UP Board Class 10 Hindi Question Paper 2024 PDF (Code 801 HG) is available for download here. The Hindi exam was conducted on February 22, 2024 in the Morning Shift from 8:30 AM to 11:45 AM. The total marks for the theory paper are 70. Students reported the paper to be easy to moderate.
UP Board Class 10 Hindi Question Paper 2024 (Code 801 HG) with Solutions
| UP Board Class 10 Hindi Question Paper 2024 with Answer Key | Check Solutions |

'वैदेही वनवास' के रचनाकार हैं
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में 'वैदेही वनवास' नामक काव्य-ग्रन्थ के रचनाकार का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation:
'वैदेही वनवास' द्विवेदी युग के प्रसिद्ध कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' द्वारा रचित एक महाकाव्य है।
इसमें कवि ने राम द्वारा सीता के निर्वासन की कथा का मार्मिक वर्णन किया है।
'हरिऔध' जी का एक अन्य प्रसिद्ध महाकाव्य 'प्रियप्रवास' है, जिसे खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।
अतः, विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: प्रमुख कवियों और लेखकों की महत्वपूर्ण रचनाओं की एक सूची बनाकर याद करें। 'प्रियप्रवास' और 'वैदेही वनवास' 'हरिऔध' जी की दो सबसे महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।
'प्रयोगवाद' के कवि हैं
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में दिए गए विकल्पों में से 'प्रयोगवाद' काव्य-धारा के कवि को पहचानना है।
Step 2: Detailed Explanation:
हिन्दी कविता में 'प्रयोगवाद' का प्रारम्भ सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' के सम्पादकत्व में प्रकाशित 'तार सप्तक' (1943) से माना जाता है।
'अज्ञेय' को प्रयोगवाद का प्रवर्तक कहा जाता है।
अन्य विकल्प:
भूषण रीतिकाल के वीर रस के कवि हैं।
सुमित्रानन्दन पन्त और महादेवी वर्मा छायावाद के प्रमुख कवि हैं।
अतः, विकल्प (B) सही है।
Quick Tip: हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालों और काव्य-धाराओं (जैसे - छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद) और उनके प्रमुख कवियों के नाम अवश्य याद रखें। 'अज्ञेय' का नाम 'प्रयोगवाद' और 'तार सप्तक' से जुड़ा है।
'भाव-विलास' के रचनाकार हैं
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में 'भाव-विलास' नामक रचना के रचनाकार का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation:
'भाव-विलास' रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि 'देव' की रचना है।
कवि देव का पूरा नाम देवदत्त था। 'भाव-विलास' के अतिरिक्त 'अष्टयाम', 'रस-विलास' और 'सुजान-विनोद' भी इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।
अतः, विकल्प (A) सही है।
Quick Tip: रीतिकाल के प्रमुख कवियों जैसे बिहारी, केशव, भूषण, देव, मतिराम और उनकी एक-एक प्रमुख रचना का नाम याद रखना परीक्षा के लिए उपयोगी है।
'छत्रसाल दशक' किनकी रचना है ?
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में 'छत्रसाल दशक' नामक रचना के रचनाकार का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation:
'छत्रसाल दशक' रीतिकाल के वीर रस के अमर गायक कवि 'भूषण' की रचना है।
इसमें उन्होंने अपने आश्रयदाता राजा छत्रसाल के शौर्य का वर्णन किया है।
'शिवराज भूषण' और 'शिवा बावनी' इनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ हैं, जिनमें इन्होंने छत्रपति शिवाजी की वीरता का गुणगान किया है।
अतः, विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: कवि भूषण रीतिकाल में शृंगार की परम्परा से हटकर वीर रस की कविता लिखने के लिए विख्यात हैं। उनकी रचनाएँ शिवाजी और छत्रसाल पर केन्द्रित हैं।
'कला और बूढ़ा चाँद' के रचनाकार हैं
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में 'कला और बूढ़ा चाँद' नामक काव्य-संग्रह के रचनाकार का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation:
'कला और बूढ़ा चाँद' प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत की एक प्रसिद्ध काव्य-कृति है।
इस कृति के लिए पंत जी को सन् 1960 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था।
अतः, विकल्प (D) सही है।
Quick Tip: प्रमुख रचनाओं को मिले पुरस्कारों (जैसे- साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ) को याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनसे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
'नीड़ का निर्माण फिर' किस विधा की रचना है ?
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में 'नीड़ का निर्माण फिर' नामक रचना की साहित्यिक विधा पूछी गई है।
Step 2: Detailed Explanation:
'नीड़ का निर्माण फिर' प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन द्वारा लिखित आत्मकथा का एक भाग है।
उनकी आत्मकथा चार भागों में प्रकाशित हुई है: 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ', 'नीड़ का निर्माण फिर', 'बसेरे से दूर' और 'दशद्वार से सोपान तक'।
जीवनी किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन पर लिखी जाती है, जबकि आत्मकथा लेखक स्वयं अपने जीवन पर लिखता है।
अतः, विकल्प (B) सही है।
Quick Tip: हिन्दी गद्य की विभिन्न विधाओं (जैसे - कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आत्मकथा, जीवनी, रेखाचित्र, संस्मरण) के अर्थ और उनके एक-एक प्रसिद्ध उदाहरण को याद रखें।
निम्नलिखित में से शुक्ल-युग के लेखक हैं
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Step 1: Understanding the Question:
दिए गए विकल्पों में से उस लेखक को पहचानना है जो शुक्ल-युग (छायावादी युग) से सम्बन्धित है।
Step 2: Detailed Explanation:
हिन्दी गद्य में शुक्ल-युग का समय मोटे तौर पर 1919 ई. से 1938 ई. तक माना जाता है।
श्यामसुन्दर दास (1875-1945) द्विवेदी युग के प्रमुख लेखक हैं, किन्तु उनका लेखन-कार्य शुक्ल-युग में भी सक्रिय रूप से जारी रहा। वे आचार्य शुक्ल के समकालीन थे।
मोहन राकेश, अमृत राय और कमलेश्वर शुक्लोत्तर-युग (स्वातन्त्र्योत्तर युग) के लेखक हैं।
दिए गए विकल्पों में, श्यामसुन्दर दास ही शुक्ल-युग के सबसे निकट और समकालीन लेखक हैं।
अतः, विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: हिन्दी गद्य के विकास के विभिन्न युगों (भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, शुक्ल युग, शुक्लोत्तर युग) की समय-सीमा और प्रत्येक युग के चार-पाँच प्रमुख लेखकों के नाम याद कर लें।
निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा कथन सही है ?
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Step 1: Understanding the Question:
दिए गए चार कथनों में से सही कथन की पहचान करनी है।
Step 2: Detailed Explanation:
आइए प्रत्येक कथन का विश्लेषण करें:
(A) 'शशांक' उपन्यास के रचनाकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री हैं, न कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल। अतः यह कथन गलत है।
(B) 'आकाशदीप' कहानी के लेखक जयशंकर प्रसाद हैं, न कि रामकुमार वर्मा। अतः यह कथन गलत है।
(C) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने नाटक 'नाटक' में सैद्धान्तिक आलोचना की नींव रखी, इसलिए उन्हें हिन्दी में आलोचना साहित्य का जनक माना जाता है। अतः यह कथन सही है।
(D) 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा है, यह निबन्ध नहीं है और इसके लेखक जयशंकर प्रसाद नहीं हैं। अतः यह कथन गलत है।
अतः, केवल कथन (C) सही है।
Quick Tip: इस प्रकार के प्रश्नों के लिए रचना, उसके लेखक और उसकी विधा, तीनों की सही जानकारी होना आवश्यक है। विकल्पों को ध्यान से पढ़ें और गलतियों को पहचानें।
'परीक्षा-गुरु' किस विधा की रचना है ?
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में 'परीक्षा-गुरु' नामक रचना की साहित्यिक विधा पूछी गई है।
Step 2: Detailed Explanation:
लाला श्रीनिवास दास द्वारा लिखित 'परीक्षा-गुरु' (1882) को हिन्दी का प्रथम उपन्यास माना जाता है।
यह एक उपदेशात्मक उपन्यास है जिसमें एक अमीर युवक मदनमोहन के पतन और फिर सुधार की कहानी है।
अतः, 'परीक्षा-गुरु' की विधा उपन्यास है।
विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: हिन्दी साहित्य में 'प्रथम' रचनाओं का विशेष महत्व है। हिन्दी का प्रथम उपन्यास ('परीक्षा-गुरु'), प्रथम कहानी ('इंदुमती'), प्रथम नाटक ('नहुष') आदि को उनके लेखकों के नाम सहित याद रखें।
'बाणभट्ट की आत्मकथा' के रचनाकार हैं
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में 'बाणभट्ट की आत्मकथा' के रचनाकार का नाम पूछा गया है।
Step 2: Detailed Explanation:
'बाणभट्ट की आत्मकथा' आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखा गया एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास है।
यद्यपि इसके शीर्षक में 'आत्मकथा' शब्द है, परन्तु यह एक उपन्यास है, आत्मकथा नहीं। इसमें सातवीं शताब्दी के कवि बाणभट्ट के जीवन को आधार बनाकर तत्कालीन समाज का चित्रण किया गया है।
अतः, विकल्प (B) सही है।
Quick Tip: कुछ रचनाओं के शीर्षक भ्रामक हो सकते हैं। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' एक उपन्यास है, इसे याद रखें। यह प्रश्न अक्सर छात्रों को भ्रमित करने के लिए पूछा जाता है।
रस के कितने अंग होते हैं ?
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में रस के अंगों (अवयवों) की संख्या पूछी गई है।
Step 2: Key Concept:
काव्यशास्त्र के अनुसार, रस के चार अंग माने गए हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
रस के चार अंग निम्नलिखित हैं:
स्थायी भाव: हृदय में स्थायी रूप से विद्यमान रहने वाले भाव।
विभाव: स्थायी भाव को जगाने वाले कारण (आलम्बन और उद्दीपन)।
अनुभाव: स्थायी भाव के जाग्रत होने पर होने वाली शारीरिक चेष्टाएँ।
संचारी (या व्यभिचारी) भाव: मन में आने-जाने वाले क्षणिक भाव।
इन चारों के संयोग से ही रस की निष्पत्ति होती है। अतः रस के चार अंग होते हैं।
विकल्प (B) सही है।
Quick Tip: रस के चारों अंगों के नाम - स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव - को क्रम से याद कर लें। यह हिन्दी काव्यशास्त्र का आधारभूत प्रश्न है।
'पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो' पंक्ति में कौन-सा अलंकार है ?
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Step 1: Understanding the Question:
दी गई काव्य-पंक्ति में प्रयुक्त अलंकार की पहचान करनी है।
Step 2: Key Concept:
रूपक अलंकार में उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) और उपमान (जिससे तुलना की जाए) में अभेद स्थापित किया जाता है, अर्थात् उपमेय पर उपमान का आरोप कर दिया जाता है।
Step 3: Detailed Explanation:
इस पंक्ति में 'राम-रतन' (राम नामी रत्न) उपमेय है और 'धन' उपमान है।
यहाँ 'राम-रतन' को 'धन' के जैसा न बताकर, 'राम-रतन' को ही 'धन' का रूप दे दिया गया है। ('राम-रतन' रूपी धन)।
उपमेय और उपमान में कोई भेद नहीं है, इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।
अतः, विकल्प (B) सही है।
Quick Tip: रूपक अलंकार की पहचान के लिए देखें कि क्या उपमेय और उपमान के बीच योजक चिह्न (-) लगा है और क्या 'रूपी' शब्द लगाकर अर्थ स्पष्ट हो रहा है। यहाँ 'राम-रतन-धन' का अर्थ है 'राम-रतन रूपी धन'।
सोरठा के पहले चरण में कितनी मात्राएँ होती हैं, ?
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में सोरठा छन्द के प्रथम चरण में मात्राओं की संख्या पूछी गई है।
Step 2: Key Concept:
सोरठा एक अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। यह दोहे का उल्टा होता है।
Step 3: Detailed Explanation:
सोरठा छन्द के लक्षण इस प्रकार हैं:
इसमें चार चरण होते हैं।
इसके विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
इसके सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 13-13 मात्राएँ होती हैं।
प्रश्न में पहले चरण की मात्राएँ पूछी गई हैं, जो 11 होती हैं।
अतः, विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: यह याद रखना बहुत सहायक है कि "सोरठा, दोहे का उल्टा होता है"। दोहे में 13, 11 मात्राएँ होती हैं, जबकि सोरठा में 11, 13 मात्राएँ होती हैं।
'निर्दय' शब्द में प्रयुक्त उपसर्ग है
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Step 1: Understanding the Question:
'निर्दय' शब्द में से उपसर्ग को पहचानना है।
Step 2: Key Concept:
उपसर्ग वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द के आरम्भ में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन ला देते हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
'निर्दय' शब्द का विच्छेद करने पर हमें 'निर्' उपसर्ग और 'दय' मूल शब्द प्राप्त होता है।
\[ निर्दय = निर् + दय \]
यहाँ 'निर्' का अर्थ है 'बिना' और 'दय' का अर्थ है 'दया'। इस प्रकार 'निर्दय' का अर्थ हुआ 'बिना दया के'।
संधि के नियम के अनुसार, 'निर्' का 'र्' अगले व्यंजन 'द' के ऊपर रेफ ( ͡ ) के रूप में लग जाता है।
अतः, सही उपसर्ग 'निर्' (हलन्त युक्त) है।
विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: उपसर्ग छाँटते समय, मूल शब्द को अलग करने का प्रयास करें जिसका कोई अर्थ हो। 'निर्दय' में 'दय' (दया से संबंधित) एक सार्थक मूल शब्द है, इसलिए बचा हुआ अंश 'निर्' उपसर्ग है।
'नीलगाय' में कौन-सा समास है ?
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Step 1: Understanding the Question:
'नीलगाय' शब्द में समास की पहचान करनी है।
Step 2: Key Concept:
कर्मधारय समास में पहला पद विशेषण (adjective) और दूसरा पद विशेष्य (noun) होता है, अथवा दोनों पदों में उपमेय-उपमान का संबंध होता है।
Step 3: Detailed Explanation:
'नीलगाय' का समास-विग्रह है: नीली है जो गाय।
यहाँ 'नील' (नीला) शब्द विशेषण है जो 'गाय' (विशेष्य) की विशेषता बता रहा है।
चूँकि इसमें विशेषण-विशेष्य का संबंध है, इसलिए यह कर्मधारय समास है।
अतः, विकल्प (A) सही है।
Quick Tip: किसी सामासिक पद का विग्रह करके देखें। यदि विग्रह में 'है जो' या 'के समान' आए और पहला पद दूसरे की विशेषता बताए, तो वहाँ कर्मधारय समास होता है।
'खेत' का तत्सम रूप है
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Step 1: Understanding the Question:
'खेत' शब्द का तत्सम (संस्कृत) रूप बताना है।
Step 2: Key Concept:
तत्सम शब्द वे शब्द होते हैं जो संस्कृत से बिना किसी परिवर्तन के हिन्दी में आ गए हैं। तद्भव शब्द वे हैं जो संस्कृत से उत्पन्न हुए हैं किन्तु रूप बदलकर हिन्दी में प्रयुक्त होते हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
'खेत' एक तद्भव शब्द है। इसका मूल संस्कृत शब्द 'क्षेत्र' है।
संस्कृत के 'क्ष' का तद्भव में प्रायः 'ख' या 'छ' हो जाता है। (जैसे - क्षीर से खीर, अक्षर से अच्छर)।
उसी नियम के अनुसार, 'क्षेत्र' से 'खेत' बना है।
'भूमि', 'जमीन', 'पृथ्वी' खेत के पर्यायवाची हो सकते हैं, परन्तु तत्सम रूप 'क्षेत्र' ही है।
अतः, विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: तत्सम और तद्भव शब्दों के रूपांतरण के कुछ सामान्य नियमों को याद रखें, जैसे 'क्ष' का 'ख' में, 'त्र' का 'त' में, 'ज्ञ' का 'ज' में बदलना। इससे सही उत्तर पहचानने में आसानी होती है।
'युष्मद्' शब्द का पंचमी विभक्ति, बहुवचन का रूप होगा
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Step 1: Understanding the Question:
'युष्मद्' (अर्थात् 'तुम') सर्वनाम शब्द का पंचमी विभक्ति, बहुवचन का रूप बताना है।
Step 2: Key Concept:
'युष्मद्' शब्द के पंचमी विभक्ति के रूप इस प्रकार हैं:
एकवचन: त्वत्
द्विवचन: युवाभ्याम्
बहुवचन: युष्मत्
Step 3: Detailed Explanation:
उपरोक्त शब्द-रूप के अनुसार, पंचमी विभक्ति का बहुवचन रूप 'युष्मत्' है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
(A) युष्माकम्: षष्ठी विभक्ति, बहुवचन ('तुम सबका')
(B) युष्मासु: सप्तमी विभक्ति, बहुवचन ('तुम सब में/पर')
(D) त्वत्: पंचमी विभक्ति, एकवचन ('तुमसे')
अतः, विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: 'अस्मद्' (मैं) और 'युष्मद्' (तुम) के शब्द-रूप अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इन्हें सभी विभक्तियों और वचनों में कंठस्थ कर लेना चाहिए।
'भाववाच्य' में किसकी प्रधानता होती है ?
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में पूछा गया है कि भाववाच्य में किसकी प्रधानता होती है।
Step 2: Key Concept:
हिन्दी में वाच्य (voice) तीन प्रकार के होते हैं:
कर्तृवाच्य: इसमें 'कर्ता' की प्रधानता होती है और क्रिया कर्ता के अनुसार होती है।
कर्मवाच्य: इसमें 'कर्म' की प्रधानता होती है और क्रिया कर्म के अनुसार होती है।
भाववाच्य: इसमें न कर्ता, न कर्म, बल्कि 'भाव' अर्थात् 'क्रिया' के अर्थ की प्रधानता होती है।
Step 3: Detailed Explanation:
भाववाच्य में क्रिया सदैव अकर्मक, अन्य पुरुष, पुल्लिंग और एकवचन में रहती है। उदाहरण: "मुझसे चला नहीं जाता।" यहाँ 'चला नहीं जाता' क्रिया (भाव) ही प्रधान है।
अतः, भाववाच्य में क्रिया की प्रधानता होती है।
विकल्प (C) सही है।
Quick Tip: भाववाच्य की पहचान के लिए देखें कि वाक्य में कर्ता 'से' या 'के द्वारा' के साथ जुड़ा हो, कर्म अनुपस्थित हो और क्रिया अकर्मक हो। प्रायः इसमें असमर्थता का भाव होता है।
वाक्य के कितने तत्व होते हैं ?
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में वाक्य के मुख्य तत्वों या अंगों की संख्या पूछी गई है।
Step 2: Key Concept:
संरचना की दृष्टि से वाक्य के दो मुख्य अंग या घटक (तत्व) माने जाते हैं।
Step 3: Detailed Explanation:
वाक्य के दो प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं:
उद्देश्य (Subject): वाक्य में जिसके विषय में कुछ कहा जाए, उसे उद्देश्य कहते हैं। इसमें कर्ता और कर्ता का विस्तार आता है।
विधेय (Predicate): वाक्य में उद्देश्य के विषय में जो कुछ कहा जाए, उसे विधेय कहते हैं। इसमें क्रिया और क्रिया का विस्तार, कर्म आदि आते हैं।
उदाहरण: 'राम ने रावण को मारा।' इसमें 'राम ने' उद्देश्य है और 'रावण को मारा' विधेय है।
अतः वाक्य के दो तत्व होते हैं।
विकल्प (A) सही है।
Quick Tip: यह ध्यान रखें कि कभी-कभी वाक्य के 'आवश्यक तत्व' पूछे जाते हैं जो छः होते हैं (सार्थकता, योग्यता, आकांक्षा, आदि), लेकिन जब वाक्य के 'अंग' या संरचनात्मक 'तत्व' पूछे जाएँ, तो उत्तर 'दो' (उद्देश्य और विधेय) ही होता है।
अविकारी पद को अन्य किस नाम से जाना जाता है ?
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Step 1: Understanding the Question:
प्रश्न में 'अविकारी पद' का दूसरा नाम पूछा गया है।
Step 2: Key Concept:
प्रयोग के आधार पर शब्द दो प्रकार के होते हैं:
विकारी शब्द: वे शब्द जिनका रूप लिंग, वचन, कारक आदि के कारण बदल जाता है। (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया)।
अविकारी शब्द: वे शब्द जिनका रूप कभी नहीं बदलता।
Step 3: Detailed Explanation:
'अविकारी' का अर्थ है 'जिसमें कोई विकार (परिवर्तन) न हो'।
'अव्यय' शब्द 'अ + व्यय' से बना है, जिसका अर्थ है 'जो व्यय (खर्च या परिवर्तित) न हो'।
चूँकि दोनों का अर्थ समान है, इसलिए अविकारी पदों को 'अव्यय' भी कहा जाता है।
क्रिया-विशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक अव्यय या अविकारी पद कहलाते हैं।
अतः, विकल्प (B) सही है।
Quick Tip: 'अविकारी' और 'अव्यय' हिन्दी व्याकरण में पर्यायवाची शब्द हैं। दोनों का अर्थ है - ऐसे शब्द जो लिंग, वचन, कारक के कारण बदलते नहीं हैं।
कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है । यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है । किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी, तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-दिन अवनति के गड्ढे में गिराती जायगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जाएँगी
Question 21:
उपर्युक्त गद्यांश का सारांश लिखिए ।
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सारांश:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने संगति के प्रभाव पर प्रकाश डाला है। लेखक के अनुसार, बुरी संगति एक भयानक बुखार की तरह है जो न केवल व्यक्ति के अच्छे आचरण और नैतिकता को नष्ट करती है, बल्कि उसकी सोचने-समझने की शक्ति (बुद्धि) को भी कमजोर कर देती है। बुरी संगति व्यक्ति को लगातार पतन की ओर ले जाती है, जबकि अच्छी संगति उसे सहारा देकर निरन्तर प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ाती है। Quick Tip: सारांश लिखते समय गद्यांश के मूल भाव को अपने शब्दों में संक्षेप में प्रस्तुत करें। यह मूल गद्यांश का लगभग एक-तिहाई होना चाहिए।
रेखाङ्कित अंश की व्याख्या कीजिए ।
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रेखांकित अंश की व्याख्या:
लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं कि मनुष्य के जीवन में संगति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है, विशेषकर युवावस्था में।
यदि किसी युवा व्यक्ति को बुरे लोगों का साथ मिलता है, तो वह संगति उसके पैरों में बंधी पत्थर की चक्की के समान बन जाती है। जिस प्रकार चक्की व्यक्ति को आगे नहीं बढ़ने देती और उसे नीचे की ओर खींचती है, उसी प्रकार बुरी संगति भी उसे उन्नति करने से रोकती है और दिन-प्रतिदिन पतन के अंधकार भरे गड्ढे में धकेलती जाती है।
इसके विपरीत, यदि उसकी संगति अच्छे लोगों से होती है, तो वह एक मजबूत सहारे देने वाले हाथ (बाहु) की तरह काम करती है, जो उसे गिरने से बचाती है और लगातार प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने में सहायता करती है। Quick Tip: रेखांकित अंश की व्याख्या करते समय लेखक द्वारा दिए गए उदाहरणों (जैसे - पैरों में बंधी चक्की, सहारा देने वाली बाहु) का अर्थ स्पष्ट करें और उन्हें मूल भाव से जोड़ें।
'सुदृढ़ बाहु' का क्या अर्थ है ?
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'सुदृढ़ बाहु' का शाब्दिक अर्थ है 'मजबूत भुजा' या 'मजबूत हाथ'।
प्रस्तुत गद्यांश के सन्दर्भ में, 'सुदृढ़ बाहु' का अर्थ है - एक ऐसा मजबूत सहारा जो किसी व्यक्ति को गिरने से बचाता है और उसे उन्नति की ओर आगे बढ़ने में मदद करता है।
यहाँ 'सुदृढ़ बाहु' अच्छी संगति का प्रतीक है। Quick Tip: किसी शब्द या वाक्यांश का अर्थ बताते समय पहले उसका शाब्दिक अर्थ और फिर प्रसंग के अनुसार उसका भावार्थ लिखें। इससे उत्तर अधिक स्पष्ट होता है।
ईर्ष्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है । जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए । उसे यह भी पता लगा लेना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है ? जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा जगेगी, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर देगा
Question 24:
उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए ।
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पाठ का शीर्षक: ईर्ष्या : तू न गई मेरे मन से
लेखक का नाम: रामधारी सिंह 'दिनकर' Quick Tip: अपनी पाठ्य-पुस्तक के सभी गद्य पाठों के शीर्षक और उनके लेखकों के नाम अच्छी तरह याद कर लें। यह प्रश्न लगभग हर परीक्षा में पूछा जाता है।
रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(नोट: चूँकि कोई अंश रेखांकित नहीं है, हम इस महत्वपूर्ण वाक्य की व्याख्या करेंगे: "उसे यह भी पता लगा लेना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है ?")
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रेखांकित अंश की व्याख्या:
लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' जी ईर्ष्या से बचने का उपाय बताते हुए कहते हैं कि ईर्ष्यालु व्यक्ति को आत्म-निरीक्षण करना चाहिए।
उसे यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि उसके मन में ईर्ष्या का भाव किस कमी (अभाव) के कारण उत्पन्न हो रहा है। वह दूसरों की किस वस्तु, गुण या सफलता को देखकर जलता है, जो उसके पास नहीं है।
जब उसे अपनी उस कमी का ज्ञान हो जाए, तो उसे उस अभाव को पूरा करने के लिए सकारात्मक (रचनात्मक) ढंग से प्रयास करना चाहिए। उसे विध्वंसक ईर्ष्या को छोड़कर सृजनात्मक कार्य में लगना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि कोई पड़ोसी की कार देखकर ईर्ष्या करता है, तो उसे मेहनत करके स्वयं कार खरीदने का प्रयास करना चाहिए, न कि पड़ोसी की कार को नुकसान पहुँचाने के बारे में सोचना चाहिए। Quick Tip: व्याख्या करते समय 'रचनात्मक तरीका' का अर्थ स्पष्ट करें। इसका अर्थ है - सकारात्मक और निर्माणकारी ढंग से प्रयास करना, न कि नकारात्मक या विनाशकारी सोच रखना।
ईर्ष्या से बचने के लिए लेखक किस आदत को छोड़ने की सलाह देता है ?
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गद्यांश के अनुसार, ईर्ष्या से बचने के लिए लेखक ईर्ष्यालु व्यक्ति को 'फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ने' की सलाह देता है।
लेखक का मानना है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपना अधिकांश समय दूसरों की कमियाँ खोजने और उनकी निंदा करने जैसी व्यर्थ की बातों में नष्ट कर देता है। यदि वह इस आदत को छोड़कर अपने अभाव को पूरा करने में लग जाए, तो वह ईर्ष्या से मुक्त हो सकता है। Quick Tip: गद्यांश पर आधारित प्रश्नों का उत्तर हमेशा गद्यांश में दी गई जानकारी के आधार पर ही दें। उत्तर सीधा और सटीक होना चाहिए।
रानी मैं जानी अजानी महा, पबि-पाहन हूँ ते कठोर हियो है ।
राजहुँ काजु अकाजु न जान्यो, कह्यो तियको जेहिं कान कियो है ।।
ऐसी मनोहर मूरति ए, बिछुरे कैसे प्रीतम लोगु जियो है ।
आँखिन में सखि राखिबो जोगु, इन्हें किमि कै वनवास दियो है ।
Question 27:
उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
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सन्दर्भ:
प्रस्तुत पद्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'कवितावली' से हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के काव्य-खण्ड में संकलित 'वन पथ पर' शीर्षक कविता से उद्धृत है।
इस अंश में, वन के मार्ग में ग्रामीण स्त्रियाँ राम, लक्ष्मण और सीता की मनोहर मूर्ति को देखकर रानी कैकेयी और राजा दशरथ की निष्ठुरता पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही हैं। Quick Tip: संदर्भ लिखते समय कवि का नाम (गोस्वामी तुलसीदास), कविता का शीर्षक (वन पथ पर) और मूल ग्रन्थ (कवितावली) का उल्लेख करने से उत्तर अधिक प्रभावशाली बनता है।
रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(नोट: चूँकि कोई अंश रेखांकित नहीं है, हम अंतिम पंक्ति की व्याख्या करेंगे: "आँखिन में सखि राखिबो जोगु, इन्हें किमि कै वनवास दियो है ।।")
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रेखांकित अंश की व्याख्या:
वन मार्ग में राम, लक्ष्मण और सीता के सौन्दर्य को देखकर एक ग्राम-वधू अपनी सखी से कहती है, "हे सखी! ये तीनों राजकुमार तो इतने सुन्दर हैं कि इन्हें तो आँखों में बसाकर रखने योग्य हैं (अर्थात् इन्हें हर समय देखते रहने का मन करता है)।"
वह आश्चर्य और दुःख के साथ कहती है कि "ऐसे मनमोहक और कोमल कुमारों को किस प्रकार (किमि कै) वनवास दे दिया गया है? इन्हें वनवास देने वाले का हृदय कितना कठोर होगा!"
इस पंक्ति में ग्राम-वधुओं का राम, लक्ष्मण और सीता के प्रति अगाध स्नेह और उनके वनवास पर गहरा दुःख व्यक्त हुआ है। Quick Tip: काव्यांश की व्याख्या करते समय सरल और स्पष्ट भाषा का प्रयोग करें। कोष्ठक में कठिन शब्दों का अर्थ लिखने से व्याख्या और भी स्पष्ट हो जाती है।
पद्यांश में 'ऐसी मनोहर मूरति ए' किसके लिए प्रयुक्त है तथा इसमें कौन-सा अलङ्कार है ?
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किसके लिए प्रयुक्त:
पद्यांश में 'ऐसी मनोहर मूरति ए' (ये ऐसी मन को हरने वाली मूर्तियाँ) श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी तीनों के लिए प्रयुक्त हुआ है।
अलंकार:
'पबि-पाहन हूँ ते कठोर हियो है' (हृदय वज्र और पत्थर से भी कठोर है) - इस पंक्ति में कैकेयी के हृदय (उपमेय) को वज्र और पत्थर (उपमान) से भी अधिक कठोर बताया गया है, अतः यहाँ व्यतिरेक अलंकार है।
सम्पूर्ण पद्य में सवैया छन्द और ब्रजभाषा का सुन्दर प्रयोग हुआ है। अनुप्रास अलंकार भी स्पष्ट है (जैसे - काजु अकाजु, कान कियो)। Quick Tip: जब किसी पद में उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया जाता है, तो वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है। यहाँ हृदय को पत्थर से भी कठोर बताकर उसकी कठोरता की अधिकता दिखाई गई है।
चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
रखता था भूतल पानी को ।
राणा प्रताप सिर काट-काट,
करता था सफल जवानी को ।।
सेना-नायक राणा के भी
रण देख देखकर चाह भरे ।
मेवाड़ सिपाही लड़ते थे
दूने तिगुने उत्साह भरे ।
Question 30:
उपर्युक्त पद्यांश में कवि एवं शीर्षक का नाम लिखिए ।
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कवि का नाम: श्याम नारायण पाण्डेय
शीर्षक का नाम: हल्दीघाटी Quick Tip: अपनी पाठ्य-पुस्तक की सभी महत्वपूर्ण कविताओं के शीर्षक और उनके कवियों के नाम की एक सूची बनाकर याद करें। यह प्रश्न अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है।
रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
(नोट: चूँकि कोई अंश रेखांकित नहीं है, हम प्रथम चार पंक्तियों की व्याख्या करेंगे: "चढ़ चेतक पर तलवार उठा...करता था सफल जवानी को ।।")
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रेखांकित अंश की व्याख्या:
कवि श्याम नारायण पाण्डेय हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के शौर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब महाराणा प्रताप अपने प्रिय घोड़े चेतक पर सवार होकर हाथ में तलवार लेकर युद्ध-भूमि में उतरते थे, तो वे इतने वेग से शत्रुओं पर प्रहार करते थे कि पृथ्वी का मान-मर्दन कर देते थे (अर्थात् भूतल को पानी-पानी कर देते थे)।
वे अपने शत्रुओं के सिरों को काट-काटकर अपनी जवानी की सार्थकता सिद्ध करते थे। उनका मानना था कि एक क्षत्रिय की जवानी तभी सफल है जब वह मातृभूमि की रक्षा के लिए शत्रुओं का संहार करे। इन पंक्तियों में कवि ने महाराणा प्रताप की वीरता और उनके अप्रतिम पराक्रम का अतिशयोक्तिपूर्ण एवं ओजस्वी वर्णन किया है। Quick Tip: वीर रस की कविता की व्याख्या करते समय ओजस्वी और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग करें। अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णनों को पहचानें और उनका भाव स्पष्ट करें, जैसे "भूतल पानी को" का अर्थ है अत्यधिक मार-काट मचाना।
उपर्युक्त पद्यांश में किस योद्धा का वर्णन किया गया है ?
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उपर्युक्त पद्यांश में मेवाड़ के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के शौर्य और पराक्रम का वर्णन किया गया है।
उनके साथ--साथ उनके वीर सेनानायकों और मेवाड़ के सैनिकों के अदम्य उत्साह और वीरता का भी वर्णन है। Quick Tip: प्रश्न का उत्तर सीधा और सटीक दें। यहाँ मुख्य योद्धा 'राणा प्रताप' हैं, जिनका नाम पद्यांश में स्पष्ट रूप से आया है।
निम्नलिखित संस्कृत गद्यावतरणों में से किसी एक अवतरण का सन्दर्भ-सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
वाराणस्यां प्राचीनकालादेव गेहे गेहे विद्यायाः दिव्यं ज्योतिः द्योतते । अधुनाऽपि अत्र संस्कृतवाग्धारा सततं प्रवहति, जनानां ज्ञानञ्च वर्द्धयति । अत्र अनेके आचार्याः मूर्धन्याः विद्वांसः वैदिकवाङ्मयस्य अध्ययने अध्यापने च इदानीं निरताः । न केवलं भारतीयाः अपितु वैदेशिकाः गीर्वाणवाण्याः अध्ययनाय अत्र आगच्छन्ति, निःशुल्कं च विद्यां गृहणन्ति ।
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सन्दर्भ:
प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-परिचयिका' खण्ड के 'वाराणसी' नामक पाठ से उद्धृत है। इस अंश में वाराणसी की प्राचीन ज्ञान-परम्परा और शैक्षिक महत्त्व का वर्णन किया गया है।
हिन्दी में अनुवाद:
वाराणसी में प्राचीन काल से ही घर-घर में विद्या का अलौकिक प्रकाश चमकता रहा है। आज भी यहाँ संस्कृत वाणी की धारा निरन्तर बहती रहती है और लोगों का ज्ञान बढ़ाती है। यहाँ अनेक आचार्य, मूर्धन्य (उच्च कोटि के) विद्वान् वैदिक साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में इस समय लगे हुए हैं। केवल भारतीय ही नहीं, अपितु विदेशी भी देववाणी (संस्कृत) के अध्ययन के लिए यहाँ आते हैं और निःशुल्क विद्या ग्रहण करते हैं।
Quick Tip: संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद करते समय, शब्दों के सही अर्थ के साथ-साथ वाक्य के भाव को समझना भी आवश्यक है। वाक्य को छोटे-छोटे भागों में तोड़कर अनुवाद करने से आसानी होती है।
'विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एव' इति भारतीयसंस्कृतेः मूलम् । विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभिः एकम् एव ईश्वरं भजन्ते । अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, करीमः, रामः, रहीमः, जिनः, बुद्धः, ख्रिस्तः, इत्यादीनि नामानि एकस्य एव परमात्मनः सन्ति । तम् एव ईश्वरं जनाः गुरुः इत्यपि मन्यते । अतः सर्वेषां मतानाम् समभावः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृतेः सन्देशः ।
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सन्दर्भ:
प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-परिचयिका' खण्ड के 'भारतीयः संस्कृतिः' नामक पाठ से अवतरित है। इसमें भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धान्त 'ईश्वर एक है' को स्पष्ट किया गया है।
हिन्दी में अनुवाद:
'संसार का रचयिता ईश्वर एक ही है', यह भारतीय संस्कृति का मूल है। विभिन्न मतों को मानने वाले अनेक नामों से एक ही ईश्वर का भजन करते हैं। अग्नि, इन्द्र, कृष्ण, करीम, राम, रहीम, जिन, बुद्ध, ईसा, इत्यादि नाम एक ही परमात्मा के हैं। उसी ईश्वर को लोग 'गुरु' के रूप में भी मानते हैं। अतः सभी मतों के प्रति समभाव (समान भाव) और सम्मान हमारी संस्कृति का सन्देश है।
Quick Tip: इस प्रकार के गद्यांश का अनुवाद करते समय भारतीय संस्कृति की 'अनेकता में एकता' की भावना को ध्यान में रखें। इससे अनुवाद में भाव की गहराई आएगी।
दिए गए संस्कृत पद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं भास्वानुदेश्यति हसिष्यति पंकजालिः ।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे हा हन्त ! हन्त ! नालिनीं गज उज्जहार ।।
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सन्दर्भ:
प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-परिचयिका' खण्ड में संकलित 'अन्योक्तिविलासः' नामक पाठ से उद्धृत है। इस श्लोक में कवि ने भौंरे के माध्यम से मनुष्य की आशावादी सोच और भाग्य की प्रबलता पर कटाक्ष किया है।
हिन्दी में अनुवाद:
कमल-कोष (कमल की कली) में बन्द भौंरा इस प्रकार सोच रहा था - "रात बीतेगी, सुन्दर सवेरा होगा, सूर्य उदित होगा और कमलों का समूह खिलेगा (और मैं बाहर निकल जाऊँगा)।" हाय! बड़े दुःख की बात है! जब भौंरा ऐसा सोच ही रहा था, तभी एक हाथी ने उस कमलिनी को ही उखाड़ फेंका।
Quick Tip: अन्योक्ति वाले श्लोकों का अनुवाद करते समय उसके शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ व्यंग्यार्थ (छिपे हुए अर्थ) को भी समझने का प्रयास करें। यहाँ यह बताया गया है कि मनुष्य सोचता कुछ है और भाग्य की इच्छा कुछ और ही होती है।
श्वेतकेतुर्हारूणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम् ।
न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ।
(नोट: यह गद्यांश है, पद्यांश नहीं। यह छान्दोग्योपनिषद् से लिया गया है।)
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सन्दर्भ:
प्रस्तुत संस्कृत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक 'हिन्दी' के 'संस्कृत-परिचयिका' खण्ड के 'छान्दोग्योपनिषद्-षष्ठोऽध्यायः' (पाठ्यक्रम के अनुसार 'जीवन सूत्रणि' या अन्य किसी पाठ से हो सकता है, यहाँ मूल स्रोत का उल्लेख है) से उद्धृत है। इसमें पिता आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्या-अध्ययन के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
हिन्दी में अनुवाद:
आरुणि के पौत्र श्वेतकेतु थे। उनसे उनके पिता (उद्दालक) ने कहा, "हे श्वेतकेतु! (गुरु के पास जाकर) ब्रह्मचर्य का पालन करो (अर्थात् विद्या अध्ययन करो)। हे सौम्य! निश्चय ही हमारे कुल में कोई भी ऐसा नहीं हुआ है जो वेदों का अध्ययन किए बिना केवल जन्म से ब्राह्मण (ब्रह्मबन्धु) कहलाता हो।"
(भावार्थ: हमारे कुल की परम्परा है कि सभी वेदों का अध्ययन करके विद्वान् बनते हैं, केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता।)
Quick Tip: उपनिषद् के अंशों का अनुवाद करते समय, संवाद की शैली को ध्यान में रखें। यहाँ पिता-पुत्र का संवाद है, जिसका उद्देश्य ज्ञान और कुल की परम्परा का महत्व बताना है।
'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के आधार पर उसके प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र (नायक) महात्मा गांधी हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
अलौकिक एवं दिव्य पुरुष: कवि ने गांधीजी को साधारण मनुष्य न मानकर ईश्वर का अवतार माना है, जिन्होंने भारत को दासता से मुक्त कराने के लिए जन्म लिया।
हरिजनों के उद्धारक: गांधीजी ने भारत में व्याप्त छुआछूत और जाति-पाति का घोर विरोध किया। उन्होंने दलितों और शोषितों को 'हरिजन' अर्थात् ईश्वर के जन कहकर सम्मान दिया और उनके उत्थान के लिए अथक प्रयास किए।
सत्य और अहिंसा के पुजारी: सत्य और अहिंसा गांधीजी के दो सबसे बड़े शस्त्र थे। उन्होंने बिना किसी हिंसा के, इन्हीं दो सिद्धांतों के बल पर शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को झुका दिया।
दृढ़-प्रतिज्ञ: गांधीजी अपने निश्चय के बहुत पक्के थे। उन्होंने जो भी संकल्प लिया (जैसे - नमक कानून तोड़ना, भारत छोड़ो आन्दोलन), उसे पूर्ण करके ही दम लिया।
हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक: गांधीजी भारत की एकता के लिए हिन्दू और मुस्लिमों को एक साथ मिलकर रहने का उपदेश देते थे। वे दोनों की एकता में ही भारत की शक्ति देखते थे।
महान देशभक्त: गांधीजी एक महान देशभक्त थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत माता की सेवा और उसे स्वतंत्र कराने में समर्पित कर दिया।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि 'मुक्तिदूत' के नायक गांधीजी मानवीय गुणों से परिपूर्ण, युग-प्रवर्तक और महान लोकनायक हैं। Quick Tip: चरित्र-चित्रण करते समय विशेषताओं को शीर्षकों (headings) में लिखें और प्रत्येक शीर्षक के अन्दर एक या दो पंक्तियों में उसकी व्याख्या करें। इससे उत्तर अधिक व्यवस्थित और प्रभावशाली लगता है।
'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए ।
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'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश
'मुक्तिदूत' खण्डकाव्य का तृतीय सर्ग 'अछूतोद्धार' की घटना पर आधारित है।
गांधीजी का मानना था कि जब तक भारत में छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीति विद्यमान है, तब तक सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती। उन्होंने हरिजनों (दलितों) के उद्धार का बीड़ा उठाया।
उस समय हरिजनों को मन्दिरों में प्रवेश करने, सार्वजनिक कुओं से पानी भरने और सवर्णों के साथ बैठने की मनाही थी। गांधीजी ने इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई। वे स्वयं हरिजनों की बस्तियों में गए, उनके साथ रहे और उनके कष्टों को दूर करने का प्रयास किया।
उन्होंने पुणे के एक मन्दिर में हरिजनों के प्रवेश को लेकर आमरण अनशन किया। उनके इस त्याग और दृढ़ संकल्प को देखकर सवर्णों का हृदय परिवर्तित हुआ और उन्होंने हरिजनों के लिए मन्दिर के द्वार खोल दिए। गांधीजी के इस प्रयास से समाज में समानता का संदेश फैला और दलितों के मन में एक नया आत्मविश्वास जागा। यह सर्ग गांधीजी की सामाजिक समरसता और मानवतावादी दृष्टि को दर्शाता है। Quick Tip: किसी सर्ग का सारांश लिखते समय, सर्ग की मुख्य घटना और उसके परिणाम को अवश्य लिखें। सारांश को अपनी भाषा में, संक्षिप्त और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करें।
'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य के आधार पर उसके नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य के नायक पं. जवाहरलाल नेहरू हैं। कवि ने उन्हें एक युग-पुरुष के रूप में चित्रित किया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
दिव्य गुणों से युक्त नायक: कवि ने नेहरूजी को सामान्य मानव न मानकर सूर्य के तेज, चन्द्रमा की शीतलता और हिमालय की दृढ़ता से युक्त एक अलौकिक पुरुष के रूप में चित्रित किया है।
समग्र राष्ट्र के प्रतिबिम्ब: नेहरूजी के व्यक्तित्व में सम्पूर्ण भारत की झलक मिलती है। कवि के अनुसार, वे जहाँ भी जाते हैं, वहाँ की संस्कृति, वीरता और विशेषताएँ उनके व्यक्तित्व में समाहित हो जाती हैं।
महान लोकनायक: वे भारत की जनता के हृदय-सम्राट थे। सम्पूर्ण देश की जनता उन्हें असीम प्रेम और सम्मान देती थी। वे सबके प्रिय 'चाचा नेहरू' थे।
शांति के अग्रदूत: नेहरूजी विश्व में शांति स्थापित करने के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने 'पंचशील' जैसे सिद्धान्तों के माध्यम से विश्व-शांति का संदेश दिया।
प्रकृति-प्रेमी: उन्हें भारत की प्रकृति, विशेषकर गंगा नदी और हिमालय से अगाध प्रेम था। वे प्रकृति में विराट सत्ता का दर्शन करते थे।
दृढ़ संकल्प और कर्मयोगी: वे अपने निश्चय के पक्के और एक कर्मठ पुरुष थे। उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण के लिए अथक परिश्रम किया।
संक्षेप में, 'ज्योति जवाहर' के नायक नेहरूजी एक महान, दूरदर्शी, शांतिप्रिय और भारत की आत्मा को समझने वाले युग-पुरुष हैं। Quick Tip: 'ज्योति जवाहर' के आधार पर नेहरूजी का चरित्र-चित्रण करते समय, कवि ने उनके व्यक्तित्व की तुलना किन-किन प्राकृतिक और ऐतिहासिक प्रतीकों से की है, इसका उल्लेख करने से उत्तर अधिक प्रभावशाली हो जाता है।
'ज्योति जवाहर' खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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श्री देवीप्रसाद शुक्ल 'राही' द्वारा रचित खण्डकाव्य 'ज्योति जवाहर' की कथावस्तु भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के विराट व्यक्तित्व पर केन्द्रित है। इसमें किसी एक कहानी या घटना का वर्णन नहीं है, बल्कि कवि ने अपनी कल्पना के माध्यम से नेहरूजी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को भारत की समग्रता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है।
काव्य का आरम्भ नेहरूजी के अलौकिक रूप के वर्णन से होता है। कवि कल्पना करता है कि नेहरूजी भारत-भ्रमण पर हैं और सम्पूर्ण भारत उनके व्यक्तित्व में समाहित है। राजस्थान उन्हें अपनी वीरता और त्याग प्रदान करता है, तो हिमालय उन्हें अपनी ऊँचाई और दृढ़ता देता है। दक्षिण भारत उन्हें अपनी कला और संस्कृति से सुशोभित करता है।
कवि ने नेहरूजी को 'भारत का मुकुटमणि' और 'युग का अवतार' माना है। उनकी नजर में नेहरूजी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह शक्ति हैं जिसमें अशोक की शांति, बुद्ध की करुणा, प्रताप का स्वाभिमान और शिवाजी की वीरता का समन्वय है। इस प्रकार, इस खण्डकाव्य की कथावस्तु नेहरूजी के महान, लोकनायक और समन्वयवादी व्यक्तित्व का गुणगान है, जिसे कवि ने भारत के विभिन्न प्रदेशों और प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से व्यक्त किया है। Quick Tip: 'ज्योति जवाहर' की कथावस्तु लिखते समय यह स्पष्ट करें कि यह घटना-प्रधान काव्य नहीं, बल्कि भाव-प्रधान और नायक के चरित्र-प्रधान काव्य है। कवि की कल्पना और प्रतीकों का उल्लेख अवश्य करें।
'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के 'लक्ष्मी सर्ग' की कथा संक्षेप में लिखिए ।
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'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के 'लक्ष्मी सर्ग' (तृतीय सर्ग) का सारांश
'लक्ष्मी सर्ग' में महाराणा प्रताप की पत्नी महारानी लक्ष्मी की चिन्ताओं और वेदना का मार्मिक चित्रण है।
अरावली के जंगल में महारानी लक्ष्मी अपने पुत्र को गोद में लिए बैठी हैं और अतीत के सुखद दिनों को याद कर रही हैं। उन्हें अपने महलों का सुख, वैभव और दास-दासियों की सेवाएँ याद आती हैं। उन सुखों की तुलना वर्तमान के कष्टमय जीवन से करके वे अत्यंत दुखी हो जाती हैं।
वे सोचती हैं कि उनके बच्चे, जो राजकुमार हैं, आज जंगल में भूख-प्यास से व्याकुल होकर भटक रहे हैं। यह विचार उनके हृदय को बींध देता है। वह अपनी पुत्री के बारे में सोचती हैं, जिसे जंगली बिलाव के रोटी छीन लेने पर रोना पड़ा था। यह सब सोचकर उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
तभी उनका पुत्र अपनी तोतली भाषा में अपनी भूख की बात करता है, जिसे सुनकर लक्ष्मी और भी व्याकुल हो उठती हैं। वे अपने भाग्य को कोसती हैं। इसी बीच महाराणा प्रताप वहाँ आ जाते हैं और उन्हें चिन्तित देखकर उनकी चिन्ता का कारण पूछते हैं। यहीं पर यह सर्ग समाप्त हो जाता है। यह सर्ग एक माँ और पत्नी के हृदय की वेदना को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। Quick Tip: सर्ग का सारांश लिखते समय पात्र के मनोभावों का चित्रण करना महत्वपूर्ण होता है। 'लक्ष्मी सर्ग' में महारानी लक्ष्मी की चिन्ता, दुःख और मातृत्व की वेदना का वर्णन प्रमुख है।
'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य के आधार पर 'दौलत' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'मेवाड़ मुकुट' खण्डकाव्य में 'दौलत' एक गौण पात्र है। वह महाराणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह की पुत्री है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
सरल एवं प्रकृति-प्रेमी: दौलत एक वनवासी बालिका है। वह प्रकृति के बीच पली-बढ़ी है, इसलिए उसका स्वभाव अत्यंत सरल और निश्छल है। उसे वनों, पर्वतों और वहाँ के जीव-जन्तुओं से गहरा लगाव है।
पितृ-भक्त: वह अपने पिता शक्ति सिंह से बहुत प्रेम करती है। जब वह अपने पिता को पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए देखती है, तो वह बहुत दुखी होती है और उनकी पीड़ा को दूर करना चाहती है।
चिन्तनशील: आयु में छोटी होने पर भी दौलत विचारशील है। वह अपने पिता के दुःख का कारण जानना चाहती है और देश की दुर्दशा पर चिन्ता व्यक्त करती है।
देश-प्रेमी: उसके हृदय में अपने देश मेवाड़ के प्रति अपार प्रेम है। वह महाराणा प्रताप का बहुत सम्मान करती है और मेवाड़ की स्वतंत्रता की कामना करती है।
भावुक: वह एक भावुक लड़की है। अपने पिता की व्यथा और परिवार की कलह को देखकर उसका हृदय द्रवित हो उठता है। Quick Tip: गौण पात्रों का चरित्र-चित्रण करते समय, खण्डकाव्य की मुख्य कथा में उनकी भूमिका को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होता है। दौलत का चरित्र उसके पिता शक्ति सिंह के हृदय-परिवर्तन में सहायक बनता है।
'अग्रपूजा' खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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'अग्रपूजा' खण्डकाव्य की कथावस्तु महाभारत के राजसूय यज्ञ और शिशुपाल वध के प्रसंग पर आधारित है। इसे छः सर्गों में विभाजित किया गया है।
कथावस्तु का सार:
पूर्वाभास एवं आयोजन: कथा का प्रारम्भ श्रीकृष्ण के हस्तिनापुर से लौटने से होता है, जहाँ दुर्योधन ने संधि का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है, जिससे युद्ध की आशंका बढ़ जाती है। इधर, युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ की तैयारी करते हैं।
यज्ञ का आयोजन: खाण्डवप्रस्थ (इन्द्रप्रस्थ) में राजसूय यज्ञ का भव्य आयोजन होता है। देश-विदेश के सभी राजा, ऋषि-मुनि और विद्वान् पधारते हैं।
अग्रपूजा का प्रश्न: यज्ञ में प्रश्न उठता है कि सर्वप्रथम किसकी पूजा (अग्रपूजा) की जाए। भीष्म पितामह सभी की सहमति से भगवान श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ पात्र बताते हैं।
शिशुपाल का विरोध: चेदि-नरेश शिशुपाल इस प्रस्ताव का घोर विरोध करता है और भरी सभा में श्रीकृष्ण को अपशब्द कहने लगता है।
शिशुपाल-वध: श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की माता को उसके सौ अपराध क्षमा करने का वचन दिया था। जब शिशुपाल के अपराधों की संख्या सौ से अधिक हो जाती है, तो श्रीकृष्ण अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर देते हैं।
यज्ञ की समाप्ति: शिशुपाल वध के बाद यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न होता है। सभी युधिष्ठिर को सम्राट के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें बधाई देते हैं।
इस प्रकार, खण्डकाव्य धर्म की अधर्म पर विजय के संदेश को प्रस्तुत करता है। Quick Tip: कथावस्तु को संक्षेप में लिखते समय प्रमुख घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करना चाहिए। बिन्दुओं (points) का प्रयोग करने से उत्तर स्पष्ट और पठनीय हो जाता है।
'अग्रपूजा' खण्डकाव्य के आधार पर 'श्रीकृष्ण' का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'अग्रपूजा' खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण को नायक के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
अलौकिक पुरुष: श्रीकृष्ण एक दैवीय शक्ति सम्पन्न पुरुष हैं। वे त्रिकालदर्शी हैं और भविष्य में होने वाली घटनाओं को जानते हैं।
धर्म-संस्थापक: वे पृथ्वी पर धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए अवतरित हुए हैं। शिशुपाल जैसे अधर्मी का वध करके वे इसी उद्देश्य की पूर्ति करते हैं।
गुण-ग्राहक: वे गुणों का सम्मान करते हैं। वे युधिष्ठिर के धर्म, भीष्म की प्रतिज्ञा और विदुर की नीति की प्रशंसा करते हैं।
शान्ति के अग्रदूत: वे अंत तक युद्ध को टालने का प्रयास करते हैं और दुर्योधन को समझाने के लिए हस्तिनापुर जाते हैं।
लोक-कल्याणकारी: उनका प्रत्येक कार्य लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित होता है। वे अपनी व्यक्तिगत मान-अपमान की चिन्ता नहीं करते।
सरल स्वभाव: इतनी शक्तियों के स्वामी होते हुए भी उनका स्वभाव अत्यंत सरल और सौम्य है। वे पांडवों के सच्चे मित्र और मार्गदर्शक हैं।
इस प्रकार, 'अग्रपूजा' के श्रीकृष्ण एक आदर्श, धर्म-रक्षक और लोक-कल्याणकारी नायक हैं। Quick Tip: श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण करते समय उनके दैवीय और मानवीय दोनों पक्षों का उल्लेख करें। उन्हें एक ओर धर्म-संस्थापक और दूसरी ओर एक कुशल राजनीतिज्ञ और पांडवों के मित्र के रूप में दिखाएँ।
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के आधार पर उसके नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'जय सुभाष' खण्डकाव्य के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हैं। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान सेनानी हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
महान देशभक्त: सुभाष चन्द्र बोस एक अद्वितीय देशभक्त थे। उनका जीवन भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए समर्पित था। उन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
अदम्य साहसी और वीर: वे जन्म से ही निर्भीक और साहसी थे। अंग्रेजों की कड़ी निगरानी के बावजूद वेष बदलकर उनके घर से निकल भागना उनके अदम्य साहस का परिचय देता है।
कुशल संगठनकर्ता: उन्होंने जर्मनी और जापान जैसे देशों की यात्रा कर भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाया। उन्होंने 'आजाद हिन्द फौज' जैसी विशाल सेना का गठन किया, जो उनकी अद्भुत संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है।
ओजस्वी वक्ता: नेताजी एक प्रभावशाली वक्ता थे। उनके भाषणों में जादू था। "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा" जैसा उनका नारा आज भी युवाओं में जोश भर देता है।
महान त्यागी: उन्होंने देश-सेवा के लिए आई.सी.एस. जैसे प्रतिष्ठित पद को ठुकरा दिया और अपना सम्पूर्ण जीवन संघर्षों में बिताया।
अमर सेनानी: सुभाष चन्द्र बोस भारत के एक अमर सेनानी हैं, जिनका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे आज भी करोड़ों भारतीयों के प्रेरणास्रोत हैं। Quick Tip: सुभाष चन्द्र बोस का चरित्र-चित्रण लिखते समय उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं, जैसे- आई.सी.एस. का त्याग, देश से पलायन, आजाद हिन्द फौज का गठन, का उल्लेख अवश्य करें। यह आपके उत्तर को प्रामाणिक बनाएगा।
'जय सुभाष' खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का कथानक लिखिए ।
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'जय सुभाष' खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का सारांश
'जय सुभाष' खण्डकाव्य का द्वितीय सर्ग सुभाष चन्द्र बोस के राजनीतिक जीवन के आरम्भ पर केन्द्रित है।
आई.सी.एस. का पद त्यागकर सुभाष बाबू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित हो जाते हैं। वे शीघ्र ही अपनी योग्यता, लगन और देशभक्ति से देश के एक प्रमुख नेता बन जाते हैं। वे कई बार जेल जाते हैं, परन्तु अंग्रेजी सरकार की यातनाएँ उनके हौसले को तोड़ नहीं पातीं।
सन् 1939 में वे महात्मा गांधी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को हराकर कांग्रेस के अध्यक्ष चुने जाते हैं। परन्तु, गांधीजी से वैचारिक मतभेद होने के कारण वे अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे देते हैं। वे 'फॉरवर्ड ब्लॉक' नामक एक नई पार्टी का गठन करते हैं।
द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ होने पर अंग्रेज सरकार उन्हें उनके ही घर में नजरबन्द कर देती है। परन्तु, सुभाष एक साधारण कैदी की तरह बन्दी जीवन बिताना नहीं चाहते थे। वे देश को स्वतंत्र कराने के लिए अवसर की तलाश में थे। एक रात वे पठान का वेष धारण कर, पुलिस की आँखों में धूल झोंककर, अपने घर से भाग निकलते हैं और भारत की सीमाओं से बाहर चले जाते हैं। यह सर्ग उनके अदम्य साहस, त्याग और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। Quick Tip: द्वितीय सर्ग के सारांश में दो प्रमुख घटनाओं - कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र और घर से पलायन - को विस्तार से बताएँ। ये घटनाएँ सुभाष के राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ थीं।
'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के 'संकल्प' सर्ग का सारांश लिखिए ।
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'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग 'संकल्प' का सारांश
'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य का प्रथम सर्ग 'संकल्प' नायक चन्द्रशेखर आजाद के क्रान्तिकारी जीवन के आरम्भ को प्रस्तुत करता है।
सर्ग का प्रारम्भ भारत की तत्कालीन दयनीय स्थिति के चित्रण से होता है। अंग्रेजी शासन के अत्याचारों से त्रस्त भारत माता अपनी मुक्ति के लिए पुकार रही है। किशोर चन्द्रशेखर अपने देश की यह दुर्दशा देखकर अत्यंत व्यथित होते हैं। वे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर भारत को स्वतंत्र कराने के आन्दोलन में भाग लेने का दृढ़ संकल्प लेते हैं।
उस समय गांधीजी का असहयोग आन्दोलन चल रहा था। चन्द्रशेखर भी उसमें कूद पड़ते हैं। विदेशी वस्त्रों की दुकान पर धरना देते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। जब उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है, तो वे निर्भीकता से अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वाधीन' और घर 'जेलखाना' बताते हैं।
इस उत्तर से क्रोधित होकर अंग्रेज मजिस्ट्रेट उन्हें पन्द्रह बेंतों की कठोर सजा सुनाता है। प्रत्येक बेंत के प्रहार पर किशोर चन्द्रशेखर पीड़ा से कराहने के बजाय 'भारत माता की जय' का उद्घोष करते हैं। यहीं से उनका नाम 'आजाद' पड़ गया और वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महान क्रान्तिकारी के रूप में प्रसिद्ध हुए। Quick Tip: 'संकल्प' सर्ग का सारांश लिखते समय चन्द्रशेखर के 'आजाद' नाम पड़ने वाली घटना का विस्तार से और प्रभावशाली ढंग से वर्णन करें, क्योंकि यह इस सर्ग का सबसे महत्वपूर्ण अंश है।
'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'मातृभूमि के लिए' खण्डकाव्य के नायक अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
महान देशभक्त: आजाद के जीवन का एकमात्र लक्ष्य मातृभूमि को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराना था। इसके लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
वीर और अदम्य साहसी: वे बचपन से ही वीर और निर्भीक थे। मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए उनके उत्तर और बेंतों की सजा को हंसते-हंसते सहना उनके अदम्य साहस का प्रतीक है।
स्वाभिमानी और दृढ़-प्रतिज्ञ: उन्होंने संकल्प लिया था कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं आएँगे। इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में उन्होंने अपनी इस प्रतिज्ञा को अपने प्राणों की आहुति देकर निभाया।
कुशल संगठनकर्ता और नेता: वे एक महान क्रान्तिकारी नेता थे। उन्होंने अनेक क्रान्तिकारियों को संगठित कर अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी।
त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति: देश के लिए उन्होंने अपने घर-परिवार, सुख-चैन, सब कुछ त्याग दिया था। उनका सम्पूर्ण जीवन त्याग और बलिदान का एक अनुपम उदाहरण है।
अमर शहीद: चन्द्रशेखर आजाद ने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया और वे सदा के लिए अमर हो गए। वे आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। Quick Tip: आजाद का चरित्र-चित्रण करते समय उनकी प्रतिज्ञा ("मैं जीते-जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आऊँगा") का उल्लेख करना अनिवार्य है, क्योंकि यह उनके स्वाभिमानी चरित्र का मूल आधार है।
'कर्ण' खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'कर्ण' खण्डकाव्य में कुन्ती एक विवश और ममतामयी माँ के रूप में चित्रित हैं। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
ममतामयी माँ: कुन्ती के हृदय में अपने सभी पुत्रों (पांडवों और कर्ण) के लिए अपार ममता है। वे আসন্ন महाभारत के युद्ध में अपने पुत्रों के विनाश की आशंका से भयभीत हैं।
विवश और चिन्तित: वे अपने अतीत में की गई भूल (कर्ण का त्याग) के कारण पश्चाताप और ग्लानि से भरी हुई हैं। वे चिन्तित हैं कि उनके ही पुत्र एक-दूसरे के रक्त के प्यासे हो रहे हैं।
स्वार्थी: पुत्र-मोह में वे स्वार्थी भी हो जाती हैं। वे कर्ण के पास जाकर उससे पांडवों के प्राणों की भीख माँगती हैं, परन्तु उसके अधिकारों और उसके साथ हुए अन्याय की उन्हें चिन्ता नहीं है।
निर्भीक एवं स्पष्टवादिनी: वे कर्ण के समक्ष जाकर निर्भीकता से उसके जन्म का रहस्य बताती हैं और उसे अपने पक्ष में आने का आग्रह करती हैं।
समाज से भयभीत: उन्होंने लोक-लाज के भय से अपने नवजात पुत्र कर्ण का त्याग कर दिया था, जो उनके चरित्र के एक कमजोर पक्ष को दर्शाता है।
इस प्रकार, कुन्ती का चरित्र एक ममतामयी माँ, एक चिन्तित रानी और एक विवश नारी का मिला-जुला रूप है। Quick Tip: कुन्ती का चरित्र-चित्रण करते समय उनके चरित्र के द्वंद्व को उजागर करें। एक ओर वे ममतामयी माँ हैं, तो दूसरी ओर पुत्र-मोह में स्वार्थी भी प्रतीत होती हैं।
'कर्ण' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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'कर्ण' खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु
इस सर्ग में पांडवों की चिन्ता और द्रौपदी के क्रोध का वर्णन है।
जब पांडवों को यह पता चलता है कि कर्ण ही अर्जुन को मारने की प्रतिज्ञा करने वाला सर्वश्रेष्ठ योद्धा है, तो वे चिन्तित हो उठते हैं। युधिष्ठिर शांति और क्षमा की बात करते हैं।
परन्तु, द्रौपदी को यह स्वीकार नहीं है। कौरवों द्वारा भरी सभा में किया गया अपना अपमान उन्हें पल-पल याद आता है। वे पांडवों को उनके क्षत्रिय धर्म की याद दिलाती हैं। वे कहती हैं कि अपमान का बदला लिए बिना शांति से बैठना कायरता है।
द्रौपदी अपने ओजस्वी वचनों से पांडवों को युद्ध के लिए प्रेरित करती हैं। वे भीम को उनकी प्रतिज्ञा (दुःशासन की छाती का रक्त पीने की) याद दिलाती हैं और अर्जुन को कर्ण से युद्ध करने के लिए उत्साहित करती हैं। द्रौपदी के इन वचनों को सुनकर पांडवों में पुनः उत्साह का संचार होता है और वे युद्ध के लिए दृढ़-संकल्प हो जाते हैं। यह सर्ग द्रौपदी के स्वाभिमानी और वीरांगना स्वरूप को दर्शाता है। Quick Tip: तृतीय सर्ग के सारांश में द्रौपदी की भूमिका को केन्द्र में रखें। यह सर्ग मुख्य रूप से द्रौपदी के प्रेरक संवादों पर ही आधारित है।
'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के आधार पर भरत का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के नायक भरत हैं। उन्हें एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई और त्यागी शासक के रूप में चित्रित किया गया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
आदर्श भ्राता: भरत का अपने बड़े भाई श्रीराम के प्रति प्रेम और सम्मान अनुकरणीय है। वे श्रीराम के बिना अयोध्या के राज्य की कल्पना भी नहीं कर सकते। भ्रातृ-प्रेम में वे विश्व-साहित्य में अद्वितीय हैं।
महान त्यागी और निर्लोभी: उनकी माता कैकेयी ने उनके लिए ही राज्य माँगा था, परन्तु भरत राज-सुख को ठोकर मार देते हैं। उनके मन में राज्य का कोई लोभ नहीं है।
आत्मग्लानि से युक्त: वे अपनी माता के कृत्य के लिए स्वयं को दोषी मानते हैं और आत्मग्लानि की आग में जलते रहते हैं। वे कैकेयी को कटु वचन भी कहते हैं।
विनम्र एवं शीलवान: भरत स्वभाव से अत्यंत विनम्र और सदाचारी हैं। वे माता कौशल्या और गुरु वशिष्ठ के समक्ष अपनी निर्दोषिता सिद्ध करते हैं।
आदर्श एवं कर्तव्यनिष्ठ शासक: श्रीराम के वन से न लौटने पर, वे उनकी खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखकर एक सेवक की भाँति चौदह वर्षों तक अयोध्या का राज-काज संभालते हैं। यह उनके महान कर्तव्य-पालन का प्रमाण है।
निष्कर्षतः भरत त्याग, भ्रातृ-प्रेम, शील और कर्तव्यनिष्ठा की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं। Quick Tip: भरत का चरित्र-चित्रण करते समय 'त्याग' और 'भ्रातृ-प्रेम' इन दो गुणों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करें, क्योंकि यही उनके चरित्र के मूल आधार हैं।
'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के 'आगमन' सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए ।
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'कर्मवीर भरत' खण्डकाव्य के 'आगमन' सर्ग की कथावस्तु
'आगमन' सर्ग में भरत और शत्रुघ्न के ननिहाल (केकय देश) से अयोध्या वापस आने की कथा है।
जब भरत अयोध्या के निकट पहुँचते हैं, तो उन्हें नगर की उदासी और सूनापन देखकर किसी अनहोनी की आशंका होती है। नगरवासी उन्हें देखकर मुँह फेर लेते हैं, जिससे उनकी चिन्ता और बढ़ जाती है।
राजमहल में प्रवेश करने पर वे अपनी माता कैकेयी से मिलते हैं। कैकेयी उन्हें बताती हैं कि उन्होंने राजा दशरथ से दो वरदानों में उनके लिए राज्य और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा है। यह सुनकर भरत पर मानो बिजली गिर जाती है। जब उन्हें पता चलता है कि इसी दुःख में पिता दशरथ ने प्राण त्याग दिए हैं, तो वे शोक से व्याकुल हो उठते हैं।
भरत अपनी माता कैकेयी को इस घोर अनर्थ के लिए बहुत धिक्कारते हैं और कहते हैं कि इस कुल-कलंक को वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। वे स्वयं को इस षड्यंत्र से पूरी तरह अलग बताते हैं। इसके बाद वे रोते हुए माता कौशल्या के पास जाते हैं। कौशल्या भी पहले उन पर संदेह करती हैं, परन्तु भरत की निष्ठा और दुःख देखकर उन्हें अपने पुत्र के समान गले लगा लेती हैं। यह सर्ग भरत के निर्दोष चरित्र और महान भ्रातृ-प्रेम को उजागर करता है। Quick Tip: 'आगमन' सर्ग की कथावस्तु लिखते समय भरत के मन के विभिन्न भावों - आशंका, दुःख, क्रोध, ग्लानि - को क्रम से दिखाना महत्वपूर्ण है। इससे उत्तर सजीव हो उठता है।
'तुमुल' खण्डकाव्य के आधार पर प्रतिनायक का चरित्र-चित्रण कीजिए ।
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'तुमुल' खण्डकाव्य का प्रतिनायक रावण-पुत्र मेघनाद (इन्द्रजीत) है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
महान पराक्रमी योद्धा: मेघनाद एक अद्वितीय वीर है। उसने अपने पराक्रम से देवराज इन्द्र को भी जीत लिया था, इसीलिए उसका नाम 'इन्द्रजीत' पड़ा। वह राम और लक्ष्मण को भी युद्ध में कड़ी टक्कर देता है।
मायावी शक्तियों का स्वामी: वह तंत्र-मंत्र और मायावी युद्ध-कला में निपुण है। वह अदृश्य होकर युद्ध करता है और नागपाश जैसी शक्तियों का प्रयोग करता है।
पितृ-भक्त: वह अपने पिता रावण का परम भक्त है। पिता की आज्ञा का पालन करना वह अपना परम कर्तव्य समझता है और लंका की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देता है।
अहंकारी और घमंडी: अपनी शक्तियों पर उसे बहुत घमंड है। वह राम और लक्ष्मण को साधारण मनुष्य समझकर उनका उपहास करता है।
कर्तव्यनिष्ठ: वह एक कर्तव्यपरायण पुत्र और योद्धा है। जब लंका पर संकट आता है, तो वह अपने सभी भोग-विलास को त्यागकर युद्ध-भूमि में उतरता है।
यद्यपि वह अधर्म के पक्ष में है, फिर भी मेघनाद का चरित्र वीरता, पितृ-भक्ति और कर्तव्य-निष्ठा जैसे गुणों से युक्त है। Quick Tip: प्रतिनायक का चरित्र-चित्रण करते समय उसके नकारात्मक गुणों (जैसे- अहंकार) के साथ-साथ उसके सकारात्मक गुणों (जैसे- वीरता, पितृ-भक्ति) का भी उल्लेख करें। इससे चरित्र-चित्रण संतुलित होता है।
'तुमुल' खण्डकाव्य के लक्ष्मण-मेघनाथ युद्ध का वर्णन कीजिए ।
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'तुमुल' खण्डकाव्य में वर्णित लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध
'तुमुल' खण्डकाव्य में लक्ष्मण और मेघनाद का युद्ध अत्यंत भयंकर और निर्णायक था। इसका वर्णन इस प्रकार है:
जब लंका के बड़े-बड़े वीर योद्धा मारे गए, तो रावण ने अपने सबसे पराक्रमी पुत्र मेघनाद को युद्ध के लिए भेजा। मेघनाद अपनी कुलदेवी की पूजा करके अजेय रथ पर सवार होकर युद्ध-भूमि में आया।
उसका सामना श्रीराम के भाई लक्ष्मण से हुआ। दोनों वीरों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। दोनों ही अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रों से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। लक्ष्मण ने अपने बाणों से मेघनाद के रथ, सारथी और घोड़ों को नष्ट कर दिया।
जब मेघनाद ने देखा कि वह सीधे युद्ध में लक्ष्मण को पराजित नहीं कर सकता, तो उसने अपनी मायावी शक्ति का प्रयोग किया। वह आकाश में अदृश्य हो गया और वहीं से लक्ष्मण पर घातक बाणों की वर्षा करने लगा। अंत में, उसने विभीषण के परामर्श के विरुद्ध, अपनी अमोघ 'वीरघातिनी शक्ति' का प्रयोग लक्ष्मण पर किया।
उस दिव्य शक्ति के प्रहार को लक्ष्मण सहन न कर सके और मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। इस प्रकार, मेघनाद ने छल और माया से इस युद्ध में विजय प्राप्त की। यह युद्ध मेघनाद की मायावी शक्ति और लक्ष्मण के अदम्य शौर्य का प्रतीक है। Quick Tip: युद्ध का वर्णन करते समय घटनाक्रम को सिलसिलेवार लिखें। युद्ध के आरम्भ, मध्य और अंत (परिणाम) को स्पष्ट रूप से बताएँ। युद्ध में प्रयुक्त विशेष अस्त्रों (जैसे- वीरघातिनी शक्ति) का उल्लेख अवश्य करें।
जयप्रकाश भारती
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जीवन-परिचय:
लोकप्रिय लेखक, पत्रकार एवं वैज्ञानिक विषयों के पुरोधा जयप्रकाश भारती का जन्म 2 जनवरी, 1936 को उत्तर प्रदेश के मेरठ नगर में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रघुनाथ सहाय था। इन्होंने मेरठ से बी.एस.सी. की परीक्षा उत्तीर्ण की और छात्र जीवन से ही समाज-सेवा में रुचि लेने लगे। इन्होंने अनेक वर्षों तक 'साक्षरता निकेतन' में काम किया और 'दैनिक प्रभात' व 'नवभारत टाइम्स' में पत्रकारिता भी की। इन्होंने सुप्रसिद्ध बाल पत्रिका 'नंदन' का भी वर्षों तक सम्पादन किया। विज्ञान से सम्बन्धित विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने में ये सिद्धहस्त थे। 15 फरवरी, 2005 को इनका निधन हो गया।
साहित्यिक योगदान:
भारती जी ने बाल-साहित्य और वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने बच्चों के लिए ज्ञानवर्धक और मनोरंजक पुस्तकें लिखीं। उनकी भाषा सरल, सुबोध और रोचक है, जिससे जटिल वैज्ञानिक विषय भी आसानी से समझ में आ जाते हैं।
प्रमुख रचना:
हिमालय की पुकार (यात्रा-वृत्तान्त)। इसके अतिरिक्त अनंत आकाश : अथाह सागर, विज्ञान की विभूतियाँ, देश हमारा : झंडा ऊँचा रहे हमारा और बर्फ की गुड़िया इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: जयप्रकाश भारती का जीवन-परिचय लिखते समय उनके 'वैज्ञानिक लेखन' और बाल-साहित्य में योगदान पर विशेष बल दें। 'नंदन' पत्रिका के सम्पादन का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
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जीवन-परिचय:
हिन्दी के प्रसिद्ध निबन्धकार और साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 27 मई, 1894 को छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम पुन्नालाल बख्शी था। इन्होंने बी.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की और साहित्य-सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के कहने पर इन्होंने प्रसिद्ध पत्रिका 'सरस्वती' का भी कुशलतापूर्वक सम्पादन किया। इनकी साहित्य-सेवा के लिए 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' द्वारा इन्हें 'साहित्य-वाचस्पति' की उपाधि से सम्मानित किया गया। 28 दिसम्बर, 1971 को इनका निधन हो गया।
साहित्यिक योगदान:
बख्शी जी एक कुशल निबन्धकार, आलोचक और कहानीकार थे। उनके निबन्धों में सरलता, स्वाभाविकता और आत्मीयता का गुण विद्यमान है। वे द्विवेदी युग के एक प्रमुख गद्यकार माने जाते हैं। 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादक के रूप में भी उन्होंने हिन्दी साहित्य की महती सेवा की।
प्रमुख रचना:
पंचपात्र (निबन्ध-संग्रह)। इसके अतिरिक्त कुछ, क्या लिखूँ ?, पद्मवन (निबन्ध-संग्रह) तथा विश्व-साहित्य (आलोचना) इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन-परिचय लिखते समय उनके 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादन और 'साहित्य-वाचस्पति' की उपाधि का उल्लेख अवश्य करें।
जयशंकर प्रसाद
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जीवन-परिचय:
छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार (सुँघनी साहू) में सन् 1889 ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद था। बाल्यावस्था में ही माता-पिता तथा बड़े भाई का देहान्त हो जाने के कारण परिवार का सम्पूर्ण भार इनके कंधों पर आ पड़ा। इन्होंने घर पर ही हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे अत्यधिक स्वाभिमानी, सरल और परोपकारी स्वभाव के थे। विषम परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए, क्षय रोग से पीड़ित होने के कारण मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में सन् 1937 ई. में इनका निधन हो गया।
साहित्यिक योगदान:
प्रसाद जी छायावादी युग के प्रवर्तक, उन्नायक तथा प्रतिनिधि कवि होने के साथ-साथ युग-प्रवर्तक नाटककार, कथाकार और उपन्यासकार भी थे। उनकी रचनाओं में भारत के गौरवशाली अतीत का सजीव वर्णन मिलता है। 'कामायनी' उनका सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है, जिसमें छायावाद की सभी प्रवृत्तियों का समावेश है।
प्रमुख रचना:
कामायनी (महाकाव्य) - यह प्रसाद जी की कीर्ति का स्तम्भ है। इसके अतिरिक्त चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त (नाटक) तथा आकाशदीप (कहानी-संग्रह) भी इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: जीवन-परिचय लिखते समय एक सारणीबद्ध प्रारूप का उपयोग करें: जन्म, मृत्यु, जन्म-स्थान, पिता का नाम, साहित्यिक युग और प्रमुख रचना। यह आपको महत्वपूर्ण बिन्दुओं को याद रखने में मदद करेगा।
सूरदास
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जीवन-परिचय:
हिन्दी साहित्य के कृष्ण-भक्ति काव्य-धारा के श्रेष्ठतम कवि सूरदास जी का जन्म सन् 1478 ई. में आगरा के निकट रुनकता नामक ग्राम में हुआ था। कुछ विद्वान् इनका जन्म-स्थान दिल्ली के निकट सीही ग्राम को मानते हैं। इनके पिता का नाम रामदास सारस्वत था। इनके जन्मांध होने के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है। ये बचपन से ही विरक्त हो गए थे और गऊघाट पर विनय के पद गाया करते थे। एक बार वल्लभाचार्य से भेंट होने पर उन्होंने इन्हें कृष्ण-लीला का गान करने का सुझाव दिया। तभी से ये वल्लभाचार्य के शिष्य बन गए और श्रीनाथजी के मन्दिर में कीर्तन करने लगे। 'अष्टछाप' के कवियों में इनका स्थान सर्वोपरि है। सन् 1583 ई. में पारसौली नामक स्थान पर इनका देहावसान हो गया।
साहित्यिक योगदान:
सूरदास जी ने कृष्ण की बाल-लीलाओं और प्रेम-लीलाओं का इतना मनोहारी वर्णन किया है कि वह विश्व-साहित्य में अद्वितीय है। वात्सल्य और शृंगार रस के वे सम्राट माने जाते हैं। उनकी भाषा शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा है।
प्रमुख रचना:
सूरसागर - यह सूरदास जी की कीर्ति का आधार-स्तम्भ है। इसके अतिरिक्त सूरसारावली तथा साहित्य-लहरी भी इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: सूरदास का जीवन-परिचय लिखते समय उन्हें 'वात्सल्य रस का सम्राट' और 'अष्टछाप का जहाज' जैसी उपाधियों का उल्लेख अवश्य करें। यह उनके महत्व को दर्शाता है।
मैथिलीशरण गुप्त
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जीवन-परिचय:
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त, 1886 को झाँसी जिले के चिरगाँव नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त था। अपने पिता से ही इन्हें कविता लिखने की प्रेरणा मिली। ये आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपना काव्य-गुरु मानते थे। द्विवेदी जी की प्रेरणा से इन्होंने खड़ी बोली को अपनी कविता का माध्यम बनाया। इनकी कविताओं में राष्ट्र-भक्ति और भारतीय संस्कृति की गहरी छाप है, इसीलिए महात्मा गांधी ने इन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया। 12 दिसम्बर, 1964 को इनका निधन हो गया।
साहित्यिक योगदान:
गुप्त जी द्विवेदी युग के सबसे लोकप्रिय कवि थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने का कार्य किया। उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के गौरवशाली प्रसंगों को अपने काव्य का विषय बनाया। 'साकेत' महाकाव्य में उन्होंने रामकथा के उपेक्षित पात्र उर्मिला के चरित्र को विशेष महत्व दिया है।
प्रमुख रचना:
साकेत (महाकाव्य) - यह रामचरितमानस के बाद रामकाव्य का दूसरा महत्वपूर्ण स्तम्भ माना जाता है। इसके अतिरिक्त भारत-भारती, यशोधरा और पंचवटी भी इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। Quick Tip: मैथिलीशरण गुप्त का जीवन-परिचय लिखते समय 'राष्ट्रकवि' की उपाधि और उनकी प्रसिद्ध रचना 'भारत-भारती' का उल्लेख करना अनिवार्य है।
माखनलाल चतुर्वेदी
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जीवन-परिचय:
'एक भारतीय आत्मा' के नाम से प्रसिद्ध, राष्ट्रीय काव्य-धारा के प्रमुख कवि माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम नन्दलाल चतुर्वेदी था। इन्होंने प्रारम्भ में अध्यापन का कार्य किया और बाद में पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए। इन्होंने 'प्रभा', 'कर्मवीर' और 'प्रताप' जैसे पत्रों का सम्पादन किया। ये एक सच्चे देशभक्त थे और स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने के कारण कई बार जेल भी गए। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया। 30 जनवरी, 1968 को इनका देहावसान हो गया।
साहित्यिक योगदान:
चतुर्वेदी जी की रचनाओं में देश-प्रेम, त्याग और बलिदान की भावना प्रमुख है। उनकी कविता में ओज और जोश का अद्भुत समन्वय है। 'पुष्प की अभिलाषा' उनकी एक अमर कविता है जो हर भारतीय के हृदय में बसी हुई है।
प्रमुख रचना:
हिमकिरीटिनी (कविता-संग्रह) - इस पर उन्हें 'देव पुरस्कार' प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त हिमतरंगिणी, माता, युगचरण और समर्पण इनकी प्रसिद्ध काव्य-रचनाएँ हैं। Quick Tip: माखनलाल चतुर्वेदी का जीवन-परिचय लिखते समय उनके उपनाम 'एक भारतीय आत्मा' और उनकी प्रसिद्ध कविता 'पुष्प की अभिलाषा' का उल्लेख अवश्य करें।
अपनी पाठ्यपुस्तक में से कण्ठस्थ कोई एक श्लोक लिखिए जो इस प्रश्नपत्र में न आया हो।
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श्लोक:
बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः।
उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता।।
अर्थ:
बन्धन हो अथवा मरण, जीत हो या हार, वीर पुरुष दोनों ही स्थितियों में समान रहता है। वीर-भाव को ही वीरता कहते हैं।
Quick Tip: परीक्षा के लिए कम से कम दो-तीन सरल श्लोक अर्थ सहित याद कर लें। यह सुनिश्चित करें कि आप जो श्लोक लिख रहे हैं, वह प्रश्न-पत्र में पहले से दिए गए पद्यांशों में से न हो। श्लोक को शुद्ध रूप में लिखना आवश्यक है।
सर्वे यात्रिणः कं दृष्ट्वा अहसन् ?
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उत्तरम्: सर्वे यात्रिणः एकं ग्रामीणं नागरिकं दृष्ट्वा अहसन्।
(सभी यात्रियों ने एक ग्रामीण नागरिक को देखकर हँसा।)
Quick Tip: संस्कृत के प्रश्नों का उत्तर देते समय, प्रश्नवाचक शब्द (जैसे - कं, कः, कुत्र) को हटाकर उसके स्थान पर सही उत्तर शब्द रखकर पूरा वाक्य लिखें।
पुरुराज ! गीतायाः कं सन्देशम् अकथयत् ?
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उत्तरम्: पुरुराजः अकथयत् यत् हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं, जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। अतः निराशीः निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।
(पुरुराज ने कहा कि (युद्ध में) मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे और जीत गए तो पृथ्वी का भोग करोगे। इसलिए, इच्छा रहित, ममता रहित और संताप रहित होकर युद्ध करो।)
Quick Tip: 'वीरः वीरेण पूज्यते' पाठ के इस महत्वपूर्ण श्लोक (गीता का संदेश) को कंठस्थ कर लें, यह अक्सर अनुवाद या प्रश्नोत्तर में पूछा जाता है।
कूपः किमर्थं दुःखम् अनुभवति ?
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उत्तरम्: कूपः 'अहं नितराम् नीचः अस्मि' इति विचार्य दुःखम् अनुभवति।
(कुआँ 'मैं अत्यधिक नीच (गहरा) हूँ' ऐसा सोचकर दुःख का अनुभव करता है।)
Quick Tip: 'अन्योक्तिविलासः' पाठ के श्लोकों के गूढ़ अर्थ को समझें। यहाँ 'नीच' शब्द के दो अर्थ हैं - गहरा और निम्न कोटि का।
रिपुः कया वर्धते ?
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उत्तरम्: रिपुः उपेक्षया वर्धते।
(शत्रु की उपेक्षा करने से वह बढ़ता है।)
Quick Tip: यह एक सूक्ति है जिसका अर्थ है कि शत्रु और रोग की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अन्यथा वे बढ़ जाते हैं।
विज्ञान : वरदान या अभिशाप
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रूपरेखा:
प्रस्तावना (विज्ञान का अर्थ और युग)
विज्ञान के वरदान (विभिन्न क्षेत्रों में लाभ)
विज्ञान के अभिशाप (हानियाँ)
उपसंहार (समन्वय की आवश्यकता)
1. प्रस्तावना
आज का युग विज्ञान का युग है। हमारे जीवन का कोई भी क्षेत्र विज्ञान के प्रभाव से अछूता नहीं है। सुबह जागने से लेकर रात को सोने तक, हम अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों का उपयोग करते हैं। विज्ञान ने मनुष्य को असीमित शक्ति प्रदान की है और हमारे जीवन को अत्यंत सरल, सुखद और आरामदायक बना दिया है। परन्तु, सिक्के के दो पहलुओं की तरह, विज्ञान के लाभ के साथ-साथ हानियाँ भी हैं। यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह इसे वरदान बनाए या अभिशाप।
2. विज्ञान के वरदान
विज्ञान ने मानव जीवन को अनेक वरदान दिए हैं:
यातायात और संचार: बस, रेल, हवाई जहाज ने दूरियों को समाप्त कर दिया है। टेलीफोन, मोबाइल, इंटरनेट ने संचार को अत्यंत तीव्र और सरल बना दिया है।
चिकित्सा: विज्ञान ने असाध्य रोगों का इलाज संभव बनाया है। नई-नई दवाइयों और शल्य-चिकित्सा की पद्धतियों ने मनुष्य को दीर्घायु बनाया है।
मनोरंजन: रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा और कंप्यूटर ने मनोरंजन के अनेक साधन प्रदान किए हैं।
कृषि और उद्योग: ट्रैक्टर, रासायनिक खाद, और उन्नत बीजों से कृषि उत्पादन में क्रांति आई है। बड़ी-बड़ी मशीनों ने उत्पादन को तीव्र गति दी है।
दैनिक जीवन: बिजली, पंखा, कूलर, फ्रिज जैसे आविष्कारों ने हमारे दैनिक जीवन को बहुत आरामदायक बना दिया है।
3. विज्ञान के अभिशाप
जहाँ विज्ञान ने मनुष्य को सुख-सुविधाएँ दी हैं, वहीं कुछ गंभीर खतरे भी उत्पन्न किए हैं:
विनाशकारी हथियार: परमाणु बम, हाइड्रोजन बम जैसे हथियारों ने सम्पूर्ण मानवता को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है।
पर्यावरण प्रदूषण: कारखानों के धुएँ, वाहनों के प्रदूषण और रासायनिक कचरे ने हमारे पर्यावरण को जहरीला बना दिया है।
बेरोजगारी: मशीनों के अत्यधिक प्रयोग ने मनुष्यों के रोजगार छीन लिए हैं, जिससे बेरोजगारी बढ़ी है।
नैतिक पतन: मोबाइल और इंटरनेट के दुरुपयोग से युवा पीढ़ी में नैतिक पतन और शारीरिक निष्क्रियता बढ़ रही है।
4. उपसंहार
वास्तव में, विज्ञान न तो वरदान है और न ही अभिशाप। यह एक शक्ति है, जिसका उपयोग अच्छे और बुरे, दोनों कामों के लिए किया जा सकता है। यह मनुष्य के विवेक पर निर्भर करता है कि वह इसका प्रयोग मानव कल्याण के लिए करे या विनाश के लिए। यदि हम विज्ञान का उपयोग रचनात्मक कार्यों और मानवता की भलाई के लिए करें, तो यह हमारे लिए एक महान वरदान सिद्ध होगा। Quick Tip: निबन्ध लिखते समय एक रूपरेखा (outline) अवश्य बनाएँ। वरदान और अभिशाप वाले निबन्ध में दोनों पक्षों पर बराबर ध्यान दें और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें।
अपने जन्मदिन पर मित्र द्वारा भेजे गए उपहार के लिए मित्र को धन्यवाद पत्र लिखिए ।
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25, सिविल लाइन्स,
कानपुर।
दिनांक: 25 अक्टूबर, 2023
प्रिय मित्र रोहित,
सप्रेम नमस्ते।
मैं यहाँ कुशलपूर्वक हूँ और आशा करता हूँ कि तुम भी स्वस्थ और सानंद होगे। तुम्हारा भेजा हुआ उपहार कल ही प्राप्त हुआ। मेरे जन्मदिन के अवसर पर तुम्हारे द्वारा भेजी गई 'रश्मिरथी' पुस्तक पाकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई।
तुम जानते हो कि मुझे कविताएँ पढ़ना कितना पसंद है और 'दिनकर' जी मेरे प्रिय कवि हैं। यह पुस्तक मेरे लिए किसी अनमोल खजाने से कम नहीं है। जन्मदिन पर इतने सुन्दर और विचारपूर्ण उपहार के लिए मैं तुम्हारा हृदय से आभारी हूँ। तुम्हारा यह उपहार मुझे सदैव तुम्हारी याद दिलाता रहेगा।
यद्यपि तुम मेरे जन्मदिन पर उपस्थित नहीं हो सके, किन्तु तुम्हारे इस उपहार ने तुम्हारी कमी को कुछ हद तक पूरा कर दिया है। चाचाजी और चाचीजी को मेरा प्रणाम कहना।
तुम्हारा अभिन्न मित्र,
सुमित
Quick Tip: धन्यवाद पत्र लिखते समय भाषा में आत्मीयता और कृतज्ञता का भाव स्पष्ट होना चाहिए। उपहार की प्रशंसा करते हुए यह बताएँ कि वह आपके लिए क्यों विशेष है।
राज्य परिवहन निगम के मुख्य प्रबन्धक को बस चालक के अप्रशंसनीय व्यवहार का उल्लेख करते हुए शिकायती पत्र लिखिए ।
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सेवा में,
श्रीमान मुख्य प्रबन्धक,
उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम,
लखनऊ।
विषय: बस चालक द्वारा अप्रशंसनीय (अभद्र) व्यवहार के सम्बन्ध में शिकायत।
महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि मैं कल दिनांक 24 अक्टूबर, 2023 को कानपुर से लखनऊ जाने वाली बस (बस संख्या - UP 78 XX 1234) में यात्रा कर रहा था। यह बस कानपुर के झकरकटी बस अड्डे से शाम 4 बजे चली थी।
यात्रा के दौरान बस के चालक का व्यवहार यात्रियों के प्रति अत्यंत असम्मानजनक और अभद्र था। वह बस को बहुत तेज और लापरवाही से चला रहा था, जिससे यात्रियों की जान को खतरा बना हुआ था। जब एक वृद्ध यात्री ने उसे बस धीरे चलाने का अनुरोध किया, तो चालक ने उनके साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया और उन्हें बस से उतर जाने की धमकी दी। उसने कई स्थानों पर निर्धारित स्टॉप पर बस नहीं रोकी, जिससे यात्रियों को बहुत असुविधा हुई।
अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप इस मामले की जाँच कराकर उक्त बस चालक के विरुद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की कृपा करें, ताकि भविष्य में किसी भी यात्री को इस प्रकार के कटु अनुभव का सामना न करना पड़े।
धन्यवाद!
भवदीय,
रमेश कुमार
5, गोमती नगर,
लखनऊ।
दिनांक: 25 अक्टूबर, 2023
Quick Tip: शिकायती पत्र लिखते समय भाषा औपचारिक और संयमित होनी चाहिए। घटना का विवरण (दिनांक, समय, स्थान, बस नम्बर आदि) स्पष्ट रूप से दें। पत्र में विषय का उल्लेख करना अनिवार्य है।







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