UP Board Class 10 Hindi Question Paper 2024 PDF (Code 801 HF) is available for download here. The Hindi exam was conducted on February 22, 2024 in the Morning Shift from 8:30 AM to 11:45 AM. The total marks for the theory paper are 70. Students reported the paper to be easy to moderate.

UP Board Class 10 Hindi Question Paper 2024 (Code 801 HF) with Solutions

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UP Board Class 10 Hindi Question Paper 2024 (Code 801 HF) with Solutions

Question 1:

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल प्रसिद्ध हैं

  • (A) कहानी-लेखन के लिए
  • (B) उपन्यास-लेखन के लिए
  • (C) आलोचना-साहित्य के लिए
  • (D) नाटक-लेखन के लिए
Correct Answer: (C) आलोचना-साहित्य के लिए
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में पूछा गया है कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल मुख्य रूप से किस साहित्यिक विधा के लिए प्रसिद्ध हैं।


Step 2: Detailed Explanation

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को हिन्दी साहित्य में एक युग-प्रवर्तक आलोचक, श्रेष्ठ निबंधकार और महान साहित्य-इतिहासकार के रूप में जाना जाता है। यद्यपि उन्होंने निबंध और साहित्य-इतिहास के क्षेत्र में भी अद्वितीय कार्य किया, किन्तु उनकी प्रसिद्धि का मुख्य आधार उनका आलोचना-साहित्य है। उन्होंने हिन्दी आलोचना को एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। उनके ग्रंथ 'रस मीमांसा' और 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में उनकी आलोचनात्मक दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है।


Step 3: Final Answer

अतः, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल मुख्य रूप से आलोचना-साहित्य के लिए प्रसिद्ध हैं। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखकों और उनके योगदान के प्रमुख क्षेत्रों को याद रखना महत्वपूर्ण है। आचार्य शुक्ल का नाम आलोचना, निबंध और साहित्य-इतिहास के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, लेकिन उनकी ख्याति एक आलोचक के रूप में सर्वोपरि है।


Question 2:

'गोदान' उपन्यास के लेखक हैं

  • (A) यशपाल
  • (B) प्रेमचन्द
  • (C) मोहन राकेश
  • (D) धर्मवीर भारती
Correct Answer: (B) प्रेमचन्द
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'गोदान' नामक उपन्यास के लेखक का नाम पूछा गया है।


Step 2: Detailed Explanation

'गोदान' हिन्दी साहित्य का एक कालजयी उपन्यास है, जिसके लेखक मुंशी प्रेमचन्द हैं। इसे 'कृषक जीवन का महाकाव्य' भी कहा जाता है। यह 1936 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास में भारतीय किसान के जीवन की त्रासदी, शोषण और संघर्ष का यथार्थवादी चित्रण किया गया है। 'होरी' और 'धनिया' इसके अमर पात्र हैं। प्रेमचन्द को 'उपन्यास सम्राट' के रूप में भी जाना जाता है।


Step 3: Final Answer

अतः, 'गोदान' उपन्यास के लेखक प्रेमचन्द हैं। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: हिन्दी के प्रमुख उपन्यासों और उनके लेखकों की एक सूची बनाएँ। 'गोदान' (प्रेमचन्द), 'मैला आँचल' (फणीश्वरनाथ 'रेणु') और 'राग दरबारी' (श्रीलाल शुक्ल) जैसे उपन्यास मील के पत्थर माने जाते हैं।


Question 3:

'नीड़ का निर्माण फिर' के रचनाकार हैं

  • (A) हरिवंश राय 'बच्चन'
  • (B) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
  • (C) हजारीप्रसाद द्विवेदी
  • (D) रामविलास शर्मा
Correct Answer: (A) हरिवंश राय 'बच्चन'
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'नीड़ का निर्माण फिर' नामक रचना के लेखक का नाम पूछा गया है।


Step 2: Detailed Explanation

'नीड़ का निर्माण फिर' प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय 'बच्चन' की आत्मकथा का दूसरा खंड है। बच्चन जी की आत्मकथा चार खंडों में प्रकाशित हुई थी: 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ', 'नीड़ का निर्माण फिर', 'बसेरे से दूर' और 'दशद्वार से सोपान तक'। यह हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ आत्मकथाओं में से एक मानी जाती है। 'नीड़ का निर्माण फिर' एक प्रसिद्ध कविता भी है जो इसी नाम से उनके काव्य संग्रह में संकलित है।


Step 3: Final Answer

अतः, 'नीड़ का निर्माण फिर' के रचनाकार हरिवंश राय 'बच्चन' हैं। सही उत्तर (A) है।
Quick Tip: प्रमुख लेखकों की आत्मकथाओं के नाम याद रखें। हरिवंश राय बच्चन की चार खंडों की आत्मकथा, महात्मा गाँधी की 'सत्य के प्रयोग' और जवाहरलाल नेहरू की 'मेरी कहानी' बहुत प्रसिद्ध हैं।


Question 4:

'झूठा सच' उपन्यास के लेखक हैं

  • (A) यशपाल
  • (B) कमलेश्वर
  • (C) रांगेय राघव
  • (D) चतुरसेन शास्त्री
Correct Answer: (A) यशपाल
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'झूठा सच' नामक उपन्यास के लेखक का नाम पूछा गया है।


Step 2: Detailed Explanation

'झूठा सच' प्रगतिवादी उपन्यासकार यशपाल द्वारा रचित एक वृहद् उपन्यास है। यह दो भागों में प्रकाशित हुआ था - 'वतन और देश' (1958) तथा 'देश का भविष्य' (1960)। इस उपन्यास में भारत-विभाजन की त्रासदी का अत्यंत मार्मिक और यथार्थवादी चित्रण किया गया है। इसे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ आंचलिक और राजनीतिक उपन्यासों में गिना जाता है।


Step 3: Final Answer

अतः, 'झूठा सच' उपन्यास के लेखक यशपाल हैं। सही उत्तर (A) है।
Quick Tip: भारत-विभाजन की त्रासदी पर लिखे गए उपन्यासों में 'झूठा सच' (यशपाल) और 'तमस' (भीष्म साहनी) का नाम सर्वप्रमुख है।


Question 5:

छायावाद की मुख्य प्रवृत्ति है

  • (A) आश्रयदाताओं की प्रशंसा
  • (B) रीतिग्रन्थों का निर्माण
  • (C) श्रृंगार और प्रेम वेदना
  • (D) भक्ति-भावना
Correct Answer: (C) श्रृंगार और प्रेम वेदना
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में छायावादी काव्य की मुख्य प्रवृत्ति (विशेषता) पूछी गई है।


Step 2: Detailed Explanation

छायावाद (लगभग 1918-1936) की मुख्य प्रवृत्तियाँ इस प्रकार हैं:

श्रृंगार और प्रेम वेदना: छायावादी काव्य में प्रेम, सौंदर्य और विरह-वेदना का सूक्ष्म और आत्मानुभूतिपरक चित्रण है। इसमें स्थूलता के स्थान पर सूक्ष्मता है।
प्रकृति का मानवीकरण: प्रकृति को एक सजीव सत्ता मानकर उसका चित्रण किया गया है।
व्यक्तिवाद की प्रधानता: कवि की व्यक्तिगत भावनाओं और अनुभूतियों की अभिव्यक्ति प्रमुख है।
रहस्यवाद: अज्ञात सत्ता के प्रति जिज्ञासा और प्रेम का भाव।
राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना: पराधीनता के विरुद्ध राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति।

दिए गए विकल्पों में, 'श्रृंगार और प्रेम वेदना' छायावाद की एक प्रमुख प्रवृत्ति है। 'आश्रयदाताओं की प्रशंसा' और 'रीतिग्रन्थों का निर्माण' रीतिकाल की, तथा 'भक्ति-भावना' भक्तिकाल की मुख्य प्रवृत्तियाँ हैं।


Step 3: Final Answer

अतः, सही उत्तर (C) श्रृंगार और प्रेम वेदना है।
Quick Tip: हिन्दी कविता के विभिन्न कालों (भक्तिकाल, रीतिकाल, छायावाद आदि) की कम से कम दो-दो प्रमुख प्रवृत्तियों को याद रखें। इससे आपको अंतर समझने में आसानी होगी।


Question 6:

'कलम का सिपाही' जीवनी है

  • (A) जयशंकर प्रसाद की
  • (B) प्रेमचन्द की
  • (C) मोहन राकेश की
  • (D) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की
Correct Answer: (B) प्रेमचन्द की
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में पूछा गया है कि 'कलम का सिपाही' नामक जीवनी किस लेखक के जीवन पर आधारित है।


Step 2: Detailed Explanation

'कलम का सिपाही' मुंशी प्रेमचन्द की जीवनी है। इसके लेखक प्रेमचन्द के पुत्र अमृत राय हैं। यह जीवनी 1962 में प्रकाशित हुई थी। इसमें अमृत राय ने अपने पिता प्रेमचन्द के जीवन और उनके साहित्यिक संघर्षों का बहुत ही आत्मीय और प्रामाणिक चित्रण किया है। इस कृति के लिए अमृत राय को 1963 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।


Step 3: Final Answer

अतः, 'कलम का सिपाही' प्रेमचन्द की जीवनी है। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: जीवनी और आत्मकथा में अंतर समझें। जीवनी किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा लिखी जाती है (जैसे 'कलम का सिपाही'), जबकि आत्मकथा व्यक्ति स्वयं लिखता है (जैसे 'मेरी कहानी')। एक और जीवनी 'कलम का मजदूर' मदन गोपाल ने लिखी है, वह भी प्रेमचंद पर ही आधारित है।


Question 7:

'घनानन्द' किस काव्यधारा के कवि हैं ?

  • (A) रीतिबद्ध
  • (B) रीतिसिद्ध
  • (C) रीतिमुक्त
  • (D) आधुनिक काल
Correct Answer: (C) रीतिमुक्त
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में कवि घनानन्द की काव्यधारा के बारे में पूछा गया है।


Step 2: Detailed Explanation

घनानन्द रीतिकाल के कवि थे। रीतिकाल को तीन प्रमुख धाराओं में बाँटा गया है:

रीतिबद्ध: वे कवि जिन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र के नियमों में बँधकर लक्षण-ग्रंथों की रचना की।
रीतिसिद्ध: वे कवि जिन्होंने रीति-ग्रंथ नहीं लिखे, पर काव्य में रीति के नियमों का पालन किया। (जैसे - बिहारी)
रीतिमुक्त: वे कवि जिन्होंने रीति के बंधनों को पूरी तरह त्यागकर स्वच्छंद प्रेम और विरह की कविताएँ लिखीं। घनानन्द इस धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उन्हें 'प्रेम की पीर का कवि' भी कहा जाता है। आलम, बोधा और ठाकुर इस धारा के अन्य प्रमुख कवि हैं।



Step 3: Final Answer

अतः, घनानन्द 'रीतिमुक्त' काव्यधारा के कवि हैं। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: रीतिकाल की तीनों धाराओं (रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त) के कम से कम एक-एक प्रमुख कवि का नाम और उनकी विशेषता याद रखें। यह वर्गीकरण बहुत महत्वपूर्ण है।


Question 8:

'हंस' पत्रिका के सम्पादक हैं

  • (A) मोहन राकेश
  • (B) प्रेमचन्द
  • (C) धर्मवीर भारती
  • (D) गुलाब राय
Correct Answer: (B) प्रेमचन्द
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'हंस' पत्रिका के सम्पादक का नाम पूछा गया है।


Step 2: Detailed Explanation

'हंस' एक प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका है, जिसका प्रकाशन मुंशी प्रेमचन्द ने सन् 1930 में बनारस से आरम्भ किया था। प्रेमचन्द ने इस पत्रिका के माध्यम से प्रगतिशील और यथार्थवादी साहित्य को प्रोत्साहित किया। यह पत्रिका उनके जीवनकाल तक उनके संपादन में निकलती रही। उनके बाद भी यह पत्रिका अलग-अलग संपादकों के नेतृत्व में प्रकाशित होती रही, लेकिन इसके संस्थापक संपादक मुंशी प्रेमचन्द ही थे। दिए गए विकल्पों में प्रेमचंद का नाम होने के कारण वही सही उत्तर है।


Step 3: Final Answer

अतः, 'हंस' पत्रिका के सम्पादक प्रेमचन्द थे। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं और उनके संपादकों के नाम याद रखना महत्वपूर्ण है। जैसे - 'सरस्वती' (महावीर प्रसाद द्विवेदी), 'हंस' (प्रेमचन्द), 'धर्मयुग' (धर्मवीर भारती), 'कादम्बिनी' (राजेन्द्र अवस्थी)।


Question 9:

'जहाज का पंछी' कृति की विधा है

  • (A) नाटक
  • (B) कहानी
  • (C) उपन्यास
  • (D) निबन्ध संग्रह
Correct Answer: (C) उपन्यास
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'जहाज का पंछी' नामक कृति की साहित्यिक विधा पूछी गई है।


Step 2: Detailed Explanation

'जहाज का पंछी' एक प्रसिद्ध उपन्यास है। इसके लेखक इलाचन्द्र जोशी हैं। इलाचन्द्र जोशी को हिन्दी में मनोवैज्ञानिक उपन्यास-परंपरा का प्रवर्तक माना जाता है। इस उपन्यास का नायक एक शिक्षित युवक है जो समाज से निराश होकर भटकता रहता है और अंत में उसे जीवन का उद्देश्य मिलता है। यह नायक की मनोवैज्ञानिक यात्रा का चित्रण करता है।


Step 3: Final Answer

अतः, 'जहाज का पंछी' की विधा उपन्यास है। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: हिन्दी गद्य की विभिन्न विधाओं और उनकी प्रमुख रचनाओं से परिचित होना आवश्यक है। इलाचंद्र जोशी, जैनेन्द्र और अज्ञेय को प्रमुख मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार माना जाता है।


Question 10:

'तारसप्तक' का प्रकाशन वर्ष है

  • (A) 1942 ई०
  • (B) 1953 ई०
  • (C) 1943 ई०
  • (D) 1940 ई०
Correct Answer: (C) 1943 ई०
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'तार सप्तक' के प्रकाशन का वर्ष पूछा गया है।


Step 2: Detailed Explanation

'तार सप्तक' सात कवियों की कविताओं का संग्रह है, जिसका संपादन सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने किया था। इसका प्रकाशन सन् 1943 ई. में हुआ। इसी संग्रह से हिन्दी कविता में 'प्रयोगवाद' का आरम्भ माना जाता है। अज्ञेय ने कुल चार सप्तकों का संपादन किया:

तार सप्तक: 1943 ई.
दूसरा सप्तक: 1951 ई.
तीसरा सप्तक: 1959 ई.
चौथा सप्तक: 1979 ई.



Step 3: Final Answer

अतः, 'तारसप्तक' का प्रकाशन वर्ष 1943 ई० है। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: 'तार सप्तक' को 'पहला सप्तक' नहीं कहा जाता, केवल 'तार सप्तक' कहते हैं। उसके बाद के संग्रहों को 'दूसरा', 'तीसरा' और 'चौथा' सप्तक कहा जाता है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है।


Question 11:

'निर्वेद' स्थायी भाव है

  • (A) हास्य रस का
  • (B) करुण रस का
  • (C) शान्त रस का
  • (D) अद्भुत रस का
Correct Answer: (C) शान्त रस का
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में पूछा गया है कि 'निर्वेद' किस रस का स्थायी भाव है।


Step 2: Key Concept

प्रत्येक रस का एक स्थायी भाव होता है, जो सहृदय के हृदय में स्थायी रूप से विद्यमान रहता है और उचित अवसर पर जागृत होकर रस में परिणत हो जाता है।


Step 3: Detailed Explanation

विभिन्न रसों के स्थायी भाव इस प्रकार हैं:

हास्य रस का स्थायी भाव 'हास' है।
करुण रस का स्थायी भाव 'शोक' है।
शान्त रस का स्थायी भाव 'निर्वेद' (वैराग्य या संसार से उदासीनता) है।
अद्भुत रस का स्थायी भाव 'विस्मय' (आश्चर्य) है।

अतः, 'निर्वेद' शान्त रस का स्थायी भाव है।


Step 4: Final Answer

सही उत्तर (C) शान्त रस का है।
Quick Tip: सभी नौ रसों और उनके स्थायी भावों की तालिका बनाकर याद कर लें। यह काव्य-सौंदर्य के तत्वों का एक बहुत ही मौलिक और महत्वपूर्ण हिस्सा है।


Question 12:

'पीपर पात सरिस मन डोला' में अलंकार है

  • (A) श्लेष अलंकार
  • (B) उपमा अलंकार
  • (C) उत्प्रेक्षा अलंकार
  • (D) रूपक अलंकार
Correct Answer: (B) उपमा अलंकार
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Step 1: Understanding the Question

दी गई काव्य पंक्ति में प्रयुक्त अलंकार को पहचानना है।


Step 2: Key Concept

उपमा अलंकार में, किसी एक वस्तु (उपमेय) की तुलना अत्यंत समानता के कारण किसी दूसरी प्रसिद्ध वस्तु (उपमान) से की जाती है। इसके चार अंग होते हैं: उपमेय, उपमान, वाचक शब्द, और साधारण धर्म। 'सा', 'सी', 'से', 'सम', 'सरिस' आदि इसके वाचक शब्द हैं।


Step 3: Detailed Explanation

पंक्ति का विश्लेषण: 'पीपर पात सरिस मन डोला'

उपमेय (जिसकी तुलना हो): मन
उपमान (जिससे तुलना हो): पीपर पात (पीपल का पत्ता)
वाचक शब्द (तुलना बताने वाला शब्द): सरिस (समान)
साधारण धर्म (समान गुण): डोला (डोलना, हिलना)

यहाँ मन के डोलने की तुलना पीपल के पत्ते के डोलने से की गई है और 'सरिस' वाचक शब्द का स्पष्ट प्रयोग है। उपमा के चारों अंग उपस्थित होने के कारण यह पूर्णोपमा का उदाहरण है।


Step 4: Final Answer

अतः, इस पंक्ति में उपमा अलंकार है। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: अलंकार पहचानने के लिए वाचक शब्दों पर ध्यान दें। यदि पंक्ति में 'सा', 'सी', 'से', 'सम', 'सरिस', 'इव', 'जिमि' जैसे शब्द आते हैं, तो वहाँ प्रायः उपमा अलंकार होता है।


Question 13:

'रोला' छन्द में कुल चरण होते हैं

  • (A) दो
  • (B) चार
  • (C) तीन
  • (D) पाँच
Correct Answer: (B) चार
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'रोला' छंद के चरणों की कुल संख्या पूछी गई है।


Step 2: Key Concept

रोला एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं तथा 11 और 13 मात्राओं पर यति (विराम) होती है।


Step 3: Detailed Explanation

रोला छंद में कुल चार चरण होते हैं। यह आमतौर पर दो पंक्तियों में लिखा जाता है, प्रत्येक पंक्ति में दो चरण होते हैं। चूँकि यह एक सम मात्रिक छंद है, इसके सभी चारों चरणों में मात्राओं की संख्या (24) समान होती है।


Step 4: Final Answer

अतः, 'रोला' छन्द में कुल चार चरण होते हैं। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: प्रमुख छंदों (दोहा, सोरठा, रोला, चौपाई) के लक्षण (मात्रिक/वर्णिक, सम/अर्धसम, मात्राओं/वर्णों की संख्या, चरण, यति) को एक तालिका बनाकर याद करें।


Question 14:

'आगमन' में किस उपसर्ग का प्रयोग हुआ है ?

  • (A) 'वि'
  • (B) 'अक'
  • (C) 'मान'
  • (D) 'आ'
Correct Answer: (D) 'आ'
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'आगमन' शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग को पहचानना है।


Step 2: Key Concept

उपसर्ग वे शब्दांश होते हैं जो किसी मूल शब्द के आरम्भ में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता ला देते हैं।


Step 3: Detailed Explanation

'आगमन' शब्द का विच्छेद करने पर: \[ आगमन = आ + गमन \]
यहाँ 'गमन' एक सार्थक मूल शब्द है, जिसका अर्थ है 'जाना'। इसके आरम्भ में 'आ' उपसर्ग जुड़ा है। 'आ' उपसर्ग 'तक', 'समेत', 'उल्टा' जैसे अर्थ देता है। यहाँ 'आगमन' का अर्थ है 'आना', जो 'गमन' का विपरीत अर्थ है।


Step 4: Final Answer

अतः, 'आगमन' शब्द में 'आ' उपसर्ग है। सही उत्तर (D) है।
Quick Tip: उपसर्ग पहचानने के लिए शब्द में से मूल शब्द को अलग करने का प्रयास करें। जो सार्थक शब्दांश आगे बचता है, वही उपसर्ग होता है।


Question 15:

'भलाई' में प्रत्यय है

  • (A) भला
  • (B) ई
  • (C) आई
  • (D) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (C) आई
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'भलाई' शब्द में प्रयुक्त प्रत्यय को पहचानना है।


Step 2: Key Concept

प्रत्यय वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द के अन्त में जुड़कर नए शब्द का निर्माण करते हैं और उसके अर्थ में परिवर्तन ला देते हैं।


Step 3: Detailed Explanation

'भलाई' शब्द का विच्छेद करने पर: \[ भलाई = भला + आई \]
यहाँ 'भला' एक सार्थक मूल शब्द है, जो एक विशेषण है। इसके अन्त में 'आई' प्रत्यय जुड़ने से 'भलाई' शब्द बना है, जो एक भाववाचक संज्ञा है। इसी प्रकार, 'बुरा + आई = बुराई', 'अच्छा + आई = अच्छाई' आदि शब्द बनते हैं।


Step 4: Final Answer

अतः, 'भलाई' शब्द में 'आई' प्रत्यय है। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: प्रत्यय पहचानने के लिए शब्द में से मूल शब्द को अलग करें। जो सार्थक शब्दांश अन्त में बचता है, वही प्रत्यय होता है। ध्यान दें कि मूल शब्द सार्थक होना चाहिए।


Question 16:

'नीलाम्बर' में कौन-सा समास है ?

  • (A) द्वन्द्व
  • (B) द्विगु
  • (C) कर्मधारय
  • (D) बहुव्रीहि
Correct Answer: (C) कर्मधारय
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'नीलाम्बर' शब्द में निहित समास का प्रकार पूछा गया है।


Step 2: Key Concept

कर्मधारय समास वह समास होता है जिसका एक पद विशेषण और दूसरा पद विशेष्य होता है, अथवा एक पद उपमान और दूसरा पद उपमेय होता है। इसका विग्रह करने पर 'है जो' या 'के समान' शब्द आते हैं।


Step 3: Detailed Explanation

'नीलाम्बर' शब्द का समास-विग्रह करने पर होता है - 'नीला है जो अम्बर (वस्त्र/आकाश)'।

यहाँ 'नील' (नीला) विशेषण है और 'अम्बर' (वस्त्र/आकाश) विशेष्य है। चूँकि इसमें विशेषण-विशेष्य का संबंध है, इसलिए यहाँ कर्मधारय समास है।

नोट: यदि इसका विग्रह 'नीला है अम्बर जिसका, अर्थात् कृष्ण/बलराम' किया जाए, तो यह बहुव्रीहि समास भी हो सकता है। परन्तु जब तक किसी तीसरे पद का विशेष संकेत न हो, और विकल्पों में कर्मधारय मौजूद हो, तो विशेषण-विशेष्य संबंध के आधार पर कर्मधारय को ही प्राथमिकता दी जाती है।


Step 4: Final Answer

अतः, दिए गए विकल्पों के अनुसार 'नीलाम्बर' में कर्मधारय समास है। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में अंतर को समझें। कर्मधारय में एक पद दूसरे की विशेषता बताता है, जबकि बहुव्रीहि में दोनों पद मिलकर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करते हैं। विग्रह के आधार पर समास का निर्धारण होता है।


Question 17:

'आम' का तत्सम है

  • (A) आम्ब
  • (B) आम्र
  • (C) अम्बु
  • (D) अम्म
Correct Answer: (B) आम्र
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में 'आम' (फल) शब्द का तत्सम रूप पूछा गया है।


Step 2: Key Concept


तत्सम शब्द: संस्कृत भाषा के वे शब्द जो हिन्दी में बिना किसी परिवर्तन के ज्यों के त्यों प्रयोग किए जाते हैं, तत्सम कहलाते हैं।
तद्भव शब्द: संस्कृत के वे शब्द जो कुछ रूप परिवर्तन के साथ हिन्दी में प्रयोग होते हैं, तद्भव कहलाते हैं।



Step 3: Detailed Explanation

'आम' एक तद्भव शब्द है। इसका मूल संस्कृत शब्द 'आम्र' है। संस्कृत से हिन्दी में आते-आते 'आम्र' शब्द सरल होकर 'आम' बन गया। अतः 'आम' का तत्सम रूप 'आम्र' है।

अन्य विकल्प: 'अम्बु' का अर्थ 'जल' होता है।


Step 4: Final Answer

अतः, 'आम' का तत्सम रूप 'आम्र' है। सही उत्तर (B) है।
Quick Tip: आमतौर पर जिन शब्दों में संयुक्त व्यंजन (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र), 'ऋ' की मात्रा, 'र' के रूप (प्र, र्, र) या 'ष' का प्रयोग होता है, वे तत्सम शब्द होते हैं। जैसे 'आम्र' में 'र' का पदेन रूप (म्र) है।


Question 18:

'कर्तृवाच्य' में प्रधानता होती है

  • (A) कर्ता की
  • (B) कर्म की
  • (C) भाव की
  • (D) इनमें से कोई नहीं
Correct Answer: (A) कर्ता की
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में पूछा गया है कि कर्तृवाच्य (Active Voice) में किसकी प्रधानता होती है।


Step 2: Key Concept

वाच्य क्रिया का वह रूप है जिससे यह पता चलता है कि वाक्य में क्रिया का मुख्य विषय कर्ता, कर्म या भाव में से कौन है। वाच्य के तीन भेद हैं:

कर्तृवाच्य: जिसमें कर्ता की प्रधानता होती है और क्रिया का लिंग-वचन कर्ता के अनुसार होता है।
कर्मवाच्य: जिसमें कर्म की प्रधानता होती है।
भाववाच्य: जिसमें भाव की प्रधानता होती है।



Step 3: Detailed Explanation

'कर्तृवाच्य' के नाम से ही स्पष्ट है 'कर्तृ' अर्थात् 'कर्ता'। इस वाच्य में वाक्य का केंद्रबिंदु कर्ता होता है और क्रिया का रूप कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार ही परिवर्तित होता है।

उदाहरण: राम जाता है। सीता जाती है। लड़के जाते हैं।


Step 4: Final Answer

अतः, 'कर्तृवाच्य' में कर्ता की प्रधानता होती है। सही उत्तर (A) है।
Quick Tip: वाच्य को पहचानने के लिए, क्रिया का लिंग और वचन बदलकर देखें। यदि क्रिया कर्ता के अनुसार बदलती है, तो कर्तृवाच्य है। यदि कर्म के अनुसार बदलती है, तो कर्मवाच्य है।


Question 19:

'ताभ्यः' शब्द में वचन और विभक्ति है

  • (A) षष्ठी विभक्ति, एकवचन
  • (B) सप्तमी विभक्ति, द्विवचन
  • (C) षष्ठी विभक्ति, बहुवचन
  • (D) चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन
Correct Answer:
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में संस्कृत शब्द 'ताभ्यः' का वचन और विभक्ति पूछा गया है।


Step 2: Key Concept

'ताभ्यः' शब्द 'तत्' (वह) सर्वनाम के स्त्रीलिंग रूप का एक पद है। हमें 'तत्' (स्त्रीलिंग) के शब्द-रूप का ज्ञान होना चाहिए।


Step 3: Detailed Explanation

'तत्' (वह) सर्वनाम के स्त्रीलिंग, बहुवचन के रूप इस प्रकार हैं:

प्रथमा: ताः (वे सब)

द्वितीया: ताः (उन सबको)

तृतीया: ताभिः (उन सबसे/उनके द्वारा)

चतुर्थी: ताभ्यः (उन सबके लिए)

पंचमी: ताभ्यः (उन सबसे)

षष्ठी: तासाम् (उन सबका)

सप्तमी: तासु (उन सबमें/उन सब पर)


इस तालिका से स्पष्ट है कि 'ताभ्यः' 'तत्' शब्द का चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन और पंचमी विभक्ति, बहुवचन, दोनों का रूप है। दिए गए विकल्पों में से (D) चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन मौजूद है। (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन का रूप 'तासाम्' होता है)।


Step 4: Final Answer

अतः, दिए गए विकल्पों के अनुसार 'ताभ्यः' में चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन है। सही उत्तर (D) है।
Quick Tip: संस्कृत में कुछ शब्द-रूप दो विभक्तियों में समान होते हैं। जैसे 'तत्' (स्त्रीलिंग) में 'ताभ्यः' चतुर्थी और पंचमी बहुवचन में समान है। ऐसे में दिए गए विकल्पों में से जो भी मौजूद हो, उसे चुनना चाहिए।


Question 20:

निम्नलिखित में सर्वनाम है

  • (A) काला
  • (B) घोड़ा
  • (C) वह
  • (D) लड़का
Correct Answer: (C) वह
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Step 1: Understanding the Question

प्रश्न में दिए गए शब्दों में से सर्वनाम शब्द को पहचानना है।


Step 2: Key Concept

सर्वनाम वे शब्द होते हैं जो संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाते हैं। जैसे - मैं, तुम, वह, यह, कोई, कुछ, जो, सो आदि।


Step 3: Detailed Explanation

दिए गए विकल्पों का विश्लेषण:

(A) काला: यह एक गुणवाचक विशेषण है, जो किसी संज्ञा की विशेषता बताता है (जैसे - काला घोड़ा)।
(B) घोड़ा: यह एक जातिवाचक संज्ञा है, जो एक जानवर का नाम है।
(C) वह: यह एक पुरुषवाचक सर्वनाम (अन्य पुरुष) है, जो किसी दूर के व्यक्ति या वस्तु के लिए संज्ञा के स्थान पर प्रयोग होता है।
(D) लड़का: यह एक जातिवाचक संज्ञा है।



Step 4: Final Answer

अतः, दिए गए शब्दों में 'वह' सर्वनाम है। सही उत्तर (C) है।
Quick Tip: यह पहचानने के लिए कि कोई शब्द सर्वनाम है या नहीं, देखें कि क्या वह किसी नाम (संज्ञा) की जगह पर इस्तेमाल हो सकता है। जैसे, "राम जा रहा है" के स्थान पर "वह जा रहा है" कह सकते हैं।


निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए गए तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
बुद्ध के इस जन्म की घटनाएँ तो इन चित्रित कथाओं में हैं ही, उनके पिछले जन्मों की कथाओं का भी इसमें चित्रण हुआ है। पिछले जन्म की ये कथाएँ 'जातक' कहलाती हैं। उनकी संख्या 555 है और इनका संग्रह 'जातक' नाम से प्रसिद्ध है, जिनका बौद्धों में बड़ा मान है । इन्हीं जातक कथाओं में अनेक अजंता के चित्रों में विस्तार के साथ लिख दी गयी हैं। इन पिछले जन्मों में बुद्ध ने गज, कपि, मृग आदि के रूप में विविध योनियों में जन्म लिया था और संसार के कल्याण के लिए दया और त्याग का आदर्श स्थापित करते, वे बलिदान हो गये थे ।

Question 21:

उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।

Correct Answer:
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सन्दर्भ:

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के गद्य-खण्ड में संकलित तथा डॉ. भगवतशरण उपाध्याय द्वारा लिखित 'अजंता' नामक निबन्ध से उद्धृत है।

इस अंश में लेखक ने अजंता की गुफाओं में चित्रित जातक कथाओं के महत्व पर प्रकाश डाला है।
Quick Tip: संदर्भ लिखते समय, पाठ का नाम और लेखक का नाम सही-सही याद रखना महत्वपूर्ण है। इसे हमेशा काले पेन या मोटे अक्षरों में लिखें ताकि यह स्पष्ट दिखे। संदर्भ में यह भी बताएं कि गद्यांश में क्या कहा जा रहा है।


Question 22:

गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
 

Correct Answer:
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रेखांकित अंश की व्याख्या:

लेखक डॉ. भगवतशरण उपाध्याय अजंता की गुफाओं में चित्रित चित्रों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि इन गुफा-चित्रों में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाओं को दर्शाया गया है, जिन्हें जातक कथाएँ कहा जाता है।

इन कथाओं के अनुसार, बुद्ध ने केवल मानव रूप में ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों की योनियों में भी जन्म लिया था।

उन्होंने हाथी (गज), बंदर (कपि), हिरण (मृग) जैसे विभिन्न रूपों में जन्म लेकर संसार के प्राणियों की भलाई के लिए कार्य किया।

अपने हर जन्म में उन्होंने दया, करुणा और त्याग का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया और दूसरों के कल्याण के लिए अपने प्राणों का भी बलिदान कर दिया।

अजंता के चित्र इन्हीं महान बलिदानों और आदर्शों को सजीव रूप में प्रस्तुत करते हैं।
Quick Tip: रेखांकित अंश की व्याख्या करते समय, केवल उस अंश का शाब्दिक अर्थ न लिखें। उस अंश का प्रसंग के अनुसार भावार्थ और लेखक का उद्देश्य भी स्पष्ट करें। अपने शब्दों में सरल भाषा का प्रयोग करें।


Question 23:

'जातक' कथाएँ किन्हें कहते हैं ?

Correct Answer:
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गद्यांश के अनुसार, महात्मा बुद्ध के पिछले जन्मों की कथाओं को 'जातक' कथाएँ कहते हैं।

इन कथाओं में बुद्ध के विभिन्न योनियों में जन्म लेने और संसार के कल्याण के लिए दया, त्याग और बलिदान करने का वर्णन है।

इनकी संख्या 555 बताई गई है और इनका संग्रह 'जातक' नाम से प्रसिद्ध है, जिसे बौद्ध धर्म में बहुत सम्मान दिया जाता है।
Quick Tip: गद्यांश पर आधारित प्रश्नों का उत्तर देते समय, उत्तर सीधे गद्यांश से ही खोजना चाहिए। अपनी ओर से कोई अतिरिक्त जानकारी तभी जोड़ें जब आवश्यक हो। उत्तर संक्षिप्त और सटीक होना चाहिए।


रोहतास-दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता, शोण के तीक्ष्ण गंभीर प्रवाह को देख रही है । ममता विधवा थी । उसका यौवन शोण के समान ही उभड़ रहा था । मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी का बरसात लिए, वह सुख के कंटक-शयन में विकल थी । वह रोहतास दुर्गपति के मंत्री चूड़ामणि की अकेली दुहिता थी, फिर उसके लिए कुछ अभाव होना असंभव था, परंतु, वह विधवा थी । हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है - तब उसकी विडंबना का अन्त कहाँ था ?

Question 24:

उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।

Correct Answer:
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सन्दर्भ:

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के गद्य-खण्ड में संकलित, छायावाद के प्रवर्तक श्री जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित 'ममता' नामक कहानी से अवतरित है।

इस अंश में लेखक ने कहानी की मुख्य पात्र ममता की युवावस्था, उसके वैधव्य और उसकी दयनीय मानसिक स्थिति का चित्रण किया है।
Quick Tip: कहानी या निबंध का संदर्भ लिखते समय लेखक की किसी प्रसिद्ध उपाधि (जैसे - छायावाद के प्रवर्तक) का उल्लेख करने से उत्तर अधिक प्रभावशाली बनता है।


Question 25:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
 

Correct Answer:
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रेखांकित अंश की व्याख्या:

लेखक जयशंकर प्रसाद जी ममता की दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि तत्कालीन समाज में एक हिन्दू विधवा की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी।

उसे समाज में सबसे छोटा (तुच्छ) और बेसहारा (निराश्रय) प्राणी समझा जाता था। उसके सभी अधिकार छीन लिए जाते थे और उसका जीवन नीरस हो जाता था।

लेखक कहते हैं कि ममता, जो एक मंत्री की बेटी थी और जिसके पास सभी भौतिक सुख-सुविधाएँ थीं, उसे भी केवल विधवा होने के कारण इस सामाजिक तिरस्कार को झेलना पड़ रहा था।

यह उसके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना या दुर्भाग्य था, जिसका कोई अंत नहीं दिखाई दे रहा था। समाज की यह कठोर रीति उसके सभी सुखों पर भारी पड़ रही थी।
Quick Tip: व्याख्या करते समय तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिखने से उत्तर अधिक गहरा और सटीक होता है। यहाँ 'हिन्दू-विधवा' की स्थिति पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।


Question 26:

गद्यांश के आधार पर संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी कौन है ?

Correct Answer:
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गद्यांश के आधार पर, संसार में सबसे तुच्छ और निराश्रय (बेसहारा) प्राणी 'हिन्दू-विधवा' को बताया गया है।

उस समय के समाज में विधवा स्त्री को सम्मान और आश्रय से वंचित कर दिया जाता था, जिससे उसका जीवन अत्यंत कष्टमय हो जाता था।
Quick Tip: प्रश्न का उत्तर हमेशा गद्यांश में दिए गए तथ्यों के आधार पर ही दें। यहाँ स्पष्ट रूप से लिखा है "हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है"।


सुनि सुन्दर बैन सुधारस साने 
सयानी हैं जानकी जानी भली । 
तिरछे करि नैन, दै सैन, तिन्हैं, 
समुझाइ कछू मुसकाइ चलीं । 
तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै 
अवलोकति लोचन लाहु अली । 
अनुराग-तड़ाग में भानु उदै 
विगसीं मनु मंजुल कंज कली ।

Question 27:

उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।

Correct Answer:
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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'कवितावली' से हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित 'वन पथ पर' शीर्षक कविता से उद्धृत है।

इस अंश में उस प्रसंग का वर्णन है जब वन के मार्ग में ग्रामीण स्त्रियाँ सीता जी से श्रीराम के विषय में पूछती हैं और सीता जी संकेतों के माध्यम से उनका उत्तर देती हैं।
Quick Tip: कविता का संदर्भ लिखते समय कवि, कविता का शीर्षक और मूल ग्रन्थ (जैसे यहाँ 'कवितावली') का उल्लेख अवश्य करें। इससे उत्तर पूर्ण और प्रभावशाली होता है।


Question 28:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
 

Correct Answer:
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रेखांकित अंश की व्याख्या:

तुलसीदास जी कहते हैं कि उस समय (जब सीता जी ने मुस्कुराकर संकेत से उत्तर दिया) सभी सखियाँ श्रीराम के सौंदर्य को देखकर ऐसे सुशोभित हो रही थीं, मानो प्रेम के सरोवर (अनुराग-तड़ाग) में सूर्य (भानु) उदय हो गया हो और कमल की सुंदर कलियाँ (मंजुल कंज कली) खिल गई हों।

यहाँ श्रीराम को सूर्य के समान, ग्रामीण स्त्रियों के हृदय को प्रेम-सरोवर के समान तथा उनके नेत्रों को कमल की कलियों के समान बताया गया है।

जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर तालाब में कमल खिल जाते हैं, उसी प्रकार श्रीराम रूपी सूर्य को देखकर ग्राम-वधुएँ रूपी कमल की कलियाँ खिल उठीं।
Quick Tip: काव्यांश की व्याख्या करते समय अलंकारों और प्रतीकों को पहचानना और उनका अर्थ स्पष्ट करना आवश्यक है। इससे भावार्थ अधिक स्पष्ट होता है। जैसे यहाँ रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर प्रयोग है।


Question 29:

'अनुराग-तड़ाग' तथा 'मनु मंजुल कंज कली' में कौन-सा अंलकार है ?

Correct Answer:
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दिए गए काव्यांश में प्रयुक्त अलंकारों का विवरण इस प्रकार है:

1. 'अनुराग-तड़ाग' (प्रेम रूपी सरोवर): यहाँ 'अनुराग' (उपमेय) पर 'तड़ाग' (उपमान) का अभेद आरोप है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।

2. 'विगसीं मनु मंजुल कंज कली' (मानो सुंदर कमल की कलियाँ खिल गई हों): यहाँ 'मनु' वाचक शब्द का प्रयोग हुआ है और ग्राम-वधुओं के खिलने (उपमेय) में कमल की कलियों के खिलने (उपमान) की संभावना व्यक्त की गई है, इसलिए यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।
Quick Tip: अलंकार पहचानने के लिए वाचक शब्दों (जैसे - मनु, मानो, जनु, जानो, ज्यों) पर ध्यान दें। 'मनु' शब्द उत्प्रेक्षा अलंकार का एक प्रमुख वाचक शब्द है। रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान को एक ही रूप मान लिया जाता है।


सच्चा प्रेम वही है जिसकी 
तृप्ति आत्मबलि पर हो निर्भर । 
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, 
करो प्रेम पर प्राण निछावर ।। 
देश प्रेम वह पुण्य क्षेत्र है, 
अमल असीम त्याग से विलसित । 
आत्मा के विकास से जिसमें 
मनुष्यता होती है विकसित ।

Question 30:

उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक एवं कवि का नाम लिखिए ।

Correct Answer:
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शीर्षक: प्रस्तुत पद्यांश का शीर्षक 'स्वदेश-प्रेम' है।

कवि: इसके रचयिता श्री रामनरेश त्रिपाठी जी हैं।
Quick Tip: अपनी पाठ्य-पुस्तक की सभी महत्वपूर्ण कविताओं के शीर्षक और उनके कवियों के नाम की एक सूची बनाकर याद करें। यह प्रश्न अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है।


Question 31:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
 

Correct Answer:
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रेखांकित अंश की व्याख्या:

कवि रामनरेश त्रिपाठी जी कहते हैं कि देश-प्रेम एक पवित्र (पुण्य) भावना है।

यह एक ऐसा पवित्र क्षेत्र है जो निर्मल (अमल) और असीम त्याग से सुशोभित (विलसित) होता है। अर्थात्, देश-प्रेम की भावना व्यक्ति को त्याग और बलिदान की प्रेरणा देती है।

कवि आगे कहते हैं कि देश-प्रेम की भावना से ही आत्मा का विकास होता है।

जब व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर देश के हित में सोचता है, तो उसकी आत्मा उन्नत होती है और इसी से सच्ची मानवता (मनुष्यता) का विकास होता है।
Quick Tip: व्याख्या करते समय कविता में आए कठिन शब्दों (जैसे - अमल, विलसित) का अर्थ स्पष्ट करें और फिर पूरी पंक्ति का भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।


Question 32:

प्रस्तुत पद्यांश में किसके प्रेम पर प्राण न्योछावर करने की बात कही गयी है ?

Correct Answer:
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प्रस्तुत पद्यांश में सच्चे प्रेम के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए देश-प्रेम पर प्राण न्योछावर करने की बात कही गयी है।

कवि के अनुसार, सच्चा प्रेम वही है जो आत्म-बलिदान पर निर्भर हो, और देश-प्रेम इसका सर्वोच्च उदाहरण है। इसलिए व्यक्ति को अपने देश के प्रेम पर अपने प्राणों को भी न्योछावर करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
Quick Tip: पद्यांश का मूल भाव समझने का प्रयास करें। यहाँ "सच्चा प्रेम" की परिभाषा देकर उसे "देश प्रेम" से जोड़ा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बलिदान देश के लिए करने को कहा गया है।


Question 33:

निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश में से किसी एक का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :

वाराणस्यां प्राचीनकालादेव गेहे गेहे विद्यायाः दिव्यं ज्योतिः द्योतते । अधुनाऽपि अत्र संस्कृतवाग्धारा सततं प्रवहति, जनानां ज्ञानश्च वर्द्धयति । अत्र अनेके आचार्याः मूर्धन्याः विद्वांसः वैदिकवाङ्मयस्य अध्ययने अध्यापने च इदानीं निरताः । न केवलं भारतीयाः अपितु वैदेशिकाः गीर्णाणवाण्या अध्ययनाय अत्र आगच्छन्ति, निःशुल्कं च विद्यां गृह्णन्ति । अत्र हिन्दूविश्वविद्यालयः, संस्कृत विश्वविद्यालयः, काशी विद्यापीठं इत्येते त्रयः विश्वविद्यालयाः सन्ति, येषु नवीनानां प्राचीनानाञ्च ज्ञानविज्ञानविषयाणाम् अध्ययनं प्रचलितः ।

Correct Answer:
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सन्दर्भ:

प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-परिचयिका' खण्ड के 'वाराणसी' नामक पाठ से उद्धृत है। इस अंश में वाराणसी की प्राचीन ज्ञान-परम्परा और शैक्षिक महत्त्व का वर्णन किया गया है।




हिन्दी में अनुवाद:

वाराणसी में प्राचीन काल से ही घर-घर में विद्या का अलौकिक प्रकाश चमकता रहा है। आज भी यहाँ संस्कृत वाणी की धारा निरन्तर बहती रहती है और लोगों का ज्ञान बढ़ाती है। यहाँ अनेक आचार्य, मूर्धन्य (उच्च कोटि के) विद्वान् वैदिक साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में इस समय लगे हुए हैं। केवल भारतीय ही नहीं, अपितु विदेशी भी देववाणी (संस्कृत) के अध्ययन के लिए यहाँ आते हैं और निःशुल्क विद्या ग्रहण करते हैं। यहाँ हिन्दू विश्वविद्यालय, संस्कृत विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ, ये तीन विश्वविद्यालय हैं, जिनमें नवीन और प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के विषयों का अध्ययन चलता रहता है।
Quick Tip: संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद करते समय, शब्दों के सही अर्थ के साथ-साथ वाक्य के भाव को समझना भी आवश्यक है। वाक्य को छोटे-छोटे भागों में तोड़कर अनुवाद करने से आसानी होती है।


Question 34:

'विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एव' इति भारतीयसंस्कृतेः मूलम् । विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभिः एकम् एव ईश्वरं भजन्ते । अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, करीमः रामः, रहीमः, जिनः, बुद्धः, ख्रिस्तः, अल्लाहः इत्यादीनि नामानि एकस्य एव परमात्मनः सन्ति । तम् एव ईश्वरं जनाः गुरुः इत्यपि मन्यते । अतः सर्वेषां मतानां समवायः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृते सन्देशः ।

Correct Answer:
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सन्दर्भ:

प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-परिचयिका' खण्ड के 'भारतीयः संस्कृतिः' नामक पाठ से अवतरित है। इसमें भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धान्त 'ईश्वर एक है' को स्पष्ट किया गया है।




हिन्दी में अनुवाद:

'संसार का रचयिता ईश्वर एक ही है', यह भारतीय संस्कृति का मूल है। विभिन्न मतों को मानने वाले अनेक नामों से एक ही ईश्वर का भजन करते हैं। अग्नि, इन्द्र, कृष्ण, करीम, राम, रहीम, जिन, बुद्ध, ईसा, अल्लाह इत्यादि नाम एक ही परमात्मा के हैं। उसी ईश्वर को लोग 'गुरु' के रूप में भी मानते हैं। अतः सभी मतों के प्रति समभाव (समान भाव) और सम्मान हमारी संस्कृति का सन्देश है।
Quick Tip: इस प्रकार के गद्यांश का अनुवाद करते समय भारतीय संस्कृति की 'अनेकता में एकता' की भावना को ध्यान में रखें। इससे अनुवाद में भाव की गहराई आएगी।


Question 35:

दिए गए संस्कृत पद्यांश में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :

बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः ।

उभयत्र समो वीरः वीर भावो हि वीरता ।।

Correct Answer:
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सन्दर्भ:

प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-परिचयिका' खण्ड के 'वीरः वीरेण पूज्यते' नामक पाठ से उद्धृत है। इसमें सिकन्दर और पुरुराज के संवाद के माध्यम से वीरता की परिभाषा दी गयी है।




हिन्दी में अनुवाद:

बन्धन हो अथवा मरण, जीत हो या हार, वीर पुरुष दोनों ही स्थितियों (परिस्थितियों) में समान रहता है। वीर-भाव को ही वीरता कहते हैं।
Quick Tip: श्लोक का अनुवाद करते समय उसके अन्वय (कर्ता, कर्म, क्रिया के अनुसार वाक्य-रचना) को समझें। इससे अर्थ स्पष्ट हो जाता है। जैसे यहाँ 'वीरः उभयत्र समः (भवति)' अर्थ है।


Question 36:

सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।

आतुरस्य भिषक् मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ।।

Correct Answer:
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सन्दर्भ:

प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-परिचयिका' खण्ड के 'जीवन सूत्रणि' नामक पाठ से लिया गया है। यह श्लोक यक्ष और युधिष्ठिर संवाद का अंश है, जिसमें जीवन के लिए उपयोगी सूत्रों को बताया गया है।




हिन्दी में अनुवाद:

प्रदेश में रहने वाले (प्रवासी) का मित्र धन (या साथ चलने वाला समूह) होता है, घर पर रहने वाले का मित्र पत्नी होती है। रोगी का मित्र वैद्य (डॉक्टर) होता है और मरने वाले व्यक्ति का मित्र दान होता है।
Quick Tip: 'जीवन सूत्रणि' पाठ के श्लोक सूक्ति के रूप में होते हैं। इनका अनुवाद करते समय ध्यान रखें कि अर्थ सरल और सारगर्भित हो, जो जीवन के लिए एक शिक्षा प्रदान करे।


Question 37:

'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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डॉ. राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित 'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के नायक महात्मा गांधी हैं। कवि ने उन्हें एक युग-पुरुष और मुक्तिदूत के रूप में चित्रित किया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


दिव्य एवं अलौकिक पुरुष: कवि ने गांधीजी को साधारण मनुष्य न मानकर ईश्वर का अवतार माना है, जिन्होंने भारत को दासता से मुक्त कराने के लिए जन्म लिया।
हरिजनों के उद्धारक: गांधीजी ने भारत में व्याप्त छुआछूत और जाति-पाति का घोर विरोध किया। उन्होंने दलितों और शोषितों को 'हरिजन' अर्थात् ईश्वर के जन कहकर सम्मान दिया और उनके उत्थान के लिए अथक प्रयास किए।
सत्य और अहिंसा के पुजारी: सत्य और अहिंसा गांधीजी के दो सबसे बड़े शस्त्र थे। उन्होंने बिना किसी हिंसा के, इन्हीं दो सिद्धांतों के बल पर शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को झुका दिया।
दृढ़-प्रतिज्ञ: गांधीजी अपने निश्चय के बहुत पक्के थे। उन्होंने जो भी संकल्प लिया (जैसे - नमक कानून तोड़ना, भारत छोड़ो आन्दोलन), उसे पूर्ण करके ही दम लिया।
हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक: गांधीजी भारत की एकता के लिए हिन्दू और मुस्लिमों को एक साथ मिलकर रहने का उपदेश देते थे। वे दोनों की एकता में ही भारत की शक्ति देखते थे।
महान देशभक्त: गांधीजी एक महान देशभक्त थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत माता की सेवा और उसे स्वतंत्र कराने में समर्पित कर दिया।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि 'मुक्तिदूत' के नायक गांधीजी मानवीय गुणों से परिपूर्ण, युग-प्रवर्तक और महान लोकनायक हैं। Quick Tip: चरित्र-चित्रण करते समय विशेषताओं को शीर्षकों (headings) में लिखें और प्रत्येक शीर्षक के अन्दर एक या दो पंक्तियों में उसकी व्याख्या करें। इससे उत्तर अधिक व्यवस्थित और प्रभावशाली लगता है।


Question 38:

'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए ।

Correct Answer:
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'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य का चतुर्थ सर्ग 'नमक सत्याग्रह' या 'दांडी यात्रा' की ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। इसका सारांश इस प्रकार है:

अंग्रेजों ने नमक जैसी आवश्यक वस्तु पर कर लगा दिया था, जिससे आम जनता बहुत परेशान थी। महात्मा गांधी ने इस अन्यायपूर्ण कानून का विरोध करने का निश्चय किया। उन्होंने साबरमती आश्रम से अपने 78 अनुयायियों के साथ दांडी नामक स्थान के लिए पदयात्रा आरम्भ की।

इस यात्रा के दौरान रास्ते में हजारों लोग उनके साथ जुड़ते गए। गांधीजी जहाँ भी रुकते, वहाँ लोगों को सत्य और अहिंसा का उपदेश देते। उनकी इस यात्रा से पूरे देश में स्वतंत्रता की एक नई लहर दौड़ गई।

24 दिनों की लम्बी यात्रा के बाद वे दांडी पहुँचे और समुद्र के पानी से नमक बनाकर अंग्रेजों के नमक कानून को तोड़ा। इस पर अंग्रेजी सरकार ने दमन चक्र चलाया और गांधीजी सहित अनेक नेताओं को जेल में डाल दिया। परन्तु, यह आन्दोलन रुका नहीं, बल्कि पूरे देश में फैल गया। अंततः, ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और गांधीजी को वार्ता के लिए आमंत्रित करना पड़ा। यह सर्ग गांधीजी की दृढ़-निश्चय और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। Quick Tip: किसी सर्ग का सारांश लिखते समय, सर्ग की मुख्य घटना और उसके परिणाम को अवश्य लिखें। सारांश को अपनी भाषा में, संक्षिप्त और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें।


Question 39:

'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए ।

Correct Answer:
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श्री देवीप्रसाद शुक्ल 'राही' द्वारा रचित खण्डकाव्य 'ज्योति जवाहर' की कथावस्तु भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के विराट व्यक्तित्व पर केन्द्रित है। इसमें किसी एक कहानी या घटना का वर्णन नहीं है, बल्कि कवि ने अपनी कल्पना के माध्यम से नेहरूजी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को भारत की समग्रता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है।

काव्य का आरम्भ नेहरूजी के अलौकिक रूप के वर्णन से होता है। कवि कल्पना करता है कि नेहरूजी भारत-भ्रमण पर हैं और सम्पूर्ण भारत उनके व्यक्तित्व में समाहित है। राजस्थान उन्हें अपनी वीरता और त्याग प्रदान करता है, तो हिमालय उन्हें अपनी ऊँचाई और दृढ़ता देता है। दक्षिण भारत उन्हें अपनी कला और संस्कृति से सुशोभित करता है।

कवि ने नेहरूजी को 'भारत का मुकुटमणि' और 'युग का अवतार' माना है। उनकी नजर में नेहरूजी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह शक्ति हैं जिसमें अशोक की शांति, बुद्ध की करुणा, प्रताप का स्वाभिमान और शिवाजी की वीरता का समन्वय है। इस प्रकार, इस खण्डकाव्य की कथावस्तु नेहरूजी के महान, लोकनायक और समन्वयवादी व्यक्तित्व का गुणगान है, जिसे कवि ने भारत के विभिन्न प्रदेशों और प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से व्यक्त किया है। Quick Tip: 'ज्योति जवाहर' की कथावस्तु लिखते समय यह स्पष्ट करें कि यह घटना-प्रधान काव्य नहीं, बल्कि भाव-प्रधान और नायक के चरित्र-प्रधान काव्य है। कवि की कल्पना और प्रतीकों का उल्लेख अवश्य करें।


Question 40:

'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य के आधार पर 'जवाहरलाल नेहरू' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य के नायक पं. जवाहरलाल नेहरू हैं। कवि ने उन्हें एक युग-पुरुष के रूप में चित्रित किया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


दिव्य गुणों से युक्त नायक: कवि ने नेहरूजी को सामान्य मानव न मानकर सूर्य के तेज, चन्द्रमा की शीतलता और हिमालय की दृढ़ता से युक्त एक अलौकिक पुरुष के रूप में चित्रित किया है।
समग्र राष्ट्र के प्रतिबिम्ब: नेहरूजी के व्यक्तित्व में सम्पूर्ण भारत की झलक मिलती है। कवि के अनुसार, वे जहाँ भी जाते हैं, वहाँ की संस्कृति, वीरता और विशेषताएँ उनके व्यक्तित्व में समाहित हो जाती हैं।
महान लोकनायक: वे भारत की जनता के हृदय-सम्राट थे। सम्पूर्ण देश की जनता उन्हें असीम प्रेम और सम्मान देती थी। वे सबके प्रिय 'चाचा नेहरू' थे।
शांति के अग्रदूत: नेहरूजी विश्व में शांति स्थापित करने के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने 'पंचशील' जैसे सिद्धान्तों के माध्यम से विश्व-शांति का संदेश दिया।
प्रकृति-प्रेमी: उन्हें भारत की प्रकृति, विशेषकर गंगा नदी और हिमालय से अगाध प्रेम था। वे प्रकृति में विराट सत्ता का दर्शन करते थे।
दृढ़ संकल्प और कर्मयोगी: वे अपने निश्चय के पक्के और एक कर्मठ पुरुष थे। उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अथक परिश्रम किया।

संक्षेप में, 'ज्योति जवाहर' के नायक नेहरूजी एक महान, दूरदर्शी, शांतिप्रिय और भारत की आत्मा को समझने वाले युग-पुरुष हैं। Quick Tip: 'ज्योति जवाहर' के आधार पर नेहरूजी का चरित्र-चित्रण करते समय, कवि ने उनके व्यक्तित्व की तुलना किन-किन प्राकृतिक और ऐतिहासिक प्रतीकों से की है, इसका उल्लेख करने से उत्तर अधिक प्रभावशाली हो जाता है।


Question 41:

'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के आधार पर 'दौलत' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य में 'दौलत' एक गौण पात्र है। वह महाराणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह की पुत्री है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


सरल एवं प्रकृति-प्रेमी: दौलत एक वनवासी बालिका है। वह प्रकृति के बीच पली-बढ़ी है, इसलिए उसका स्वभाव अत्यंत सरल और निश्छल है। उसे वनों, पर्वतों और वहाँ के जीव-जन्तुओं से गहरा लगाव है।
पितृ-भक्त: वह अपने पिता शक्ति सिंह से बहुत प्रेम करती है। जब वह अपने पिता को पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए देखती है, तो वह बहुत दुखी होती है और उनकी पीड़ा को दूर करना चाहती है।
चिन्तनशील: आयु में छोटी होने पर भी दौलत विचारशील है। वह अपने पिता के दुःख का कारण जानना चाहती है और देश की दुर्दशा पर चिन्ता व्यक्त करती है।
देश-प्रेमी: उसके हृदय में अपने देश मेवाड़ के प्रति अपार प्रेम है। वह महाराणा प्रताप का बहुत सम्मान करती है और मेवाड़ की स्वतंत्रता की कामना करती है।
भावुक: वह एक भावुक लड़की है। अपने पिता की व्यथा और परिवार की कलह को देखकर उसका हृदय द्रवित हो उठता है। Quick Tip: गौण पात्रों का चरित्र-चित्रण करते समय, खण्डकाव्य की मुख्य कथा में उनकी भूमिका को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होता है। दौलत का चरित्र उसके पिता शक्ति सिंह के हृदय-परिवर्तन में सहायक बनता है।


Question 42:

'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के किसी सर्ग का सारांश लिखिए ।

Correct Answer:
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'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग 'अरावली' का सारांश

'मेवाड़ मुकुट' का प्रथम सर्ग 'अरावली' महाराणा प्रताप के संघर्षपूर्ण जीवन को प्रस्तुत करता है। हल्दीघाटी के युद्ध में पराजित होने के पश्चात् महाराणा प्रताप अपने परिवार सहित अरावली के घने जंगलों में भटक रहे हैं। वे मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अनेक कष्ट सहन कर रहे हैं। उनके बच्चे भूख से व्याकुल हैं और उन्हें घास की रोटियाँ खानी पड़ रही हैं।

सर्ग की सबसे मार्मिक घटना तब घटती है, जब महाराणा प्रताप की छोटी बेटी के हाथ से एक जंगली बिलाव घास की रोटी छीनकर भाग जाता है। बेटी की भूख और उसके करुण क्रंदन को देखकर प्रताप का हृदय विचलित हो उठता है। वे अपनी प्रतिज्ञा पर संदेह करने लगते हैं और सोचते हैं कि उनके इस हठ के कारण उनका परिवार इतना कष्ट झेल रहा है।

इस मानसिक संघर्ष की स्थिति में, वे क्षणिक आवेश में आकर मेवाड़ की स्वतंत्रता का संकल्प त्यागकर अकबर की अधीनता स्वीकार करने का विचार करने लगते हैं। इसी द्वंद्व और पीड़ा के साथ प्रथम सर्ग समाप्त होता है। यह सर्ग प्रताप की संघर्षशीलता और उनकी मार्मिक मानवीय पीड़ा को दर्शाता है। Quick Tip: सारांश लिखते समय सर्ग के शीर्षक ('अरावली') की सार्थकता को भी समझाएँ। यह सर्ग अरावली पर्वत में प्रताप के संघर्ष को दिखाता है, इसलिए इसका नाम 'अरावली' है।


Question 43:

'अग्रपूजा' खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।

Correct Answer:
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'अग्रपूजा' खण्डकाव्य की कथावस्तु महाभारत के राजसूय यज्ञ और शिशुपाल वध के प्रसंग पर आधारित है। इसे छः सर्गों में विभाजित किया गया है।

कथावस्तु का सार:

पूर्वाभास एवं आयोजन: कथा का प्रारम्भ श्रीकृष्ण के हस्तिनापुर से लौटने से होता है, जहाँ दुर्योधन ने संधि का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है, जिससे युद्ध की आशंका बढ़ जाती है। इधर, युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ की तैयारी करते हैं।
यज्ञ का आयोजन: खाण्डवप्रस्थ (इन्द्रप्रस्थ) में राजसूय यज्ञ का भव्य आयोजन होता है। देश-विदेश के सभी राजा, ऋषि-मुनि और विद्वान् पधारते हैं।
अग्रपूजा का प्रश्न: यज्ञ में प्रश्न उठता है कि सर्वप्रथम किसकी पूजा (अग्रपूजा) की जाए। भीष्म पितामह सभी की सहमति से भगवान श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ पात्र बताते हैं।
शिशुपाल का विरोध: चेदि-नरेश शिशुपाल इस प्रस्ताव का घोर विरोध करता है और भरी सभा में श्रीकृष्ण को अपशब्द कहने लगता है।
शिशुपाल-वध: श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की माता को उसके सौ अपराध क्षमा करने का वचन दिया था। जब शिशुपाल के अपराधों की संख्या सौ से अधिक हो जाती है, तो श्रीकृष्ण अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर देते हैं।
यज्ञ की समाप्ति: शिशुपाल वध के बाद यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न होता है। सभी युधिष्ठिर को सम्राट के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें बधाई देते हैं।

इस प्रकार, खण्डकाव्य धर्म की अधर्म पर विजय के संदेश को प्रस्तुत करता है। Quick Tip: कथावस्तु को संक्षेप में लिखते समय प्रमुख घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करना चाहिए। बिन्दुओं (points) का प्रयोग करने से उत्तर स्पष्ट और पठनीय हो जाता है।


Question 44:

'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के आधार पर 'युधिष्ठिर' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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'अग्रपूजा' खण्डकाव्य में युधिष्ठिर एक आदर्श नायक के रूप में चित्रित हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


धर्मराज और सत्यवादी: युधिष्ठिर को 'धर्मराज' कहा जाता है क्योंकि वे सदैव धर्म और सत्य के मार्ग पर चलते हैं। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी वे धर्म का त्याग नहीं करते।
विनम्र और शीलवान: उनका स्वभाव अत्यंत विनम्र और शांत है। वे सभी बड़ों, गुरुजनों और अतिथियों का यथोचित सम्मान करते हैं। उनका आचरण शील और सदाचार का प्रतीक है।
आदर्श शासक: वे एक प्रजा-वत्सल राजा हैं। उनकी एकमात्र इच्छा अपनी प्रजा को सुखी देखना है। वे न्यायप्रिय हैं और उनके राज्य में सभी प्रसन्न हैं।
श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त: युधिष्ठिर की भगवान श्रीकृष्ण में अटूट श्रद्धा और विश्वास है। वे प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य में श्रीकृष्ण से परामर्श लेते हैं और उन्हीं के निर्णय को अंतिम मानते हैं।
क्षमाशील एवं उदार: उनका हृदय अत्यंत उदार है। वे अपने भाईयों के प्रति अपमानजनक व्यवहार करने वाले दुर्योधन जैसे शत्रुओं के प्रति भी कटुता नहीं रखते।
शांतिप्रिय: युधिष्ठिर स्वभाव से शांतिप्रिय हैं और अंत तक युद्ध को टालने का प्रयास करते हैं। राजसूय यज्ञ का आयोजन भी विश्व-शांति की कामना से ही किया गया था।

इस प्रकार, युधिष्ठिर धर्म, सत्य, विनम्रता और उदारता की प्रतिमूर्ति हैं। Quick Tip: युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण करते समय उनके उपनाम 'धर्मराज' को आधार बनाकर व्याख्या करें। उनके सभी गुण इसी एक विशेषता से जुड़े हुए हैं।


Question 45:

'जय सुभाष' खण्डकाव्य के आधार पर 'सुभाष चन्द्र बोस' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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श्री विनोदचन्द्र पाण्डेय 'विनोद' द्वारा रचित 'जय सुभाष' खण्डकाव्य के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हैं। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान सेनानी हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


महान देशभक्त: सुभाष चन्द्र बोस एक अद्वितीय देशभक्त थे। उनका जीवन भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए समर्पित था। उन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
अदम्य साहसी और वीर: वे जन्म से ही निर्भीक और साहसी थे। अंग्रेजों की कड़ी निगरानी के बावजूद वेष बदलकर उनके घर से निकल भागना उनके अदम्य साहस का परिचय देता है।
कुशल संगठनकर्ता: उन्होंने जर्मनी और जापान जैसे देशों की यात्रा कर भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाया। उन्होंने 'आजाद हिन्द फौज' जैसी विशाल सेना का गठन किया, जो उनकी अद्भुत संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है।
ओजस्वी वक्ता: नेताजी एक प्रभावशाली वक्ता थे। उनके भाषणों में जादू था। "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा" जैसा उनका नारा आज भी युवाओं में जोश भर देता है।
महान त्यागी: उन्होंने देश-सेवा के लिए आई.सी.एस. जैसे प्रतिष्ठित पद को ठुकरा दिया और अपना सम्पूर्ण जीवन संघर्षों में बिताया।
अमर सेनानी: सुभाष चन्द्र बोस भारत के एक अमर सेनानी हैं, जिनका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे आज भी करोड़ों भारतीयों के प्रेरणास्रोत हैं। Quick Tip: सुभाष चन्द्र बोस का चरित्र-चित्रण लिखते समय उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं, जैसे- आई.सी.एस. का त्याग, देश से पलायन, आजाद हिन्द फौज का गठन, का उल्लेख अवश्य करें। यह आपके उत्तर को प्रामाणिक बनाएगा।


Question 46:

'जय सुभाष' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए ।

Correct Answer:
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'जय सुभाष' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश

'जय सुभाष' खण्डकाव्य का प्रथम सर्ग नायक सुभाष चन्द्र बोस के जन्म, बचपन और युवावस्था की घटनाओं पर आधारित है। सर्ग का आरम्भ भारत की महिमा के गुणगान से होता है और बताया जाता है कि ऐसे महान देश में सुभाष जैसे वीर ने जन्म लिया।

इस सर्ग में उनके माता-पिता (जानकीनाथ बोस और प्रभावती) का परिचय दिया गया है। बचपन से ही सुभाष की बुद्धि अत्यंत तीव्र थी और उनके मन में देश-प्रेम की भावना प्रबल थी।

कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ते समय एक अंग्रेज प्रोफेसर ओटेन द्वारा भारतीयों का अपमान किए जाने पर युवा सुभाष का खून खौल उठता है। वे इस अन्याय का विरोध करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें कॉलेज से निकाल दिया जाता है। यह घटना उनके स्वाभिमानी और निर्भीक चरित्र को उजागर करती है।

इसके पश्चात् वे अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए इंग्लैंड जाकर आई.सी.एस. की कठिन परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं। परन्तु, गुलामी की नौकरी करना उनके स्वाभिमान को स्वीकार्य नहीं था। अतः वे इस उच्च पद को त्यागकर भारत माता की सेवा करने का संकल्प लेते हैं और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ते हैं। Quick Tip: प्रथम सर्ग के सारांश में नायक के बचपन की उन घटनाओं पर विशेष ध्यान दें जो उनके भविष्य के चरित्र की नींव रखती हैं, जैसे प्रोफेसर ओटेन वाली घटना।


Question 47:

'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग का सारांश लिखिए ।

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'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग 'संकल्प' का सारांश

डॉ. जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित 'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य का प्रथम सर्ग 'संकल्प' नायक चन्द्रशेखर आजाद के क्रान्तिकारी जीवन के आरम्भ को प्रस्तुत करता है।

सर्ग का प्रारम्भ भारत की तत्कालीन दयनीय स्थिति के चित्रण से होता है। अंग्रेजी शासन के अत्याचारों से त्रस्त भारत माता अपनी मुक्ति के लिए पुकार रही है। किशोर चन्द्रशेखर अपने देश की यह दुर्दशा देखकर अत्यंत व्यथित होते हैं। वे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर भारत को स्वतंत्र कराने के आन्दोलन में भाग लेने का दृढ़ संकल्प लेते हैं।

उस समय गांधीजी का असहयोग आन्दोलन चल रहा था। चन्द्रशेखर भी उसमें कूद पड़ते हैं। विदेशी वस्त्रों की दुकान पर धरना देते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है, तो वे निर्भीकता से अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वाधीन' और घर 'जेलखाना' बताते हैं।

इस उत्तर से क्रोधित होकर अंग्रेज मजिस्ट्रेट उन्हें पन्द्रह बेंतों की कठोर सजा सुनाता है। प्रत्येक बेंत के प्रहार पर किशोर चन्द्रशेखर पीड़ा से कराहने के बजाय 'भारत माता की जय' का उद्घोष करते हैं। यहीं से उनका नाम 'आजाद' पड़ गया और वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महान क्रान्तिकारी के रूप में प्रसिद्ध हुए। Quick Tip: 'संकल्प' सर्ग का सारांश लिखते समय चन्द्रशेखर के 'आजाद' नाम पड़ने वाली घटना का विस्तार से और प्रभावशाली ढंग से वर्णन करें, क्योंकि यह इस सर्ग का सबसे महत्वपूर्ण अंश है।


Question 48:

'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के आधार पर 'चन्द्रशेखर आजाद' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के नायक अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


महान देशभक्त: आजाद के जीवन का एकमात्र लक्ष्य मातृभूमि को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराना था। इसके लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
वीर और अदम्य साहसी: वे बचपन से ही वीर और निर्भीक थे। मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए उनके उत्तर और बेंतों की सजा को हंसते-हंसते सहना उनके अदम्य साहस का प्रतीक है।
स्वाभिमानी और दृढ़-प्रतिज्ञ: उन्होंने संकल्प लिया था कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं आएँगे। इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में उन्होंने अपनी इस प्रतिज्ञा को अपने प्राणों की आहुति देकर निभाया।
कुशल संगठनकर्ता और नेता: वे एक महान क्रान्तिकारी नेता थे। उन्होंने अनेक क्रान्तिकारियों को संगठित कर अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी।
त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति: देश के लिए उन्होंने अपने घर-परिवार, सुख-चैन, सब कुछ त्याग दिया था। उनका सम्पूर्ण जीवन त्याग और बलिदान का एक अनुपम उदाहरण है।
अमर शहीद: चन्द्रशेखर आजाद ने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया और वे सदा के लिए अमर हो गए। वे आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। Quick Tip: आजाद का चरित्र-चित्रण करते समय उनकी प्रतिज्ञा ("मैं जीते-जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आऊँगा") का उल्लेख करना अनिवार्य है, क्योंकि यह उनके स्वाभिमानी चरित्र का मूल आधार है।


Question 49:

'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर 'कृष्ण' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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'कर्ण' खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण एक सहायक परन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र हैं। वे कथा को एक निर्णायक मोड़ देते हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


महान कूटनीतिज्ञ: श्रीकृष्ण एक कुशल कूटनीतिज्ञ हैं। वे महाभारत के युद्ध को टालने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसी उद्देश्य से वे कर्ण के पास जाते हैं और उसे पांडवों के पक्ष में लाने की चेष्टा करते हैं।
स्पष्टवादी एवं निर्भीक: वे कर्ण के समक्ष बिना किसी लाग-लपेट के उसके जन्म का रहस्य उजागर कर देते हैं। वे स्पष्ट रूप से उसे दुर्योधन के अधर्मी साथ को छोड़ने के लिए कहते हैं।
पांडवों के हितैषी: वे पांडवों के परम हितैषी और संरक्षक हैं। वे चाहते हैं कि कर्ण जैसा महान योद्धा पांडवों की ओर से लड़े, जिससे उनकी शक्ति बढ़े और धर्म की विजय हो।
प्रलोभन-दाता: अपनी बात मनवाने के लिए वे कूटनीति का सहारा लेते हुए कर्ण को राज्य और द्रौपदी तक का प्रलोभन देते हैं। यह उनके राजनीतिक कौशल को दर्शाता है।
गुणों के प्रशंसक: यद्यपि कर्ण शत्रु पक्ष में है, फिर भी श्रीकृष्ण उसकी वीरता, दानवीरता और मित्र-धर्म के प्रति निष्ठा की प्रशंसा करते हैं।

संक्षेप में, 'कर्ण' खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण एक लोक-कल्याणकारी, कुशल राजनीतिज्ञ और धर्म-स्थापना के लिए प्रयत्नशील पात्र के रूप में चित्रित हुए हैं। Quick Tip: श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण करते समय यह ध्यान रखें कि यहाँ वे ईश्वर से अधिक एक कुशल राजनीतिज्ञ और पांडवों के हितैषी के रूप में चित्रित हैं। उनके मानवीय पक्ष पर अधिक जोर दें।


Question 50:

'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर 'द्रौपदी' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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'कर्ण' खण्डकाव्य में द्रौपदी एक वीरांगना और स्वाभिमानी नारी के रूप में चित्रित हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


अत्यंत स्वाभिमानी: द्रौपदी एक क्षत्राणी हैं और उनमें स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी है। वे कौरवों द्वारा भरी सभा में किए गए अपने अपमान को भूल नहीं पातीं।
अपमान की पीड़ा से व्यथित: चीर-हरण का अपमान उनके हृदय में एक ज्वाला की भाँति धधकता रहता है। यह पीड़ा उन्हें शांति से नहीं बैठने देती।
युद्ध की प्रेरिका: जब पांडव शांति और क्षमा की बात करते हैं, तो द्रौपदी उन्हें उनके क्षत्रिय धर्म की याद दिलाती हैं। वे अपने अपमान का बदला लेने और युद्ध के लिए उन्हें प्रेरित करती हैं।
वीर नारी: वे कायरता को पसंद नहीं करतीं। वे अपने पतियों को वीरों की भांति युद्ध करके न्याय प्राप्त करने के लिए उत्साहित करती हैं।
तर्कशील: वे अपने तर्कों से पांडवों को यह समझाती हैं कि शांति-प्रस्ताव भेजना उनकी कायरता समझी जाएगी और उन्हें अपने सम्मान के लिए युद्ध करना ही होगा।

इस प्रकार, द्रौपदी एक ऐसी नारी हैं जो अन्याय को सहन नहीं करतीं और अपने सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष करने में विश्वास रखती हैं। Quick Tip: द्रौपदी का चरित्र-चित्रण करते समय 'महाभारत' के उस प्रसिद्ध प्रसंग का उल्लेख अवश्य करें जहाँ वह अपने खुले केशों की प्रतिज्ञा करती हैं। यह उनके स्वाभिमानी और दृढ़-प्रतिज्ञ चरित्र को दर्शाता है।


Question 51:

'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के आधार पर 'भरत' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के नायक भरत हैं। उन्हें एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई और त्यागी शासक के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


आदर्श भ्राता: भरत का अपने बड़े भाई श्रीराम के प्रति प्रेम और सम्मान अनुकरणीय है। वे श्रीराम के बिना अयोध्या के राज्य की कल्पना भी नहीं कर सकते। भ्रातृ-प्रेम में वे विश्व-साहित्य में अद्वितीय हैं।
महान त्यागी और निर्लोभी: उनकी माता कैकेयी ने उनके लिए ही राज्य माँगा था, परन्तु भरत राज-सुख को ठोकर मार देते हैं। उनके मन में राज्य का कोई लोभ नहीं है।
आत्मग्लानि से युक्त: वे अपनी माता के कृत्य के लिए स्वयं को दोषी मानते हैं और आत्मग्लानि की आग में जलते रहते हैं। वे कैकेयी को कटु वचन भी कहते हैं।
विनम्र एवं शीलवान: भरत स्वभाव से अत्यंत विनम्र और सदाचारी हैं। वे माता कौशल्या और गुरु वशिष्ठ के समक्ष अपनी निर्दोषिता सिद्ध करते हैं।
आदर्श एवं कर्तव्यनिष्ठ शासक: श्रीराम के वन से न लौटने पर, वे उनकी खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखकर एक सेवक की भाँति चौदह वर्षों तक अयोध्या का राज-काज संभालते हैं। यह उनके महान कर्तव्य-पालन का प्रमाण है।

निष्कर्षतः भरत त्याग, भ्रातृ-प्रेम, शील और कर्तव्यनिष्ठा की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं। Quick Tip: भरत का चरित्र-चित्रण करते समय 'त्याग' और 'भ्रातृ-प्रेम' इन दो गुणों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करें, क्योंकि यही उनके चरित्र के मूल आधार हैं।


Question 52:

'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के 'आगमन' सर्ग की कथावस्तु लिखिए ।

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'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के 'आगमन' सर्ग की कथावस्तु

'आगमन' सर्ग में भरत और शत्रुघ्न के ननिहाल (केकय देश) से अयोध्या वापस आने की कथा है।

जब भरत अयोध्या के निकट पहुँचते हैं, तो उन्हें नगर की उदासी और सूनापन देखकर किसी अनहोनी की आशंका होती है। नगरवासी उन्हें देखकर मुँह फेर लेते हैं, जिससे उनकी चिन्ता और बढ़ जाती है।

राजमहल में प्रवेश करने पर वे अपनी माता कैकेयी से मिलते हैं। कैकेयी उन्हें बताती हैं कि उन्होंने राजा दशरथ से दो वरदानों में उनके लिए राज्य और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा है। यह सुनकर भरत पर मानो बिजली गिर जाती है। जब उन्हें पता चलता है कि इसी दुःख में पिता दशरथ ने प्राण त्याग दिए हैं, तो वे शोक से व्याकुल हो उठते हैं।

भरत अपनी माता कैकेयी को इस घोर अनर्थ के लिए बहुत धिक्कारते हैं और कहते हैं कि इस कुल-कलंक को वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। वे स्वयं को इस षड्यंत्र से पूरी तरह अलग बताते हैं। इसके बाद वे रोते हुए माता कौशल्या के पास जाते हैं। कौशल्या भी पहले उन पर संदेह करती हैं, परन्तु भरत की निष्ठा और दुःख देखकर उन्हें अपने पुत्र के समान गले लगा लेती हैं। यह सर्ग भरत के निर्दोष चरित्र और महान भ्रातृ-प्रेम को उजागर करता है। Quick Tip: 'आगमन' सर्ग की कथावस्तु लिखते समय भरत के मन के विभिन्न भावों - आशंका, दुःख, क्रोध, ग्लानि - को क्रम से दिखाना महत्वपूर्ण है। इससे उत्तर सजीव हो उठता है।


Question 53:

'तुमुल' खण्डकाव्य के आधार पर 'लक्ष्मण' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।

Correct Answer:
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'तुमुल' खण्डकाव्य के नायक लक्ष्मण हैं। वे श्रीराम के छोटे भाई और एक आदर्श अनुज हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


अद्वितीय भ्रातृ-भक्त: लक्ष्मण के जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपने बड़े भाई श्रीराम की सेवा करना है। वे श्रीराम के लिए अपने सभी सुखों, यहाँ तक कि अपनी पत्नी उर्मिला का भी त्याग कर उनके साथ वन चले जाते हैं।
महान वीर और साहसी: वे एक अतुलनीय योद्धा हैं। युद्ध-भूमि में वे अकेले ही रावण के पुत्र मेघनाद जैसे मायावी योद्धा को भी परास्त कर देते हैं। उनकी वीरता की प्रशंसा शत्रु भी करते हैं।
उग्र स्वभाव: लक्ष्मण को अन्याय सहन नहीं होता और वे शीघ्र ही क्रोधित हो जाते हैं। उनका क्रोध धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए होता है।
त्यागी और तपस्वी: वनवास के चौदह वर्षों तक वे अपने भाई-भाभी की सेवा के लिए कभी सोये नहीं। उन्होंने एक तपस्वी की भाँति कठोर जीवन व्यतीत किया।
अजेय योद्धा: लक्ष्मण को युद्ध में पराजित करना असंभव था। मेघनाद भी उन्हें सीधे युद्ध में नहीं हरा सका और उसे छल से 'शक्ति' बाण का प्रयोग करना पड़ा।
सेवा-भाव की प्रतिमूर्ति: उनका सम्पूर्ण जीवन सेवा और समर्पण का प्रतीक है। वे बिना किसी स्वार्थ के केवल अपने भाई की सेवा में लगे रहते हैं।

संक्षेप में, लक्ष्मण भ्रातृ-भक्ति, वीरता, त्याग और सेवा की प्रतिमूर्ति हैं। Quick Tip: लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण करते समय उनके उग्र स्वभाव को नकारात्मक रूप में न दर्शाएँ, बल्कि यह बताएँ कि उनका क्रोध अन्याय के विरुद्ध था। उनकी भ्रातृ-भक्ति और वीरता पर मुख्य ध्यान दें।


Question 54:

'तुमुल' खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए ।

Correct Answer:
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'तुमुल' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग ('शक्ति-भेद') का सारांश

'तुमुल' खण्डकाव्य का तृतीय सर्ग राम-रावण युद्ध की एक अत्यंत मार्मिक घटना पर आधारित है।

लंका के युद्ध-क्षेत्र में रावण का पराक्रमी पुत्र मेघनाद युद्ध के लिए आता है। वह मायावी शक्तियों में निपुण है। उसका लक्ष्मण से भयंकर युद्ध होता है। लक्ष्मण अपने शौर्य से मेघनाद के सभी अस्त्र-शस्त्रों को विफल कर देते हैं और उसे व्याकुल कर देते हैं।

जब मेघनाद देखता है कि वह सीधे युद्ध में लक्ष्मण को पराजित नहीं कर सकता, तो वह अपनी मायावी शक्ति का प्रयोग करता है। वह बादलों में छिप जाता है और वहीं से लक्ष्मण पर अमोघ 'वीरघातिनी शक्ति' का प्रहार करता है। उस दिव्य शक्ति के प्रहार से लक्ष्मण मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं।

लक्ष्मण को मूर्छित देखकर श्रीराम की सेना में शोक की लहर दौड़ जाती है। स्वयं भगवान राम भी अपने भाई की यह दशा देखकर एक साधारण मनुष्य की भाँति विलाप करने लगते हैं। उनका यह विलाप अत्यंत करुण और हृदय-विदारक है।

तभी विभीषण बताते हैं कि सूर्योदय से पूर्व संजीवनी बूटी लाने से ही लक्ष्मण के प्राण बच सकते हैं। यह सुनकर हनुमान जी तुरंत संजीवनी लाने के लिए द्रोण पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग लक्ष्मण की वीरता और श्रीराम के अपार भ्रातृ-प्रेम को दर्शाता है। Quick Tip: इस सर्ग का सारांश लिखते समय दो मुख्य भावों पर ध्यान दें: लक्ष्मण की अद्भुत वीरता और लक्ष्मण के मूर्छित होने पर श्रीराम का मार्मिक विलाप। इन दोनों प्रसंगों को प्रमुखता से लिखें।


Question 55:

जयशंकर प्रसाद

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जीवन-परिचय:

छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार (सुँघनी साहू) में सन् 1889 ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद था। बाल्यावस्था में ही माता-पिता तथा बड़े भाई का देहान्त हो जाने के कारण परिवार का सम्पूर्ण भार इनके कंधों पर आ पड़ा। इन्होंने घर पर ही हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे अत्यधिक स्वाभिमानी, सरल और परोपकारी स्वभाव के थे। विषम परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए, क्षय रोग से पीड़ित होने के कारण मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में सन् 1937 ई. में इनका निधन हो गया।



साहित्यिक योगदान:

प्रसाद जी छायावादी युग के प्रवर्तक, उन्नायक तथा प्रतिनिधि कवि होने के साथ-साथ युग-प्रवर्तक नाटककार, कथाकार और उपन्यासकार भी थे। उनकी रचनाओं में भारत के गौरवशाली अतीत का सजीव वर्णन मिलता है। 'कामायनी' उनका सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है, जिसमें छायावाद की सभी प्रवृत्तियों का समावेश है।



प्रमुख रचना:

कामायनी (महाकाव्य) - यह प्रसाद जी की कीर्ति का स्तम्भ है। इसके अतिरिक्त चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त (नाटक) तथा आकाशदीप (कहानी-संग्रह) भी इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: जीवन-परिचय लिखते समय एक सारणीबद्ध प्रारूप का उपयोग करें: जन्म, मृत्यु, जन्म-स्थान, पिता का नाम, साहित्यिक युग और प्रमुख रचना। यह आपको महत्वपूर्ण बिन्दुओं को याद रखने में मदद करेगा।


Question 56:

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

Correct Answer:
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जीवन-परिचय:

हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ आलोचक, निबन्धकार एवं इतिहासकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 ई. में बस्ती जिले के अगोना नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम चन्द्रबली शुक्ल था। इन्होंने मिर्जापुर के मिशन स्कूल से फाइनल परीक्षा उत्तीर्ण की और एफ.ए. (इण्टरमीडिएट) की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद आए, किन्तु गणित में कमजोर होने के कारण पढ़ाई पूरी न कर सके। इन्होंने मिर्जापुर के मिशन स्कूल में चित्रकला के अध्यापक के रूप में कार्य किया और बाद में 'हिन्दी शब्द सागर' के सहायक सम्पादक के रूप में काशी आ गए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में वे हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी रहे। हृदय-गति रुक जाने के कारण सन् 1941 ई. में इनका देहावसान हो गया।



साहित्यिक योगदान:

शुक्ल जी ने निबन्ध, आलोचना और इतिहास-लेखन के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। वे हिन्दी साहित्य के युग-प्रवर्तक आलोचक माने जाते हैं। उनका 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' आज भी सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है। 'चिन्तामणि' उनके सर्वश्रेष्ठ निबन्धों का संग्रह है।



प्रमुख रचना:

चिन्तामणि (निबन्ध-संग्रह) - यह दो भागों में प्रकाशित है और इसमें शुक्ल जी के मनोविकार सम्बन्धी प्रसिद्ध निबन्ध संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त हिन्दी साहित्य का इतिहास (इतिहास-ग्रन्थ) और रस मीमांसा (आलोचना) भी इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। Quick Tip: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जीवन-परिचय लिखते समय उनके साहित्यिक योगदान, विशेषकर 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' और 'चिन्तामणि' के महत्व पर प्रकाश अवश्य डालें।


Question 57:

डॉ० भगवतशरण उपाध्याय

Correct Answer:
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जीवन-परिचय:

प्रसिद्ध साहित्यकार, पुरातत्त्ववेत्ता एवं निबन्धकार डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का जन्म सन् 1910 ई. में बलिया जिले के उजियारपुर नामक ग्राम में हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय चले गए, जहाँ से इन्होंने प्राचीन इतिहास में एम.ए. किया। वे पुरातत्त्व विभाग, प्रयाग संग्रहालय एवं लखनऊ संग्रहालय के अध्यक्ष तथा बिड़ला महाविद्यालय में प्राध्यापक भी रहे। इन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद पर कार्य किया और वहीं से अवकाश ग्रहण किया। सन् 1982 ई. में इनका निधन हो गया।



साहित्यिक योगदान:

उपाध्याय जी ने पुरातत्त्व, इतिहास, संस्कृति, यात्रा-वृत्तान्त और निबन्ध जैसे विविध विषयों पर 100 से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उनकी भाषा-शैली तत्सम-प्रधान होते हुए भी सरल और प्रवाहमयी है। 'अजंता' जैसे पाठों के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति और कला का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है।



प्रमुख रचना:

खून के छींटे (इतिहास-साक्षी निबन्ध)। इसके अतिरिक्त ठूँठा आम (निबन्ध-संग्रह), इतिहास साक्षी है और सागर की लहरों पर (यात्रा-वृत्तान्त) इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: डॉ. भगवतशरण उपाध्याय का जीवन-परिचय लिखते समय उनके पुरातत्त्व और इतिहास के ज्ञान को उनके लेखन से जोड़कर प्रस्तुत करें। यह उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को समझने में मदद करता है।


Question 58:

महाकवि सूरदास

Correct Answer:
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जीवन-परिचय:

हिन्दी साहित्य के कृष्ण-भक्ति काव्य-धारा के श्रेष्ठतम कवि सूरदास जी का जन्म सन् 1478 ई. में आगरा के निकट रुनकता नामक ग्राम में हुआ था। कुछ विद्वान् इनका जन्म-स्थान दिल्ली के निकट सीही ग्राम को मानते हैं। इनके पिता का नाम रामदास सारस्वत था। इनके जन्मांध होने के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है। ये बचपन से ही विरक्त हो गए थे और गऊघाट पर विनय के पद गाया करते थे। एक बार वल्लभाचार्य से भेंट होने पर उन्होंने इन्हें कृष्ण-लीला का गान करने का सुझाव दिया। तभी से ये वल्लभाचार्य के शिष्य बन गए और श्रीनाथजी के मन्दिर में कीर्तन करने लगे। 'अष्टछाप' के कवियों में इनका स्थान सर्वोपरि है। सन् 1583 ई. में पारसौली नामक स्थान पर इनका देहावसान हो गया।



साहित्यिक योगदान:

सूरदास जी ने कृष्ण की बाल-लीलाओं और प्रेम-लीलाओं का इतना मनोहारी वर्णन किया है कि वह विश्व-साहित्य में अद्वितीय है। वात्सल्य और शृंगार रस के वे सम्राट माने जाते हैं। उनकी भाषा शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा है।



प्रमुख रचना:

सूरसागर - यह सूरदास जी की कीर्ति का आधार-स्तम्भ है। इसके अतिरिक्त सूरसारावली तथा साहित्य-लहरी भी इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: सूरदास का जीवन-परिचय लिखते समय उन्हें 'वात्सल्य रस का सम्राट' और 'अष्टछाप का जहाज' जैसी उपाधियों का उल्लेख अवश्य करें। यह उनके महत्व को दर्शाता है।


Question 59:

सुमित्रानन्दन पन्त

Correct Answer:
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जीवन-परिचय:

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म सन् 1900 ई. में अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम गंगादत्त पन्त था। जन्म के कुछ घंटों बाद ही इनकी माता का देहान्त हो गया, अतः इनका लालन-पालन प्रकृति की गोद में ही हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में तथा उच्च शिक्षा प्रयाग में हुई। इन्होंने असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही स्वाध्याय किया। इन्हें 'चिदम्बरा' काव्य-ग्रन्थ पर 'भारतीय ज्ञानपीठ' पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' की उपाधि से सम्मानित किया। सन् 1977 ई. में इनका निधन हो गया।



साहित्यिक योगदान:

पन्त जी छायावादी युग के चार प्रमुख स्तम्भों में से एक हैं। इन्हें 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है क्योंकि इन्होंने प्रकृति का अत्यंत कोमल और सजीव चित्रण किया है। इनकी काव्य-यात्रा छायावाद, प्रगतिवाद और अरविन्द-दर्शन से प्रभावित रही है।



प्रमुख रचना:

चिदम्बरा (कविता-संग्रह) - इस पर इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त वीणा, पल्लव, गुंजन और लोकायतन (महाकाव्य) इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन-परिचय लिखते समय 'प्रकृति का सुकुमार कवि' और 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' का उल्लेख करना न भूलें। ये उनके परिचय के महत्वपूर्ण अंग हैं।


Question 60:

बिहारी लाल

Correct Answer:
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जीवन-परिचय:

रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी लाल का जन्म सन् 1603 ई. के लगभग ग्वालियर के निकट बसुआ गोविन्दपुर ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। इन्होंने अपना बचपन बुंदेलखण्ड में तथा युवावस्था अपनी ससुराल मथुरा में व्यतीत की। ये जयपुर के राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे। कहा जाता है कि राजा जयसिंह अपनी नवविवाहिता पत्नी के प्रेम में इतने डूबे रहते थे कि राज-काज भूल गए थे। तब बिहारी ने एक दोहा लिखकर उन तक भेजा - "नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल। अली कली ही सौं बिंध्यौ, आगे कौन हवाल।।" इस दोहे ने राजा पर गहरा प्रभाव डाला और वे पुनः अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर हो गए। राजा जयसिंह बिहारी को प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण-मुद्रा पुरस्कार देते थे। सन् 1663 ई. में इनका देहावसान हो गया।



साहित्यिक योगदान:

बिहारी रीतिकाल की रीतिसिद्ध काव्य-धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। इन्होंने केवल एक ग्रन्थ की रचना करके हिन्दी साहित्य में अमर स्थान प्राप्त कर लिया। इनके दोहे 'गागर में सागर' भरने की उक्ति को चरितार्थ करते हैं। इन्होंने शृंगार, भक्ति और नीति से सम्बन्धित दोहे लिखे हैं।



प्रमुख रचना:

बिहारी सतसई - यह इनकी एकमात्र रचना है, जिसमें लगभग 723 दोहे हैं। यह शृंगार रस का एक अप्रतिम ग्रन्थ है। Quick Tip: बिहारी का जीवन-परिचय लिखते समय राजा जयसिंह वाले प्रसंग और "गागर में सागर" वाली उक्ति का उल्लेख अवश्य करें। यह उनके काव्य-कौशल को सिद्ध करता है।


Question 61:

अपनी पाठ्यपुस्तक में से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्नपत्र में न आया हो ।

Correct Answer:
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श्लोक:

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।।




अर्थ:

(संसार में) सभी सुखी हों, सभी निरोगी (स्वस्थ) हों, सभी कल्याण को देखें (अर्थात् सभी का कल्याण हो) और कोई भी दुःख का भागी न बने।
Quick Tip: परीक्षा के लिए कम से कम दो-तीन सरल श्लोक अर्थ सहित याद कर लें। यह सुनिश्चित करें कि आप जो श्लोक लिख रहे हैं, वह प्रश्न-पत्र में पहले से दिए गए पद्यांशों में से न हो। श्लोक को शुद्ध रूप में लिखना आवश्यक है।


Question 62:

गृहे सतः मित्रं किम् ?

Correct Answer:
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उत्तरम्: गृहे सतः मित्रं भार्या अस्ति।

(घर पर रहने वाले का मित्र पत्नी है।)
Quick Tip: संस्कृत के प्रश्नों का उत्तर देते समय, प्रश्नवाचक शब्द (जैसे - किम्, कः, कुत्र) को हटाकर उसके स्थान पर सही उत्तर शब्द रखकर पूरा वाक्य लिखें।


Question 63:

चन्द्रशेखरः स्वगृहं किम् अवदत् ?

Correct Answer:
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उत्तरम्: चन्द्रशेखरः 'कारागारः एव मम गृहम्' इति स्वगृहम् अवदत्।

(चन्द्रशेखर ने 'जेलखाना ही मेरा घर है' ऐसा अपना घर बताया।)
Quick Tip: उत्तर लिखते समय पाठ के प्रसंग को याद रखें। चन्द्रशेखर ने यह उत्तर मजिस्ट्रेट के पूछने पर निर्भीकता से दिया था।


Question 64:

प्रहेलिकायाः उत्तरं किम् आसीत् ?

Correct Answer:
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उत्तरम्: प्रहेलिकायाः उत्तरं 'पत्रम्' आसीत्।

(पहेली का उत्तर 'पत्र' था।)
Quick Tip: पाठ 'प्रबुद्धो ग्रामीणः' की पहेली "अपदो दूरगामी च..." को याद रखें, जिसका उत्तर 'पत्र' है। यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है।


Question 65:

वाराणसी केषां संगमस्थली अस्ति ?

Correct Answer:
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उत्तरम्: वाराणसी विविधधर्माणां संगमस्थली अस्ति।

(वाराणसी अनेक धर्मों की संगम-स्थली है।)
Quick Tip: 'वाराणसी' पाठ के मुख्य बिन्दुओं, जैसे- उसकी प्राचीनता, ज्ञान का केंद्र होना और विभिन्न धर्मों की संगम-स्थली होना, को याद रखें।


Question 66:

पर्यावरण संरक्षण के उपाय

Correct Answer:
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रूपरेखा:

प्रस्तावना (पर्यावरण का अर्थ और महत्व)
पर्यावरण प्रदूषण के कारण
पर्यावरण संरक्षण के उपाय
उपसंहार




1. प्रस्तावना

'पर्यावरण' शब्द 'परि' और 'आवरण' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'चारों ओर से घेरे हुए'। हमारे चारों ओर जो कुछ भी है - वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, सभी मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। एक स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ पर्यावरण का होना अनिवार्य है। परन्तु आज, मानवीय गतिविधियों के कारण हमारा पर्यावरण लगातार प्रदूषित हो रहा है, जिसका संरक्षण करना हम सबका परम कर्तव्य है।



2. पर्यावरण प्रदूषण के कारण

पर्यावरण प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं - तीव्र औद्योगिकीकरण, वनों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ती जनसंख्या का दबाव, वाहनों से निकलता धुआँ, कारखानों का अपशिष्ट, और रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग। इन कारणों से वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं।



3. पर्यावरण संरक्षण के उपाय

पर्यावरण को विनाश से बचाने के लिए हमें निम्नलिखित उपाय करने होंगे:

अधिक से अधिक वृक्षारोपण: हमें 'एक व्यक्ति, एक वृक्ष' के सिद्धान्त को अपनाना चाहिए। पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और पर्यावरण को संतुलित रखते हैं।
प्रदूषण पर नियंत्रण: हमें वाहनों और कारखानों से निकलने वाले धुएँ को नियंत्रित करने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना चाहिए। नदियों में कारखानों का कचरा डालने पर रोक लगानी चाहिए।
जनसंख्या नियंत्रण: बढ़ती जनसंख्या पर्यावरण पर अत्यधिक दबाव डालती है। अतः जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना आवश्यक है।
नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग: पेट्रोल, डीजल और कोयले के स्थान पर हमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा जैसे ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए।
जन-जागरूकता: पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। हमें लोगों को campañas, नाटकों और विज्ञापनों के माध्यम से जागरूक करना चाहिए।




4. उपसंहार

पर्यावरण हमारा जीवन-आधार है। यदि हम इसे नष्ट करेंगे, तो हम स्वयं अपने जीवन को संकट में डालेंगे। अतः यह हम सभी का सामूहिक उत्तरदायित्व है कि हम पर्यावरण की रक्षा करें और अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ और सुरक्षित भविष्य प्रदान करें। Quick Tip: निबन्ध लिखते समय एक रूपरेखा (outline) अवश्य बनाएँ। इससे आपके विचार व्यवस्थित रहते हैं और आप कोई भी महत्वपूर्ण बिन्दु भूलते नहीं हैं। प्रस्तावना और उपसंहार को प्रभावशाली बनाने का प्रयास करें।


Question 67:

अपनी विशेष रुचियों का उल्लेख करते हुए अपने मित्र को एक पत्र लिखिए ।

Correct Answer:
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15, अशोक नगर,

प्रयागराज।

दिनांक: 20 अक्टूबर, 2023




प्रिय मित्र सोहन,

सप्रेम नमस्ते।



आशा है कि तुम स्वस्थ और सानंद होगे। बहुत दिनों से तुम्हारा कोई पत्र नहीं आया, तो सोचा मैं ही लिखूँ। इस पत्र में मैं तुम्हें अपनी कुछ विशेष रुचियों के बारे में बताना चाहता हूँ।

पढ़ाई के अलावा, मुझे किताबें पढ़ने का बहुत शौक है। विशेषकर मुझे ऐतिहासिक और जासूसी उपन्यास पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। इसके अतिरिक्त, मैं नियमित रूप से क्रिकेट खेलता हूँ। शाम के समय दोस्तों के साथ खेलना दिनभर की थकान मिटा देता है। मुझे संगीत सुनने में भी बहुत रुचि है और मैं गिटार बजाना भी सीख रहा हूँ। इन सब रुचियों से मुझे न केवल आनंद मिलता है, बल्कि कुछ नया सीखने को भी मिलता है।

अपने अगले पत्र में तुम भी अपनी रुचियों के बारे में अवश्य बताना। अपने माता-पिता को मेरा प्रणाम कहना।



तुम्हारा प्रिय मित्र,

रमेश
Quick Tip: मित्र को पत्र लिखते समय भाषा सरल और आत्मीय होनी चाहिए। पत्र का प्रारूप (पता, दिनांक, संबोधन, अभिवादन, समापन) सही होना चाहिए।


Question 68:

रेलवे के महाप्रबन्धक को एक शिकायती पत्र लिखिए जिसमें टिकट निरीक्षक द्वारा किये गये अभद्र व्यवहार का उल्लेख हो ।

Correct Answer:
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सेवा में,

श्रीमान महाप्रबन्धक,

उत्तर मध्य रेलवे,

प्रयागराज।



विषय: टिकट निरीक्षक द्वारा अभद्र व्यवहार के सम्बन्ध में शिकायत।



महोदय,



सविनय निवेदन यह है कि मैं, मोहन शर्मा, दिनांक 18 अक्टूबर, 2023 को प्रयागराज से दिल्ली जाने वाली ट्रेन संख्या 12417, 'प्रयागराज एक्सप्रेस' के कोच संख्या S-5 में सीट संख्या 45 पर यात्रा कर रहा था। मेरा टिकट पूर्ण रूप से वैध था।

यात्रा के दौरान टुंडला स्टेशन के पास एक टिकट निरीक्षक (TTE) हमारे कोच में आए। उन्होंने मुझसे टिकट माँगा। मैंने अपना ई-टिकट दिखाया, जिसे देखने के बाद भी वे अकारण ही मुझ पर चिल्लाने लगे और टिकट को अवैध बताने की कोशिश करने लगे। जब मैंने विनम्रतापूर्वक बात करने का अनुरोध किया, तो उन्होंने मेरे साथ और भी अभद्र भाषा का प्रयोग किया और अन्य यात्रियों के सामने मुझे अपमानित किया। उनका व्यवहार एक सरकारी कर्मचारी के पद की गरिमा के सर्वथा प्रतिकूल था।

अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि इस मामले की जाँच कराकर उक्त टिकट निरीक्षक के विरुद्ध उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की कृपा करें, ताकि भविष्य में किसी अन्य यात्री को इस प्रकार के दुर्व्यवहार का सामना न करना पड़े।



धन्यवाद!




भवदीय,

मोहन शर्मा

12, सिविल लाइन्स,

प्रयागराज।

दिनांक: 20 अक्टूबर, 2023
Quick Tip: शिकायती पत्र लिखते समय भाषा औपचारिक और संयमित होनी चाहिए। घटना का विवरण (दिनांक, समय, स्थान, ट्रेन नम्बर आदि) स्पष्ट रूप से दें। पत्र में विषय का उल्लेख करना अनिवार्य है।



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