UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 PDF (Code 301 DD) is available for download here. The Hindi exam was conducted on February 22, 2024 in the Evening Shift from 2 PM to 5:15 PM. The total marks for the theory paper are 100. Students reported the paper to be easy to moderate.

UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 (Code 301 DD) with Solutions

UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 PDF UP Board Class 12 Hindi Solutions 2024 PDF
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Question 1:

निम्न में से कृति एवं कृतिकार का एक गलत युग्म है :

  • (A) 'प्रेमसागर' - लल्लूलाल
  • (B) 'नासिकेतोपाख्यान' - सदल मिश्र
  • (C) 'चंद छन्द बरनन की महिमा' - किशोरीलाल गोस्वामी
  • (D) 'भाषा योगवाशिष्ठ' - रामप्रसाद 'निरंजनी'
Correct Answer: (C) 'चंद छन्द बरनन की महिमा' - किशोरीलाल गोस्वामी
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'चंद छन्द बरनन की महिमा' काव्य कृति किशोरीलाल गोस्वामी द्वारा नहीं, बल्कि आचार्य शुक्ल द्वारा रचित है। अन्य विकल्पों में दिए गए कृतिकार सही हैं।


Question 2:

गुलाब राय प्रमुख निबन्धकार हैं :

  • (A) 'द्विवेदी-युग' के
  • (B) 'शुक्ल-युग' के
  • (C) 'शुक्लोत्तर-युग' के
  • (D) 'स्वातन्त्र्योत्तर युग' के
Correct Answer: (C) 'शुक्लोत्तर-युग' के
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गुलाब राय शुक्लोत्तर-युग के प्रमुख निबंधकार थे, जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद के समय में साहित्य सृजन कर रहे थे। उनके निबंध सामाजिक और साहित्यिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।


Question 3:

जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित उपन्यास है :

  • (A) 'त्यागपत्र'
  • (B) 'ऋतुचक्र'
  • (C) 'परती परिकथा'
  • (D) 'चारुचन्द्र लेख'
Correct Answer: (C) 'परती परिकथा'
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'परती परिकथा' जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित उपन्यास है, जो उनके साहित्यिक योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह उपन्यास मानव जीवन के जटिल पहलुओं को दर्शाता है।


Question 4:

डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का निबन्ध संग्रह है :

  • (A) 'साहित्य सहचर'
  • (B) 'पुनर्नवा'
  • (C) 'सहज साधना'
  • (D) 'विचार और वितर्क'
Correct Answer: (B) 'पुनर्नवा'
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डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का निबन्ध संग्रह 'पुनर्नवा' है, जो उनके विचार और साहित्यिक दृष्टिकोण को उजागर करता है। अन्य विकल्पों में दिए गए नाम उनके अन्य कार्यों से संबंधित हैं।


Question 5:

'डायरी' विधा की रचना नहीं है :

  • (A) 'ज्यादा अपनी कम पराई'
  • (B) 'निठल्ले की डायरी'
  • (C) 'एक साहित्यिक की डायरी'
  • (D) 'रोजनामचा'
Correct Answer: (D) 'रोजनामचा'
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'रोजनामचा' एक प्रकार की डायरी नहीं है, बल्कि यह एक काव्यात्मक रचनात्मकता के रूप में प्रस्तुत होता है। अन्य विकल्पों में दिए गए सभी नाम 'डायरी' विधा के अंतर्गत आते हैं।


Question 6:

निम्न में से प्रगतिवादी कवि नहीं हैं :

  • (A) गजानन माधव मुक्तिबोध
  • (B) केदारनाथ अग्रवाल
  • (C) गिरिजाकुमार माथुर
  • (D) त्रिलोचन शास्त्री
Correct Answer: (C) गिरिजाकुमार माथुर
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गिरिजाकुमार माथुर प्रगतिवादी कवि नहीं थे। वे हिंदी साहित्य में अपने अलग काव्य शिल्प और भावनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन प्रगतिवाद से उनका संबंध नहीं था।


Question 7:

प्रयोगवादी कवियों को 'राहों का अन्वेषी' कहा है :

  • (A) नामवर सिंह ने
  • (B) रामविलास शर्मा ने
  • (C) रामचन्द्र शुक्ल ने
  • (D) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने
Correct Answer: (D) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने
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प्रयोगवादी कवियों को 'राहों का अन्वेषी' सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने कहा था। यह उपमा प्रयोगवाद के कवियों के नए विचार और नई दिशाओं की खोज को दर्शाती है।


Question 8:

जयशंकर प्रसाद की प्रथम काव्यकृति है :

  • (A) 'कामायनी'
  • (B) 'लहर'
  • (C) 'आँसू'
  • (D) 'चित्राधार'
Correct Answer: (B) 'लहर'
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जयशंकर प्रसाद की प्रथम काव्यकृति 'लहर' है। यह काव्यकृति उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत थी और इसके बाद उन्होंने 'कामायनी' जैसी अमर काव्य कृतियाँ लिखीं।


Question 9:

निम्न में से 'दूसरा सप्तक' में प्रकाशित कवि हैं :

  • (A) गिरिजाकुमार माथुर
  • (B) धर्मवीर भारती
  • (C) सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
  • (D) नेमिचन्द्र जैन
Correct Answer: (B) धर्मवीर भारती
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'दूसरा सप्तक' में धर्मवीर भारती का नाम शामिल है। इस काव्य संग्रह में हिंदी कविता की प्रयोगवादी धारा को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।


Question 10:

सुमित्रानंदन पन्त को 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार मिला था :

  • (A) 'चिदम्बरा' पर
  • (B) 'लोकायतन' पर
  • (C) 'कला और बूढ़ा चाँद' पर
  • (D) 'युगवाणी' पर
Correct Answer: (C) 'कला और बूढ़ा चाँद' पर
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सुमित्रानंदन पन्त को 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार 'कला और बूढ़ा चाँद' काव्यकृति पर मिला था। यह काव्यकृति उनकी साहित्यिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है । मनुष्यों ने युगों-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबंधमात्र है, संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है । संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि संभव है । राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है । यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिये जायँ तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए। जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है ।

Question 11:

राष्ट्र की वृद्धि कैसे संभव है ?

Correct Answer:
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राष्ट्र की वृद्धि संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा संभव है। संस्कृति के विकास के साथ-साथ राष्ट्र का विकास होता है। जब जन की संस्कृति का अभ्युदय होता है, तो राष्ट्र में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि आती है, जिससे राष्ट्र की वृद्धि सुनिश्चित होती है।


Question 12:

किसी राष्ट्र का लोप कब समझना चाहिए ?

Correct Answer:
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जब भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित हो जाते हैं, तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए। संस्कृति के बिना राष्ट्र का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यह राष्ट्र के सामाजिक और सांस्कृतिक रूप को समाप्त करने के समान है।


Question 13:

संस्कृति क्या है ?

Correct Answer:
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संस्कृति वह सभ्यता है जो मनुष्यों ने अपनी आवश्यकताओं, सोच और आदतों को पूर्ण करने के लिए विकसित की है। यह जीवन के तरीके, विश्वासों, कला, भाषा, धर्म और अन्य सामाजिक पहलुओं का संग्रह होती है। संस्कृति ही समाज की पहचान और उसकी उन्नति का आधार है।


Question 14:

उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।

Correct Answer:
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उपर्युक्त गद्यांश का पाठ "राष्ट्र का विकास और संस्कृति" है। इस गद्यांश के लेखक का नाम "डॉ. रामविलास शर्मा" है।


Question 15:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

Correct Answer:
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रेखांकित अंश में यह कहा गया है कि जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है, अर्थात संस्कृति ही जीवन की सबसे सुंदर और महत्वपूर्ण तत्व है। संस्कृति के बिना राष्ट्र और समाज का अस्तित्व नहीं हो सकता। यह अंश हमें यह समझाता है कि संस्कृति ही राष्ट्र का जीवन है।


अथवा:

रवीन्द्रनाथ ने इस भारतवर्ष को 'महामानव समुद्र' कहा है । विचित्र देश है यह ! असुर आये, - न जाने कितनी मानव-जातियाँ आये, शक आये, हूण आये, नाग आये, यक्ष आये, गंधर्व आये यहाँ आयीं और आज के भारतवर्ष को बनाने में अपना हाथ लगा गयीं। जिसे हम हिन्दू रीति-नीति कहते हैं, वह अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का मिश्रण है। एक-एक पशु, एक-एक पक्षी न जाने कितनी स्मृतियों का भार लेकर हमारे सामने उपस्थित हैं । अशोक की भी अपनी स्मृति - परम्परा है । आम की भी, बकुल की भी, चंपे की भी । सब क्या हमें मालूम है ? जितना मालूम है, उसी का अर्थ क्या स्पष्ट हो सका है ?

Question 16:

किसने किसको 'महामानव समुद्र' कहा है ?

Correct Answer:
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रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतवर्ष को 'महामानव समुद्र' कहा है। वह इसे एक विशाल और असीमित समुद्र के समान मानते हैं, जिसमें अनेक संस्कृतियाँ और जातियाँ सम्मिलित हैं।


Question 17:

आज के भारतवर्ष के निर्माण में किनका सहयोग रहा है ?

Correct Answer:
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आज के भारतवर्ष के निर्माण में असुर, शक, हूण, नाग, यक्ष, गंधर्व और अन्य अनेक मानव जातियों का सहयोग रहा है। इन विभिन्न जातियों ने मिलकर भारत की संस्कृति और पहचान को आकार दिया।


Question 18:

'उपादान' और 'बकुल' शब्दों के अर्थ लिखिए ।

Correct Answer:
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- उपादान: यह शब्द 'संसाधन' या 'सामग्री' के अर्थ में आता है, जो किसी चीज़ के निर्माण या उत्पत्ति में योगदान देता है।
- बकुल: यह एक प्रकार का पेड़ है, जिसे बकुल का वृक्ष कहा जाता है, जो सुगंधित फूलों के लिए प्रसिद्ध है।


Question 19:

उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।

Correct Answer:
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उपर्युक्त गद्यांश का पाठ "भारतवर्ष की विविधता" है। इस गद्यांश के लेखक का नाम "रवीन्द्रनाथ ठाकुर" (रवींद्रनाथ ठाकुर) है।


Question 20:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

Correct Answer:
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रेखांकित अंश में यह कहा गया है कि भारतवर्ष में अनेकों जातियाँ, संस्कृतियाँ, और परंपराएँ आकर मिश्रित हुई हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह स्पष्ट किया है कि हमारी संस्कृति का निर्माण कई संस्कृतियों और जातियों के सहयोग से हुआ है, जिसमें हर तत्व का योगदान महत्वपूर्ण है। इस दृष्टिकोण से भारत एक ऐसा समुद्र है जिसमें विभिन्न संस्कृतियाँ एक साथ मिलकर उसका निर्माण करती हैं।


निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए: \\
लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आये ।\\
होने देना विकृत वसना तो न तू सुंदरी को ।\\
जो थोड़ी भी श्रमित वह हो गोद ले श्रांति खोना ।\\
होठों की औ कमल मुख की म्लानताएँ मिटाना ।।\\
कोई क्लान्ता कृषक-ललना खेत में जो दिखावै । \\
धीरे-धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना ।\\
जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला । \\
छाया द्वारा सुखित करना, तप्त भूतांगना को ।।

Question 21:

'लज्जाशीला' शब्द किसके लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त है ?

Correct Answer:
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'लज्जाशीला' शब्द पथिक महिला के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है। यह शब्द उस स्त्री की विशेषता को दर्शाता है जो लज्जाशील है और अपने मार्ग पर चल रही है।


Question 22:

वियोगिनी राधा 'पवन दूतिका' से किसकी क्लान्तियों को मिटाने का निवेदन करती हैं ?

Correct Answer:
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वियोगिनी राधा 'पवन दूतिका' से कृषक-ललनाओं की क्लान्ति को मिटाने का निवेदन करती हैं। वे चाहती हैं कि किसान की परिश्रांत पत्नी की थकान को दूर किया जाए, जिससे उसे सुखद अनुभूति हो।


Question 23:

'विकृत-वसना' शब्द का अर्थ लिखिए तथा 'कमल-मुख' में अलंकार निरूपित कीजिए ।

Correct Answer:
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- 'विकृत-वसना' शब्द का अर्थ: फटे-पुराने और जीर्ण वस्त्रों में लिपटी हुई स्त्री।

- 'कमल-मुख' में अलंकार: 'कमल-मुख' में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है, जहाँ मुख की उपमा कमल से दी गई है, जिससे सौंदर्य और कोमलता का बोध होता है।


Question 24:

उपर्युक्त पद्यांश के पाठ और रचयिता का नाम लिखिए ।

Correct Answer:
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उपर्युक्त पद्यांश का पाठ 'वियोगिनी राधा का वात्सल्य' है और इसके रचयिता 'सूरदास' हैं।


Question 25:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

Correct Answer:
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रेखांकित अंश में कवि यह दर्शाते हैं कि वियोगिनी राधा 'पवन दूतिका' से संसार के क्लांत, श्रमशील और दुखी प्राणियों को सुख देने का निवेदन करती हैं।
वे चाहती हैं कि वायु सभी के श्रम को हर ले और उन्हें ताजगी तथा स्फूर्ति प्रदान करे। यह करुणा और संवेदना की भावना को प्रकट करता है।


अथवा:

सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं, \\
काँपता है कुंडली मारे समय का व्याल,\\
मेरी बाँह में मारुत, गरुड़, गजराज का बल है \\
मर्त्य मानब की विजय का तूर्य हूँ मैं, \\
उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूँ मैं । \\
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ\\
बादलों के सीस पर स्यंदन चलाता हूँ ।

Question 26:

किसके सामने 'समय का व्याल' काँप जाता है ?

Correct Answer:
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'समय का व्याल' उस व्यक्ति के सामने काँप जाता है, जो अदम्य साहस, पराक्रम और शक्ति का प्रतीक है। पद्यांश में कवि ने व्यक्ति के आत्मबल और दृढ़ निश्चय को दर्शाया है, जिसके सामने समय की कठिनाइयाँ और विपरीत परिस्थितियाँ भी हार मान लेती हैं।


Question 27:

उपर्युक्त पद्यांश के पाठ और रचयिता का नाम लिखिए ।

Correct Answer:
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उपर्युक्त पद्यांश 'उर्वशी' नामक काव्य से लिया गया है, जिसके रचयिता रामधारी सिंह 'दिनकर' हैं। इस काव्य में वीरता, आत्मगौरव और मानव की शक्ति का चित्रण किया गया है।


Question 28:

'वनराज' और 'स्पंदन' शब्दों के अर्थ लिखिए ।

Correct Answer:
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- वनराज: इसका अर्थ 'जंगल का राजा' अर्थात 'सिंह' होता है। यह शब्द शौर्य और शक्ति का प्रतीक है।
- स्पंदन: इसका अर्थ 'हलचल' या 'कंपन' होता है, जो किसी भाव या स्थिति में गति या परिवर्तन को दर्शाता है।


Question 29:

'अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ' - इसका आशय स्पष्ट कीजिए ।

Correct Answer:
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इस पंक्ति का आशय यह है कि कवि स्वयं अज्ञान और अंधकार के विरुद्ध प्रकाश और सत्य का प्रतीक बनकर खड़ा है। 'अंध तम' अज्ञानता, अन्याय और बाधाओं का प्रतीक है, जबकि 'पावक जलाना' सत्य और ज्ञान का प्रसार करना दर्शाता है। कवि यह कहना चाहते हैं कि वे अपने समय में सत्य और प्रकाश को स्थापित करने के लिए संकल्पित हैं।


Question 30:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

Correct Answer:
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रेखांकित अंश में कवि ने वीरता, आत्मगौरव और आत्मबल का गुणगान किया है। कवि स्वयं को अजेय और अपने समय का सूर्य मानते हैं, जो समाज में प्रकाश और ऊर्जा का संचार करता है। यह पंक्तियाँ मानव की शक्ति और संघर्षशीलता को दर्शाती हैं, जो हर विपत्ति को मात देकर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देती हैं।


निम्नलिखित में से किसी एक लेखक का जीवन परिचय देते हुए उनकी भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए: ( अधिकतम शब्द सीमा 80 शब्द )

Question 31:

कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' का जीवन परिचय एवं भाषा-शैली।

Correct Answer:
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कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' का जन्म 1906 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार, विचारक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका लेखन भारतीय संस्कृति, समाज सुधार और राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत था। उनकी रचनाओं में देशभक्ति, नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्थान की झलक मिलती है।

उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में फैली बुराइयों पर प्रहार किया और जनमानस को नैतिकता, ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता का संदेश दिया। उनकी भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और भावनाओं से भरपूर थी। वे व्यंग्य और प्रेरणादायक शैली के लिए प्रसिद्ध थे, जिससे उनकी रचनाएँ पाठकों के हृदय को गहराई तक प्रभावित करती थीं।

उनकी प्रसिद्ध कृतियों में 'कलम के चमत्कार', 'मानवता की धरोहर', 'हम कहाँ जा रहे हैं' आदि शामिल हैं। उनके निबंधों में समाज के प्रति जागरूकता और भारतीय संस्कृति का गौरव झलकता है। वे हिंदी भाषा के समर्थक थे और जीवनभर उसके प्रचार-प्रसार में जुटे रहे। उनके साहित्य ने समाज और राष्ट्र को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


Question 32:

प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी का जीवन परिचय एवं भाषा-शैली।

Correct Answer:
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प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी का जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। वे एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, हिंदी भाषा के विद्वान और साहित्यकार थे। उन्होंने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे दक्षिण भारत में हिंदी साहित्य को लोकप्रिय बनाने वाले प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे।

उनका लेखन सटीक, प्रभावशाली और तर्कपूर्ण था। उनकी भाषा-शैली में शुद्ध हिंदी व्याकरण का अनुपालन मिलता है। उनके लेखन में तर्कशीलता, गहन अध्ययन और बौद्धिक चिंतन की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे हिंदी भाषा की समृद्धि के लिए आजीवन समर्पित रहे और उन्होंने इसके व्याकरण, साहित्य और प्रयोग पर महत्वपूर्ण कार्य किए।

उनकी प्रमुख कृतियों में 'हिंदी साहित्य का विकास', 'भाषा और संस्कृति', तथा 'भारतीय साहित्य में हिंदी का योगदान' आदि शामिल हैं। उन्होंने हिंदी भाषा को दक्षिण भारत में एक सशक्त पहचान दिलाने का कार्य किया। उनके साहित्य में तार्किकता, गहन शोध और समाजोपयोगी विषयों की प्रधानता थी। हिंदी के प्रचार में उनके योगदान को सदैव याद किया जाएगा।


Question 33:

जैनेन्द्र कुमार का जीवन परिचय एवं भाषा-शैली।

Correct Answer:
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जैनेन्द्र कुमार का जन्म 1905 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हुआ था। वे हिंदी साहित्य में मनोवैज्ञानिक कथा-शैली के प्रमुख रचनाकार थे। उन्होंने हिंदी उपन्यासों में एक नई धारा का प्रवाह किया, जिसमें पात्रों की आंतरिक मनःस्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया गया। वे गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे और उनकी रचनाएँ मानव मन के गहरे पहलुओं को उजागर करती हैं।

उनकी भाषा सहज, भावनात्मक और विचारप्रधान थी। उन्होंने हिंदी साहित्य में नई कहानियों की प्रवृत्ति को जन्म दिया, जिसमें आदर्शवाद, आत्मविश्लेषण और व्यक्तित्व के अंतर्द्वंद्व का विशेष महत्व था। उनकी शैली अत्यंत संवेदनशील थी और उनके पात्र जीवन के यथार्थ को दर्शाते थे।

उनकी प्रमुख रचनाओं में 'त्यागपत्र', 'सुनीता', 'परख', और 'सुखदा' शामिल हैं। उनके उपन्यास और कहानियाँ समाज में संवेदनशीलता और आत्मविश्लेषण को बढ़ावा देने के लिए लिखी गई थीं। वे केवल बाह्य घटनाओं का चित्रण नहीं करते थे, बल्कि पात्रों के मनोभावों का गहन अध्ययन भी प्रस्तुत करते थे। हिंदी साहित्य में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।


निम्नलिखित में से किसी एक कवि का जीवन परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए: ( अधिकतम शब्द - सीमा 80 शब्द )

Question 34:

जगन्नाथदास 'रत्नाकर' का जीवन परिचय एवं उनकी कृतियाँ।

Correct Answer:
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जगन्नाथदास 'रत्नाकर' का जन्म 17वीं शताब्दी में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध रीतिकालीन कवि थे। उनकी रचनाएँ मुख्य रूप से भक्ति और नायक-नायिका भेद पर आधारित थीं। वे अपनी कविता में श्रृंगार रस के उत्कृष्ट चित्रण के लिए प्रसिद्ध थे।

उनकी प्रमुख कृतियों में 'उषा-स्वप्न', 'रत्नाकर महाकाव्य', 'हरिश्चंद्रिका', और 'श्रृंगार-मंजरी' शामिल हैं। उनकी कविता में कोमलता, कल्पनाशीलता और अलंकारों की विशेषता देखने को मिलती है।


Question 35:

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का जीवन परिचय एवं उनकी कृतियाँ।

Correct Answer:
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सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का जन्म 1896 में बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुआ था। वे हिंदी के महान कवि, उपन्यासकार और निबंधकार थे। उनकी कविता में ओज, विद्रोह, करुणा और प्रकृति प्रेम की अद्भुत झलक मिलती है। वे छायावादी युग के प्रमुख कवि थे, जिन्होंने काव्य भाषा को नया स्वरूप दिया।

उनकी प्रमुख कृतियों में 'राम की शक्ति पूजा', 'सरोज स्मृति', 'वह तोड़ती पत्थर', 'परिमल', तथा 'कुल्ली भाट' शामिल हैं। उन्होंने समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण के विरुद्ध अपनी लेखनी चलाई और हिंदी साहित्य को नई दिशा दी।


Question 36:

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जीवन परिचय एवं उनकी कृतियाँ।

Correct Answer:
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सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जन्म 1911 में उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक माने जाते हैं। उनकी काव्य रचनाओं में आधुनिकता, आत्मविश्लेषण और गहरी संवेदनशीलता का समावेश मिलता है।

उनकी प्रमुख कृतियों में 'भग्नदूत', 'अरी ओ करुणा प्रभामय', 'सागरमुद्रा', 'आँगन के पार द्वार', और 'असाध्य वीणा' शामिल हैं। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास और निबंधों में नए प्रयोग किए और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।


Question 37:

'लाटी' कहानी के आधार पर उसके प्रमुख पात्र का चरित्र चित्रण कीजिए।( अधिकतम शब्द - सीमा 80 शब्द )

Correct Answer:
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'लाटी' कहानी का प्रमुख पात्र एक आदर्श और संघर्षशील व्यक्ति है। वह गरीब है, लेकिन उसका आत्मविश्वास, साहस और ईमानदारी उसे विशेष बनाते हैं। उसकी पूरी जीवन यात्रा कठिनाइयों से भरी हुई है, फिर भी वह कभी हार नहीं मानता। लाटी का चरित्र हमें सिखाता है कि जीवन में अगर संघर्ष सच्चे उद्देश्य के लिए किया जाए, तो उसे किसी भी स्थिति में सफलता मिल सकती है। वह अपने परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने में पूरी तरह से समर्पित है, और उसकी मेहनत और ईमानदारी की कोई सीमा नहीं है। अपने आस-पास के समाज के लिए उसकी निष्ठा और सेवा का भाव उसे एक आदर्श व्यक्ति बनाता है। लाटी का चरित्र समाज में व्याप्त असमानताओं और कठिनाइयों के बावजूद आदर्श जीवन जीने का एक प्रतीक बनकर उभरता है।


इसके अलावा, लाटी का मानसिक बल और धैर्य उसे हर विपरीत परिस्थिति में सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है। उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने सपनों को सच करने के लिए लगातार प्रयास करता है, चाहे उसकी राह में कितनी भी बाधाएं क्यों न हों। लाटी का आदर्श न केवल व्यक्तिगत संघर्षों के बारे में है, बल्कि यह समाज में सुधार लाने की उसकी क्षमता को भी दर्शाता है। वह न केवल अपने लिए, बल्कि दूसरों के लिए भी एक प्रेरणा स्रोत बनता है। उसकी साधारणता में ही एक महानता है, और वह हमें यह सिखाता है कि सफलता केवल भौतिक संपत्ति से नहीं, बल्कि आत्मिक समृद्धि और समाज के प्रति जिम्मेदारी से आती है।


अथवा

Question 38:

'बहादुर' अथवा 'कर्मनाशा की हार' कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।( अधिकतम शब्द-सीमा 80 शब्द )

Correct Answer:
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'बहादुर' कहानी का उद्देश्य समाज में व्याप्त भेदभाव और जातिगत अन्याय को उजागर करना है। यह कहानी सामाजिक असमानता और निचले तबके के लोगों के संघर्ष को दर्शाती है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि निचले वर्ग के लोगों को केवल उनकी जाति या आर्थिक स्थिति के कारण कमतर नहीं आँका जाना चाहिए, बल्कि उनके साहस और ईमानदारी को भी मान्यता मिलनी चाहिए। यह कहानी सामाजिक सुधार की प्रेरणा देती है और समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रश्न उठाती है।

वहीं, 'कर्मनाशा की हार' कहानी मानवीय चेतना और संकल्प शक्ति को रेखांकित करती है। यह कहानी बताती है कि यदि मनुष्य में आत्मबल और सकारात्मक दृष्टिकोण हो, तो वह किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर सकता है। यह कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय की भी है, जो यह सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर मनुष्य में आत्मबल हो तो वह हर बाधा को पार कर सकता है।

दोनों कहानियाँ समाज को जागरूक करने और न्याय की भावना विकसित करने का संदेश देती हैं। ये कहानियाँ न केवल सामाजिक असमानताओं पर चोट करती हैं, बल्कि पाठकों को प्रेरित करती हैं कि वे अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाएँ। लेखक ने इन कहानियों के माध्यम से समाज में सुधार लाने का प्रयास किया है और यह संदेश दिया है कि सच्चा साहस और आत्मबल ही मनुष्य को विजयी बनाता है।


Question 39:

'रश्मिरथी' खण्डकाव्य के आधार पर 'अर्जुन' का चरित्र-चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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'रश्मिरथी' खण्डकाव्य में अर्जुन का चरित्र एक महान धनुर्धर, कर्तव्यनिष्ठ योद्धा और धर्म के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अर्जुन केवल अपनी युद्ध-कला और वीरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी नैतिकता और धर्म के प्रति अडिग विश्वास के लिए भी प्रसिद्ध है।


अर्जुन की वीरता और धनुर्विद्या: अर्जुन एक महान धनुर्धर था, जिसने अपनी शिक्षा गुरु द्रोणाचार्य से प्राप्त की। वह अद्वितीय युद्ध-कौशल और अपार शक्ति का स्वामी था।
अर्जुन का धर्म और कर्तव्य-बोध: अर्जुन सदैव धर्म और न्याय के मार्ग पर चलता है। महाभारत के युद्ध में उसने अधर्म के विरुद्ध युद्ध किया और अपनी नैतिकता को सर्वोपरि रखा।
कर्ण और अर्जुन का संघर्ष: 'रश्मिरथी' में कर्ण और अर्जुन के मध्य युद्ध केवल भौतिक शक्ति का नहीं, बल्कि उनके चरित्रों और आदर्शों का भी संघर्ष है। अर्जुन को श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन प्राप्त था, जिससे वह विजयी हुआ।
अर्जुन की मानसिक दशा: महाभारत के युद्ध से पहले अर्जुन मानसिक रूप से विचलित हो जाता है, लेकिन श्रीकृष्ण के गीता उपदेश से वह अपने कर्तव्य को समझता है और धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करता है।


अर्जुन केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक ऐसा पात्र है जो संघर्षों के बीच भी अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करता है। वह वीरता, धैर्य और आत्मसंयम का प्रतीक है।


अथवा

Question 40:

'रश्मिरथी' खण्डकाव्य के 'पंचम सर्ग' की घटना का उल्लेख कीजिए।

Correct Answer:
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'रश्मिरथी' के पंचम सर्ग में कर्ण और श्रीकृष्ण के बीच संवाद का मार्मिक चित्रण किया गया है। इस सर्ग में महाभारत युद्ध की पृष्ठभूमि में श्रीकृष्ण कर्ण को पांडव पक्ष में आने का आग्रह करते हैं और उसे उसकी वास्तविक पहचान बताकर उसे कौरवों का साथ छोड़ने के लिए प्रेरित करने का प्रयास करते हैं।


कृष्ण द्वारा कर्ण को पहचान का रहस्य बताना: श्रीकृष्ण कर्ण को बताते हैं कि वह कुंती का पुत्र और पांडवों का ज्येष्ठ भ्राता है, अतः उसका स्थान पांडवों के साथ होना चाहिए।
कर्ण का अस्वीकार और दानवीरता: कर्ण अपनी मित्रता और वचनबद्धता के कारण दुर्योधन का साथ छोड़ने से इनकार कर देता है। वह स्वयं को कौरवों का ऋणी मानता है और किसी भी परिस्थिति में अपना वचन नहीं तोड़ता।
कर्ण की महानता और निष्ठा: कर्ण श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को ठुकराते हुए अपने धर्म को मित्रता और कर्तव्य के रूप में स्वीकार करता है। यह सर्ग कर्ण की दानवीरता, त्याग और आत्मसम्मान को दर्शाता है।
कृष्ण द्वारा कर्ण को आशीर्वाद: कर्ण के अडिग निश्चय को देखकर श्रीकृष्ण उसकी निष्ठा और बलिदान की सराहना करते हैं और उसे एक महान योद्धा के रूप में स्वीकार करते हैं।


पंचम सर्ग कर्ण के चरित्र की महानता को उजागर करता है और यह दिखाता है कि कर्ण परिस्थितियों के बावजूद अपने सिद्धांतों से कभी विचलित नहीं होता। यह सर्ग मित्रता, कर्तव्य और बलिदान की भावना का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।


Question 41:

'त्यागपथी' खण्डकाव्य के आधार पर 'राज्यश्री' का चरित्रांकन कीजिए।

Correct Answer:
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'त्यागपथी' खण्डकाव्य में राज्यश्री का चरित्र नारी शक्ति, त्याग और धैर्य का प्रतीक है। वह केवल एक राजकुमारी नहीं, बल्कि एक संघर्षशील, धैर्यवान और आदर्शवादी महिला के रूप में प्रस्तुत की गई हैं।


राज्यश्री का जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि: वह एक राजकुमारी होते हुए भी अपने जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करती हैं और धैर्यपूर्वक उनका समाधान खोजती हैं।
संघर्ष और आत्मनिर्भरता: राज्यश्री का जीवन केवल ऐश्वर्य में नहीं बीता, बल्कि उन्होंने अपने संघर्षों से जीवन को एक नई दिशा दी। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मनिर्भरता का परिचय दिया।
त्याग और नारी सशक्तिकरण: वह केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज और धर्म के लिए भी त्याग करने को तत्पर रहती हैं। उनका चरित्र नारी सशक्तिकरण का एक प्रेरणास्रोत है।
राज्यश्री का प्रेरणादायक व्यक्तित्व: उनकी सहनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और समाज के प्रति समर्पण उन्हें एक आदर्श नारी के रूप में प्रस्तुत करता है।


राज्यश्री का चरित्र त्याग, साहस और आत्मसम्मान का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि कठिनाइयों के बावजूद सच्ची नारी शक्ति कैसे आत्मनिर्भरता और दृढ़ संकल्प से विजय प्राप्त कर सकती है।


अथवा

Question 42:

'त्यागपथी' खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।

Correct Answer:
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'त्यागपथी' खण्डकाव्य में अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित होती हैं, जो न केवल नायक-नायिका के चरित्र को उभारती हैं, बल्कि समाज और धर्म की गहरी सीख भी देती हैं।


संघर्ष और आत्म-त्याग की शुरुआत: खण्डकाव्य की प्रारंभिक घटनाएँ नायक के संघर्ष और त्याग की भावना को उजागर करती हैं, जहाँ वह व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और धर्म के लिए समर्पित होता है।
राज्यश्री की जीवन-यात्रा: राज्यश्री का संघर्ष, उनकी कठिनाइयाँ और आत्मनिर्भरता इस खण्डकाव्य की एक महत्वपूर्ण धारा को दर्शाते हैं।
नैतिकता और धर्म का संदेश: विभिन्न घटनाओं के माध्यम से यह खण्डकाव्य धर्म, न्याय और मानव मूल्यों को महत्व देने की प्रेरणा देता है।
त्याग और बलिदान का चरमोत्कर्ष: खण्डकाव्य के अंत में त्याग की पराकाष्ठा दिखाई देती है, जहाँ नायक और राज्यश्री अपने सिद्धांतों के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने के लिए तत्पर रहते हैं।


'त्यागपथी' खण्डकाव्य की घटनाएँ व्यक्ति के चरित्र निर्माण, नारी शक्ति, आत्म-त्याग और समाजहित के लिए समर्पण की भावना को उजागर करती हैं।


Question 43:

'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य के आधार पर 'श्रवणकुमार' का चरित्र-चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य में श्रवणकुमार का चरित्र आदर्श पुत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह अपनी निःस्वार्थ भक्ति, सेवा और कर्तव्यपरायणता के लिए प्रसिद्ध है।


श्रवणकुमार की आज्ञाकारिता: श्रवणकुमार अपने माता-पिता की सेवा को ही अपना सबसे बड़ा धर्म मानते थे। उन्होंने अपने जीवन को पूरी तरह से अपने माता-पिता की देखभाल के लिए समर्पित कर दिया था।
त्याग और निःस्वार्थ प्रेम: श्रवणकुमार ने अपने माता-पिता की हर इच्छा पूरी करने के लिए कठिनाइयों का सामना किया। उनका जीवन निःस्वार्थ प्रेम और सेवा का प्रतीक है।
संघर्ष और बलिदान: जंगल में अपने अंधे माता-पिता के लिए जल लाने के दौरान राजा दशरथ के बाण से घायल होकर उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद उनके माता-पिता ने भी प्राण त्याग दिए, जो उनके प्रति उनकी अटूट भक्ति को दर्शाता है।
श्रवणकुमार की प्रेरणा: उनका चरित्र भारतीय संस्कृति में आदर्श पुत्र के रूप में स्थापित है, जो आज भी माता-पिता की सेवा और कर्तव्यपालन की प्रेरणा देता है।


श्रवणकुमार का जीवन त्याग, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो हमें अपने माता-पिता के प्रति स्नेह और सम्मान की भावना रखने की सीख देता है।


अथवा

Question 44:

'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।

Correct Answer:
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'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य भारतीय संस्कृति में पुत्र धर्म, सेवा और त्याग के महत्व को दर्शाने वाला एक प्रेरणादायक काव्य है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


आदर्श पुत्र की कथा: इस खण्डकाव्य में श्रवणकुमार को एक आदर्श पुत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसने अपने माता-पिता की सेवा को जीवन का उद्देश्य बना लिया था।
संवेदनशीलता और करुणा: यह काव्य पाठकों में करुणा उत्पन्न करता है और पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का कार्य करता है।
नैतिक शिक्षा: यह काव्य नैतिकता, कर्तव्यनिष्ठा और त्याग की शिक्षा देता है, जिससे समाज में सच्चे मूल्यों की स्थापना होती है।
सरल एवं प्रभावी भाषा: इसमें भाषा सरल, काव्यात्मक और प्रवाहमयी है, जिससे पाठक इसकी गहन भावना को सहजता से समझ सकते हैं।
मानवीय संवेदनाओं का चित्रण: इसमें पुत्र का माता-पिता के प्रति प्रेम, सेवा और बलिदान का हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है, जो हर युग में प्रासंगिक बना रहता है।


'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक संदेश है, जो हमें सिखाता है कि माता-पिता की सेवा और त्याग ही सच्चा धर्म है।


Question 45:

'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाएँ लिखिए।

Correct Answer:
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'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य एक प्रेरणादायक रचना है, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम, बलिदान और राष्ट्रीय भावना का उत्कृष्ट चित्रण किया गया है। इसकी प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं:


स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि: यह खण्डकाव्य भारत के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित घटनाओं पर आधारित है, जिसमें नायक के संघर्ष और बलिदान को दर्शाया गया है।
नायक की देशभक्ति: नायक अपने देश के लिए आत्मबलिदान करने के लिए संकल्पित होता है और स्वतंत्रता की भावना को सर्वोच्च मानता है।
त्याग और संघर्ष: काव्य में नायक के संघर्षों का उल्लेख मिलता है, जिसमें वह देशहित में व्यक्तिगत सुख-आराम को त्याग कर स्वतंत्रता के लिए लड़ता है।
बलिदान और प्रेरणा: खण्डकाव्य के अंत में नायक राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाते हुए बलिदान देता है, जिससे पाठकों को प्रेरणा मिलती है।


'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य देशभक्ति, त्याग और संघर्ष की भावना को उजागर करता है और पाठकों को स्वतंत्रता के मूल्य का एहसास कराता है।


अथवा

Question 46:

'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।

Correct Answer:
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'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य के नायक का चरित्र त्याग, देशभक्ति और वीरता का प्रतीक है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


देशभक्त और वीर: नायक राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर रहता है और अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानता है।
त्याग और समर्पण: वह अपने व्यक्तिगत जीवन के सुखों को त्यागकर मातृभूमि की सेवा में स्वयं को समर्पित कर देता है।
संघर्षशील और दृढ़ संकल्पी: नायक कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से नहीं भटकता और सच्चे हृदय से अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयास करता है।
प्रेरणादायक व्यक्तित्व: नायक का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनता है और स्वतंत्रता संग्राम की भावना को जागरूक करता है।


'मुक्तियज्ञ' का नायक केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है, जो राष्ट्र प्रेम और कर्तव्यपरायणता का आदर्श प्रस्तुत करता है।


Question 47:

'सत्य की जीत' खण्डकाव्य के आधार पर उसकी नायिका का चरित्र-चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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'सत्य की जीत' खण्डकाव्य में नायिका का चरित्र साहस, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता का प्रतीक है। वह केवल एक साधारण नारी नहीं, बल्कि संघर्षशील और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने वाली आदर्श महिला के रूप में चित्रित की गई है।


सत्य और न्याय की समर्थक: नायिका सदैव सत्य और न्याय का समर्थन करती है, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों। वह अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करती।
संघर्षशील और दृढ़ निश्चयी: समाज और परिस्थितियाँ उसके मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करती हैं, लेकिन वह धैर्य और साहस के साथ उनका सामना करती है।
कर्तव्यनिष्ठ और त्यागमयी: नायिका अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा के साथ निभाती है। वह समाज के कल्याण के लिए व्यक्तिगत सुखों का त्याग करने को भी तत्पर रहती है।
प्रेरणादायक व्यक्तित्व: नायिका का चरित्र पाठकों को सिखाता है कि सत्य की राह पर चलने वाले व्यक्ति को अंततः विजय प्राप्त होती है, भले ही उसे संघर्षों का सामना करना पड़े।


यह नायिका केवल कथा का पात्र नहीं, बल्कि सत्य और साहस का जीवंत उदाहरण है, जो समाज को नैतिकता और कर्तव्यपरायणता की सीख देती है।


अथवा

Question 48:

'सत्य की जीत' खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।

Correct Answer:
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'सत्य की जीत' खण्डकाव्य सत्य, संघर्ष और नैतिक मूल्यों की महत्ता को दर्शाने वाला प्रेरणादायक ग्रंथ है। इसकी प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं:


नायिका का संघर्ष: खण्डकाव्य की शुरुआत में नायिका कठिन परिस्थितियों का सामना करती है, लेकिन सत्य और न्याय की राह पर अडिग रहती है।
अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष: नायिका अन्याय और अधर्म के विरुद्ध आवाज उठाती है, जिससे समाज में हलचल मच जाती है।
नैतिक मूल्यों की परीक्षा: कई कठिन परिस्थितियों में नायिका को अपने सिद्धांतों और विश्वास की परीक्षा देनी पड़ती है, लेकिन वह अपने आदर्शों से नहीं डिगती।
सत्य की विजय: अंततः सत्य की जीत होती है और नायिका का संघर्ष सफल होता है। यह घटना यह संदेश देती है कि सच्चाई की राह पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजयी होता है।


यह खण्डकाव्य केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन के नैतिक मूल्यों और सत्य की शक्ति का प्रतीक है, जो समाज को सच्चाई और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।


Question 49:

'आलोक-वृत्त' खण्डकाव्य के आधार पर 'कस्तूरबा गांधी' का चरित्र-चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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'आलोक-वृत्त' खण्डकाव्य में कस्तूरबा गांधी का चरित्र भारतीय नारी की सहनशीलता, त्याग और देशभक्ति का प्रतीक है। वह केवल महात्मा गांधी की पत्नी ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी थीं।


सहयोग और समर्थन: कस्तूरबा गांधी ने अपने पति महात्मा गांधी के आदर्शों और स्वतंत्रता संग्राम में पूर्ण सहयोग दिया। उन्होंने न केवल गृहस्थ जीवन में संतुलन बनाए रखा, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भाग लिया।
त्याग और सहनशीलता: उन्होंने अनेक कठिनाइयों का सामना किया, जेल यात्राएँ कीं और हर परिस्थिति में अपने सिद्धांतों पर अडिग रहीं। उनका जीवन त्याग और सहनशीलता का अनुपम उदाहरण है।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: कस्तूरबा गांधी ने सत्याग्रह और अन्य आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने महिलाओं को संगठित किया और सामाजिक सुधारों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नारी सशक्तिकरण की प्रतीक: वे भारतीय नारी शक्ति की प्रतीक थीं, जिन्होंने पारिवारिक दायित्वों को निभाने के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी योगदान दिया।


कस्तूरबा गांधी का चरित्र भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में त्याग, सेवा और नारी सशक्तिकरण का संदेश देता है। वह केवल एक आदर्श पत्नी ही नहीं, बल्कि संघर्ष और निष्ठा की प्रतिमूर्ति भी थीं।


अथवा

Question 50:

'आलोक-वृत्त' खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।

Correct Answer:
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'आलोक-वृत्त' खण्डकाव्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गांधी के जीवन से प्रेरित एक महत्वपूर्ण काव्य है, जो आदर्शों, त्याग और संघर्ष की भावना को दर्शाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह खण्डकाव्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं पर आधारित है और सत्याग्रह, अहिंसा और स्वराज की भावना को प्रकट करता है।
महात्मा गांधी के आदर्श: इसमें गांधी जी के जीवन, उनके संघर्षों और उनके सिद्धांतों का गहराई से वर्णन किया गया है।
नारी शक्ति का चित्रण: कस्तूरबा गांधी के योगदान को विशेष रूप से उजागर किया गया है, जिससे यह काव्य नारी सशक्तिकरण की प्रेरणा भी देता है।
त्याग और सेवा का संदेश: यह काव्य पाठकों को त्याग, सेवा और देशभक्ति का महत्व समझाने का प्रयास करता है।
सरल और प्रवाहमयी भाषा: इसकी भाषा सहज, प्रभावशाली और ओजपूर्ण है, जिससे पाठक इसकी गहराई को आसानी से समझ सकते हैं।


'आलोक-वृत्त' खण्डकाव्य केवल ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन मात्र नहीं है, बल्कि यह समाज में नैतिकता, त्याग और सेवा की भावना को जागरूक करने का एक सशक्त माध्यम भी है।


Question 51:

निम्नलिखित संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए।

संस्कृतसाहित्यस्य आदिकविः वाल्मिकीः; महर्षिव्यासः, कविकुलगुरुः कालिदासः अन्ये च भास - भारवि भवभूत्यादयो महाकवयः स्वकीयैः ग्रन्थरत्नैः अद्यापि पाठकानां हृदि विराजन्ते । इयं भाषा अस्माभिः मातृसमं सम्माननीया, वन्दनीया च यतो भारतमातुः स्वातन्त्र्यं गौरवम्, अखण्डत्वं सांस्कृतिकमेकत्वञ्च संस्कृतेनैव सुरक्षितुं शक्यन्ते । इयं संस्कृतभाषा सर्वासु भाषासु प्राचीनतमा श्रेष्ठा चास्ति । ततः सुष्ठुक्तम् 'भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती' इति ।

Correct Answer:
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संस्कृत साहित्य के आदिकवि वाल्मीकि, महर्षि व्यास, कविकुलगुरु कालिदास तथा अन्य महाकवि जैसे भास, भारवि और भवभूति अपने ग्रंथों के माध्यम से आज भी पाठकों के हृदय में विराजमान हैं। यह भाषा हमारी मातृभाषा के समान सम्माननीय और वंदनीय है, क्योंकि भारत माता की स्वतंत्रता, गौरव, अखंडता और सांस्कृतिक एकता को संस्कृत भाषा के माध्यम से ही सुरक्षित रखा जा सकता है। संस्कृत भाषा सभी भाषाओं में प्राचीनतम और श्रेष्ठतम मानी जाती है। अतः यह उचित रूप से कहा गया है कि 'भाषाओं में मुख्य, मधुर और दिव्य भाषा गीर्वाणभारती (संस्कृत) ही है।'


अथवा

Question 52:

निम्नलिखित संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए।

महामनस्विनः मदनमोहनमालवीयस्य जन्म प्रयागे प्रतिष्ठितपरिवारेऽभवत् । अस्य पिता पण्डितव्रजनाथमालवीयः संस्कृतस्य सम्मान्यः विद्वान् आसीत् । अयं प्रयागे एवं संस्कृतपाठशालायां. राजकीयविद्यालये म्योरसेण्ट्रलमहाविद्यालये च शिक्षां प्राप्य अत्रैव राजकीयविद्यालये अध्यापनम् आरब्धवान् । युवकः मालवीयः स्वकीयेन प्रभावपूर्ण भाषणेन जनानां मनांसि अमोहयत् । अतः अस्य सुहृदः तं प्राड्विवाकपदवीं प्राप्य देशस्य श्रेष्ठतरां सेवां कर्त्तुं प्रेरितवन्तः । तदनुसारम् अयं विधिपरीक्षामुत्तीर्य प्रयागस्थे उच्चन्यायालये प्राड्विवाककर्म कर्तुमारभत् । विधेः प्रकृष्टज्ञानेन मधुरालापेन उदारव्यवहारेण चायं शीघ्रमेव मित्राणां न्यायाधीशानाञ्च सम्मानभाजनमभवत् ।

Correct Answer:
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महान आत्मा वाले मदन मोहन मालवीय का जन्म प्रतिष्ठित परिवार में प्रयाग में हुआ था। उनके पिता, पंडित ब्रजनाथ मालवीय, संस्कृत के सम्मानित विद्वान थे। उन्होंने अपनी शिक्षा प्रयाग की संस्कृत पाठशाला, राजकीय विद्यालय और म्योर सेंट्रल महाविद्यालय में प्राप्त की। इसके पश्चात, उन्होंने राजकीय विद्यालय में अध्यापन कार्य आरंभ किया।

युवा मालवीय अपने प्रभावशाली भाषणों से जनमानस को आकर्षित करने में सक्षम थे। इसी कारण, उनके मित्रों ने उन्हें विधि की उच्च शिक्षा प्राप्त कर देश की श्रेष्ठतम सेवा करने के लिए प्रेरित किया। तदनुसार, उन्होंने विधि परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रयाग उच्च न्यायालय में वकालत का कार्य आरंभ किया। अपनी उत्कृष्ट विधि-ज्ञान, मधुर भाषण शैली और उदार व्यवहार के कारण वे शीघ्र ही अपने मित्रों और न्यायाधीशों के सम्मान का पात्र बन गए।


Question 53:

निम्नलिखित संस्कृत पद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए।

प्रजानां विनयाधानाद् रक्षणाद् भरणादपि ।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः ।।

Correct Answer:
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सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक में सच्चे पिता की पहचान का वर्णन किया गया है, जो केवल जन्मदाता ही नहीं, अपितु पालन-पोषण और संरक्षण प्रदान करने वाला भी होता है।

अनुवाद:
जो व्यक्ति अपनी प्रजा को विनय (शिष्टाचार), सुरक्षा और पालन-पोषण प्रदान करता है, वही उनका वास्तविक पिता कहलाता है। जन्म देने वाले माता-पिता केवल जन्मदाता होते हैं, लेकिन जो व्यक्ति जीवनभर उनके पालन-पोषण, रक्षा और मार्गदर्शन का उत्तरदायित्व निभाता है, वही सच्चे अर्थों में पिता की भूमिका निभाता है।


अथवा

Question 54:

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परपीडनाय ।
खलस्य साधोः विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ।।

Correct Answer:
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सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक में सज्जन और दुष्ट व्यक्तियों के स्वभाव में अंतर बताया गया है। यह श्लोक दर्शाता है कि एक ही वस्तु का प्रयोग भिन्न व्यक्तियों द्वारा भिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

अनुवाद:
दुष्ट व्यक्ति विद्या का उपयोग केवल वाद-विवाद करने के लिए, धन का उपयोग अहंकार बढ़ाने के लिए और शक्ति का प्रयोग दूसरों को पीड़ा देने के लिए करते हैं। इसके विपरीत, सज्जन व्यक्ति विद्या को ज्ञान के प्रचार के लिए, धन को दान के लिए और शक्ति को दूसरों की रक्षा के लिए प्रयोग करते हैं।


निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए:

Question 55:

काकः उलूकस्य विरोधं कथम् अकरोत् ?

Correct Answer:
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काकः उलूकस्य विरोधं तस्य निशाचर स्वभावस्य कारणात् अकरोत्। काकः दिवा विचरति, किन्तु उलूकः रात्रौ गच्छति। उभयोः वृत्तिः भिन्ना आसीत्, अतः काकः उलूकस्य स्वभावं न स्वीचक्रे। तस्मात्, काकः उलूकस्य मित्रत्वं न अङ्गीचक्रे एवं विरोधः अभवत्।


Question 56:

रविः जलं किमर्थम् आदत्ते ?

Correct Answer:
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रविः जलं वाष्पीकरणाय आदत्ते। सः जलं आदत्ते यथा उष्णता प्राप्य वाष्परूपेण गच्छेत्, एवं वर्षाकाले पुनः वर्षति। अयं चक्रः निरन्तरं प्रवर्तते।


Question 57:

दयानन्दस्य पितुः नाम किम् आसीत् ?

Correct Answer:
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दयानन्दस्य पितुः नाम करशनजी आसीत्। सः एकः धर्मनिष्ठः एवं विद्वान् पुरुषः आसीत्। तस्य संयोगेनैव दयानन्दः बाल्यकालात् संस्कृताध्ययनं कृतवान्।


Question 58:

चीन-भारत - देशो कस्मिन् धर्मे निष्ठावन्तौ ?

Correct Answer:
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चीन-भारत - देशौ बौद्धधर्मे निष्ठावन्तौ। भारतं बौद्धधर्मस्य जन्मभूमिः आसीत्, यः पश्चात् चीनदेशे अपि प्रचारितः। बुद्धस्य शिक्षाः उभयोः देशयोः महत्त्वपूर्णाः सन्ति।


Question 59:

‘श्रृंगार' रस अथवा 'रौद्र' रस की परिभाषा लिखकर एक उदाहरण दीजिए।

Correct Answer:
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श्रृंगार रस:
श्रृंगार रस प्रेम, सौंदर्य और आकर्षण को दर्शाने वाला रस है। यह मुख्यतः रति भाव से उत्पन्न होता है। इसका स्थायी भाव ‘रति’ होता है और यह विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों द्वारा पुष्ट होता है।

उदाहरण:
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भवन में करत हैं, नैनन ही सों बात॥
(इस दोहे में नायक-नायिका के नेत्रों के संकेत से होने वाली श्रृंगारिक चेष्टाओं का वर्णन किया गया है।)

रौद्र रस:
रौद्र रस क्रोध, वीरता और प्रतिशोध को व्यक्त करने वाला रस है। इसका स्थायी भाव ‘क्रोध’ होता है और यह विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों द्वारा प्रकट होता है।

उदाहरण:
क्रोध में भरि भृकुटि चढ़ाए, कर सृजन संहार को।
रौद्र रूप धरि काल बन, रचहिं सृजन संहार को॥
(इस दोहे में युद्ध की स्थिति और क्रोध के भाव को अभिव्यक्त किया गया है।)


Question 60:

'श्लेष' अलंकार अथवा 'उत्प्रेक्षा' अलंकार की परिभाषा लिखकर एक उदाहरण दीजिए।

Correct Answer:
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श्लेष अलंकार:
जिसमें एक ही शब्द के एकाधिक अर्थों का प्रयोग करके काव्य में विशेष सौंदर्य उत्पन्न किया जाता है, उसे श्लेष अलंकार कहते हैं। इसमें शब्दों की पुनरुक्ति नहीं होती, किंतु उनके एक से अधिक अर्थ ग्रहण किए जा सकते हैं।

उदाहरण:

सानी सानी गिरधारी को सानी।
(यहाँ 'सानी' शब्द के दो अर्थ हैं - 'समान' और 'चारा'। गिरधारी भगवान श्रीकृष्ण का नाम भी है और यहाँ उनके अद्वितीय होने का संकेत किया गया है।)

उत्प्रेक्षा अलंकार:
जब किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति की उपमा इस प्रकार दी जाए कि उसमें कल्पना का अधिक प्रभाव हो और ऐसा प्रतीत हो कि वह वस्तु या व्यक्ति वास्तव में वैसा ही है, तो उसे उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं। इसमें 'मानो', 'जैसे', 'लगे', 'प्रतीत हो' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण:
सुरसरिता सम मंजु मृदु बानी।
(यहाँ वाणी को गंगा के समान कोमल और मधुर बताया गया है, मानो वह वास्तव में गंगा ही हो।)


Question 61:

‘बरवै' छन्द अथवा 'इन्द्रवज्रा' छन्द की सोदाहरण परिभाषा लिखिए।

Correct Answer:
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बरवै छन्द:
बरवै छन्द एक मात्रिक छन्द है, जिसमें प्रत्येक चरण में 7+4 अर्थात 11 मात्राएँ होती हैं। यह दो पंक्तियों में विभाजित होता है और इसके अंत में गुरु मात्रा होती है। इसे विशेष रूप से भक्ति एवं नीति विषयक काव्य रचनाओं में प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण:
बरवै खेलत स्याम बिहारी।
गोपिन संग मन मोहनि हारी॥
(इसमें प्रत्येक चरण में 7+4 = 11 मात्राएँ हैं।)

इन्द्रवज्रा छन्द:
इन्द्रवज्रा छन्द संस्कृत का एक प्रमुख वर्णिक छन्द है, जिसमें प्रत्येक पंक्ति में 11 वर्ण होते हैं। इसकी गति ‘गुरु-लघु-गुरु-गुरु-लघु-गुरु-लघु-गुरु-लघु-गुरु’ होती है। यह छन्द वीर रस से ओतप्रोत काव्यों में प्रयुक्त होता है।

उदाहरण:
वज्रं चक्रं च कृपाणमासिजम्।
(इसमें 11 वर्ण हैं और वर्णक्रम इन्द्रवज्रा छन्द के अनुरूप है।)


Question 62:

गरीबी उन्मूलन में जनसंख्या-निवारण का महत्त्व

Correct Answer:
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N/A


Question 63:

प्राकृतिक आपदाएँ: कारण और निवारण

Correct Answer:
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N/A


Question 64:

महिला सशक्तीकरण और उसके परिणाम

Correct Answer:
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N/A


Question 65:

कम्प्यूटर की उपयोगिता

Correct Answer:
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Question 66:

साहित्य का उद्देश्य

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Question 67:

'पवित्रम्' का सन्धि-विच्छेद होगा:

  • (अ) पे + इत्रम्
  • (ब) पव + इंत्रम्
  • (स) पवि + त्रम्
  • (द) पो + इत्रम्
Correct Answer: (स) पवि + त्रम्
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Question 68:

'योद्धा' का सन्धि-विच्छेद होगा:

  • (अ) युध् + तृन्
  • (ब) युद्ध + आ
  • (स) योध् + धा
  • (द) यो + धा
Correct Answer: (अ) युध् + तृन्
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Question 69:

'इतस्ततः' का सन्धि-विच्छेद है:

  • (अ) इतः + ततः
  • (ब) इतस् + ततः
  • (स) इतर + ततः
  • (द) इतश् + ततः
Correct Answer: (ब) इतस् + ततः
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Question 70:

'निर्दोष' में समास है:

  • (अ) कर्मधारय
  • (ब) बहुव्रीहि
  • (स) अव्ययीभाव
  • (द) तत्पुरुष
Correct Answer: (द) तत्पुरुष
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Question 71:

'चराचरम्' में समास है:

  • (अ) कर्मधारय
  • (ब) अव्ययीभाव
  • (स) द्विगु
  • (द) बहुव्रीहि
Correct Answer: (अ) कर्मधारय
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Question 72:

'नीत्वा' शब्द में प्रत्यय है:

  • (अ) क्त
  • (ब) क्त्वा
  • (स) तव्यत्
  • (द) त्व
Correct Answer: (ब) क्त्वा
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'नीत्वा' शब्द में प्रत्यय 'क्त्वा' है। 'नी' धातु में 'क्त्वा' प्रत्यय जुड़ने से यह रूप बनता है। संस्कृत में 'क्त्वा' प्रत्यय किसी कार्य के समाप्त होने के संकेत के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे 'गत्वा' (जाकर), 'पीत्वा' (पीकर)।


Question 73:

'इयान्' में प्रत्यय है:

  • (अ) अनीयर
  • (ब) मतुप्
  • (स) वतुप्
  • (द) तव्यत्
Correct Answer: (अ) अनीयर
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'इयान्' में 'अनीयर' प्रत्यय है। यह विशेषण निर्माण के लिए प्रयुक्त होता है और अधिकता (comparative degree) को दर्शाता है। संस्कृत में 'श्रेष्ठ' या 'अधिक श्रेष्ठ' दिखाने के लिए 'अनीयर' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, जैसे 'बलवान्' (बलशाली) से 'बलवत्तर' (अधिक बलशाली)।


Question 74:

'हा ! कृष्णाभक्तम्'|

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वाक्य में 'कृष्णाभक्तम्' शब्द द्वितीया विभक्ति (Accusative Case) में प्रयुक्त हुआ है। यह संज्ञा पुरुषवाचक संज्ञा 'कृष्णभक्त' का द्वितीया रूप है, जो कर्ता द्वारा प्रभावित होने वाले कर्म को दर्शाता है।

नियम: द्वितीया विभक्ति उस संज्ञा के लिए प्रयुक्त होती है, जो क्रिया का सीधा प्रभाव झेलती है। जैसे:
- अहम् रामम् वन्दे। (मैं राम को प्रणाम करता हूँ।)
- सा पुस्तकम् पठति। (वह पुस्तक पढ़ती है।)


Question 75:

देवेभ्यः स्वाहा

Correct Answer:
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वाक्य में 'देवेभ्यः' शब्द चतुर्थी विभक्ति (Dative Case) में प्रयुक्त हुआ है। यह 'देव' शब्द का बहुवचन रूप है और किसी के लिए या किसी को समर्पण करने की भावना को व्यक्त करता है।

नियम: चतुर्थी विभक्ति उस संज्ञा के लिए प्रयुक्त होती है, जो क्रिया का प्राप्तकर्ता होती है। यह 'के लिए' या 'को' के अर्थ में प्रयुक्त होती है। जैसे:
- अहम् मित्राय पत्रं लिखामि। (मैं मित्र को पत्र लिखता हूँ।)
- सः राज्ञे पुष्पाणि ददाति। (वह राजा को फूल देता है।)


Question 76:

त्वं मया सार्धम् आपणं चल

Correct Answer:
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वाक्य में 'मया' शब्द तृतीया विभक्ति (Instrumental Case) में प्रयुक्त हुआ है। यह 'अहम्' सर्वनाम का तृतीया विभक्ति रूप है और किसी कार्य को करने के साधन या सहयोगी को दर्शाता है।

नियम: तृतीया विभक्ति किसी क्रिया के लिए उपकरण (Instrument) या किसी के साथ (With) होने को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होती है। जैसे:
- सः शस्त्रेण युद्धं करोति। (वह शस्त्र से युद्ध करता है।)
- अहम् गुरुणा सह गच्छामि। (मैं गुरु के साथ जाता हूँ।)


Question 77:

अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को एक प्रार्थना पत्र लिखिए, जिसमें अपने माता-पिता के साथ 'केदारनाथ यात्रा' पर जाने के लिए दस दिन के अवकाश की माँग की गयी हो।

Correct Answer:
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दिनांक: [आपकी तिथि]

सेवा में,

प्रधानाचार्य महोदय

[विद्यालय का नाम]

[विद्यालय का पता]


विषय: केदारनाथ यात्रा हेतु दस दिन के अवकाश हेतु प्रार्थना पत्र।

माननीय महोदय,


सविनय निवेदन है कि मैं [आपका नाम], कक्षा [आपकी कक्षा] का छात्र हूँ। मेरे माता-पिता के साथ इस वर्ष 'केदारनाथ यात्रा' पर जाने की योजना बनी है। यह यात्रा धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है और हमारे परिवार के लिए एक विशेष अनुभव रहेगा।

यात्रा का समय दस दिनों का रहेगा, अतः मैं आपसे दिनांक [आरंभ तिथि] से [समाप्ति तिथि] तक के लिए अवकाश की अनुमति प्रदान करने की विनम्र प्रार्थना करता हूँ। मैं यह सुनिश्चित करता हूँ कि वापसी के बाद अपनी पढ़ाई की पूरी भरपाई करूँगा।

अतः महोदय से निवेदन है कि कृपया मुझे उक्त अवधि के लिए अवकाश प्रदान करने की कृपा करें। आपकी अनुमति के लिए मैं सदैव आभारी रहूँगा।

धन्यवाद।


सधन्यवाद,

[आपका नाम]

कक्षा - [आपकी कक्षा]

[विद्यालय का नाम]


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