुखों का त्याग कर दिया और अपने जीवन के कई बहुमूल्य वर्ष जेलों में बिताए।
समन्वयवादी व्यक्तित्व: उनके व्यक्तित्व में प्राचीन भारतीय संस्कृति और आधुनिक पाश्चात्य विचारों का अद्भुत समन्वय था। वे गाँधीजी के सत्य-अहिंसा के अनुयायी होने के साथ-साथ वैज्ञानिक प्रगति के भी प्रबल समर्थक थे।
विश्व-शांति के अग्रदूत: वे केवल भारत के नेता नहीं, बल्कि विश्व-नेता थे। उन्होंने 'पंचशील' और 'गुटनिरपेक्षता' के सिद्धांतों द्वारा विश्व को शांति और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाया।
भारत के भाग्य-विधाता: कवि उन्हें स्वतंत्र भारत का निर्माता और भाग्य-विधाता मानता है। वे भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाली कड़ी हैं और भारत की आशाओं के 'ज्योति पुंज' हैं।
Quick Tip: नेहरू जी का चरित्र-चित्रण करते समय, खण्डकाव्य के शीर्षक 'ज्योति जवाहर' की सार्थकता को उनके व्यक्तित्व से जोड़कर स्पष्ट करें। बताएँ कि किस प्रकार वे भारत के लिए प्रकाश और आशा के प्रतीक थे।
'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य के कथानक का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
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'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य का कथानक घटना-प्रधान न होकर भाव-प्रधान और चरित्र-प्रधान है। इसमें किसी एक कहानी का वर्णन नहीं है, बल्कि नायक जवाहरलाल नेहरू के विराट व्यक्तित्व का काव्यात्मक चित्रण है।
काव्य का आरम्भ स्वतंत्र भारत के नवनिर्माण के प्रश्न से होता है, जिसका नेतृत्व नेहरू जी कर रहे हैं।
कवि कल्पना करता है कि नेहरू रूपी 'लोकनायक' का निर्माण सम्पूर्ण भारत के योगदान से हुआ है। भारत के विभिन्न प्रदेशों, नदियों, पर्वतों और महापुरुषों ने अपने-अपने श्रेष्ठ गुण उन्हें प्रदान किए हैं। राजस्थान ने अपना शौर्य, महाराष्ट्र ने वीरता, दक्षिण ने कला, और गांधीजी ने सत्य-अहिंसा का गुण उन्हें दिया है।
इसमें नेहरू जी के स्वतंत्रता-संग्राम में योगदान, उनके जेल-जीवन और भारत की गौरवशाली संस्कृति की खोज का वर्णन है।
कवि ने उनकी राष्ट्रीय नीतियों (पंचवर्षीय योजनाएँ, औद्योगीकरण) और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों (पंचशील, गुटनिरपेक्षता) का भी उल्लेख किया है, जो उनके दूरदर्शी व्यक्तित्व को दर्शाती हैं।
अंत में, कवि नेहरू जी को एक ऐसे 'ज्योति पुंज' के रूप में स्थापित करता है जो भारत के गौरवशाली अतीत को वर्तमान से जोड़कर उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है। वे ही भारत के 'जवाहर' (रत्न) हैं और 'ज्योति' (प्रकाश) भी।
Quick Tip: सारांश लिखते समय यह स्पष्ट करें कि यह काव्य एक पारंपरिक कथा नहीं है, बल्कि नायक के गुणों और भारत की आत्मा के साथ उनके संबंध का एक प्रतीकात्मक चित्रण है।
'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग 'भामाशाह' की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य का सप्तम और अंतिम सर्ग 'भामाशाह' है। यह सर्ग महाराणा प्रताप के जीवन में एक नए मोड़ को दर्शाता है और इसमें भामाशाह की अद्वितीय देशभक्ति का वर्णन है। इसकी कथावस्तु इस प्रकार है:
महाराणा प्रताप अपनी निराशा और सीमित साधनों के कारण मेवाड़ छोड़कर बाहर जाने का निश्चय कर लेते हैं।
जब वे अपने परिवार के साथ मेवाड़ की सीमा पार कर रहे होते हैं, तभी उनका पुराना मंत्री भामाशाह वहाँ आ पहुँचता है।
भामाशाह प्रताप के चरणों में गिरकर उनसे मेवाड़ न छोड़ने की प्रार्थना करता है। वह कहता है कि जब तक उनका एक भी सैनिक जीवित है, प्रताप मेवाड़ नहीं छोड़ सकते।
भामाशाह अपनी और अपने पूर्वजों द्वारा संचित अपार धन-संपत्ति को प्रताप के चरणों में अर्पित कर देता है। यह धनराशि इतनी अधिक थी कि उससे कई वर्षों तक पच्चीस हजार सैनिकों की सेना का निर्वाह किया जा सकता था।
इस अप्रत्याशित सहायता और भामाशाह की स्वामी-भक्ति को देखकर प्रताप का हृदय द्रवित हो जाता है। उनकी निराशा आशा में बदल जाती है।
वे मेवाड़ वापस लौटने और मुगलों से पुनः संघर्ष करने का निश्चय करते हैं। भामाशाह के इस त्याग ने मेवाड़ के स्वतंत्रता-संग्राम में एक नई जान डाल दी।
Quick Tip: इस सर्ग का कथानक लिखते समय, भामाशाह के त्याग और महाराणा प्रताप के हृदय-परिवर्तन, इन दो मुख्य घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करें। यह सर्ग त्याग और देशभक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए ।
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'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के नायक महाराणा प्रताप हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
अद्वितीय देशभक्त: प्रताप अपनी मातृभूमि मेवाड़ से असीम प्रेम करते थे। उन्होंने मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
स्वाभिमानी: वे एक महान स्वाभिमानी पुरुष थे। उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने की अपेक्षा जंगलों में भटकना, घास की रोटियाँ खाना स्वीकार किया, परन्तु अपना मस्तक नहीं झुकाया।
वीर और साहसी: वे एक अतुलनीय वीर और साहसी योद्धा थे। सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में विशाल मुगल सेना का डटकर मुकाबला किया।
दृढ़-प्रतिज्ञ: वे अपनी प्रतिज्ञा के धनी थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक चित्तौड़ को मुक्त नहीं करा लेंगे, तब तक वे राजसी सुखों का भोग नहीं करेंगे। उन्होंने आजीवन अपनी इस कठोर प्रतिज्ञा का पालन किया।
त्याग और कष्ट-सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति: उनका जीवन त्याग और कष्टों को सहने का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने देश के लिए राजमहलों के सुखों को त्यागकर अपने परिवार के साथ वनों में घोर कष्ट सहे।
Quick Tip: महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण करते समय उनके 'स्वाभिमान' और 'देशभक्ति' जैसे गुणों पर विशेष बल दें। उनकी प्रतिज्ञाओं और कष्टपूर्ण जीवन का उल्लेख आपके उत्तर को अधिक प्रभावशाली बना देगा।
'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के 'प्रस्थान' सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए।
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'अग्रपूजा' खण्डकाव्य का 'प्रस्थान' सर्ग (प्रथम सर्ग) पाण्डवों के वनवास से लौटने और उनके भावी जीवन की चिंताओं पर आधारित है। इसका कथानक संक्षेप में इस प्रकार है:
पाण्डव बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास सफलतापूर्वक पूरा करके वापस लौटते हैं।
वे खाण्डवप्रस्थ नामक वन में अपना डेरा डालते हैं। यहाँ धर्मराज युधिष्ठिर अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। वे सोचते हैं कि क्या दुर्योधन बिना युद्ध के उनका आधा राज्य वापस करेगा।
युधिष्ठिर युद्ध की विभीषिका से परिचित हैं और किसी भी कीमत पर युद्ध को टालना चाहते हैं। वे अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ इस विषय पर विचार-विमर्श करते हैं।
द्रौपदी और भीम युद्ध के पक्ष में हैं, जबकि युधिष्ठिर शांति चाहते हैं।
अंत में, श्रीकृष्ण के सुझाव पर युधिष्ठिर हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान करते हैं ताकि शांतिपूर्वक अपना अधिकार प्राप्त करने का प्रयास किया जा सके।
इस सर्ग में कवि ने युधिष्ठिर की धर्मपरायणता, शांतिप्रियता और भविष्य की चिंताओं का सुंदर चित्रण किया है। यहीं से राजसूय यज्ञ की पृष्ठभूमि भी तैयार होती है।
Quick Tip: इस सर्ग का कथानक लिखते समय, युधिष्ठिर के अंतर्द्वंद्व (शांति और अधिकार के बीच) को प्रमुखता दें। यह सर्ग महाभारत की मुख्य कथा के आरंभ का बिंदु है, इसे ध्यान में रखकर लिखें।
'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के आधार पर 'श्रीकृष्ण' का चरित्र-चित्रण कीजिए।
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'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के नायक भगवान श्रीकृष्ण हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
लोक-रक्षक और धर्म-संस्थापक: श्रीकृष्ण का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करना और अधर्म का नाश करना है। वे दुष्टों का दमन करके सज्जनों की रक्षा करते हैं। शिशुपाल का वध उनके इसी रूप को प्रकट करता है।
महान राजनीतिज्ञ एवं कूटनीतिज्ञ: वे एक कुशल राजनीतिज्ञ हैं। वे युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ करने की प्रेरणा देते हैं ताकि भारत के सभी राजा एक छत्र के नीचे आ सकें और एक अखण्ड राष्ट्र का निर्माण हो।
विनयशील और निरभिमानी: अलौकिक शक्तियों के स्वामी होते हुए भी वे अत्यंत विनम्र हैं। वे युधिष्ठिर के यज्ञ में ब्राह्मणों के पैर धोने और जूठी पत्तलें उठाने जैसा सेवा-कार्य भी सहजता से करते हैं।
अपार शक्ति के स्वामी: वे अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न हैं। उनके सुदर्शन चक्र के तेज से सभी परिचित हैं। अग्रपूजा के समय वे अपने विराट रूप का प्रदर्शन करते हैं।
पाण्डवों के हितैषी: वे पाण्डवों के परम हितैषी और सच्चे पथ-प्रदर्शक हैं। वे हर संकट में उनकी सहायता करते हैं और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
Quick Tip: श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण करते समय उनके विभिन्न रूपों (जैसे- दैवीय, मानवीय, राजनीतिक) का उल्लेख करें। राजसूय यज्ञ में उनके सेवा-भाव और शिशुपाल-वध के समय उनके रौद्र-रूप, दोनों का वर्णन उत्तर को संतुलित बनाता है।
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए।
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'जय सुभाष' खण्डकाव्य का तृतीय सर्ग नायक सुभाष चन्द्र बोस के भारत से पलायन और विदेश में स्वतंत्रता के लिए किए गए प्रयासों पर आधारित है। इसका कथानक संक्षेप में इस प्रकार है:
अंग्रेज सरकार सुभाष बाबू को उनके कलकत्ता स्थित घर में नजरबन्द कर देती है।
सुभाष यह अनुभव करते हैं कि देश में रहकर स्वतंत्रता के लिए बड़ा आंदोलन चलाना संभव नहीं है। वे देश से बाहर जाकर अंग्रेजों के शत्रुओं से सहायता लेने की योजना बनाते हैं।
एक रात वे एक पठान मौलवी का वेश धारण कर, अपना नाम जियाउद्दीन रखकर, पुलिस की कड़ी निगरानी को धता बताते हुए अपने घर से निकल पड़ते हैं।
वे अत्यंत कठिनाइयों का सामना करते हुए पेशावर, काबुल और रूस होते हुए जर्मनी पहुँचते हैं।
जर्मनी में वे हिटलर से मिलते हैं और भारत की स्वतंत्रता के लिए सहायता माँगते हैं। वहाँ से वे जापान जाते हैं।
जापान में वे रासबिहारी बोस द्वारा स्थापित 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का नेतृत्व सँभालते हैं। वे सैनिकों में एक नया जोश भरते हैं और उन्हें 'दिल्ली चलो' का नारा देते हैं।
यह सर्ग सुभाष चन्द्र बोस के अदम्य साहस, बुद्धि-कौशल और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
Quick Tip: इस सर्ग का कथानक लिखते समय, सुभाष के वेश-परिवर्तन, उनकी साहसिक यात्रा के प्रमुख पड़ावों (पेशावर, जर्मनी, जापान) और आज़ाद हिन्द फ़ौज के गठन का उल्लेख अवश्य करें।
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
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'जय सुभाष' खण्डकाव्य के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
महान देशभक्त: सुभाष बाबू एक प्रखर देशभक्त थे। उन्होंने भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए आई.सी.एस. जैसे प्रतिष्ठित पद को भी त्याग दिया और अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
कुशल संगठनकर्ता: उनमें संगठन की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने भारत में 'फॉरवर्ड ब्लॉक' की स्थापना की और विदेश जाकर 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया, जिसमें सभी धर्मों और जातियों के सैनिक शामिल थे।
अदम्य साहसी और वीर: वे एक महान वीर और साहसी पुरुष थे। अंग्रेजों की नजरबंदी से निकल भागना और विदेश में एक पूरी सेना का गठन करना उनके अदम्य साहस का परिचायक है।
महान त्यागी: उनका जीवन त्याग का प्रतीक था। उन्होंने देश के लिए घर-परिवार, पद, प्रतिष्ठा और समस्त सुखों का त्याग कर दिया।
युवाओं के प्रेरणास्रोत: उनका ओजस्वी व्यक्तित्व और संघर्षपूर्ण जीवन आज भी भारत के करोड़ों युवाओं को देश-सेवा और आत्म-बलिदान के लिए प्रेरित करता है।
Quick Tip: एक ऐतिहासिक नायक का चरित्र-चित्रण करते समय, उनके जीवन की वास्तविक घटनाओं (जैसे- आई.सी.एस. का त्याग, आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन) का उल्लेख करना उत्तर को अधिक प्रामाणिक बनाता है।
'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के आधार पर 'चन्द्रशेखर आजाद' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के नायक अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
महान देशभक्त: आज़ाद का सम्पूर्ण जीवन भारत माता को स्वाधीन कराने के लिए समर्पित था। वे बचपन से ही देश की दुर्दशा से दुखी थे और उन्होंने अपना सर्वस्व मातृभूमि के लिए न्योछावर कर दिया।
वीर और साहसी: आज़ाद अद्भुत वीर और साहसी थे। वे काकोरी काण्ड, साण्डर्स-वध आदि अनेक क्रांतिकारी घटनाओं में सम्मिलित रहे। वे अकेले ही अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेज पुलिस दल का सामना करते रहे।
दृढ़-प्रतिज्ञ: आज़ाद अपने निश्चय के बहुत पक्के थे। उन्होंने जीवित रहते अंग्रेजों के हाथ न आने की प्रतिज्ञा की थी और अन्तिम गोली शेष रहने पर स्वयं को गोली मारकर अपनी प्रतिज्ञा का पालन किया।
कुशल संगठनकर्ता: उनमें संगठन करने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने देश के सभी क्रांतिकारियों को एक सूत्र में पिरोकर एक शक्तिशाली दल का गठन किया।
अमर शहीद: चन्द्रशेखर आज़ाद ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका यह बलिदान उन्हें अमर बना गया और वे आज भी भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।
Quick Tip: चरित्र-चित्रण करते समय, विभिन्न विशेषताओं को शीर्षकों में विभाजित करें। प्रत्येक विशेषता को प्रमाणित करने के लिए खण्डकाव्य की किसी घटना (जैसे- अल्फ्रेड पार्क का संघर्ष) का उल्लेख अवश्य करें।
'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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'बलिदान' सर्ग (तृतीय सर्ग) की कथावस्तु
'बलिदान' सर्ग 'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य का अंतिम और सबसे मार्मिक सर्ग है। इसकी कथावस्तु इस प्रकार है:
चन्द्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में अपने एक साथी के साथ भविष्य की योजनाओं पर चर्चा कर रहे थे।
तभी एक विश्वासघाती की सूचना पर अंग्रेज पुलिस अधीक्षक नॉट-बावर भारी पुलिस बल के साथ पार्क को चारों ओर से घेर लेता है।
आज़ाद अपने साथी को सुरक्षित भेज देते हैं और अकेले ही एक जामुन के वृक्ष की आड़ लेकर पुलिस से लोहा लेने लगते हैं।
दोनों ओर से भीषण गोलीबारी होती है। आज़ाद अपनी वीरता से कई अंग्रेज सिपाहियों को घायल कर देते हैं।
जब आज़ाद के पिस्तौल में केवल एक गोली बचती है, तो उन्हें अपनी प्रतिज्ञा याद आती है कि वे कभी भी जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आएँगे।
अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए वे वह अंतिम गोली अपनी कनपटी पर दाग लेते हैं और भारत माता के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं।
Quick Tip: किसी एक सर्ग का कथानक पूछा गया है, इसलिए आप किसी भी सर्ग (जैसे- संकल्प, संघर्ष या बलिदान) का वर्णन कर सकते हैं। 'बलिदान' सर्ग सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय है, इसलिए इसका वर्णन करना श्रेयस्कर है।
'कर्ण' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग 'कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान' की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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'कर्ण' खण्डकाव्य का तृतीय सर्ग कर्ण के 'दानवीर' चरित्र को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाने वाली घटना पर आधारित है। इसकी कथावस्तु इस प्रकार है:
महाभारत युद्ध से पूर्व, देवराज इन्द्र अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए चिंतित थे। वे जानते थे कि जब तक कर्ण के पास उसके जन्मजात कवच और कुण्डल हैं, उसे कोई परास्त नहीं कर सकता।
इसलिए, इन्द्र एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास उस समय पहुँचते हैं जब वह सूर्योपासना के बाद याचकों को दान दे रहा होता है।
कर्ण ब्राह्मण को प्रणाम कर कुछ भी माँगने का वचन देते हैं। इन्द्र कपटपूर्वक कर्ण से दान में उसके प्राण-रक्षक कवच और कुण्डल ही माँग लेते हैं।
सूर्यदेव द्वारा सचेत किए जाने के बावजूद कि यह एक छल है, कर्ण अपने वचन से नहीं डिगते।
वे कहते हैं कि एक याचक को निराश लौटाना उनके धर्म के विरुद्ध है, भले ही इसके लिए उन्हें अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें।
वे बिना किसी हिचकिचाहट के अपने शरीर से चिपके हुए कवच और कुण्डल को छुरे से काटकर इन्द्र को दान दे देते हैं। यह देखकर देवता भी कर्ण की दानवीरता की प्रशंसा करते हैं।
Quick Tip: इस सर्ग का कथानक लिखते समय, कर्ण की दानवीरता और वचन-बद्धता को केंद्र में रखें। यह घटना कर्ण के चरित्र का सबसे उज्ज्वल पक्ष प्रस्तुत करती है।
'कर्ण' खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
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'कर्ण' खण्डकाव्य के नायक दानवीर कर्ण हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
महान दानवीर: दानवीरता कर्ण के चरित्र का सर्वप्रमुख गुण है। वे प्रतिदिन याचकों को दान देते थे। उन्होंने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए अपने जन्मजात कवच-कुण्डल भी इन्द्र को दान में दे दिए।
सच्चा मित्र: कर्ण एक आदर्श और सच्चे मित्र थे। उन्होंने दुर्योधन के उपकारों को सदा याद रखा और उसके लिए अपने प्राणों की भी आहुति दे दी, यद्यपि वे जानते थे कि दुर्योधन अधर्म के मार्ग पर है।
अद्वितीय योद्धा: वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धरों में से एक थे। उनकी वीरता की प्रशंसा स्वयं श्रीकृष्ण भी करते थे।
गुरुभक्त: वे एक महान गुरुभक्त थे। उन्होंने परशुराम से शस्त्र-विद्या सीखने के लिए अनेक कष्ट सहे और उनका श्राप भी चुपचाप स्वीकार कर लिया।
जाति-प्रथा का शिकार: कर्ण का चरित्र सामाजिक अन्याय और जाति-प्रथा की विडंबना को भी दर्शाता है। सूत-पुत्र होने के कारण उन्हें जीवन भर अपमान सहना पड़ा, जिससे उनका चरित्र और भी अधिक त्रासद और महान बन जाता है।
Quick Tip: कर्ण का चरित्र-चित्रण करते समय उनकी 'दानवीरता' और 'मित्र-धर्म' इन दो गुणों पर विशेष बल दें। कवच-कुण्डल दान की घटना का उल्लेख अनिवार्य है।
'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग 'राजभवन' का कथानक संक्षेप में लिखिए ।
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'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग 'राजभवन' में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों और मंथरा-कैकेयी संवाद का वर्णन है। इसका कथानक संक्षेप में इस प्रकार है:
अयोध्या के राजभवन में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ बड़े धूमधाम से चल रही हैं। सम्पूर्ण नगर में उत्सव का माहौल है।
कैकेयी की कुबड़ी दासी मंथरा इस समाचार से ईर्ष्या से जल उठती है। वह कैकेयी के पास जाती है और उसके कान भरना शुरू कर देती है।
प्रारंभ में, कैकेयी श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर प्रसन्न होती है और मंथरा को पुरस्कार देना चाहती है।
किन्तु मंथरा अपनी कुटिल बातों से कैकेयी को यह विश्वास दिला देती है कि राम के राजा बनने पर कौशल्या का प्रभाव बढ़ जाएगा और भरत को दास बनकर रहना पड़ेगा।
मंथरा के लगातार बहकाने से कैकेयी का सरल मन बदल जाता है। वह मंथरा के षड्यंत्र में फंस जाती है।
मंथरा कैकेयी को राजा दशरथ द्वारा दिए गए दो वरदानों की याद दिलाती है और उन्हें माँगने के लिए उकसाती है।
कैकेयी कोपभवन में चली जाती है और दशरथ से अपने दो वरदानों - भरत के लिए राज्य और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास - माँगने का निश्चय कर लेती है।
Quick Tip: इस सर्ग का कथानक लिखते समय, मंथरा की कुटिलता और कैकेयी के हृदय-परिवर्तन को केंद्र में रखें। यह सर्ग ही रामायण की कथा का प्रमुख मोड़ है।
'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के आधार पर 'राम' के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
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'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य में श्रीराम का चरित्र एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
आदर्श पुत्र और पितृभक्त: श्रीराम एक आदर्श पुत्र हैं। वे अपने पिता के वचनों की रक्षा के लिए बिना किसी प्रश्न के चौदह वर्षों का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। उनके लिए पिता की आज्ञा सर्वोपरि है।
आदर्श भ्राता: उनके हृदय में अपने भाइयों के प्रति असीम स्नेह है। वे भरत को अयोध्या का राज्य सौंपे जाने से प्रसन्न होते हैं और चित्रकूट में भरत से मिलकर भाव-विभोर हो जाते हैं। वे भरत को निर्दोष मानते हैं।
मर्यादा पुरुषोत्तम: श्रीराम मर्यादा के पालक हैं। वे राज-धर्म, पुत्र-धर्म और भ्रातृ-धर्म सभी का आदर्श रूप में पालन करते हैं। वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और मर्यादा का त्याग नहीं करते।
त्याग और विनम्रता की प्रतिमूर्ति: उनमें त्याग की भावना कूट-कूट कर भरी है। वे राजसिंहासन को तिनके के समान त्याग देते हैं। वे स्वभाव से अत्यंत विनम्र और शांत हैं।
दृढ़-निश्चयी: वे अपने निश्चय के पक्के हैं। एक बार पिता को दिया वचन निभाने का निश्चय करने के बाद वे भरत और अयोध्यावासियों के बहुत अनुरोध पर भी अपना निर्णय नहीं बदलते।
Quick Tip: श्रीराम का चरित्र-चित्रण करते समय 'मर्यादा पुरुषोत्तम', 'पितृभक्ति' और 'भ्रातृ-प्रेम' इन गुणों पर विशेष ध्यान दें। पिता की आज्ञा के लिए वन-गमन का प्रसंग उनके चरित्र का मूल आधार है।
'तुमुल' खण्डकाव्य के 'मेघनाद' सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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'तुमुल' खण्डकाव्य का 'मेघनाद' सर्ग लक्ष्मण और मेघनाद के बीच हुए भयंकर युद्ध और लक्ष्मण की मूर्च्छा पर आधारित है। इसकी कथावस्तु संक्षेप में इस प्रकार है:
रावण के कई प्रमुख योद्धाओं के मारे जाने के बाद, उसका अजेय पुत्र मेघनाद (इन्द्रजीत) युद्ध के लिए आता है। वह अपनी कुलदेवी की पूजा करके अमोघ शक्ति प्राप्त करता है।
युद्धभूमि में लक्ष्मण और मेघनाद के बीच भीषण युद्ध होता है। दोनों योद्धा अपने समस्त दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हैं। मेघनाद अपनी मायावी शक्तियों से वानर सेना को व्याकुल कर देता है।
जब मेघनाद किसी भी तरह से लक्ष्मण को पराजित नहीं कर पाता, तो वह क्रोध में भरकर अपनी अमोघ 'शक्ति' अस्त्र का प्रयोग लक्ष्मण पर कर देता है।
उस 'शक्ति' के प्रहार से लक्ष्मण मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। वानर सेना में हाहाकार मच जाता है।
हनुमानजी लक्ष्मण को उठाकर श्रीराम के शिविर में लाते हैं। अपने प्रिय भाई की यह दशा देखकर श्रीराम एक साधारण मनुष्य की भाँति विलाप करने लगते हैं।
विभीषण के सुझाव पर लंका के राजवैद्य सुषेण को बुलाया जाता है, जो संजीवनी बूटी को ही एकमात्र उपाय बताते हैं।
श्रीराम के आदेश पर हनुमानजी संजीवनी बूटी लाने के लिए द्रोणगिरि पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं।
Quick Tip: इस सर्ग का कथानक लिखते समय युद्ध की भयंकरता, लक्ष्मण की मूर्च्छा, श्रीराम का विलाप और हनुमान का संकल्प, इन प्रमुख घटनाओं को क्रम से वर्णित करें।
'तुमुल' खण्डकाव्य के आधार पर 'लक्ष्मण' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'तुमुल' खण्डकाव्य के नायक लक्ष्मण हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
आदर्श भ्राता: लक्ष्मण में भ्रातृ-प्रेम अपने चरम पर है। वे अपने बड़े भाई श्रीराम की सेवा के लिए सभी राज-सुखों को त्यागकर चौदह वर्षों के लिए वन चले जाते हैं। राम की सेवा ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।
अद्वितीय वीर और साहसी योद्धा: लक्ष्मण अतुलनीय वीर हैं। वे अकेले ही शूर्पणखा का मान-मर्दन करते हैं और खर-दूषण की सेना से लोहा लेते हैं। युद्ध में वे रावण के पुत्र मेघनाद जैसे अजेय योद्धा का वध करते हैं।
उग्र एवं ओजस्वी स्वभाव: लक्ष्मण का स्वभाव अत्यंत उग्र और स्वाभिमानी है। वे अपने भाई श्रीराम या भाभी सीता का कोई भी अपमान सहन नहीं कर सकते और तुरंत क्रोधित हो जाते हैं।
निःस्वार्थ सेवक: वनवास के दौरान वे एक क्षण के लिए भी विश्राम नहीं करते और रात-दिन जागकर राम-सीता की रक्षा और सेवा करते हैं। उनका जीवन निःस्वार्थ सेवा का अनुपम उदाहरण है।
विवेकशील: यद्यपि वे स्वभाव से उग्र हैं, किन्तु वे विवेकशील भी हैं और सदैव श्रीराम की आज्ञा का पालन करते हैं। Quick Tip: लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण करते समय उनके 'भ्रातृ-प्रेम' और 'वीरता' इन दो गुणों को प्रमुखता दें। मेघनाद-वध जैसी घटनाओं का उल्लेख उनकी वीरता को प्रमाणित करने के लिए अवश्य करें।
निम्नलिखित लेखकों में से किसी एक लेखक का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए :
(i) रामधारी सिंह 'दिनकर' \quad (ii) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद \quad (iii) भगवतशरण उपाध्याय
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(i) रामधारी सिंह 'दिनकर'
जीवन-परिचय: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म 30 सितम्बर, 1908 ई. को बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रवि सिंह और माता का नाम श्रीमती मनरूप देवी था। इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् वे एक विद्यालय में अध्यापक, बिहार सरकार के सब-रजिस्ट्रार, मुजफ्फरपुर कॉलेज में हिन्दी-विभागाध्यक्ष, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति तथा भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार के पद पर कार्यरत रहे। इन्हें 'पद्मभूषण' से अलंकृत किया गया। 'उर्वशी' नामक कृति के लिए इन्हें भारतीय 'ज्ञानपीठ' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 24 अप्रैल, 1974 ई. को इनका देहावसान हो गया।
साहित्यिक योगदान: दिनकर जी छायावादोत्तर काल के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। इन्हें 'ओज का कवि' माना जाता है। इन्होंने गद्य और पद्य दोनों क्षेत्रों में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। इनकी कविताओं में राष्ट्रीयता, विद्रोह और क्रांति का स्वर प्रमुख है, तो गद्य में चिंतन और विवेचन की प्रधानता है।
प्रमुख रचना: संस्कृति के चार अध्याय (गद्य)। यह भारतीय संस्कृति का एक गहन विश्लेषण है, जिसके लिए इन्हें 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार भी मिला। इनकी अन्य प्रमुख रचनाओं में 'उर्वशी' (महाकाव्य), 'रश्मिरथी' (खण्डकाव्य), 'कुरुक्षेत्र' (काव्य) तथा 'मिट्टी की ओर' (निबंध-संग्रह) शामिल हैं।
Quick Tip: जीवन-परिचय में जन्म-मृत्यु की तिथियाँ, स्थान, शिक्षा, प्रमुख पद, प्राप्त पुरस्कार और साहित्यिक विशेषताओं का उल्लेख करना चाहिए। एक प्रमुख रचना का नाम स्पष्ट रूप से अलग से लिखें।
निम्नलिखित कवियों में से किसी एक कवि का जीवन परिचय देते हुए उनकी एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए :
(i) सुभद्रा कुमारी चौहान \quad (ii) मैथिलीशरण गुप्त \quad (iii) बिहारीलाल \quad (iv) केदारनाथ सिंह
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(ii) मैथिलीशरण गुप्त
जीवन-परिचय: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन् 1886 ई. में झाँसी जिले के चिरगाँव नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त था, जो स्वयं एक अच्छे कवि थे। गुप्त जी पर अपने पिता का पूरा प्रभाव पड़ा। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी को वे अपना काव्य-गुरु मानते थे। गुप्त जी ने घर पर ही अंग्रेजी, संस्कृत और हिन्दी का अध्ययन किया। साकेत महाकाव्य पर इन्हें 'मंगलाप्रसाद पारितोषिक' मिला। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया। ये राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। 12 दिसम्बर, 1964 ई. को इनका निधन हो गया।
साहित्यिक योगदान: गुप्त जी आधुनिक काल के द्विवेदी युग के सबसे लोकप्रिय कवि थे। इनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति और नारी-वेदना का स्वर प्रमुखता से मुखरित हुआ है। 'भारत-भारती' रचना की अपार लोकप्रियता के कारण महात्मा गाँधी ने इन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी।
प्रमुख रचना: साकेत (महाकाव्य)। यह रामकथा पर आधारित है, किन्तु इसमें उर्मिला के विरह का वर्णन अत्यंत मार्मिक ढंग से किया गया है। इनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ 'भारत-भारती', 'यशोधरा', 'जयद्रथ-वध' आदि हैं।
Quick Tip: जीवन-परिचय में कवि की उपाधियों (जैसे- राष्ट्रकवि) और महत्वपूर्ण पुरस्कारों का उल्लेख अवश्य करें। यह आपके उत्तर को प्रभावशाली बनाता है।
अपनी पाठ्यपुस्तक में से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए, जो इस प्रश्नपत्र में न आया हो ।
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बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः ।
उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता ।।
Quick Tip: श्लोक लिखते समय शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। हलन्त, विसर्ग और मात्राओं की गलती से अंक कट सकते हैं। ऐसा श्लोक चुनें जो सरल हो और जिसे आपने अच्छी तरह याद किया हो। यह भी सुनिश्चित कर लें कि वह श्लोक प्रश्न-पत्र में कहीं और न आया हो।
अपने निवास स्थान के आसपास/मोहल्ले की नालियों की समुचित सफाई के लिए नगर/जनपद के स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखिए ।
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सेवा में,
श्रीमान् स्वास्थ्य अधिकारी,
नगर निगम,
लखनऊ (उ.प्र.)।
[1em]
विषय: मोहल्ले की नालियों की समुचित सफाई हेतु प्रार्थना-पत्र।
[1em]
महोदय,
सविनय निवेदन है कि हम इन्दिरा नगर, सेक्टर-14 के निवासी हैं। हम आपका ध्यान अपने मोहल्ले में व्याप्त गंदगी और नालियों की दुर्दशा की ओर आकर्षित करना चाहते हैं।
हमारे मोहल्ले में सफाई कर्मचारी नियमित रूप से नहीं आते हैं, जिसके कारण नालियाँ कूड़े-कचरे से भरी पड़ी हैं। नालियों में पानी का बहाव रुक गया है, जिससे गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है। इस गंदगी के कारण पूरे मोहल्ले में दुर्गंध फैल गई है और मच्छरों तथा अन्य कीटाणुओं का प्रकोप बढ़ गया है, जिससे मलेरिया, डेंगू जैसी संक्रामक बीमारियों के फैलने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस मामले को गंभीरता से लेते हुए हमारे मोहल्ले की नालियों की तत्काल और समुचित सफाई करवाने की व्यवस्था करें।
आपकी इस कृपा के लिए हम सभी मोहल्लेवासी आपके आभारी रहेंगे।
[1em]
सधन्यवाद !
[1em]
भवदीय,
समस्त निवासीगण,
इन्दिरा नगर, सेक्टर-14,
लखनऊ।
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दिनांक: [परीक्षा की तिथि]
Quick Tip: औपचारिक पत्र लिखते समय प्रारूप (format) का विशेष ध्यान रखें। प्रेषक का पता, दिनांक, प्राप्तकर्ता का पद और पता, विषय, संबोधन और अंत में भवदीय आदि का सही स्थान पर प्रयोग करें। भाषा शिष्ट और स्पष्ट होनी चाहिए।
अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को छात्रवृत्ति के लिए एक आवेदनपत्र लिखिए ।
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सेवा में,
श्रीमान् प्रधानाचार्य जी,
राजकीय इण्टर कॉलेज,
कानपुर।
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विषय: छात्रवृत्ति प्रदान करने हेतु आवेदन-पत्र।
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महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय में कक्षा 10 (ब) का छात्र हूँ। मैं एक निर्धन परिवार से सम्बन्ध रखता हूँ। मेरे पिताजी एक छोटी सी दुकान चलाते हैं, जिससे परिवार का भरण-पोषण बड़ी कठिनाई से हो पाता है। उनकी आय इतनी कम है कि वे मेरी पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ हैं।
मैं अपनी कक्षा का एक परिश्रमी छात्र हूँ। मैंने गत वर्ष कक्षा 9 की वार्षिक परीक्षा में 85% अंक प्राप्त कर कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। मैं पढ़ाई के साथ-साथ विद्यालय की अन्य गतिविधियों में भी उत्साहपूर्वक भाग लेता हूँ।
मेरी पढ़ने में बहुत रुचि है और मैं अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहता हूँ, परन्तु आर्थिक कठिनाई के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।
अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि मेरी पारिवारिक आर्थिक स्थिति और मेरी शैक्षिक योग्यता को ध्यान में रखते हुए मुझे विद्यालय कोष से छात्रवृत्ति प्रदान करने की कृपा करें, ताकि मैं अपनी पढ़ाई सुचारु रूप से जारी रख सकूँ।
आपकी इस कृपा के लिए मैं आपका सदैव आभारी रहूँगा।
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सधन्यवाद !
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आपका आज्ञाकारी शिष्य,
क. ख. ग.
कक्षा - 10 (ब)
अनुक्रमांक - ...
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दिनांक: [परीक्षा की तिथि]
Quick Tip: प्रधानाचार्य को पत्र लिखते समय, अपनी बात विनम्रता और स्पष्टता से रखें। अपनी आर्थिक स्थिति का वर्णन करें और अपनी शैक्षिक उपलब्धियों का उल्लेख करके अपनी पात्रता सिद्ध करें। अंत में आज्ञाकारी शिष्य/शिष्या लिखकर अपना नाम (परीक्षा में क.ख.ग.), कक्षा और अनुक्रमांक अवश्य लिखें।
निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए :
(i) भूमेः गुरुतरं किम् अस्ति ?
(ii) विद्या केन वर्धते ?
(iii) चन्द्रशेखरः कः आसीत् ?
(iv) वाराणस्यां नगयाँ कति विश्वविद्यालयाः सन्ति ?
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(i) भूमेः गुरुतरं किम् अस्ति ?
उत्तर: माता भूमेः गुरुतरा अस्ति।
(iii) चन्द्रशेखरः कः आसीत् ?
उत्तर: चन्द्रशेखरः एकः प्रसिद्धः क्रान्तिकारी देशभक्तः च आसीत्।
Quick Tip: संस्कृत प्रश्नों का उत्तर देते समय, प्रश्नवाचक शब्द (किम्, केन, कः, कति) को पहचानें और उसके स्थान पर सही उत्तर शब्द रखकर वाक्य को पूरा करें। उत्तर संक्षिप्त और सटीक होना चाहिए।
निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए :
(i) पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या एवं समाधान \quad (ii) इण्टरनेट \quad (iii) छात्र तथा अनुशासन \quad (iv) किसी एक त्योहार का वर्णन \quad (v) नई शिक्षा नीति
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(i) पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या एवं समाधान
प्रस्तावना (परिचय): 'पर्यावरण' शब्द 'परि' और 'आवरण' दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'चारों ओर से घेरे हुए'। हमारे चारों ओर जो कुछ भी है- वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, सभी मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। जब इन प्राकृतिक घटकों में कोई अवांछनीय परिवर्तन होता है, जो जीवधारियों के लिए हानिकारक हो, तो उसे 'पर्यावरण-प्रदूषण' कहते हैं। आज यह एक वैश्विक समस्या बन चुका है।
प्रदूषण के प्रकार: प्रदूषण मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है:
वायु प्रदूषण: कारखानों की चिमनियों, मोटर-गाड़ियों और कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ वायु को प्रदूषित करता है। इससे साँस की बीमारियाँ, जैसे- अस्थमा, फेफड़ों का कैंसर आदि होती हैं।
जल प्रदूषण: कारखानों के कचरे और शहरों के गंदे नालों को नदियों और तालाबों में बहा देने से जल प्रदूषित हो जाता है। प्रदूषित जल पीने से हैजा, पीलिया, टाइफाइड जैसे रोग होते हैं।
ध्वनि प्रदूषण: मोटर-गाड़ियों, लाउडस्पीकरों, मशीनों और कारखानों के शोर से ध्वनि प्रदूषण होता है। इससे बहरापन, उच्च रक्तचाप और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
मृदा प्रदूषण: खेतों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग तथा प्लास्टिक कचरे के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है, जिसे मृदा प्रदूषण कहते हैं।
प्रदूषण के कारण: प्रदूषण के मुख्य कारण हैं - बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, वनों की अंधाधुंध कटाई, शहरीकरण और मनुष्य की स्वार्थपूर्ण गतिविधियाँ।
समस्या का समाधान (निवारण): पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए:
अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाए जाएँ।
जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया जाए।
कारखानों के अपशिष्ट पदार्थों को उपचारित करके ही बाहर छोड़ा जाए।
प्लास्टिक का प्रयोग बंद किया जाए और कचरे का सही निस्तारण किया जाए।
सौर ऊर्जा जैसे ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा दिया जाए।
लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाई जाए।
उपसंहार (निष्कर्ष): पर्यावरण हमारा जीवन-आधार है। इसे स्वच्छ और संतुलित रखना हम सभी का कर्तव्य है। यदि हम अभी भी सचेत नहीं हुए, तो यह प्रदूषण एक दिन सम्पूर्ण मानव-सभ्यता के विनाश का कारण बन सकता है। सरकार और समाज के सम्मिलित प्रयासों से ही इस समस्या पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
Quick Tip: निबंध को हमेशा रूपरेखा (प्रस्तावना, विषय-विस्तार, उपसंहार) बनाकर लिखें। विषय-विस्तार में विभिन्न पहलुओं (जैसे- प्रदूषण के प्रकार, कारण, समाधान) के लिए अलग-अलग अनुच्छेद बनाएँ। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए तथ्य और उदाहरण दें।







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